गुरुवार, 23 अगस्त 2018








" मनीषा ,,,,,,," 


     बहुत दिनों तक ,   यूनियन लीडर होने  की विद्रोही छवि के कारण , मेरा विभाग , ,मुझे   तहसील स्तर की   जगहों पर पोस्ट करता रहा    ! कभी कभी तो शुद्ध डकैत क्षेत्रों में  सहायक यंत्री  के ,    उपसंभागीय पद पर मुझे  तहसील क्षेत्र के सघन वनो के अंदर ,  विद्युतीकरण का कार्य देखना पड़ा ! जब बच्चे बड़े होने लगे , तो स्थायित्व  की चिंता सताने लगी ! ईश्वर का  सहारा था तो   ईश्वर  ने साथ दिया , और स्वयमेव बिना किसी की शिफारिश के , कमिश्नरी स्तर  के एक  बड़े  शहर में पोस्टिंग  मिल गयी !

   एक शुभाकांक्षी , वरिष्ठ साथी ने कहा की अब , प्रशाशन से लड़ाई बंद करो , और यहां जम कर रहो , ताकि बच्चे स्थिर हो कर अपनी पढ़ाई पूरी  कर सकें ,,,,, तो बात मान ली !

   यह राजनीति ग्रसित शहर था , किन्तु ब्राम्हणो का वर्चस्व होने के कारण , मुझे स्वयमेव ही सुरक्षा की छतरी , ब्राम्हण होने के कारण मिल गयी , और धीरे धीरे मैं भी उस शहर में ' अंगद का पैर  " बन गया ! फ़ायदा यह हुआ की मेरे बच्चे स्थिर हो कर पढ़े , और उनकी पढ़ाई इस शहर में ही पूर्ण हुई !  इस शहर में रहते हुए कई अनुभूतियों का पिटारा मेरी यादों में है , जिसका ,,जिक्र  आगे  फिर कभी   करूंगा !
       कई वर्ष पूर्ण होने पर बदलाव ने दस्तक दी , और उसी के साथ , ब्राम्हण वर्चस्व का गणित बदल गया !  ,,,लेकिन बदलाव होते ही , जो लोग शहर के देवता की तरह पुजते  थे , वही अब दानव मान लिए गए ! शिकायतें यह हुईं  की " ब्राम्हणो " ने मिल कर इस क्षेत्र में बड़ी मनमानी की है   , और जो ब्राम्हण यहां पदस्थ हैं  , अगर उन्हें नहीं हटाया गया , तो  क्षेत्र गर्त में  डूब  जाएगा ! दुर्भाग्य से मैं भी ब्राम्हण , था और बहुत समय से  , वहां राज कर रहा  था तो मुझे पहली लिस्ट में ही चिन्हित कर लिया गया  ,,, और तुरंत मेरा स्थानांतरण , प्रदेश की उत्तरी सीमा से सीधी दक्षिणी छोर पर बने एक आदिवासी जिले ,  में कर दिया गया !!

  नौकरी में , जातिवाद , इतना ज्यादा प्रभाव करेगा , यह मैंने सोचा ना था ! लेकिन मन  ने कहा ,,,यार ,,!!  इतने दिनों तक ब्राम्हण होने का सुख उठाये हो , तो अब विभाग में ब्राम्हण होने का दुःख भी  झेलो ! ईश्वर वादी होने के कारण , मन ने यह भी कहा ,,,," जो होता है भले के लिए होता है ,,,यह जान लो " ,,तो चुपचाप छह चकों के ट्रक में , चार बच्चों के कारण ,पिछले ३५ वर्षों की जोड़ी गृहस्थी , ठूंस ठूंस कर ,  भर कर,   वहां आदिवासी  जिले में  चला गया जहां आने जाने का साधन सिर्फ सड़क मार्ग था !  उबड़ खाबड़ मार्ग पर  सामान तो टूटा ही , मन भी , एक शहर में बने साहित्यिक मित्रों   को छोड़ने के दुःख के कारण  दुखी हो  गया !

    माँ  नर्मदा के किनारे बसे  इस शांत शहर को देख कर  लगा की सच में जो होता है भले के लिए ही होता है !  विभागीय कालोनी में क्वार्टर अलॉट हो गया , और बच्चे भी पढ़ाई पूरी  कर लेने के बाद , अपने अपने लक्ष्य पूरा करने अन्य विभिन्न शहरों में बिखर गए !  सिर्फ सबसे छोटी बेटी  अपनी शेष पढ़ाई के लिए मेरे साथ थी ! ,, यह क्षेत्र पूरी  तरह आदिवासी क्षेत्र था , जिन्हे  विकसित करने के लिए , सरकार कई वर्षों से भागीरथी प्रयास  कर रही थी ! जिला छोटा था ,और मुझे अब शान्ति चाहिए थी ,,,,तो ,, मुझे ईश्वर कृपा से मेरा मनचाहा काम , जिले के  आफिस के अधिकारी के रूप में मिल गया ! आफिस का काम , और बिलिंग , तथा , कम्प्यूटर सेक्शन के प्रभारी के रूप में , मुझे नयी नयी योजना बनाने  का काम भी सौंप दिया गया !

  जल्दी ही वहां भी बदलाव हुआ  और हमारे एक उच्च अधिकारी ,' शिवांग '   साहब की पोस्टिंग हुई ! उनकी पोस्टिंग के साथ  ही  ,  सभी दफ्तरों में , बाबुओं में कानाफूसी होने लगी , और ' शिवांग " का अर्थ जानने की जिज्ञासा  की सब के मन ,में हिलोरें उठाने  लगीं !
      तब तक कुछ लोग जान चुके थे की मेरी साहित्य में रूचि है , तो वे मेरे पास आकर , फुसफुसा कर पूछने लगे ,,," सर ,,,ये  "शिवांग " किस  जाति  में आते हैं ,,,? , अभी तक तो हमने ऐसा कोई सरनेम नहीं सुना  है ,,क्या आप जानते हैं ,,ये कौन हैं ,,,कहाँ से हैं ,,?? "  !
     लेकिन यह सरनेम तो मैंने भी नहीं सुना  था और दुर्भाग्य से मैं उन्हें पहले से जानता भी नहीं था ! मुझे लगा , की बाबू लोग , आदतन , नए अधिकारी के बारे में जान कर , अपनी गोटी बैठाने के लिए मुझसे इंक्वायरी कर रहे हैं !  तो मैंने कहा --" यह नाम तो मैं भी नहीं जानता , और जानने से मुझे क्या फर्क पडेगा ,,?? जब आ जाएँ तभी जान लेना ! "
       उस आदिवासी बाहुल्य जिले में , मेरे आफिस में , जो कुछ  सीनियर बाबू थे , वे सवर्ण  भी थे ! वे लोग किंचित मुस्करा कर बोले ,,," सर हम जानते हैं ,,,यह सरनेम '   एस सी / एस  टी  में होता है ,,,और यह साहब , इस कोटे से ही जल्दी जल्दी प्रमोशन पा कर इस पोस्ट पर आये है !  यह एस सी हैं ,,,! "

    मैं समझ गया ,,,  एस सी मायने --" दलित " ,,!!
   ,,,  मुझे लगा की सरकारी हर विभाग में , अभी भी व्यक्ति अपनी तकनीकी , और अनुभव की  योग्यता से  ज्यादा ,  जात  पांत से ही जाना जा रहा है ! पिछले शहर में भी ब्राम्हण होने की योग्यता ने मुझे वहां टिक कर रहने का अवसर दिया था ,,,यहां भी बहुत से लोग ब्राम्हण होने के कारण  मुझे मान्यता दे रहे हैं , जबकि एक उच्च पद पर आने वाले अधिकारी की पहली जांच वे उसकी जाति   आधार पर ही करने को आतुर हैं !
 भले ही विभिन्न सरकारें , सामाजिक न्याय और सामान अधिकार के नाम पर , पानी की तरह पैसा बहा कर , सामाजिक समरसता की ककहरे बांच रही थी ,,,लेकिन विडम्बना ही थी की अभी धरातल पर यह समभाव नहीं उतारा था !
   जल्दी ही नए अधिकारी आ गए ! कुछ ही मीटिंगों में हमने और बाबू स्टाफ ने यह जान लिया की वे कार्य में चतुर , अनुभवी , और दृढ निश्चय के साथ फैसले लेने वाले व्यक्ति हैं ! उन्हें बाबुओं की बैसाखी पर चलने की आदत नहीं थी , और वे विभाग में भी एक  अच्छे  ,  विशिष्ट  , अधिकारी के रूप में अपनी साख रखते थे  ! उन्होंने अपनी अनुभवी पारखी निगाह से जल्द्दी ही आलसी , कामचोर , बहाने बाज , बाबुओं , और मेहनती , लगनशील बाबुओं को अलग अलग पहचान लिया , और छटनी करके , महत्वपूर्ण कार्य , लगनशील लोगों को , तथा , अनुपयोगी कार्य बहानेबाज बाबुओं को बाँट दिए !
     फलस्वरूप , कुछ लोग उनकी तारीफों के  पुल  बांधने लगे , और कुछ उनकी जाति  पर तरस खाकर ,उन्हें कोसने लगे !

 ,,,,दफ्तर का काम तो सुचारु रूप से चलने लगा , किन्तु घर अभी अव्यवस्थित ही था ! एक कामवाली की तलाश जारी थी ,,,लेकिन सही कामवाली नहीं मिल रही थी ! अचानक एक दिन , एक लड़की हमारे घर के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी ! वह  युवा थी , और बहुत सलीके से वेश भूषा बनाये  हुई थी ! पूछा ,,, तो बोली--"  मैं काम करना चाहती हूँ ,,, जो सही लगे वह दे दीजियेगा ,,,मुझे काम की जरुरत है,,"  !
     पत्नी ने पूछा ,,, " किस   जाति  से हो बाई ,,?? ",,,
    तो वह सकुचाते हुए बोली ,,,' अहीर  हैं ' ! नाम "    मनीषा  " है  "  ! ,
     ,,  पत्नी आश्वश्त हो गयी ,,,,,,अहीर  मायने ,गाय चराने वाला  ,,!
       तो अहीर  से तो काम लिया  सकता है  क्यूंकि पत्नी नहीं चाहती थी की वह किसी छोटी  दलित जाति  से काम करवाए ,,,! उसे लगता था की ,,,चौके में जा कर , बर्तन समेटने में भी अच्छी  जाति  की ही कामवाली प्रवेश करे ! इसीलिये वह बहुत दिनों से ऐसी ही कामवाली के इंतज़ार में थी !
----- लिहाजा उस लड़की को तुरंत काम पर लगा लिया गया ! वह बहुत सुघढ़ ढंग से काम करने लगी ,,,और बिना किसी शिकायत के समय पर घर आ जाती !
      धीरे धीरे ,, मेरी पत्नी का विश्वाश बढ़ता गया ,,और वह लड़की भी अपने मन से कई दायित्व आगे बढ़ कर सम्हालने लगी ! मेरी सबसे छोटी बेटी , मेरे साथ ही रहती थी ! उसने वहीं कम्प्यूटर कोर्स ज्वाइन कर लिया था और बीएससी की डिग्री की पढ़ाई करने लगी ! जल्दी ही मेरी बेटी का लगाव भी उस लड़की से हो गया , और वह उसके घर की बातों के बारे में पूछने लगी ! लड़की ने कहा की वह सिर्फ पांचवी तक ही पढ़ पाई थी , तभी उसके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और उसकी  माँ  को छोड़ दिया ! मजबूरी की स्थिति में वह गावं छोड़ कर माँ  के साथ  इस शहर में चली आयी थी  ! माँ  अक्सर बीमार रहने लगी तो उसने काम ढूंढा  , और अब धीरे धीरे उसे काम मिल गया है इसलिए अब उसके  घर की  जीविका चलने लगी है !
  मेरी बेटी को उससे सहानुभूति हो गयी !  उसने  उसके लिए छठवीं  कक्षा की किताबें  खरीद , दीं   और  उसे  एक घंटा घर में ही पढ़ाने लगी ! !

    लड़की बहुत प्रसन्नता से समय देते हुए , मनोयोग से पढ़ने लगी ! इधर , मेरी पत्नी भी उससे खुश हो कर उससे किचिन में चाय बनवाने लगी , और धीरे धीरे , वह  किचिन में उसके साथ  रोटियां सेकने की मदद भी करने लगी !  छोटे मोटे  ,, नास्ते ,,,पकौड़ी   तलने का काम भी उसने अपने हाथ में ले लिया और सुबह आकर वह  सेंडविच , और पकौड़ी भी  सुघड़ता से बना लेती ! हमने धीरे धीरे उसे घर का मेंबर ही मान लिया और वह  हमारे घर में एक सदस्य के रूप में रम गयी !

   घर व्यवस्थित होने पर , घर में , साथी इंजीनियरों का , और अधीनस्थ बाबुओं का भी आनाजाना शुरू हो गया ! कभी कभी छोटे पद पर कार्य रत चौकीदार , और चपरासी पद के लोग भी आ जाते ,,तो वे चाय पीने के बाद   हमारे घर में ,काम करने वाली  लड़की से अलग से पानी मांगते  , और कप खुद धो कर  वापिस रख देते ! मेरे मना करने पर वे जीभ निकाल कर कहते , --" वर्षों से चाकरी और सेवा की है , आप ब्राम्हण हैं !   , हम आपके घर झूठा  कप छोड़ कर कैसे जा सकते हैं" ?,,,
 मेरी पत्नी मुझे टोक देती थी की ,,,"  जो रिवाज है , उसे चलने दो , ,,वे मन से करते हैं तो तुम्हे क्या पडी है जो तुम अपनी अलग मुर्गे की डेढ़  टांग लगाओ " ,!

  लेकिन  एक दिन,,,एक विचित्र बात हुई ! हमारे आफिस के बड़े बाबू ,,,,, जिनसे हमारी थोड़ी  मित्रता  हो गयी थी , अपने दो भाइयों के साथ , मुझसे मिलने मेरे घर आये ! बड़े बाबू एक कुलीन ब्राम्हण थे , और उनका बड़ा आदर  शहर के  समाज , और शहर में , पूज्य ब्राम्हणो के रूप में होता था ! वे नगर के  सर्व  ब्राम्हण समाज के अध्यक्ष भी थे ! वे मुझे आग्रह करके एक बार सर्व समाज ब्राम्हण की बैठक में भी  ले गए थे ,, जहां मेरा भी बहुत आदर किया गया ! एक तो मैं एक  बड़ा विद्युत् अधिकारी था , , और वह भी ब्राम्हण ,,,,, तो ब्राम्हण  समाज ने मुझे खासी इज्जत दी !
   बड़े बाबू अक्सर आ जाया करते थे और मेरी पत्नी उनके लिए चाय नास्ते का इंतजाम कर दिया करती थीं !       वे ,पहले भी  कई बार आ कर हमारे  घरमें चाय नास्ता कर गए थे !
 उस दिन जब वे अपने भाइयों के साथ आ कर बैठे , और विभिन्न बातों पर चर्चाएं होने लगी , तभी  मनीषा , मेरी पत्नी के निर्देश पर , एक प्लेट में पकौड़ी और तीन चाय ले कर बैठक में  आयी ! उसे देख कर , बड़े बाबू के भाइयों ने कौतुहल से पूछा --" यह  आपकी  बिटिया है क्या ,,?? "
  मेने बताया  _  "  नहीं यह कामवाली है , इसके हाथ की बनी  चाय पकौड़ियाँ तो आप पहले भी कई बार खा चुके हैं ,,बड़ी स्वादिष्ट बनाती है ! "
 बड़े बाबू के भाइयों ने उससे पूछा  --" कहाँ की हो बिटिया ,,?  इसी शहर की ?? "   तो मनीषा चुप हो गयी ! मैंने कहा --" यह निकट के किसी गावं की है ,, वक्त की मार के कारण ,   अपनी  माँ  के साथ यहाँ शहर में आ कर रह रही है ,,,बहुत अच्छा काम करती है ! "
 इस बार बड़े बाबू के तिलकधारी , और बड़ी सी पाण्डित्याइ  चोटी  रखे , एक  भाई ने पूछा --" बताया नहीं    बिटिया किस गावं की हो ,,?
 "  मनीषा ने अटक अटक कर बताया ---" परसवाड़ा  की " ,,!
" ----" परसवाड़ा की ,,?? " ,,,अरे वह तो हमारा ही गावं है ,,,तुम किसकी बेटी हो ,,?? "  इस बार बड़े बाबू ने    खुद भौंहे सिकोड़ते हुए  पूछा  !
  मनीषा के मुँह पर हवाइयां उड़ने लगी , वह नर्वस हो गयी !
बड़े बाबू के भाई ने  पूछा ,," अपने पिता  का नाम बताओ ,,"!
 मनीषा मेरी और ताकने लगी ! मुझे साफ़ दिखाई देने लगा की वह घबरा गयी है !
 मैंने कहा --"  डरती  क्यों हो ,,अपने पिता का नाम बता दो ना ,," !
 मनीषा ने धीमे स्वर में बताया ---" रामदीन " ,,!
   " रामदीन ,,,?? " वह तो अहिरवार था ,,  ,,,हमारे घर में हरवाहे का  काम देखता था ,,,क्या तुम उसकी बेटी हो ,," ?
   मैंने विवाद किया ,," नहीं ,,,यह तो अहीर है ,,, हो सकता है वह कोई और होगा "
   वे बोले -- " तुम्हारी माँ  का नाम रामकली ही है ना ,,?? "
  मनीषा चुपचाप नीचे देखने लगी !
  बड़े बाबू के भाई बोले ---" इसका पिता ने दूसरी औरत  रख ली थी  ! ये लोग अहीर नहीं अहिरवार हैं ,,, ,,,,,,बाद में इसकी  माँ  घर छोड़ कर चली आयी थी ,,और रामदीन सट्टेबाज़ी में जेल चला गया था ! - मैं इसे   अच्छी तरह से जानता हूँ ! "
   मुझे भी थोड़ा धक्का सा लगा !
 मैंने मनीषा से कहा ,," तुम इन्हे अपने बारे में  सही सही क्यों नहीं बताती कि ,,तुम कौन  हो "
  मनीषा बोलने में खुद को  अशक्त महसूस करने लगी !
   वह  जैसे  असहाय मृगी की तरह खुद को  चतुर शिकारियों से घिरा पा रही हो  , और उसके बोलने की शक्ति ही  जैसे समाप्त हो गयी हो , उसकी हालत ऐसे ही हो गयी ! !
   वह चुपचाप  उन लोगों को ताकती खड़ी रही !
  बड़े बाबू के भाई बोले --" इसकी माँ  अहिरन  थी  , उसने दूसरे गावं से भाग कर रामदीन के साथ शादी की थी ,,,,, लेकिन जल्दी ही दोनों में लड़ाई  हुई  , और राम कली को  उसने छोड़ दिया ! हम लोग इसकी कहानी जानते हैं ! "
   मैं चुप रह गया !
      पकौड़ियाँ और चाय ठंडी हो चुकी थीं ! बड़े बाबू उठ खड़े हुए ,,साथ में उनके तिलकधारी दोनों भाई भी !
     मैंने कहा --" अरे रुकिए चाय तो पी कर जाइये ,,"
  वे बोले---" माफ़ करें शर्माजी , अब हम कुछ नहीं खाएंगे  ! आप  निम्न जाति  के  लोगों  के हाथों की चाय    हमें पिलवाते हैं ,,और उनके ही हाथ का बना नास्ता भी खिलवा  रहे हैं   !  आप ब्राम्हण हो कर , किचन में इन छोटी जाति  के हाथ का बनाया खाना खा रहे हैं ! यह गलत बात है ! "
  वे उठ कर खड़े हो गए , और हाथ जोड़ते हुए बाहर निकल गए !
  पत्नी भी क्रोध करती हुई बाहर निकल आयी !
   वह  बोली --" मनीषा ,,! तुमने तो खुद को अहीर बताया था ,,फिरयह अहिरवार कैसे हो गयीं ,,"
   मनीषा बुझे मन से बोली ,," आंटी ,,! मेरी माँ  तो अहीर ही है ना ,,?? तो मैंने क्या गलत कहा ,,?? मानती हूँ की मेरे पिता ," अहिरवार " हैं , छोटी जाति  के ,  पर  मेरे पिता ने   तो हमें  कब से   छोड़  दिया है  ! "
   ---" वह तो  ठीक है ,,! लेकिन  जाति  तो पिता की ही मानी जाएगी ना ,,??,,, तुम्हारे जाति  छिपा लेने के कारण ,   आज हमें   उन    लोगों से बातें  सुनने  को मिल गयीं   जो हमें ,,, समाज में बहुत मान  देते हैं !  ! "
 
      मैंने बीच में पड़ते हुए कहा --" कोई बात नहीं मनीषा ,,! हमें फर्क नहीं पड़ता ,,,बहुत होगा तो बड़े बाबू हमारे घर नहीं आएंगे ,,,अब अगर नहीं आते हैं तो ना आएं ,,! "

        लेकिन  मनीषा जब वापिस ट्रे ले कर किचिन की और जाने लगी तो मेरी पत्नी  थोड़े सकुचाते हुई बोली   _ " ---" अब आज रहने दो मनीषा,,! मैं देख लुंगी ,,,तुम घर जाओ ,,,कल आना तब बात करेंगे ,,! "

        मनीषा की आँखें भर आईं ,,, बोली --" मेरी गलती माफ़ करें आंटी ,, मैंने कोई झूठ नहीं बोला , ,,मेरी  माँ  अहीर है ,,तो  मैंने खुद को अहीर कह कर काम शुरू कर दिया !   अब मुझे काम से ना हटाइएगा ,,, यह घर अब मुझे अच्छा लगने लगा है,,, दीदी ,,मुझे पढ़ाती भी हैं ,,और मैं काफी पढ़ चुकी हूँ ! "

       तभी मेरी बेटी भी  कालिज से वापिस आ गयी ! उसने पूछा - क्यों रो रही है मनीषा ? "
     ,,,,   अब   हम क्या बताते ,,!
 
      मनीषा ही बोली ,, " मेरे  कारण आज अंकल को कुछ  बातें सुननी पडी !  सब गलती मेरी है ! "

              मेरी बेटी को जब पूरा प्रकरण पता चला तो वह उलटे हम पर ही बिफर गयी !
            बोली --- " जब मेरी सहेलियां आतीं हैं , तो आप   पूछती  हो वह कौन है ,,? , किस  जाति की है ,,?? ,,आप किस युग में रह रहीं है ,शायद जानती नहीं !,, अब कोई जाति  पाँति  नहीं होती ",,! ,,
  ,,,,उसने मनीषा से मुखातिब हो कर कहा ,," मनीषा ,,!!  तुम कहीं नहीं जाओगी यहीं काम करोगी ,,"


          लेकिन मनीषा ने जैसे कुछ  सुना  ही नहीं !  शायद उसे हृदय में कोई गहरी ठेस लगी थी !  वह  चुपचाप , अपनी आँखें पोंछती हुई बाहर चली गयी !

  दूसरे दिन दफ्तर में जब अपने चैंबर में बैठा ,,,तो मुझे लगा कुछ मौहोल अलग सा है ! बड़े बाबू ने बात चारों और फैला दी थी !
  एक नजदीकी मातहत ने पूछा --" अगर आपको खाना  बनाने वाली कोई बाई चाहिए तो बताइयेगा ,,हमारे यहां एक बूढ़ी ब्राम्हणी है ,,, जो कई घर में  खाना बनाती है  ,, थोड़ा चार्ज  जरूर  ज्यादा है ,,लेकिन मेरे कहने से  कम ले लेगी ! " !
 मैंने उसे धन्यवाद कहा और कहा की,,,फिलहाल मुझे कोई जरुरत नहीं !
  उस शाम घर लौटा तो , पत्नी बोली   कि ,,,,मोहल्ले की कई औरतें पूछ रही थीं ,,मनीषा के बारे में ,,!  वे कह रहीं थी कामवाम तो करवा लीजिये , लेकिन किचन का काम ये लोग करें यह ठीक नहीं ! आप को अगर जरुरत है तो किचन के लिए कोई औरबड़ी  जाति  की औरत रख लीजिये !  लोग अच्छा नहीं मानते ,,,छोटी जाति  के हाथों का ,बना   खाना ,,,,,, खाना ! "
मैंने पूछा --"  मनीषा  आयी थी फिर ,,?? "
 पत्नी ने बताया --" नहीं ,,,! वह भी नहीं आयी ,,! कल मैंने चौके में जाने से रोक दिया था तो शायद वह भी बुरा मान गयी !"
--" चलो ,,! अपने काम अब तुम खुद करो ,,इसी में सार है ,,! " ,,मैंने लम्बी सांस छोड़ी !

समय चक्र आगे बढ़ चला ! जल्दी ही बर्तन आदि के लिए नयी कामवाली  आगयी ,,और चौका पूरी तरह पत्नी के द्वारा संचालित होने लगा !  जिस तरह मनीषा के आने की बात फ़ैली थी , उसी तरह उसके काम छोड़ने की बात फ़ैल गयी और वातावरण जैसे पूर्वतः  शांत हो गया !

    कुछ दिन बाद ही बड़े   बाबू  के घर में , उनके पुत्र के जन्म दिन की पार्टी का आयोजन हुआ !  बड़े बाबू को लोगों ने कहा की इस समारोह में,,,बड़े साहब " शिवांग " सर को भी बुलाया जाए ! बड़े बाबू  भी शायद मन से ऐसा ही चाहते थे तो मुझ से बोले --" सर ,,! आप चलिए ,,आपके साथ जा कर में शिवांग साहब को पार्टी में आने का आमंत्रण देना चाहता हूँ !  आप रहेंगे तो वे आ जाएंगे ! " "
  मैंने बात मान ली और हम लोग दो चार स्टाफ के साथ , बड़े बाबू , शिवांग साहब के घर पहुंचे !  वे अंदर थे !
   , तभी , हमारे ही आफिस का एक चपरासी , जो निम्न   जाति  का था , कुछ नास्ता और पानी के गिलास टेबिल पर रख गया !  बड़े बाबू चुपचाप बड़े साहब के बाहर आने की बाट  ,जोहने लगे  !
 बड़े साहब ने बाहर आ कर   देखा और बोले ,---," अरे ,,!  नास्ता तो ज्यूँ का  त्यूं रखा है ,,,पहले नास्ता लीजिये ,,,! "
 मैंने बड़े बाबू की और देखा ,,,लेकिन उसके पहले ही वह हाथ बढ़ा कर , बड़े  साहब के घर की किचन की  बनी पकौड़ी हाथ में ले कर , मुंह में रख चुके थे ! साथ आये  सभी  लोग  सर झुका कर नास्ता करने में लग गए ! सबने नास्ता ले कर ,,इत्मीनान से पानी पीया !  तभी बड़े साहब ने मुझ से पूछा--" आज कैसे इतने लोगों को ले कर आना हुआ शर्माजी ,,? "
 बड़े बाबू ने हाथ जोड़ते हुए कहा --" सर आज हमारे घर में मेरे पुत्र की जन्म दिन पार्टी है ,,आप सपरिवार आएं ,,यही निवेदन ले कर हम आये हैं ! "
  बड़े साहब ने थोड़ी उपेक्षा के साथ उन्हें देखा और फिर मुझे देखते हुए बोले --" आज तो बाहर का टूर है ,, मुश्किल है ,,शायद लौट ना पाऊं ,,"
 बड़े बाबू  आग्रह के साथ जोर डालते हुए बोले ,," नहीं सर !,,आप को तो आना ही पडेगा ,,आपके बिना पार्टी सूनी हो जाएगी ,,! ,,,अगर आप देर से आएंगे तो भी हम इंतज़ार कर लेंगे ,, लेकिन आप आएं जरूर ,,! "
   " देखता हूँ। .. पूरी  कोशिश करूंगा ,,,! "---- कह कर बड़े साहब उठ खड़े हुए !
   हम लोग बाहर निकल आये !  मैंने बड़े बाबू की और थोड़ी रुक्षता के साथ निहारा ,,,वे शायद समझ गए ,,लेकिन बोले कुछ नहीं !
 शाम पार्टी हुई तो दफ्तरों के सारा स्टाफ बड़े बाबू के घर इकट्ठा हुआ !  बड़े बाबू के सभी रिश्तेदारों के साथ , उनके दोनों भाई भी कार्यक्रम में डोलते नज़र आये !
 देर रात तक बड़े साहब भी आ गए !  बड़े बाबू ने अपने हाथों से प्लेट सजा कर उन्हें दी , और जैसे हर कौर को ताकते हुए धन्य होते रहे !  उनके पंडित भाई दौड़ कर पानी के गिलास ले आये , और आगे बढ़ कर उन्हें पानी प्रस्तुत किया ! पानी पी कर वापिस गिलास करते हुए , बड़े साहब के हाथों से वह गिलास भी बड़े बाबू के भाइयों ने बिना किसी हिचक के थामा !
   मुझे बड़ी वितृष्णा हुई !  मैंने एकांत होते ही बड़े बाबू  और उनके भाइयों से पूछा --" आप को मालूम  है  वे कौन हैं ,,"
   वे हंसने लगे ! बोले---"  जानते हैं  भैया के सबसे बड़े साहब हैं ,", !
  मैंने पूछा ,,और उनकी   जाति  मालूम  है ? "
   वे खिसयाते हुए बोले। ---" जानते हैं ,,,वे एस  सी  हैं ,,निम्न जाति वाले ! "
  --" फिर आपने आज उनके घर ना सिर्फ पकौड़ी खा ली , बल्कि उनके घर, उस चपरासी के हाथ का लाया पानी भी   पिया , जिसे आप वर्षों से जानते हैं की वह निम्न जाति  का है  ! ,,,,,, क्या तब आपका  'जातिबोध  '  नहीं  जागा  ,,??   जिस चपरासी के आपके घर आने पर , चाय पीने पर,  आप उसे अपने घर के  कप भी धुलवा लेते हो , उसी जाति  के अफसर के हाथ का झूठा गिलास आपने खुद आगे बढ़ कर थाम लिया ,,?? आपने तब जरुरत नहीं समझी की  वह  निम्न जाति का होने के कारण ,  गिलास धो कर वापिस करे ,,??

बड़े बाबू दबी आवाज़ में बोले --" आपत्तिकाल ,,मर्यादानास्ति " ,!
  उनके भाई भी कुटिलता से हो हो करके हंस दिए !
 
    कौन सी " आपत्ति " ,,,??   कैसी मर्यादा ,,?? ,,,,मेरे मुंह का स्वाद कसैला हो गया ! मैंने नास्ता नहीं किया !     ,,,चुपचाप वहां से बिना बताये  लौट आया !

   बहुत दिनों तक मैं ,,,मनीषा को ढूंढता रहा ,,,लेकिन वह नहीं दिखी !

   लेकिन एक दिन वह नर्मदा  घाट  पर दिख गयी ! मुझे देखते ही  उसके मुँह पर आत्मीय मुस्कान बिखर गयी ! दोनों हाथ जोड़ कर उसने नमस्ते की ,,तो मैंने पूछ लिया--

   --" कहाँ चली गयीं थी मनीषा ,,??   उस दिन गयीं तो लौट कर वापिस ही नहीं आईं ,,??
     वह गंभीर हो कर बोली --"  जब आंटी ने किचन में जाने को मना किया तो मैं उनकी मजबूरी समझ गयी  ,,,!   आप अच्छे हैं यह बात सही है , लेकिन आपके अच्छे होने से क्या होगा ,,?? दूसरे लोग आपको बुरा भला कहते , व्यवहार तोड़ देते ,,तो मुझे अच्छा नहीं लगता ! इसलिए मैं खुद जान बूझ  कर  वापिस नहीं गयी "

   मैं खामोश रह गया ! फिर रुक कर पूछा --" अभी भी कहीं काम करती हो या नहीं ,,? "
   -  " क्यों नहीं ,,," ,,वह चहक कर बोली ,," अब मैं एक क्रिश्चियन साहब के घर में काम करती हूँ ,, इरिगेशन में इंजीनियर साहब हैं ! ,,वहां कोई  दिक़्क़त  नहीं ,,पूरा किचन मैं ही सम्हालती हूँ ,,मेडम  बीमार रहती  हैं ,, वे खुश रहती हैं ! "
    मैं स्तब्ध सा देखता रह गया !  फिर पूछा --" ,,,,, कहीं वे लोग क्रिश्चियन बनने को  तो  नहीं कहते ,,? "
  मनीषा  खिलखिला कर  बोली --" मैं क्यों बनूं  क्रिश्चियन ?? ,,,मैं तो अहीर हूँ ,,, अपनी  माँ  की बेटी ,,वही रहूंगी  "  !
         वह नमस्ते कह कर चली गयी
     ,,और मैं नर्मदा की शांत बहती धारा को ताकते रह गया !  मन में उठ रही अशांत तरंगों को शांत करने की कोशिश  करते हुए मुझे लगा कि मैं नर्मदा से पूछूं --
       " किस जात की हो  मां ,,तुम ,,?? "



----सभाजीत 

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

   हिन्दू ,,,
हम सबके एक सर्वमान्य देव ,,," शिव " 

वोट के लिये निरंतर बंटते  हिन्दू समाज को एक अहम् जरुरत है , ऐसे बंधन की , जो उन्हें एक एक सूत्र में पिरो सके !  अलग अलग समुदायों के अलग अलग भगवानो ने , उन्हें पहले ही , एक दूसरे से अलग थलग कर रखा है ! हर समाज अपने अपने भगवान् की जयन्ती , चल समारोह आयोजित कर अपने ढंग से मनाता है , किन्तु वे समारोह सर्वथा , एक विलग भावना को ही जन्म देते हैं ! 
  वर्षों पूर्व , अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए , सबसे पहले , लोकमान्य  तिलक  ने ,  एक ऐसे धार्मिक बंधन की महाराष्ट्र में कल्पना की , जो सर्वमान्य हो , और आस्था से सभी महाराष्ट्र वासियों को एक सूत्र में पिरो सकें ,,! इसी भावना के तहत , गणेश उत्सव में ,  सम्पूर्ण महाराष्ट्र में , घर घर एक गणेश की मूर्ति स्थापित करने का आह्वान किया गया  , और पूरा महाराष्ट्र एक सूत्र में " गणेश मय  " हो गया ! समाज एक ईश्वर की छवि को ले कर चेतन हो गया , ! इस उत्सव को ले कर हर घर एक दूसरे से जुड़ गया , ,,,,एक आस्था , एक रूप , एक चेतना !
    आज फिर लोकमान्य तिलक की तरह , अथवा , आदि शंकराचार्य की तरह , एक आह्वान की सख्त जरुरत है , कि ,,, साकार , अथवा निराकार,  दोनों स्वरूपों में  विद्व्मान  , एक ईश्वरीय छवि को हिन्दू समाज अपने मन में धारण करे !, वह छवि  समानरुप से हर घर पूजी जाए , जिस की पूजा अर्चना में , कर्मकांड , और सनातनी  गूढ़ पद्धतियों का समावेश ना हो !और जिसकी पूजा हर व्यक्ति के लिए सहज हो ! 
   सुखद यह है की ऐसे ईश्वर की छवि हिन्दू समाज में पूर्व से ही सर्वत्र व्याप्त है ,,और वह है ,,," शिव " ,,! 
      आदि  देवों  में विष्णु के मंदिर बहुत कम  मिलेंगे , , ब्रम्हा की पूजा पूरी  तरह वर्जित है , जबकि शिव सर्वत्र व्याप्त हैं !  वे प्रकृति के देव हैं , प्राकृतिक स्थान ,," पर्वत " उनके निवास का चिन्ह है ,  वे भोग विलास से दूर , आडमबर से मुक्त हैं ! सर पर , मनुष्य का जीवन आधार  ,," जल " ,, अपने साथ लिए ,  गंगा उनकी जटाओं में विराजमान है !  अपनी कलाओं से मन मोहता , समय की  गणनाओं का प्राकृतिक माध्यम , चंद्र भी उनके माथे पर सोहता है ,,! ललाट पर , भविष्य को देखने में सक्षम , और हर पाप को भस्म करने वाला एक , तीसरा न्रेत्र  भी उपस्थित है, जो आवश्यकता अनुसार खुलता भी है ! कानो में , वे जीव जंतु , जो प्रकृति को संतुलित करने के माध्यम हैं , और जिनमे , किसी भी रोग को नष्ट करने का विष , एक दवा के रूप में विदवमान है ,,,," बिच्छु "  के आभूषण के रूप में , कुण्डल की तरह विदवमान हैं!  !  गले में वह "  हलाहल  " , स्थिर हो कर अवरुद्ध है , जो क्षण मात्र में सारी श्रष्टि को समाप्त कर सकता है ,   और जो मृत्यु का कारक है !,,, किन्तु मानो वह उनके कंठ के कारागार में सदा के लिए कैद है !  कंठ में प्रकृति के विषधारी , वे विषधर भी , हार बन कर पड़े हैं ,  जिनके विष का तोड़ मनुष्य अभी तक नहीं पैदा कर पाया है !  गले में ही , मुंडों  की वह माला है , जो सदा याद दिलाती है की जीवन नश्वर है , और अंत में वही  व्यक्ति की आधारभूत पहचान है ,  !  शरीर पर वह भस्म है , जो  पाँच तत्वों का , मृत्यु के बाद एकसार बन कर  श्मशान में धरती पर शेष रह जाती है ,  बाजुओं में प्रकृति प्रदत्त , वे फल हैं , जो बाजूबंद के रूप में , एक मुखी रुद्राक्षों के रूप में , बंधे हुए हैं ,  वे किसी को रिझाने , आकर्षित करने के लिए , कोई रंगीन तड़क भड़क वाले वस्त्र नहीं पहनते , बल्कि , मरे हुए बाघ की खाल को वस्त्र की तरह धारण करते हैं , जो दर्शाती है , की प्रकृति के पशु भी , अपनी स्वाभाविक मृत्यु के पश्चात , अपनी खाल के रूप में किसी मनुष्य के काम आ सकते हैं ! पैरों में वे ' खड़ाऊं ' पहनते हैं , जो सूखे हुए बृक्ष की , उस लकड़ी के बने हुए हैं , जो अपनी उम्र जी कर समाप्त हो चुका है !

       शिव गृहस्थ हैं , एक पत्नी धारी हैं , और उनके दो  पुत्रों  का  परिवार है !  पुत्रों में जिस ' गणेश ' को प्रथम पूज्य माना गया है , उनका स्वरूप भी प्राकृतिक है ! उनका मुख , सबसे बुद्धिमान , जीव , हाथी का है , और शेष शरीर , इस दुनिया में उपस्थित मानव का ! शिव का वाहन भी प्राकृतिक है ,," बैल " का ,,,जो शक्ति का प्रतीक है ,,और जिसे बाद में मनुष्य ने भी अपने जीवन के आधार कृषिकार्य में भी उपयोग किया है ! 

   शिव के पास जो वाद्य यंत्र है ,," डमरू " ,,,,,वह ,' नाद ' , और ' लय ' , दोनों को एक साथ  उत्पन्न करती है !  वह नृत्य की उमंग देती है , और स्वर का आनंद भी ! उनके पास जो अस्त्र है  वह " त्रिशूल " है , जो  शस्त्र  की तरह भी उपयोग में आता है , और " अस्त्र " की तरह भी ! वह रक्षात्मक भी है , और आक्रामक भी !

   शिव का स्वरूप निराकार भी है , !  प्रकृति के हर स्थान पर उपलब्ध , पत्थर के एक गोल  टुकड़े को , आप शिव स्वरूप में , आसानी से पूज सकते हैं !  पूजा में ना तो कोई कर्मकांड है , ना पद्धति , !  सर्वत्र उपलब्ध " जल " को आप उन पर उड़ेल दीजिये ,  प्राकृतिक बेल पत्र को उन पर रख दीजिये !  हो गयी पूजा ! 

   शिव का यह स्वरूप , आदिकाल से ले कर अब तक ,  हिन्दू धर्म के जनक , आर्यों और अनार्यों को एक  मतेन  स्वीकार था !  , अनार्यों  ने उन्हें उसी सम्मान के साथ पूजा , जिस सम्मान के साथ  आर्यों  ने !  शिव ने किसी भी वर्ग , जाती में कोई भेद नहीं किया ! उन्होंने प्रसन्न हो कर , सरल और सहज रूप में हर व्यक्ति की  आकांक्षा  पूर्ण की !  यहां तक की उसे भी वरदान दे दिया , जो उन्हें ही भस्म करने उनके पीछे दौड़ गया !

  तो जरुरत है , की आदिदेव " शिव " को सम्पूर्ण हिन्दू समाज आज  प्रमुख रूप से अपना पूजनीय इष्ट माने ! शिव के पास , ना भव्य मकान है , ना  भव्य गृहस्थी , ना दिखावा , ना गरीबी अमीरी का कोई भेद ! उनकी पत्नी , एक राजा की पुत्री है ,," पार्वती " ,,,,!,,,लेकिन वह शिव के साथ उसी हिमालय पर , उन्ही की जीवन पद्धति में रहती है , जिसमे शिव रहते हैं ! वे शाकाहारी हैं , प्राकृतिक फलों पर जीवन यापन करते हैं ! वे दो स्वरूपों में रह कर भी एकाकार हैं ,,," अर्धनारीश्वर " के रूप में !  वे नृत्य और संगीत पारंगत हैं , और समस्त जीवों के प्रति सहज दयालु हैं !

  हिन्दू एक जीवन पद्धति है ! आज का हिन्दू " आर्यों " और अनार्यों " की सम्मलित संतान  है !भले ही सामाजिक कारणों से हम आज कई वर्गों में  बँट  गए हों , या राजनैतिक धूर्तता  के षडयंत्र से अलग थलग किये जाने के कुचक्र में फंस गए हों , किन्तु यह सच यह है , हमारा  ईश्वर का सर्वमान्य रूप एक ही है ,,और वह है ,," शिव " !  जरुरत है कि  शिव के इस स्वरूप को हम घर घर में प्रतिस्थापित करें ,   जो मात्र एक पत्थर के गोल टुकड़े के स्वरूप में सहज ही उपलब्ध हैं , और जिन की पूजा अर्चना में किसी तरह की पद्धति , वस्तु  , या धन की जरुरत नहीं है ! शिव हमारे आदिदेव हैं ,,,जो चाहे दलित वर्ग हो या  धनाड्य , सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले सहज देव हैं ! 


,,,,,सभाजीत 

रविवार, 13 मई 2018





  फटे चिथे  कपड़ों में  लिपटी ,
 किसी गावं की ,
 एक गरीब लड़की की पेंटिंग ,
 रखी  गयी एक कला दीर्धा में,

लोग निहारते रह गए ,
 अपलक ,,मुग्ध भाव से ,
  और लोगों के मुख से निकला ,
   वह ,,,!
क्या रचना है ,,!!

 अखबारों , मेग्जीनो में ,
  छपे  कई लेख ,
 और पढ़े गए कसीदे ,
पेंटर के चित्रण पर ,
सबने कहा
 वह ,,!!  क्या पेंटर है ,,!!

 कई लोगों ने लगा दी बोली ,
हज़ार से लाखों की ,
 और कड़ी प्रतिस्पर्धा में,
 बिक गयी पेंटिंग ,
लोगों ने कहा ,
 वाह  ,,!!
,इस देश में अभी भी शेष हैं ,
 कला के जौहरी ,,!

 पेण्ट,,
 बिकते हैं बाज़ारों में ,
केनवास भी ,
 और स्टेण्ड भी ,,,
कई तरह के ब्रश ,
बिना इनके ,
  शायद नहीं था सम्भव ,
जन्म किसी पेंटर की ,
 रचना का ,,!
और शायद संभव नहीं था ,
 बिना उस उस मूल फोटो के ,
जिसे खींचा गया था ,
कीमती कैमरे से , कीमती लेंसों के जरिये ,
जो बिकते हैं बाजारों में ,
औजारों की तरह ,
  बड़े दामों में ,


बिक गयी जिसकी छवि ,
मजबूरी के लिबास में ,
ऊँचे दामों में ,
उसी की खबर , जब छपी ,
 एक अखबार में ,
तो बहक उठी चैनलें ,
तमक उठे  बुद्धिवादी ,
गतिशाल , विगतशील , प्रगतिशील ,
 पहुँच गए , राजधानी के चौराहों , सडकों पर
  लेकर हाथों में मोमबत्ती ,,!
 एक बेटी की सुरक्षा की गुहार ले कर ,,!
सबसे आगें  था वह  पेंटर ,
पीछे  थे , कला समीक्षक ,
,अखबारी लोग ,
 फिर वे सब ,
 जिन्होंने  घंटों  गुजारे थे ,
कला दीर्धा में , अपलक ताकते हुए ,
 उस लड़की का लिबास ,
उसकी मायूसी , उसकी आँखों में जमे निराशा के भाव ,
और वे भी , जिन्होंने चुकाई थी कीमत ,
उस रचना की ,
अपने ड्राइंग  रूम  की शोभा के लिए ,

सबने ,,नाम दिया लड़की को ,
" रचना "
जो मर गयी थी असुरक्षित , क्षत - विक्षत ,
और पायी गयी थी घूरे पर ,
 उसी फटी चीथी लिबास में ,
जिसका फोटो लेते समय ,
किसी संवेदनशील कलाकार ने ,
नहीं सोचा  उस समय  उसे बचाने को ,
क्यूंकि ,,
 शायद  उसके लिए भी ,,
सोचने से ज्यादा जरूरी था ,
 दुनिया में
   खुद को दिखाने को ,,!

----सभाजीत








सोमवार, 30 अप्रैल 2018

 ,,   बाली " ,,,

     रात देर घर पहुंचा तो  माँ ने बताया कोई आया था स्कूटर से ,,,तुमको पूछ रहा था !
     सन ,,1970 ,, में बालाघाट में नौकरी लगी थी , विद्युत्  मंडल में ,,,, शहर में नया नया था ,!
    अभी तो ठीक से विभाग में ही जान पहचान नहीं हुई थी ,,,तो ऐसा कौन होता जो मुझे ढूंढता आता ??   वह भी स्कूटर से ,,??

   कौतुहल इसलिए  हुआ   क्यूंकि उन दिनों स्कूटर का किसी के पास होना एक रईसी की निशानी थी  और कोई  रईस  व्यक्ति मुझे खोजे यह तो मेरे लिए   अचम्भे   की बात थी !

   दूसरे दिन , सुबह सुबह मेरी मकान मालकिन दरवाजे पर आईं ,! उन्होंने कहा की,,,' भैया ,,, शाम को  सोनवाने  जी आये थे ,,आप से मिलने  वे आपका नाम पूछ रहे थे ,, !  मैंने तो उन्हें बैठने को भी कहा ,,,लेकिन बैठे नहीं ,,यह कह कर चले गए की साहब आएं तो उन्हें मेरी दूकान पर मिलने को कह दीजियेगा ! '

     सोनवाने ,, नाम सुन कर मुझे कुछ कुछ याद आया ,,! मुझे नौकरी ज्वाइन करते ही तीन बड़े गावों के विद्युतीकरण का काम सौंप दिया गया था ! तीनो इस जिले के बड़े गावं थे , शहर से लगभग १२ किलोमीटर दूर ,,!  इन गावों में लिफ्ट इरिगेशन की योजना अंतर्गत , विभाग को मिले वर्ड बैंक के बजट से , अधिकतम खेतों में धरती के अंदर से पानी उलीच कर सिंचाई करने के लिए पम्प कनेक्शन देने का प्रावधान था ! इसके लिए अलग से एक ११ के वी का फीडर शहर के एक किनारे बने सब स्टेशन से खींच कर , गावं तक ले जाना था ! इन गावों की साइट के लिए जाते समय एक बहुत बड़ी आइल मिल दिखती थी ,,जिसमें   सोनवाने   आइल मिल लिखा हुआ था !  तो यही मिल मालिक हो सकता हो घर आये हों !  लेकिन   दुकान  से क्या अर्थ था ,,??
  मैंने मकान मालकिन से पूछा ,," वो तो मिल है ,,,   दुकान  नहीं ,,,फिर मुझे  दुकान  में मिलने को क्यों बोला होगा उन्होंने ,,?? "
  मकान मालकिन उत्साह दिखाती हुई बोली ,," अरे भैया ,,,उनकी  दुकान  भी है ,,,सोने चांदी की बड़ी  दुकान    मैं तो वहीं से गहने खरीदती हूँ ,,   आप नहीं जानते वे नगर सेठ हैं ,,बहुत से कारोबार हैं ,,, लेकिन राम भक्त हैं ,,हर साल रामायण के व्याख्यान करवाते हैं ,,, बड़े बड़े संत आते हैं ,,, देर रात तक रामायण पर व्याख्या होती है ,,,हम लोग वहां भी रोज जाते हैं ,,, पूरा शहर उमड़ता है ,,, सेठ जी द्वार पर खड़े हो कर सबका अभिवादन करते हैं ! "
    मैं चिंता में पड़ गया ,,,!  एक संत स्वभाव  का  आदमी मेरे घर तक  ,आया था ,!,  उसे  मुझसे क्या काम पड़  गया होगा ,,??,,,,अब  मैं जाऊं या नहीं ,, ?!
 अंत में दिल ने कहा ,,,तुम क्यों जाओ भाई वहां ?? ,,,,,, उन्हें जरुरत होगी तो वे फिर बुला  लेंगे  या खुद आ जाएंगे ,,!
 लिहाजा में नहीं गया !

  दो दिन बाद सुबह सुबह ही मेरे घर के सामने , स्कूटर का हार्न बजा !  मैं बाहर निकलता  इससे पहले ही मकान मालकिन हड़बड़ाती हुई आयी और बोली ,,," सेठ जी आज फिर आये हैं ,,,बाहर खड़े आपको याद कर रहे हैं " !   बदन पर  शर्ट  डाल   कर मैं बाहर आया तो देखा की एक अति सौम्य  सा  व्यक्ति स्कूटर पर बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा था !  उनके मस्तस्क पर गोल टीका,  सूर्य की तरह देदीप्यमान हो रहा था ,,, और धवल धोती कुर्ता का परिधान ,  उनकी सौम्यता की गवाही दे  रहा था  ! गले में एक मुखी रुद्राक्ष की माला थी ,,,जो एक भारी सोने की चैन के साथ साथ , मानो  युगलबंदी कर रही थी ! मैं नमस्कार करूँ ,,, इससे पहले उन्होंने खुद नमस्कार करके  दोनों हाथ जोड़ कर मेरी और सर झुका दिया ! मैं झेंप गया ,,,,यह व्यक्ति कितना विनम्र है ,,,और एक मैं हूँ की ,,,पहले नमस्कार करने में भी आलस्य कर गया !
मैंने कहा। ---.."आइये। .बैठिये " !
वे बोले -- " थोड़ा सा समय चाहिए था आपका ,,! अगर दे सकें तो मेहरबानी "
मैंने कहा __ हाँ हाँ !! बताएं ,,! "
वे स्कूटर से उतर गए , स्टेण्ड पर गाड़ी खड़ी की ,, फिर मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोले ,---" चलिए चलते हुए बाहर ही बात करते हैं !,,,  आप हमारे जिले के विकास के लिए गावों में बिजली लगाने का काम कर रहे हैं ,,,मैं आपको रोज अपनी मिल के आगे से गुजरते देखता हूँ   कई बार सोचा की आपको मिल में बुला कर , आपको जलपान करवाऊं ,,,लेकिन आप तेजी में निकल जाते हैं   ! "
मैंने कहा  --  " वह तो काम है ,,ड्यूटी है ,,,उसके लिए ही तो तनख्वाह पाता हूँ ! "
वे मुस्कराये -- ' सही है ,,,लेकिन हमें भी लगता है , हमारे क्षेत्र में कोई अफसर काम करवा रहा है तो उसकी खिदमत भी मैं करूँ !"
" कैसी खिदमत " ,,??
 " अरे युहीं छोटी सी खिदमत " ,,!"    कहते हुए उन्होंने एक लिफाफा मेरी ऊपर की  जेब में डाल दिया !
  मैं चिंहुक गया ,,!  मैनी लिफाफा जेब से निकाला और उनकी और वापिस  बढ़ाते हुए पूछा -- " यह क्या है ? "
  " अरे कुछ नहीं एक भेंट है , इसमें दो सौ रूपये हैं ,! "
   मैं अचकचा गया !उस जमाने में दो सौ रुपये बड़ी रकम होती थी !   मैंने कहा  ---  " भला क्यों  ,,?? क्यों दे रहे हैं आप मुझे यह भेंट ??  मैंने ऐसा कौन सा नेक काम किया है ,,??
  " नहीं किया है तो कर दीजियेगा  कोई  ,,  नेक काम "
 "  क्या काम   ?? "
  " काम छोटा सा है ,,!"  वे मेरे कान से मुँह  सटाते  हुए बोले --- " ,,,जहाँ से आप बिजली की लाइन निकाल रहे हैं ,,,वहीं पर मेरे भाई का एक खेत है ,,! ,,,

   ' कहाँ ,,?? "

    " गोंदिया रोड पर मेरी मिल के आगे बांयी और "
  ,,,"  तो "
    " तो यह कि ,,, उस खेत को खरीदने के लिए मैं कई साल से कोशिश कर रहां हूँ ,,,!  भाई गरीब है ,उसकी माली हालत ठीक नहीं है , ,,वह बेचना चाहता है ,,,लेकिन उसके बच्चे  उसे रोक देते हैं ,,वह उसे बरगलाते  हैं की जल्दी ही बिजली का विकास होने पर यहाँ दुकाने बना लेंगे ,, कुछ काम शुरू  कर देंगे ! "
   " वे बात तो सही कर रहे हैं ,,,वहां विकास तो जल्दी ही होगा ही "
   " यह तो मैं भी जानता हूँ ,,,इसीलिये तो अब वह जमीन हर हालत में खरीदना मेरे लिए जरूरी है  मेरा प्लान वहां शॉपिंग  सेंटर बनाने का है  ! "
  "  तो आपका ही तो भाई है ,,,खरीद लीजिये उससे जमीन "
  " अरे आप नहीं जानते हैं  " ,,,,वे दांत कसमसाते हुए बोले ,,,"  नहीं राजी है ,,, दुने तिगुने दाम माँगता है ! "
     " चलिए ,,,तो इसमें मुझ से क्या काम है आपको ??"
    " आप बिजली की लाइन उसके बीच खेत से निकाल दीजिये ,,,बीच खेतों में तीन चार खम्बे गढ़वा दीजिये ,  ,,जैसे ही गड्ढे खुदेंगे   मेरा भाई खुद दौड़ते हुए आएगा मेरे पास ,,,,और सस्ते में खेत बेचने को राजी हो जाएगा ,,,, आखिर सरकारी काम थोड़े ही रुक सकते हैं  उस  के चाहने से ,,! " --  वह यूँ हंसा जैसे मारीच हंसा हो !
   "  तो यह बात है " ,,,मैंने उन्हें घूर कर देखा    फिर कहा ---" लेकिन लाइन का सर्वे तो मैं पहले ही से कर चुका हूँ ,,,मेरी लाइन तो सड़क के दाहिने और से निकल रही है ,,,जबकि आप  अपने  भाई के खेत बाईं और बता रहे हैं ! "
    वे अचानक  उचक पड़े,,,!   जैसे उनका पैर  सांप पर पड़  गया हो ! ,,,, हकलाते हुए   से बोले --
    " अरे यह क्या कह रहे हैं आप ?? ,,,सड़क के दाहिने तरफ तो सब  मेरे प्लाट हैं ,,वहां मैं एक कालोनी बनाने जा रहा हूँ ,,,!  मेरा तो सत्यानास हो जाएगा ! "
    मैं तब तक उनका दिया लिफाफा वापिस उनकी ही   ऊपरी जेब में रख चुका था ! दुर्भाग्य से मैं एक  मास्टर का लड़का था ,,,मुझे लालच से ज्यादा मूल्यों की घुट्टी ज्यादा पिलाई थी मेरे पिता ने ! और संयोग यह था की छोटी कक्षाओं में पढ़ते समय  अपने गावं की रामलीला में मैंने राम का अभिनय किया था !  राम  बन कर मूर्च्छित लक्षमण के सीने पर मैं फूट फूट  कर रोया था ,,,अपने भाई को बचाने  ! रामलीला में ,  सुग्रीव के कहने पर बाली का बध  जरूर किया था ,,,लेकिन उन कारणों को बताते हुए की "  ,,अनुज वधु , भगनी  सुत  नारी , सुन  शठ  ये   कन्या सम  चारी,,,इन्हहि कुदृष्टि विलोकहि जेही , ताहि  बधे  कछु पाप ना होही ,,! "   तो  यहां उस चौपाई  के अनुसार कोई कारण भी नहीं था की मैं सोनवाने  जी के भाई पर धर्म की रक्षार्थ , प्रहार करता !
     लिहाजा , मैंने  सोनवाने  जी  को  उन्ही की  शैली में उत्तर देते हुए कहा ---" अब तो जो सर्वे होना था हो चुका !   ,,यह  सरकारी काम है ,  रोका थोड़े ही जा सकता है !  ,,,कल से गड्ढे खुदना शुरू हो जाएंगे ,,,और हम लोग एक दिन में चार  पोल खड़े कर देते हैं ! "
 " लेकिन साहब !,",,,  वे  मिमयाती आवाज़ में बोलने लगे --," ,वह मेरी जमीन है ,,, वहां तो रहवासी मकान बनाये जाने हैं ,,, बड़ा गज़ब हो जाएगा ,,,आप काम रुकवा दें ,,! "
   मुझे हंसी आ गयी ,,, किसी तरह हंसी  रोकते हुए बोला ---" काम कैसे रुकेगा ,,?? अभी तो वह सब खेत हैं ,, कोई प्लाट नहीं ,,,और ना आपने अभी तक लेंड डायवर्सन करवाया होगा ! "
    उन्होंने  जेब टटोलकर सौ  के दो  नोट  और  निकाल लिए ,,, लिफ़ाफ़े  के ऊपर रख कर बोले ,,," आप फीस ले लें ,,,लेकिन काम तुरंत रुकवा दें ,,,मैं तब तक इंतज़ाम कर लूंगा ,,,स्टे ले लूंगा ! "
   अब मेरा स्वर तल्ख़ हो गया ,,!  मैंने कहा -- " आप मुझे क्या समझ रहे हैं ,,, ""  आप करोड़ों रुपये भी दे दें तब भी में अपने ईमान से डिगने वाला आदमी नहीं समझे ,,!  अपने ये पैसे अपनी जेब में रखें     मुझे लालच देने की कोशिश ना करें ! "
  वे निरीह से मुझे देखते रहे ,,,फिर मुस्करा कर बोले ,,,_  "  सोच लीजिये ,,,, मेरे काम तो हो ही जाएंगे ,,,लेकिन आप घाटे में रहेंगे ! "
 " घाटा नफ़ा आप जैसे लोग सोचते हैं ,,, जो भाई की बर्बादी में अपना नफ़ा देखे उससे घटिया आदमी कौन होगा ,  अब आप जाइये ,,,मैंने आप से  इतनी बात इसलिए कर ली क्यूंकि मुझे किसी ने बताया था की आप धर्म परायण व्यक्ति हैं ,,, हर साल रामायण के व्याख्यान कराते हैं ,,, लेकिन अब आप जाइये ,,,आप का काम मेरे जैसे व्यक्ति के माध्यम से कभी पूरा नहीं होगा ! " ,??
   इतना कह कर मैं बिना उनकी और देखे , बिना नमस्कार किये घर के फाटक के अंदर घुस गया ! थोड़ी देर बाद स्कूटर की आवाज़ आयी ,,, और दूर चली गयी ,,,! स्पष्ट था की वो खिसिया कर वापिस चले गए थे !

    नहा  धो कर आफिस पहुंचा तो लाइनमेन ने बताया की ऐ ई   साहब का  दो बार फोन आ चुका है  ! उन्होंने आप को तुरंत बात करने के लिए कहा है ! मैं धर्म भीरु तो था ही , अनुशाशन भीरु भी था !  धड़कते दिल से अपने बॉस , ऐ ई  साहब  को नंबर डायल किया !
   ऐ ई  साहब का सरनेम सलूजा  था ! पक्के पंजाबी ! स्वभाव से कड़क ,,,, जो सोचलें वही करने में माहिर !   ,,,  वे हर महीने अपने अधीनस्थ वितरण केंद्रों का निरीक्षण करने के आदि थे !  गलतियां पकड़ लें तो फिर सुई की नोक बराबर गलती भी उनकी निगाह से ना बचे  , और नज़रअंदाज कर दें तो हाथी जैसी गलती भी ना देखें ! मेरे साथी सब इंजीनियर बताते थे ,,,की हर बार निरीक्षण करने के बाद , उन्हें मुर्गा खाने की आदत थी ,,! शायद घर में मुर्गा बनाने के लिए मेडम मना कर देती थी !  जब वितरण केंद्रों में निरीक्षण के बाद मुर्गा बनता ,,,तो उसे पचाने के लिए , शुद्ध विदेशी मदिरा का भी इंतजाम सब इंजीनियरों को करना पड़ता था !   भोजन के बाद वे सहृदय हो जाते थे ,,,अधीनस्थों को गलतियां सुधारने की तरकीब स्वयं बता देते थे   इसलिए स्टाफ  उन्हें देवता मानता था !
    फोन उठाते ही सलूजा साहब भड़की आवाज़ में बोले ---" अरे क्या शर्मा ,,,क्या लफड़ा कर रहे हो खम्बे खड़े करने में ,,?? "
   मैंने हकलाती आवाज़ में कहा --" कुछ नहीं सर ,,,काम तो बिलकुल सही चल रहा है ! "
   " क्या ख़ाक चल रहा है ,,?? ----वे बोले ,,,,,," किसी के प्लाट के ऊपर से लाइने खींच रहे हो ,,,झगड़े को निमंत्रण दे रहे हो ! "
    मेरी तीक्ष्ण बुद्धि  में तुरंत मामला समझ में आ गया ,,,!  सोनवाने ने अपना दावं खेला है !
  मैंने संयत हो कर कहा --- ' सर लाइन बिलकुल सही खींची जा रही है ,,, पूरे  खेत हैं ,, कोई प्लाट नहीं ,,,और में भी कोशिश करता हूँ की पोल मेड पर ही गाड़ें  जाएँ  ,,ताकि किसी के खेत बर्बाद ना हों ,,! "
     "  यही तो गलती है ,,, पोल की दूरी तुम क्यों घटा बढ़ा देते हो ,,??   और तुम्हे कैसे पता की सब खेत ही हैं ,,,वहां प्लाट नहीं ,,,क्या रेवेन्यू रिकार्ड चेक किया ,,?? "
  "   नहीं सर ,,,! "
  " देखो अगर कोई कहे की वहां प्लाट हैं ,,,तो मान लो की वहां प्लाट होंगे ,,,!   वहां से लाइन मत  निकालो,,,समझे  ! "
   जी सर ,,! " --- " लेकिन फिर कहाँ से निकालूँ ,,, ?? सड़क के के तो दोनों और खेत हैं ,,,वहां कोई भी प्लाट हो सकता है ! "
  " सड़क के दाईं और अगर कोई कहे की प्लाट हैं ,,,तो झगड़े को दावत मत दो ,,  बाईं और से लाइन निकाल दो ,,, समझे। .!! "
    " लेकिन सर   ऐसा करने में तो रोड पार करनी होगी , रोड क्लीरेंस के लिए रेल पोल लगाने होंगे ,  गार्डिंग करनी होगी ,,! पोल गाड़ने के लिए अलग से सीमेंट लगेगी   ,,विभाग का ,खर्चा बढ़ जाएगा ,,,एस्टीमेट ओवर हो जाएगा ! "
    "  हूँ ,,, ठीक है ,,,तुम मुझसे अलग से एक एप्रूवल ले लो ,,, मैं दे दूंगा ,  रेल पोल लगा दो , कांक्रीट कर दो , क्लीरेंस बना दो    सब चलेगा ,!  लेकिन लाइन को रोड की बाईं और से ही निकाल दो ,,,वहां कोई नहीं आएगा शिकायत ले कर ,,,विभाग का काम बिना झगडे झंझट के पूरा हो जाएगा ,,,समझे ! "
----"   ठीक है सर ,,! "

  उन्होंने फोन पटक दिया !  मैं सोचने लगा ,, दो रेल पोल , स्टे , कांक्रीट , गार्डिंग ,,,जिसकी कतई  जरुरत नहीं थी ,,, वह विभाग क्यों वहां करेगा ,,?? आखिर विभाग का मतलब क्या है ,,,??    अफसर या इंजीनियर ,,,या फिर वित्त ,,??
    तभी मेरा एक साथी इंजीनियर भी आ गया !   बोला - " सर ने तुम्हारी मदद के लिए मुझे भेजा है !  लाइन को बाईं और से निकालना है ,,, सर्वे करवा कर दो दिन में ही पोल खड़े करवा दें ,, लाइन खींच कर काम जल्दी करवाना है ,,,उदघाटन की डेट तय हो गयी है,,,,समझे ,,,??  !

   " समझे " एक अंदाज़ में कह कर वह हंस दिया !  में कहा---" अब भी ना समझूँ तो मुझसे बड़ा गधा कौन होगा भाई ,,!! "
      दूसरे दिन ही अचानक मेरे दादाजी की तबियत के बहुत खराब होने का टेलीग्राम मिला ! मैंने ऐ ई  साहब से सात दिन की छुट्टी  माँगी ,,,उन्होंने तुरंत दे दी !  शायद यह छुट्टी जितनी मेरे लिए जरूरी थी उतनी ही ऐ ई   साहब , के साथ साथ  सोनवाने के लिए भी जरूरी थी ! मैंने  अपना काम साथी इंजीनियर को सौंपा और तुरंत ट्रेन  ट्रेन पकड़ कर घर चल दिया !
   ट्रेन में बैठे बैठे   मैं सोचता रहा ,,,क्या हम सचमुच इंजीनियर है ,,,या एक " औजार " ! ऐसे औजार ,,,जिनके पास अपना कोई दिमाग नहीं होता ,,,! उसे यह भी नहीं मालुम होता की वह किस जगह क्यों कुछ छील रहा है ,,,!  सिर्फ उसका काम   खोदना  , तोड़ना , छीलना है ,,,, निर्माण की गुणवत्ता से उसका कोई सम्बन्ध नहीं ! फिर हमारी पढ़ाई से क्या लाभ ,,? अगर हम सिर्फ औजारों की तरह ही उपयोग हो रहे होते हैं  तो हमारे घर के लोग पढ़ाई की मोटी रकम खर्च कर के हमें क्यों पढ़ा रहे हैं ?? !

    मन में तर्क उठा --- क्या रामायण के पात्रों के बीच लड़ाई ख़त्म हो गयी है ,,??  क्या आज भी   बाली  अपने छोटे भाई सुग्रीव को राज निष्काषित करके , उसकी जमीन नहीं छीन लेना चाहता है ,??  क्या सहोदर भाई के ऊपर कोई बाली उदार है ,,?  क्या  आज भी  बाली के पास.."  कोर्ट' ,' अधिकारी' , 'पैसे',, जैसे घातक हथियार नहीं है और क्या वह   पलक  झपकते ही , सामने वाले  का  बल आधा नहीं कर देने में  समर्थ नहीं  है ,,??   और  क्या राज्य  निष्काषित  सुग्रीव का दर्द कोई  राज्य  निष्काषित राम ही जान पाता  है ,,,कोई दूसरा नहीं ,,,और क्या तब तक सुग्रीव को दीन हीन   बन  कर भय के साथ जीवन बिताना जरूरी है ,,,जब तक उसे राम ना मिले ,,??

     कुछ दिनों बाद जब में लौट कर आया तो मेरे साथी इंजीनियर ने लाइने , रोड के बाईं और से खिंचवा दी थी !  शायद सोनवाने का भाई अपना  खेत आने पौने दामों में  सोनवाने को  बेच गया था !  इसकी  तस्दीक काफी दिनों बाद तब हुई , जब में कई वर्षों बाद एक बार बालाघाट गया तो मुझे वह पूरा इलाका विकसित दिखा !  सोनवाने के भाई के जिन प्लाटों में कभी खम्बे गाड़े गए थे ,,वहां से वे शिफ्ट हो गए थे !  वहां पर एक बड़ा मैरिज  हाल बन चुका था !  मैंने पूछा की यह किसका है तो लोगों ने बताया की  ' मिल वाले सोनवाने जी '  का !

   शाम को शहर में घूमते हुए यूँही फुल्की खाने की इच्छा हुई ,,,तो एक ठेले पर खड़ा हो गया ! उस पर लिखे बोर्ड पर ध्यान दिया तो पाया वह सोनवाने फुलकीवाला है !  मुझे   कौतुहल हुआ तो फुल्की बनाने वाले से पूछ लिया ,, क्या तुम्हारा एक खेत कभी गोंदिया रोड पर था ,,,रोड के बाईं और   मिल के पास ,,??
    उसने सर हिलाते हुए कहा--- " हाँ सर था वहां ,,,मेरे पिताजी के नाम ,,पर उन्होंने बेच दिया था ,,, ताऊ जी को ,,  वे अपने बड़े भैया को बहुत मानते थे ,,, हमारे मना करने पर भी नहीं माने ,,!"
     " तो अब क्या है तुम्हारे पास ,,?? "
     " यही फुल्की वाला ठेला है   गुजर बसर के लिए "
     " तुम्हारे दूसरे भाई ,,वगैरह नहीं है ,,?"
       " नहीं सर ,,,एक फौज में भर्ती हो गया था ,,,वह काश्मीर में शहीद हो गया ,, आतंकवादियों से लड़ते ,,! दूसरे भाई की अभी दो महीने पहले ही मौत हुई है ,,,कैंसर से ,,,सिर्फ अब मैं बचा हूँ ,,!

            अंत में मुझे " सलूजा  साहब " याद आये ,,,जिन्होंने इन तीनो भाइयों को तो वर्षों पहले ही मार दिया था ! शायद एक टीन  सरसों के तेल के बदले , जो सोनवाने आयल मिल से , उनकी जीप में उनके बंगले के लिए ,  जीप ड्रायवर ले कर गया था ,,!  यह बात उनके तबादले के बाद , खुद ड्रायवर ने ही बताई थी मुझे !

   सोनवाने फुल्की वाला मुझे पूछ रहा था ,," चटनी खट्टी लेंगे या मीठी ,,??,,

               ,और मेरी जीभ थी की सारे स्वाद खो चुकी थी !


---सभाजीत

 






मंगलवार, 3 अप्रैल 2018







मैं ब्राहमन हूँ ...!!

मैं क्यू ब्राह्मंण हूँ .? ..
.यह मुझे नही पता ...!!

.....बस .
.एक ब्राहमन के घर जन्म लिया ..
तो मैं एक ब्राहमन हो गया .!!

मेरी शिक्षा है ..एम एस सी .!!

आप पूछेंगे,
 तब यह वेश क्यू धारण किया
पंडित्याई का ??

हाँ ...!!
 मैं पंडितयाई करता हूँ !
घरों में,
 कथा ,हवन , महाभीषेक , पित्र पूजन , करके,
 अपनी जीविका चलाता हूँ !!

यह मुझे किसी ने नहीं सिखाया .
.क्यूँकी,
 यह मेरा पैत्रिक कार्य था !

इसके लिये कहीं इमतहान देने नही गया !
ना टाप टेन में आने की ज़रूरत पडी !
 ओर ना ही दिनरात पढाई करनी पडी ...
.जैसी मैने कालेज में की !!

,,ना कोई बडी फीस लगी .
..ना ट्युशन ..!.
..जैसी कि मुझे शिक्षा ग्रहण करने के लिये लगी .
..जिसे जूटाते जूटाते
..मेरे व्रद्ध पिता स्वर्ग सिधार गये !
,,,
वे एक गरीब व्यक्ति थे
..बहुत गरीब ..!!
भिक्षाटन से ज़िन्दगी शुरु की थी उन्होने ..!!
लेकिन सरकारी सूची में,
 ब्राहमन को गरीब माना ही नही गया था !

उल्टे ,
जब भी मैने किसी नौकरी के लिये फार्म भरा .
...तो लिखना पड़ा ....' ब्राहमन '..!
क्यूँकी,,
 " गरीब " का कालम था ही नही वहां ..!!
मेरे लिये नही था कोई ..
." आरक्षण .."..!!
मेरे लिये थी .
..' प्रतीक्षा " की अंतिम सीट .
 क्यूँकी में ब्राहमन था .!!

,,,हां ...!.
..मुझे मिला था ,
मेरी योगयता के लिये ,
 स्कूल में ..' बेस्ट साइंस माडल ' का पुरस्कार ..!
लेकिन मैं नही था .,
..योग्य ..,
 उस नौकरी के लिये .
..जहां ब्राहमन होना गलत था !

सही था तो पिछडा होना !
मुझे नही मालूम,
 मैं क्यू ब्राहमन था ...ओर क्यू नही पिछडा था !
लेकिन आज पिछडा हूँ !
पिछडा हूँ ...अपनी योग्यता में ...!
पिछडा हूँ अपने देश में ..!!
ओर अब पिछडा हूँ ...अपने कर्म में ..!!
आरोप है .
.कभी मेरे पूर्वजों ने किया था दमन ..
पिछडो पर
...ज़िसका प्रतिकार मैं झेल रहा हूँ !
....
लेकिन मैं तो आज हूँ ..,
बीता हुआ कल नही ....!!
मैं ब्राहमन हूँ ...!!
ए मेरे देश ..!
क्या मेरी जगह भी सुरक्षित हो सकती है
..तेरी गोद में ..??
ना सही एक पिछडे की तरह .,
एक गरीब की तरह ही सही ..!!
कि कर सकूँ तेरी सेवा ..
अपनी ' योग्यता अनुसार ..!!
ना .! ..ना ..! ...मुझे आरक्षण नही चाहिये ..,
मुझे सिर्फ अपना हक चाहिये ...,
अपनी योग्यता का,, हक ...!,
कि मै कब का छोड चुका ...,
' भीख मांगना '....!!

,,सभाजीत 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017











   सरदार ,,,यानी मुखिया 


 इधर कुछ दिन पूर्व ही , जब न्यूज़ १८ पर  , कांग्रेस के प्रवक्ता ,, आलोक शर्मा ने    सीना ठोक कर कह दिया की सरदार पटेल से इंदिरागांधी बड़ी नेता थीं , तो हार्दिक दुःख हुआ !   दुःख इसलिए हुआ की आधुनिक कांग्रेस के प्रवक्ता सरदार को जानते ही नहीं थे ! वे ही क्यों , बहुत से लोग सरदार से इसलिए अनभिज्ञ हैं की उनकी जीवनी किसी स्कुल में ठीक से पढ़ाई ही नहीं गयी ,,,,और ना उन पर किसी फिल्मकार ने फिल्म बनाई ,,!  जो  लोग  भारत को गावं की मिटटी के जरिये पहचानते हैं ,,,वे ही गांधी और सरदार को समझ सकते हैं ,,,और जो गावं को राजाओं , नबाबों , और अभिजात्यवर्ग के लोगों  के रूप में  पहचानते हैं वे ही नेहरू को जान सकते हैं !

    मुश्किल यह है की , सरदार को , आज़ादी के सन्दर्भ में सिर्फ एक ऐसे लौह पुरुष के रूप में सीमित कर दिया गया , जिसने देश  की  ५१२ रियासतों को एक राष्ट्र के रूप में नया स्वरूप दे दिया ,   जो की  रजवाड़ों के स्वार्थी संस्कारों के बीच ,,,एक असंभव कार्य था !  क्या पटेल का व्यक्तित्व बस एक लौहपुरुष का ही था ,,,,??  तो  फिर  वे सरदार क्यों  कहलाये  ,,?? क्या यह सरदार का सम्बोधन उन्हें   रियासतों के  विलय के दुष्कर  कार्य करने के लिए नवाज़ा गया था ,या किसी और कारण ,?  वे क्यों सरदार कहलाये ,,,इसका   उत्तर    आज की पीढ़ी  नहीं जानती  .??

   सरदार पटेल वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम में ,  गांधी के साथ चलने वाले रथ के दूसरे पहिये थे !  या  यु  कहें  की   गांधी और सरदार एक ही सिक्के के दो पहलु थे ! वे गांधी के अनुयायी कम , मित्र ज्यादा थे ! वे  संघर्षों  में  पले _  बढे ब्यक्ति थे !  उन्हें सुविधाओं की चम्मच जन्म से ही मुंह में नहीं मिली थी , और ना ही कोई व्यक्ति उनका गॉड फादर था ! दूसरे शब्दों में यदि एक कड़वा सत्य कहें की , गांधी को और सरदार को " कांग्रेस ' की जरुरत नहीं थी ,,,बल्कि कांग्रेस को इन दोनों व्यक्तित्वों की जरुरत थी ,,, स्वतंत्रता के आंदोलन के लिए ......, तो गलत नहीं होगा  !

  संक्षेप में यदि सरदार की जीवनी पढ़ें , तो यह पता चलता है की वे सं १८७५ में जन्मे , और नेहरू से १४ साल बड़े थे ! वे बहुत ही सामान्य  परिवार  से थे , और स्वभाव से महात्वाकांक्षी नहीं थे ! उन्होंने अपनी वकालत की प्रारम्भिक पढ़ाई भी , अन्य सीनियर वकीलों से किताबें  मांग कर पढ़ीं ,,, क्यूंकि उनके पास किताबें खरीदने  के  पैसे  नहीं थे ! उन्होंने युवावस्था में  ,    प्लेग से पीड़ित अपने मित्र की सेवा की  और  उसका  इलाज़ किया और फलस्वरूप वे भी इस भयानक रोग के शिकार हो गए !  अपने रोग का इलाज़ , उन्होंने परिवार से दूर रह कर,  एकांत में , एक मंदिर में रह कर किया और स्वस्थ हुए !  वकालत  की  पढ़ाई  के बाद उन्होंने गोधरा में रह कर प्रेक्टिस शुरू की ,,,और अपने पैतृक घर , और परिवार से कोई  आर्थिक  मदद नहीं ली !  सं १९०९ में , उनकी पत्नी कैंसर के  रोग  से  ग्रसित  हुई , और मुंबई के एक अस्पताल में मर गयीं ,,,! जब उनकी पत्नी की खबर उन्हें दी गयी तो वे अदालत में एक ज़िरह कर रहे थे ,,,उन्होंने कागज़ पर लिखी अपनी पत्नी की मृत्यु की सूचना को चुपचाप जेब में रख लिया और जिरह पूरी होने के बाद ही अदालत से बाहर आये !
   पत्नी की   मृत्यु  के  बाद  उन्होंने पुनः विवाह नहीं किया ! एक लड़की और एक लड़के , दो बच्चों की परवरिश उन्होंने खुद अपने ही आर्थिक  सीमाओं में आजीवन   की  !

     ३६ वर्ष की उम्र में  सं १९११ में  , वे बैरस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए !जहाँ उन्होंने ३६ माह का कोर्स सिर्फ ३० माह में ही पूरा कर लिया !  वापिस आकर   वे एक सफल बैरिस्टर बने  और अपनी प्रेक्टिस शुरू कर दी ! सं १९१७ में उनकी पहली मुलाक़ात गांधी से हुई ,,,और वे उनकी  स्वराज की धारणा से वे प्रभावित हुए !  इस कार्यक्रम के अंग बन कर  , वे गुजरात  सभा  के सचिव बने जो बाद में कांग्रेस की .. शाखा ' गुजरात  कांग्रेस  के  रूप  में परिवर्तित हो गयी !

    सरदार ने गुजरात में अपने ही तत्वाधान में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया ! उन्होंने सर्वप्रथम अंगरेजी कानून ,',बैथ ' .. का विरोध किया  ! जिसके अनुसार   किसान  और , मज़दूर , अंग्रेजों का सामान  मुफ्त  ढोने के लिए कानूनन बाध्य थे ! अस्वीकार करने पर जेल का प्रावधान था ! इसके साथ साथ ही उन्होंने समाज सेवा का बीड़ा उठाया , जिसमें प्लेग से बचाव , और कुपोषण से मुक्ति हेतु लोगों को शिक्षित करने का कार्य था !   इसी सिलसिले में उन्होंने गुजरात के खेड़ा जिले से , अंग्रेजों को टेक्स दिए जाने का विरोध शुरू किया ,,,और कुछ ही दिनों में किसान टेक्स देना बंद कर दिए ! यह वह समय था जब गांधी जी  चम्पारण  में  निलहे गोरों के विरोध में एक अलग आंदोलन चला रहे थे !  सरदार वल्लभ भाई का जुड़ाव , एक से स्वभाव   के कारण , गांधी से जुड़ता गया ,,और वे गांधी के ना सिर्फ समर्थक बल्कि , एक महत्वपूर्ण सिपाही बन गए ! सरदार ने पुरे जिले के सभी गावों में भ्रमण करके किसानो को जाग्रत किया की वे टेक्स ना दें , ! सरकार ने पुलिस भेजी , किसानो के जानवर और संपत्ति को सीज़ करने के लिए , किन्तु सरदार के इशारे पर किसानो ने अपने जानवर और मूल्यवान संपत्ति को छिपा लिया ,,!! सरकार ने हजारों आंदोलन  कर्ताओं  को पकड़ा  , लेकिन पटेल  पकड़  में नहीं आ  पाए ! धीरे धीरे यह आंदोलन निकट के अन्य प्रांतों में भी फ़ैल गया ,,,लोग पटेल को जानने लगे। .. वे  लोगों के नायक बन गए ,,!  कुछ दिन बाद सरकार झुकी , उसने टेक्स में रियायत की  और कहीं कहीं  तो  एक  साल  के लिए वापिस ले लिया !

     पटेल ने गुजरात  को पूरी तरह सम्हाल लिया ! असहयोग आंदोलन  के दौरान  , उन्होंने  कांग्रेस के  तीन लाख सदस्य बनाये , जिनसे १.५ लाख की रकम भी आंदोलन चलाने के लिए एकत्रित हुई ! पटेल ने अंगरेजी वस्त्र त्याग दिए , और बच्चों सहित खादी पहनने लगे ! उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध , और शराब  बंदी के  लिए  ,सफल  आंदोलन संचालित किये ! वे लोगों द्वारा ' अहमदाबाद '' शहर के नगरपालिका के अध्यक्ष भी बनाये गए और उस जमाने में उन्होंने शहर की स्वच्छता के लिए   महत्त्व   पूर्ण कार्य किया ! जब १९२७  में उस क्षेत्र में भीषण बाढ़ आयी , सैकड़ों लोग बेघर हुए , तो उन्होंने राहत केम्प चलाये  , और  , निशुक्ल वस्त्रों ,दवा, भोजन की व्यवस्था करवाई !  उनके एक आह्वान पर सैकड़ों कार्यकर्ता खड़े हो जाते थे !,,,और वे उनके नायक कहलाते थे ! विभिन्न आंदोलनों के मुखिया होने के नाते   गुजरात  के लोगों ने,, उन्हें अपना " सरदार " माना !और वे उनके बीच प्यार से,,,, " सरदार " ,,,,कहलाने लगे !


    १९२३  में जब गांधी जेल में थे , तो पटेल को नागपुर कांग्रेस का न्रेतत्व करने को कहा गया ! उन दिनों " तिरंगा " फहराना मना था ,,,! नागपुर में तिरंगा फहराने   के लिए उन्होंने हज़ारों कार्यकर्ताओं को देश के कोनों से बुला लिया ...पुलिस समझ ही नहीं पाई  और झंडा फहराया गया ! बढ़ते  हुए प्रभाव को देख कर अंग्रेज सरकार झुकी , और सरदार के कहने पर बहुत से उन लोगों को  जो  झंडारोहण  के लिए जेल में ठूंस दिए गए   थे ,,,रिहा किया गया ! दांडी यात्रा के समय , पटेल से डरे अंग्रेजों ने उन्हें  पहले  ही  गिरफ्तार  कर लिया !  और बंद कमरे में उन पर एक गंभीर मुकदमा चलाने की कोशिश , बिना गवाहों के शुरू हुई !,,,लेकिन जनता के दबाव के सामने सरकार को पटेल को छोड़ना पड़ा !  दांडी यात्रा के बाद जब गांधी भी गिरफ्तार हो गए ,,,तो  सरदार को कांग्रेस का   अंतरिम  अध्यक्ष बनाया गया ! बाद में वे १९३१ में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए !

     दूसरी गोल मेज कांफ्रेंस फेल होने पर गांधी और सरदार दोनों नेताओं को एक साथ गिरफ्तार कर लिया गया ,, और उन्हें यरवदा जेल में साथ साथ रखा गया ! वहां सरदार,    गांधीजी के एक विश्वश्त सहयोगी बने , और स्वराज से ले कर स्वतंत्रता प्राप्ति के सभी मुद्दों पर परामर्श हुआ ! उन्होंने वहां हिन्दू मान्यताओं पर भी चर्चाएं की , हंसी मज़ाक भी किया , और जब गांधी ने आमरण  अनशन शुरू किया तो पटेल ने ही उनकी देखभाल की ! !सरदार से  गांधी की निकटता की रिपोर्ट मिलने पर , अंग्रेजों ने उन्हें अलग नासिक जेल भेज दिया ! इस बीच उनके बड़ेभाई की भी मृत्यु हुई किन्तु उन्होंने अल्पकाल के लिए रिहा होने से मना कर दिया! ,,अंत में सरकार को उन्हें..  उसी वर्ष के अंत में छोड़ना पड़ा !

   १९३४ के बाद सरदार अब कांग्रेस में भी एक " सरदार " का कद अख्तियार कर चुके थे  और उनकी राय हर जगह ली जाने लगी थी ,, चाहे , वह विधान  मंडल  के लिए चुने जाने वाले लोगों के चयन के लिए हो या फिर किसी अन्य मुद्दे के लिए ! सर्वशक्तिमान नेता होने के बाद भी उन्होंने खुद के पद के लिए कभी उठापठक नहीं की और ना ही कोई महत्वकांक्षा पाली !

    शोशलिस्ट विचारों को कांग्रेस में मान्यता दिलाने के लिए जब नेहरू ने पहल की तो.. उन्होंने नेहरू का खुला विरोध किया ! सरदार का मानना था की इससे कांग्रेस दिशाभ्रमित होगी !,,,क्यूंकि सोशलिज्म और वामपंथ एक ही रंग रूप के सिद्धांत थे ,!,जो  कांग्रेस  के मूल सिद्धांत अहिंसा ,,और शांतिपूर्ण असहयोग को प्रभावित कर सकते थे !यही नहीं ,,,जब युवा नेता ,,, सुभाषचंद्र बोस ने भी कांग्रेस के सिद्धांत को गरमदल से जोड़ना चाहा  ,  तो सरदार  उनके   साथ नहीं  गए  !  यही कारण है की शोशलिष्ट और कुछ क्षुब्ध कांग्रेसी उनके  सदा के लिए  आंतरिक विरोधी बन गए !

  असली वक्त आया सं १९४२ , जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ ,,,तो ' अभी नहीं तो कभी नहीं ' की सोच पूरी  कांग्रेस में जाग्रत हो गयी !  नेहरू ने विधान मंडलों से कांग्रेस को अलग करने की पैरवी की ,,,और राजगोपालाचारी ने कहा की अंग्रेजों का पूरा साथ दिया जाना उचित होगा यदि वे हमें आज़ादी देने के लिए अनुबंध कर लें ! अंग्रेजों ने राजगोपालाचारी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो सभी , एकमतेन,," अवज्ञा   आंदोलन " छेड़ने के लिए सहमत हो गए ! यहीं से जवाहरलाल नेहरू और पटेल में थोड़ी समझ एक दूसरे के प्रति  बढ़ी  ! क्यूंकि पहले अवज्ञा आंदोलन को ले कर नेहरू , राजगोपालाचारी   और मौलाना आज़ाद ने आपत्ति उठाई थी ,  लेकिन पटेल के समझाने पर सब मान गए ! फिर भी जब कांग्रेस कमेटी के सामने कई लोगों ने इस आंदोलन के विरोध में आवाज़ उठाई तो पटेल ने  अंतिम  चेतावनी दे दी की अगर कांग्रेस नहीं मानती है तो वे , कांग्रेस छोड़ देंगे !पटेल हर हालत में गांधी के सिद्धांत पर चलना पसंद कर रहे थे ,,,जबकि कई लोगो इसे मंजूर नहीं कर रहे थे !  पटेल के दबाव के कारण ही ७ अगस्त1942  के ऐतिहासिक दिन को  ,  अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ ,,!

    इस आंदोलन को सफल करने के लिए सरदार ने धुआंधार मीटिंग जनता के बीच की   !   यद्यपि   भारत छोडो आंदोलन की इस मुहीम पर सम्पूर्ण कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करके ,,,अहमदनगर जेल में डाल दिया गया जो १९४५ तक जेल  में रहे !,,इस जेल प्रवास में ही कस्तूरबा और महादेव देसाई की मृत्यु हुई जिससे सरदार को बहुत बड़ा दुःख पहुंचा ! ,  पीछे  जनता ने बहुत उग्र प्रदर्शन भी किये ,,,और जनता से पुलिस की झड़प भी होती रही !  इसे अंग्रेजों ने विद्रोह की संज्ञा दी ,,,और इसे १८५७ से भी बड़ा विद्रोह माना !   सरदार   इस दौरान जेल में रहे ,,और १९४६ में बाहर आने पर वह बड़ा परिवर्तन आया..... जब गांधीजी के कहने पर सरदार ने... कांग्रेस के अध्यक्ष पद.... से अपना नाम ,,     नेहरू को आगे करने के लिए   हटा लिया ! सरदार ने जेल में रहते हुए ही कहा की अब उनके विश्राम करने का समय आ गया है ,,,क्यूंकि उन्होंने बहुत परिश्रम कर लिया जो उनके  कूवत से भी बाहर था !  शायद,,,, कांग्रेस के बदलते परिदृश्य को वे भांप गए थे ,,और इसी लिए थकान अनुभव करने लगे थे !

१९४६  में अंग्रेजों ने सत्ता हस्तारण की बात शुरू की ,!,,और दो अलग राष्ट्रों की अवधारणा सामने आयी!  , जिसमें एक राष्ट्र,,,, धर्म आधारित,,," पाकिस्तान  "  की परिकल्पना  जिन्ना  ने की ! अब सवाल उठा की कौन सी  रियासत  किस राष्ट्र में विलीन होगी ,,,और यही वह समय था जब सरदार पटेल ,,,,एक लौहपुरुष के रूप में सामने आये ,,,और उन्होंने एक नए राष्ट्र को मूर्तवत किया !

    सच कहें तो १९४७ की कांग्रेस,,, सिर्फ तीन बड़े नेताओं के नामों की कांग्रेस  बची  थी ,,!   डाक्टर राजेंद्र प्रसाद , जवाहर लाल नेहरू , और सरदार पटेल !  इस   कांग्रेस   में अब बहुत शक्ति , और  ओज बचा ही नहीं था ,,इसी लिए गांधी ने कहा की,,,, कांग्रेस को डिजाल्व कर दो , और नए सिरे से एक पार्टी का गठन करो , जो देश का शाशन चलाये !  अगर यह प्रस्ताव मान लिया जाता तो नयी पार्टी में वे भी समाविष्ट होते , जो बाद में बाहर रह कर नेहरू के विरोधी दिखाई देते रहे ! सरदार की मृत्यु के बाद , और राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बन जाने के बाद ,,, स्वतंत्रता आंदोलन की कांग्रेस तो एक ही व्यक्ति के नाम  शेष बची थी जो  " नेहरू " थे !  और यही कारण   हैकी बाद की भूलें ,,,आज  की  कंटक बनी हुई हैं !

      नेहरू कीमृत्यु के बाद ,,,,,, कांग्रेस,,,,,, कामराज , और निजलिंगप्पा तक  रही ,!,,लेकिन इंदिरा ने जब खुद को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पार्टी से बगावत की,,, तो वह कांग्रेस ख़तम ही हो गयी जो वास्तविक कांग्रेस थी !!  बाद की कांग्रेस तो इंदिरा कांग्रेस कहलाई जिसका चुनाव चिन्ह भी बदला और टीम भी ! आश्चर्य है की स्वार्थी कांग्रेसियों ने उस समय के एक तेजस्वी कांग्रेस नेता की भी अवहेलना की ,,,जो मुरारजी देसाई थे !  बाद में यही नेता कांग्रेस के विरोधी नेता बन कर कुछ समय के लिए ही सही , लेकिन प्रधान मंत्री जरूर  बनाये गए थे !

    आज की कांग्रेस जो यह दावा करे की सरदार  उसकी  विरासत के हैं , तो ,वह गलत है ,,!! ना कांग्रेस वह  पुरानी कांग्रेस है ,,,और ना वे सिद्धांत बचे हैं  जो आज़ादी की लड़ाई के लिए  स्थापित हुए  थे   !  यह कांग्रेस तो सत्ता के लिए लड़ने वाली कांग्रेस है ,,,जिसका पुराणी कांग्रेस से ना  कोई  खून का रिश्ता है ,,ना विचारों का !  कोई कुछ भी कहे ,,,आज की कांग्रेस तो स्वार्थ और वंशपरम्परा से उपजी , चापलूस लोगों द्वारा समर्थित कांग्रेस है ,,जो सत्ता का मक्खन बिना किसी रिस्क के , पीछे  पीछे  रह कर खाना चाहते हैं !यह येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज रहने की कोशिश करते रहने वाली कांग्रेस है जिसका..स्वतंत्रता संग्राम में खून बहाने वाले कार्यकर्ताओं से कोई सम्बन्ध नहीं !

---sabhajeet


मंगलवार, 22 अगस्त 2017

 राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु   लिखी गयी  , स्वीकृति !

   यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

    राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के  शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !

   राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में  उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !

  राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे !  उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !

         यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३७ के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !  !  यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

      अब  यह  देखना  जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?

   वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था  की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन  भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था !   इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य  " गन सेल्यूट " कहलाते थे !

     एक्ट १९३५ में   ,   इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !

     तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,??   इस राज को जानने की जरुरत है !

 खुद  को स्वयंभू  ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , "  मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण  जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए !  महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि  स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !

    जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल  में रहा   बाद में उसकी मृत्यु हो गयी !  ,,,!

    अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे !  तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन ककर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए  और काश्मीर नहीं बना ??राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु लिखी गयी , स्वीकृति !
यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल एक्ट १९३५ के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए , शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी ! भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,! किन्तु काश्मीर ने नहीं दी ,,,क्यों ,,? इसके कारण है नेहरू द्वारा पैदा किये गए काश्मीर के स्वयं भू नेता ,,शेख अब्दुल्ला ! जो शुरू से ही काश्मीर को स्वतन्त्र मुस्लिम राज्य की तरह देख रहे थे ,,और दूसरे उन्हें मौका मिल गया नेहरू की गलती का ,,,जो नेहरू यु एन ओ में जाकर , काश्मीर को अंतर राष्ट्रीय समस्या बना दिए ! बहाना लिया गया गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया के एक्ट १९३५ तथा , राजा की संधि में लिखी शर्तों का !
अब यह देखना जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?
वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था ! इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य " गन सेल्यूट " कहलाते थे !
एक्ट १९३५ में , इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !
तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,?? ऐसा क्यों ,,??
इस राज को भी जानने की जरुरत है !

खुद को स्वयंभू ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , " मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए ! महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !
जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल में रहा बाद में उसकी मृत्यु हो गयी ! ,,,!
अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे ! तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन कर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए और काश्मीर नहीं बना ??
सच तो यह है की काश्मीर के प्रति शुरू से लापरवाही बरती गयी ,,,! पहले तो जब कबायलियों ने आक्रमण किया तो उन्हें पुरे काश्मीर से हटाने की जगह सिर्फ थोड़े से हिस्से से हटा कर युद्ध रोक दिया गया ,,,और इस प्रकरण को नेहरू बे वजह यु एन ओ ले जा कर विवाद का विषय बना दिए ! बाद में शेख अब्दुला को काश्मीर की गद्दी सौंप दी , जो बाद में जल्दी ही प्रकट हो गयी की वह एक स्वतन्त्र काश्मीर मुस्लिम राज चाहता है ! उसे हटा कर जेल में डाला ,,,तो घिसे पिटे एक्ट १९३७ और संधि शर्तों में उलझ कर नए एक्ट ३५ै ऐ तथा ३७० बना लिए ! ये एक्ट भी संसद में पारित नहीं हुए , और सिर्फ राष्ट्रपति से आदेश बनवा कर काश्मीर में लागू करवा दिए !
दूसरी और देखिये , क्या पी ओ के वाले काश्मीर के हिस्से पर पाकिस्तान ने ऐसे ही एक्ट बना कर लागू किये ,,?? क्या उस हिस्से के सम्प्रभुता , राजा हरिसिंह के राज के आधीन नहीं थी ? क्या उस पर ब्रिटिश काल का एक्ट १९३५ लागू नहीं होता है ,,? तब पाकिस्तान ने वहां कौन सी शराफत दिखाई , जो हम दिखाने में लगे रहे ! ,??
अब वक्त आया है जब इन ऐक्ट के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय से एक्ट हटवाने का जो संसद पारित हैं ही नहीं तो हमारे वाम पंथी प्रबुद्ध लोग हमें सीखा रहे हैं की इतिहास क्या है !
लेकिन याद रहे वक्त करवट बदलता है ,,,, जिन काश्मीरी ब्राम्हणो को यह सीख दी जा रही है की आप वहां रह कर लड़े क्यों नहीं , उनकी और से जबाब है की जब बल का ही प्रयोग करना है तो क्यों ना हम पुरे काश्मीर को वापिस लेने के लिए करेंगे ,,और जो एक्ट लगाए वो हम अपने ही न्यायालय से रद्द करवाएंगे !
राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !
राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !
राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे ! उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !
यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३5 के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !



     राजा हरिसिंह के शाशन काल में ही नेहरू ने ,,मुस्लिम लीडर और तत्कालीन अलगाव वादी , नेता ,



शनिवार, 9 सितंबर 2017





  **** " सबूत " *****

   वह एक लम्बी टाटा सफारी गाड़ी के सामने तनी हुई खड़ी थी ! वह ट्रेफिक पुलिस की वर्दी में थी और साथ में थे दो , डंडा धारी सिपाही !
  वह बार बार हाथ में लिया हुआ एक नोटिस लहरा रही थी ,,,और गाड़ी का मालिक   अपनी  गाड़ी के   डोर पर अड़ा हुआ उसे घूर रहा था ! गाड़ी का मालिक बार बार उसे कह रहा था --- ' मेडम आप मुझे जानती नहीं है ,,इसलिए ये बत्तमीज़ी कर रही हैं ,,!  आज तक किसी ट्रेफिक इन्स्पेक्टर की हिम्मत नहीं हुई  जो वह हमारी गाड़ी का चालान काट देता  ! आप नयी हैं इसलिए मैं आपको माफ़ कर रहा हूँ ,,! "

   लड़की ने कहा , ... ' मुझे फर्क नहीं पड़ता की मैं नयी हूँ या पुरानी  " आपने अपनी गाड़ी पार्किंग लाइन के बाहर रोड पर खड़ी  है ,,नियम के अनुसार यह , अपराध है , और इस पर आपका यह चालान मेने काटा है   आप चाहें तो अभी भुगतान करदें या फिर कल हमारे दफ्तर में आकर भुगतान करदें ,,,!  यदि भुगतान नहीं किया तो हम आपकी गाड़ी सीज़ करवा  लेंगे   !"

   इस बीच कुछ तमाशाइयों की भीड़ वहां जुड़ने लगी !  कुछ संभ्रांत लोग भी आ गए !

   एकत्रित लोगों में कुछ लोग दांत निकालते हुए  गाड़ी मालिक की तरफदारी करने लगे ,,!  वे उस लड़की से बोले ,,
   
        "  हद हो गयी ,,! आप गाड़ी पर लगा पार्टी का झंडा नहीं देख रहीं ,,?   ये शहर के बड़े नेताजी की गाड़ी है ,,,कम से कम इसे तो बख्श दो ,, आज अगर पैसा उगाना ही है तो किसी और चौराहे पर खड़ी हो जाओ ,,,लगता है आपका टारगेट पूरा नहीं हुआ इसलिए आप अड़ गयीं हैं ! "

    लड़की की आवाज़ तल्ख़ हो गयी ,,,वह बोली ,," आप अपनी राय अपने पास रखो ,,!  यह सरकारी मामला है ,,,इसमें दखल डालने पर आप पर भी कार्यवाही हो जाएगी ,,समझे ,,! "

    राय देने वाला व्यक्ति कुछ कहता इससे पहले ही भीड़ को हटाता हुआ एक स्थूल शरीर का युवा नेता आगे आगया ,,,! उसने गाड़ी मालिक से पूछा -- " क्या हुआ भैया " ?

   गाड़ी मालिक ने  लापरवाही से उस पर निगाह डाली ,,,और बोला ,,"  अरे कुछ नहीं ,,,नयी नयी   नौकरी है ,,,वर्दी का रौब दिखा रही हमें ! "  वह स्थूल काय युवा उस लड़की की और मुखातिब हो कर कहने लगा ,,,___

      " मालुम नहीं की यह विधायकजी के भतीजे है ,,,मुन्ना बाबू ,,! पूरा शहर इन्हे जानता है  और आप इन्ही से पंगा ले रही हैं ,,, आप इन्हे जाने दीजिये ,,,इस पी साहब आपको इन्हे चालान देने पर कोई तमगा नहीं दे देंगे ,,बल्कि आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी  समझीं ,,"

   मुझे यह जान कर क्या करना है की कौन किसका रिश्तेदार है या कौन नहीं ,,! " ---- लड़की ने तल्खी से जबाब दिया ,,, आप सब खुद देख लें की यह गाड़ी साइड की पटरी पर बनी सफ़ेद पार्किंग लाइन के  बहुत बाहर रोड पर खड़ी है ,,,अभी बहुत सी गाड़ियों का रेला यहाँ फंस गया था जब ये गाड़ी लॉक करके शॉपिंग करने गए थे ,,"

     अब कुछ सभ्रांत लीग नहीं बीच में कूदने लगे ,,!  बोले ---- क्या विधायकों के रिश्तेदारों के लिए कोई अलग से ट्रेफिक नियम बने हैं ,,?? हम सबने भी तो अपनी गाड़ियां यहां पार्क की थी ,,लेकिन सब सफ़ेद लाइन के अंदर थी  ,,! "

  गाड़ी मालिक ने उन लोगों को घूर कर कहा --" आप लोग चुप रहें ज्यादा नेतागिरी ना करें ,,, पुलिस रोज शरीफ आदमियों को ट्रेफिक के नाम पर परेशान करती है ,,,लेकिन जब उन्हें अपने अफसर के लिए पैसे की जरुरत पड़ती है तो वे ' वसूली ' में उतर आते हैं ,,मैंने तो यही देखने के लिए जानबूझ कर गाड़ी रास्ते में खड़ी की है ,,देखें कौन मुझसे पैसा वसूलता है ,,? "!

   सभ्रांत लोगों में से एक बुजुर्ग ने आपत्ति की ,,,--" लेकिन आप सरेआम गाड़ी सड़क के बीच खड़ी किये हैं ,,,और फ़ालतू बातें कर रहे हैं ,,?   आपको चालान की राशि जमा करने में क्या आपत्ति है ,,?? "

    स्थूलकाय युवा नेता बोला ,,,--"ऐ ययय   चाचा ,,, अपने काम से काम रखो    अब यह इज्जत का सवाल है ,,,भैया जी आप गाड़ी चालु करो  ,,, आगे बढ़ाओ देखते हैं कौन रोकता है ,,??

     लड़की गाड़ी के सामने  जम  कर खड़ी हो गयी ! वह हिलने का नाम भी नहीं ले रही थी ! पता नहीं किस मोरल वेल्यू से प्रभावित हो कर उसके साथ के सिपाहियों ने भी डंडे सम्हाल लिए !

   तभी कार का शीशा  नीचे  हुआ  और  कार के अंदर बैठी  एक वृद्धा महिला ने झाँक कर  पूछा --" क्या बात है मुन्ना ,,,क्यों रार बढ़ा रहे हो ,,?? "

   गाड़ी  मालिक ने कार में बैठी मां को समझाते हुआ कहा। ."कुछ नहीं ,,,कार का  ऐo  सीo   चालु है ,,आप आराम से बैठो ,,थोड़ी देर में  चल रहे  हैं ,,! "

    स्थूल काय युवा नेता ने कहा ---' भैयाजी आपसे कहा ना आप कार में बैठ कर कार आगे बढ़ाओ ,,, आपको कोई नहीं  रोकेगा  !  मैं डी एस पी साहब को फोन करता हूँ !  "

    गाड़ी मालिक कार में बैठ गया ,,, लड़की कार के सामने अपने सिपाहियों के साथ खड़ी रही ,, गाड़ी मालिक ने कार को झटके के साथ,, बैक,, किया ,,लोग हट गए ,,,फिर गाड़ी मालिक ने कार को थोड़ा साइड करके  सफ़ेद लाइन के अंदर कर  दिया  ! दरवाज़ा खोल कर वह फिर बाहर आया और बोला ---" राजू,,,,अब  बुलाओ डी एस पी साहब को ,,इन्हे इनका आयना दिखा दूँ ,!

   ज्यादा देर नहीं लगी ,,,डी एस पी साहब की पीली बत्ती वाली गाड़ी वहां उपस्थित हो गई !  वर्दी वाली लड़की ने आगे बढ़ कर अपने अफसर को सेल्यूट किया  ,! अफसर ने गुर्राई आवाज़ में पूछा ,,--" क्या बात है इंपेक्टर प्रीती ' सड़क पर क्यों मज़मा लगाए खड़ी हो ,,??

    लड़की कुछ जबाब देती उससे पहले ही गाड़ी मालिक बोल उठा ,,__' नमस्कार डी एस पी साहब ,,!  ये आपने कैसे कैसे इंस्पेक्टरों को भर्ती करवा   लिया  डिपार्टमेंट में ,,??

    दी एस पी ने गाड़ी मालिक को देखा और  कूद कर बाहर आगया ,,, बोला ,," अरे  मुन्ना  जी ,,आपने फोन पर याद  किया था हमें क्या परेशानी हो गयी आप  को हुकुम करें ,,! "

    गाड़ी मालिक ने आँखे तरेरते हुए कहा ---  आप खुद देख  लें ,,मेरी गाड़ी पार्किंग लाइन के अंदर खड़ी है ,,,मेरी माताजी बीमार हैं ,, यहाँ कुछ शॉपिंग के लिए दवाइयां लेने आया तो आपकी इन  इन्स्पेक्टर साहिबा ने मेरे ही गाड़ी का चालान काट दिया ,,,,और पैसे मांगने लगीं ,,  अरे आप लोगों को कभी जरुरत हो तो हमें ही सीधे आदेश दे दिया करें ,,, ये चालान से वसूली का नाटक क्यों करते हैं ,,!
! "

   लड़की बिफर गयी  बोली --"  झूठ बोल रहे हैं ये सर ,,! ,,इन्होने अभी अभी यही गाड़ी बेक करके पार्किंग लाइन के अंदर की है ,,! "

    " भाई सत्यवादी हरिश्चंद्र तो पुलिस में ही होते है ,, सबूत सामने है ,,,गाड़ी कहाँ खड़ी है  दिख रही है  ,,,फिर भी अड़े बैठे हैं ,,, पैसे जो चाहिए इन्हे ,,! " ... गाड़ी मालिक का चमचा नेता राजू बोला ,,!!

  ,,,"  आप चाहें तो भीड़ में खड़े इन लोगों से पूछ लें ,,, ये बताएँगे आपको ,,! " --- लड़की ने प्रतिवाद किया ,,!
      डी एस पी ने  इन्स्पेक्टर को डांटते हुए कहा ,,," क्या मुझे नहीं दिख रहा की गाड़ी कहाँ खड़ी है ,,,जो और लोगों से पूछूं ,,? यह  नोटिस केंसिल करो , मुन्ना भैया को जाने दो ,," "

     अब लड़की जान की परवाह किये बिना अड़  गयी ,,,"  मेरे पास सबूत है सर ,,,ये देखिये ,,,मेरे मोबाइल में फोटो है ,,,गाड़ी इन्होने पहले जहाँ खड़ी थी वह साफ़ साफ़ दिख रहा है ,,! "

      ,,," अरे छोडो मोबाइल ,,,और फोटो ,,,अदालतें सबूत में गवाह मांगती हैं मिस प्रीती ,,बेकार की जिद ना करो  मुन्ना बाबू को जाने दो ,,! "

     इन्स्पेक्टर रुआंसी हो गयी ,,,बोली ,,,' सर,,,,! मेरे सिपाही ने वह वीडियो  भी  बनाया है जिसमें ये गाड़ी बेक  कर के गाड़ी को पार्किंग लाइन के अंदर कर रहे हैं ,,, ,,,पूरी भीड़ खड़ी है ,,! "

     '  कौन सी भीड़ ,,?? "--- राजू हंसने लगा ,,! ,,,वह भीड़ की और मुखातिब हो कर  बोला --- ' क्यों भाइयो  ,,?? आप लोग जाएंगे अदालत में गवाही देने ,,??
 
    पल भर में भीड़ खिसकने लगी ,.,,!   गाड़ी  मालिक विजेता की मुद्रा में प्रीती को देखने लगा ,,, बोला     "   डी एस पी साहब ,,,ऐसे अफसरों को पब्लिक ड्यूटी में क्यों लगाते हैं ,,,जिन्हे  समझने बुझने की तमीज नहीं ,,,वो तो में हूँ ,,कोई और होता तो इतनी देर में बलवा हो जाता ! "

   "  आप फ़िक्र ना करें मुन्ना भाई ,,,में प्रीती को पब्लिकडयुटी से हटा कर आफिस अटैच कर दूंगा ,,, आखिर हमारा भी तो फ़र्ज़ है ,,, पब्लिक के साथ ' ना इंसाफ़ी ' ना हो ,,! "


     प्रीती ने एक बार फिर कोशिश की ,,," लेकिन सर  ये फोटो , ये वीडियो झूठे नहीं है ,,,ये पूरा सबूत हैं ,,, इन्होने नियम तोड़े हैं ,,! "

    अब डी एस पी साहब का पारा चढ़ गया ,,,"  शट अप ,,,!! तुम हमीं से जबान लड़ा रही हो ,,, ? ये सबूत किस काम के ,,जब कोर्ट पूछेगा ,,,है कोई ' चश्मदीद गवाह " ,,??

,,,, तभी कार की खिड़की खुली ,,! कार में बैठी वृद्धा बाहर निकली ,,-- बोली --" हाँ में हूँ चश्मदीद गवाह
   मेरा बेटा झूठ बोल रहा है डी एस पी साहब ,,, इसने कार गलत खड़ी की थी ,,,और उस लड़की ने सही चालान काटा ,,! "

    महिला को देखते ही डी एस पी ने आदर से  महिला को प्रणाम किया ,,,,!   बोले ''' अरे आप इतनी देर से अंदर बैठी सब देख रहीं है भाभी जी  ,,,लेकिन चुपचाप बैठी रहीं ,," ,,!

   "  हाँ में सब देख रही थी सब सुन रही थी ,,,देख रही थी की मुन्ना कब तक अपनी औकात की धौंस दिखाता है ,,",,!

       गाड़ी मालिक अचकचा गया ,,,कुछ बोलने को हुआ की  वह वृद्धा फिर बोल उठी ,,, " तेरे पिता  फ्रीडम फाइटर थे ,,, उन्होंने  लाठियां   झेली  जेल गए ,,,लेकिन झूठ कभी नहीं बोले ,,,!  यही कारण है की उनके मरने के बाद उनके सबसे छोटे भाई को जनता ने उनकी साख पर विधायक बनाया !  आज तू उस विधायकी की धौंस उसे दिखा रहा है जो कानून की हिफाजत में लगी है ,,? लानत है तुम पर ,,,कोई नहीं देगा तो में दूंगी गवाही कोर्ट में बेटी ,,,तुम वह चालान इस कार पर चिपकाओ ,,,देखें कौन तुम्हे रोकता है ,,? "

    अब बचे खुचे लोगों में सन्नाटा खिच गया    जैसे  सब को सांप सूंघ   गया  हो ,,!

    गाड़ी  मालिक   पर  तो जैसे घड़ों पानी फिर गया था !    उसने चुपचाप बटुआ खोला चालान के पांच सोउ रूपये निकाले    और सर झुका कर बोला ,,"" आय एम् सारी  प्रीतीजी ,,!  आप यह रसीद काटें ,,,अब इसके बाद ऐसे गलती में कभी नहीं करूंगा ,,!!


,,,,,,, सभाजीत शर्मा
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