शनिवार, 13 दिसंबर 2014


 !!  " भूतलीला " ,,,!!

    ( मंच पहले सूना रहता है !
    { फिर एक व्यक्ति का प्रवेश )

    व्यक्ति :- ( स्वतः ) ,,, ' हमेशा भाग्य ,, भाग्य ,,!! कितना भी काम करो ,, सफलता नहीं मिलती ! और कुछ लोग  हैं  कि  बिना कुछ किये ही चढ़ गए सफलता के सिंहासन पर ,,,!   न जाने क्या सोच कर मेरे पिता ने मेरा नाम रखा था - " गौरव सिंह " ,,! लेकिन ,,,किस बात का गौरव ,,??  किस काम का गौरव ,,,?? ,, अब तो खुद अपने पर ही तरस आने लगा है ---न  जाने कब होगा  ,,  कैसे होगा ,  मेरा उद्धार ,,,!!

     ( मंच पर विविध  रंगीन प्रकाश का आवागमन )

      ( तभी एक अन्य  व्यक्ति  विचित्र वेशभूषा में मंच पर आता है !}
  {  यह व्यक्ति अधेड़ है ,, तथा ' तांत्रिकों ' की तरह पोशाक धारण किये है ! हाथ में एक बड़ी सी ' गठरी ' है ,,, और तरह तरह के सामान , ,, मालाएं ,, आदि कंधे पर लादे हैं ,,! )

  तांत्रिक   -      ' ' कहो गौरव सिंह  ,,!! ,, क्योँ  बड़बड़ा रहे हो ,,?? "

  गौरव सिंह :-     ' ( चौंक कर उसे घूरते हुए ) ,,, तुम ,,??,,,, कौन हो तुम ,,??  और तुम्हे कैसे मालूम की मेरा                                  नाम गौरव सिंह है ,,? "

 तांत्रिक:-            ( हँसते हुए ) ,, ' त्रिलोकीनाथ ' से क्या छिप  सका     है  गौरव  सिंह ,,? ,,, त्रिलोकी नाथ          
                                क्या   नहीं  जानता ,       ,??

  गौरव सिंह :-       ( संदेह से  तांत्रिक  को घूरते हुए ) ।'
                          " , त्रिलोकीनाथ  ,,??,,, क्या मतलब ,,,??  "

   त्रिलोकीनाथ  :-   " त्रिलोकीनाथ का मतलब नही जानते  ' गौरव सिंह ' ,,??   कैसे मूर्ख बुद्धिजीवी हो,,
                        तुम ,,??

   गौरव सिंह ;-  " त्रिलोकीनाथ ' का मतलब  मैं  खूब जानता हूँ , ,,,,, तीनो लोकों का स्वामी ' ,, लेकिन तुम  वह
                          त्रिलोकीनाथ  तो हो नहीं ,,!! "
   त्रिलोकीनाथ ;- ' मेने कब कहा कि  मैं वह त्रिलोकीनाथ  हूँ ,,!,, जैसे तुम गौरव सिंह होकर भी वह गौरव सिंह
                        नहीं ,,, उसी प्रकार  मैं  त्रिलोकीनाथ होकर भी  वह त्रिलोकीनाथ नहीं हूँ ,,! "
  गौरव सिंह ;-   " ( उपेक्षा से  कंधे उचकाते हुए  ) ,,,  ,," होगा ,,!!,,इससे मुझे क्या ,,?? ,,, (रूककर घूरते हुए )
                     … क्यों मेरे पीछे पड़े हो ,,??   कोई और शिकार ढूंढो ,,!!
  त्रिलोकीनाथ ;- ( किंचित क्रोध में ) ,, मैं कोई शिकारी नहीं  मूर्ख ,,!!  मैं त्रिलोकी नाथ हूँ ,,!! '
  गौरव सिंह ;- ' तो बने रहो ,,त्रिलोकीनाथ ,,!  लेकिन मेरा पिंड छोडो ,,!  मैं इस समय बहुत डिस्टर्ब  हूँ '
  त्रिलोकीनाथ ;- ( मुस्कराते हुए ) ,, मुझे डिस्टर्ब लोग बहुत अच्छे लगते हैं ,, ! मैं डिसटर्ब लोगों के ही काम
                     आता हूँ ,,!
  गौरव सिंह ;- ( सर हिलाते हुए ) ,,  अच्छा ,,?? ,, तो बताओ  क्या कर सकते हो तुम मेरे लिए ,,??
   त्रिलोकीनाथ  ;-  ( गठरी नीचे रखते हुए ),, पहले तुम अपनी जेब में बची वह आखरी सिगरेट  मुझे
                        पिलाओ   ,, जो तुमने  अपने दोस्त के  ' पैकेट ' से चुराई है ,,!!
  गौरव सिंह :- ' ( चौंक कर ) ,,' सिगरेट ,,?? ,,( स्वतः  ),,,इसे कैसे मालूम  कि  मेरी जेब में  एक '
                      सिगरेट ' है ,,??
                     ( प्रकट में ) ,,' सिगरेट अगर   मैं तुम्हें दे दूंगा ,तो फिर मैं क्या ,पियूँगा ,,??  मेरे  पास तो  बस                            अब  एक यही सिगरेट बची है ,,! "
त्रिलोकीनाथ ;-   { हँसते हुए }
                         " बच्चा ,,! " ,, त्रिलोकीनाथ  की  कृपा  होगी   तो  सिगरेट कंपनी का ' मालिक ' बन जाएगा
                     ,,, तूँ,,  समझा ,,??
 गौरव सिंह ;- ( घूरते हुए ) ,,, बहुत खूब ,,!!,,, अब तुम से ' तूँ '   पर उतर  आये,,,त्रिलोकीनाथ ,,? ,,
                     ( रुक कर ),,मुझे  बेवकूफ बनाने की कोशिश मत  करो ,,,  " और चलते बनो यहां से ,,, समझे ,,? '
  त्रिलोकीनाथ -- " जैसी तेरी इच्छा मूर्ख ,,! बाद में न  पछताना  की भाग्य जो  मिला तो उसे भी ठुकरा दिया ! "
गौरव सिंह  -      [चौंक कर ]  ,," भाग्य ,,??   ( रोकते हुए )  ,,अरे  अरे ठहरो ,,त्रिलोकीनाथ बाबा ,,!  आप तो                            औघड़ लगते हैं ! "
त्रिलोकीनाथ - ( मुड़ कर वापिस आ जाता है ),",देर से पकड़ता है  बेवकूफ   इसी लिए अभी तक असफल रहा  !
गौरवसिंह -   "  गलतीतो  इंसान से ही होती है न  बाबा ! ,,लेकिन अब आप यहाँ बिराजें ,,( जेब से सिगरेट                                 निकालता है )   और हाँ ,,!  यह लीजिये सिगरेट और ये माचिस ,,! "
त्रिलोकीनाथ -"   मुझे क्या कहीं आग  लगाना  है मूर्ख ,,??   माचिस अपने ही हाथ में रख ,,,सिगरेट तू खुद                                  जलाकर दे ,,!! "
  गौरव सिंह -- ( स्वतः )   अजीब आदमी से पाला पड़ा है ,,खैर , ( प्रकट में ,,) ,,,यह लीजिये में जला कर दे रहा हूँ ,,! "
त्रिलोकीनाथ -  ( सुट्टा लगाते  हुए ) ,,," अब बोल गौरव सिंह ,,! "
गौरव सिंह -- " मैं क्या बोलूं ,,??  अब आप त्रिलोकीनाथ हैं तो आप ही  बोलें,,,!  बताएं मेरे बारे में ,  तभी मैं समझूँ  की आप क्या कुछ कर सकते हैं मेरे लिए ! ,! "
त्रिलोकीनाथ - (  मुस्कराते हुए ) ,," शंका ,,,!  संदेह ,,!! यही कारण है जिससे तू कन्फ्यूज़ रहता है और कुछ नहीं कर सका है अबतक ,,! "
गौरवसिंह ---( स्वतः )  ,,इंग्लिश भी जानता  है ,,,!! ( प्रकट में ) ," ,हाँ बाबा ,,!! यह कमी तो है मुझमें ,,!! ,,,लेकिन कमियों के  अलावा भी तो  कुछ   बताइये  न  मेरे बारे में  ,,!!
त्रिलोकीनाथ -- " और क्या जानना चाहता है ,,?? यही न  की तू एक एक्टर बनना चाहता है   और हालत यह है की जिस ड्रामे में तू काम कर रहा था  उसके डायरेक्टर ने ,,आज ही तुझे उस ड्रामे से निकाल कर  दूसरे  एक्टर  को रख लिया ,,?? "
गौरवसिंह ( भौचक्का होकर ) -"-बिलकुल सही है बाबा !,,लेकिन   अब मैं क्या करूँ ,,??"
त्रिलोकीनाथ   -  " तू मुझसे कुछ खरीद ले !"
गौरव सिंह --" आपसे ,,??  आपके पास क्या है ,,?? "
त्रिलोकीनाथ ,,-  ( पोटली दिखाते हुए )  ,," यह जो पोटली है  मेरे पास ,,,इसमें से कुछ खरीद ले "
गौरवसिंह -- " बाबा ये पोटली की चीजें  मेरे किस काम की  ,,?? और मेरे पास तो पैसे भी नहीं  है ,कुछ भी ,खरीदने के लिए !,  खाली जेब हूँ ,,,बेरोजगार ,! "
त्रिलोकीनाथ -- { आँखें तरेर कर } ,,, " झूठ बोलता है ,,?? ,,क्या तेरी जेब में वह पचास रूपये का नोट  नहीं  जो तूने आज ही माँगा है अपने  दोस्त से ,,,उधार  ,,?? "
गौरवसिंह -- { चौंक कर ) ,," कौन हो तुम बाबा ,,?? जो मेरी जेब के बारे में भी  जानते हो ,,??
 "
  त्रिलोकीनाथ   ( हँसते हुए ) ,,," त्रिलोकीनाथ " ,,!!
गौरवसिंह --  ( उखड़े स्वर में ),,, " त्रिलोकीनाथ ??,, ,,या फिर उसी डायरेक्टर के भेजे  हुए कोई शातिर एक्टर,,??  ,,,जो मुझे बर्बाद करने पर तुला है ,,?? "
 त्रिलोकीनाथ --( क्रोध में पैर पटकते हुए ) --" तू मुझ पर शक कर रहा है , मूर्ख ,??? ,,,जा पड़ा रह नाकामयाबी के उसी  गटर में ,,,तेरा उद्धार कोई भी नहीं कर सकता ,,!!" ( जाने लगता है )
गौरव --( हकलाते हुए ) " ,,,,अरे ,,अरे ठहरो  औघड़  बाबा ,,,!!,,,जब आप मेरे बारे में इतना जानते हैं ,,,तो फिर आज  मेरा उद्धार भी करते ही जाओ ,,,देखो ना ,,अभी अभी मैने आप को एक सिगरेट  पिलाई है ,,! "
त्रिलोकी नाथ -- " इसी लिए तो तेरे से कुछ लगाव  भी होगया ,,,वरना बाबा इतनी देर तो किसी की नहीं सुनते ,,,,कहीं नहीं ठहरते ,!"
  गौरव --"  गुस्सा मत होइए बाबा ! माफी चाहता हूँ ,!,अब ,  बताइये  किस तरह होगा मेरा उद्धार ,,?? "
   त्रिलोकी नाथ -- " कहा तो  ,,,,की  कुछ खरीद ले  मुझ से  " ,,!!
गौरव --( स्वतः )     बुरा क्या है यार गौरव ,,?   देख ले क्या है इस औघड़ के पास  ( प्रकट में ) ,,,ठीक है बाबा ,,,!! मैं खरीद लेता  हूँ   सामान ,,!  लेकिन मैं अपनी इच्छा से  चुन कर ही  खरीदूंगा ,,! "
त्रिलोकीनाथ --- ( उसे देख कर रहस्य्मयी  मुस्कान उस पर डालता है ) ,,," ठीक है बच्चा ,,! " ,,,तू भी क्या कहेगा ,,!!    चुन ले सामान  ,,,जो चाहिए तुझे ,,! "
गौरव सिंह --- (  औघड़ को ऊपर से नीचे तक देखता है  फिर उंगली उठा कर ) ,,," मुझे वह अंगूठी दे दीजिये   जो आप बाएं हाथ में पहने हैं ,,! "
त्रिलोकीनाथ -  ( हँसते हुए ) -" यह अंगूठी तू ना सम्हाल पायेगा गौरव ,,,यह  बहुत  कीमती  है ! "
गौरव सिंह --  " अब जो कुछ मेरी जेब में  है वो दे   तो रहा हूँ आपको ,,,और आप ही ने तो कहा ,,,' की चुन ले सामान ,,जो तुझे चाहिए ' ,,!"
त्रिलोकीनाथ --"  यह अंगूठी   मिस्त्र  की एक ममी  के हाथ से निकाली गयी अंगूठी है ,,,वह ममी भी एक बहुत बड़े ओझा की  थी  ,,,सोच ले तू सम्हाल सकेगा इसे ?,,,,यह अंगूठी जादुई अंगूठी है ,,! "
गौरव सिंह --" यह तो देखा जाएगा  बाबा ,,!!   अब तो मुझे यही अंगूठी चाहिए ,,! "
त्रिलोकीनाथ ---" यह अंगूठी तुझे कुछ नहीं  दे सकेगी   गौरव ,,!,,,यह सिर्फ तेरी अतृप्त इच्छाओं को बखूबी  दृश्यगत  करेगी ,,हाँ उससे अगर कुछ फ़ायदा हो जाए तो और बात है ! "
गौरव --  ( जिद पूर्वक ) ,,, " अब चाहे जो हो जाए ,,,मुझे तो बस यही अंगूठी चाहिए बाबा ,,! ,,,और फिर  मैं अपनी जेब का एकलौता पचास का नोट  भी तो इस अंगूठी  पर कुर्बान करने को तैयार हूँ ना ,बाबा ?  "
  त्रिलोकीनाथ  __ ( हँसते हुए ) ,,  " बाबा को नोटों की क्या दरकार ,गौरवसिंह ,,!!,,   मैं  तो सिर्फ इसलिए कह रहा हूँ  की मुफ्त में मिली चीज़ की कीमत  वह व्यक्ति  नहीं जानता  जिसे चीज़ मुफ्त में मिल  जाए,,!   समझा   ?? ,"
गौरव सिंह-- ( स्वतः ) ,,समझा ,,त्रिलोकीनाथ ,,,तुम्हे तो पॉलिटिक्स  में होना चाहिए था ,,! (  प्रकट में ) ,,,," ठीक है  बाबा ,,,आप मुझ से ये पचास रूपये ले लें ,,और अंगूठी दे दें ,,! "
त्रिलोकीनाथ ---" ( अंगूठी उतार कर देता हुआ ) ,,," यह ले  गौरव सिंह ,, इसे पहनने से पहले तू  जो भी  सोच रहा होगा  तुझे  वही बना देगी यह अंगूठी  ,,! ,,,,लेकिन खबरदार  ,,,!! ,,अगर तूने यह  अंगूठी पहन कर  हाथ से कोई व्यापार   किया तो यह अंगूठी तेरे हाथ से गायब हो कर फिर से  मेरे पास वापिस लौट आएगी ,,,समझा ,,?? "
गौरव सिंह __  " समझा ! " ,,," अब यह लीजिये पचास का नोट  बाबा ,,!  यह नोट  भी कम करामाती नहीं है ,,परसों किसी और की जेब में था ,,  कल मेरे दोस्त की जेब में आया  और आज ,, ,,,अभी  मेरी  में है !   ,,,आगे आपकी जेब में जा रहा  हैं    ,,! ( हँसते हुए ) है न करामाती अंगूठी के बदले करामाती नोट बाबा  ??  ,,,!!
त्रिलोकी नाथ --( हँसते हुए )  बहुत   होशियार है ,,,!,,,खैर ,,,अब तू जान और तेरे यह अंगूठी जाने ,,! मैं तो चला !  ( चल देता है , कुछ दूर जा कर ,,,अचानक ठिठक कर वापिस आ कर   गौरव सिंह के कान के पास बोलता है  ) ,,,"  और गौरव सिंह ,,!!   औघड़ बनने से पहले मैं एक   बहुत बड़ा " पॉलीटीशियन " ही था,,,,समझा ,,??  ! "
गौरव सिंह ---  (  चौंक कर )  "  हैं ,,?? ,,,समझा ,,!!बाबा  खूब  समझा ,,,"!!
(  बाबा मंच से बाहर चला जाता है ,,,गौरव सिंह हैरान हो कर उसे पीछे से  देखता रह जाता है ,,फिर  अंगूठी को  गौर से देख कर )
    ",,,-हूँ ,,,,!!   तो यह अंगूठी है ,,जादुई अंगूठी  ,,,एक ओझा की ममी की उंगली से निकाली गयी  जादुई अंगूठी,,! ,,,बहुत खूब बाबा ,त्रिलोकी नाथ ,,,अच्छा झटका दे गए  तुम मुझे ,,  मेरी एक सिगरेट पी गए और लूट ले गए मेरा एकलौता पचास रुपये का नोट,,,,,ठीक कहते थे मेरे पिता की  बेटा गौरव सिंह ,,  तू मूर्ख शिरोमणि होने  का गौरव ही प्राप्त कर सकेगा ! सो बना गया यह बाबा भी मुझे ,,,मूर्ख ,,!!,, लेकिन ,ठीक है,,,,, सौदा घाटे का नहीं है ,! बदले में यह अंगूठी भी तो ले ली है मैनें ,,!!,, ,बहुत खूब ,,,,,,अब देखता हूँ की यह कितनी करामाती है   और कितनी खुराफाती ,,! ,,,,कहता था की ओझा के हाथ की है ,,, अगर में ओझा होता तो बुलाता सभी  भूतों को ,,,एक से एक बहुत से भूत ,,! ,,,एक्टर के भूत ,,,डायरेक्टरों के भूत ,,,और फिर करता उनसे  खिलवाड़ ,,,और दिखाता उस डायरेक्टर  के बच्चे को   की क्या होती है एक्टिंग ,,  और क्या होता है डायरेक्टर ,,!,,,अभी भी क्या बिगड़ा है ,,? देखता हूँ इस अंगूठी को पहन कर ,,,कैसा लगता है ,,!

   ( अंगूठी पहनता है ,,,तीव्र चमक और नेपथ्य में  समवेत कई स्वर ,,गौरव सिंह का पूरा शरीर , हाथ पैर , भोंह , आँख थिरकती हैं वह झूमता है ,,और नाक से हों हों की आवाज़ निकलती है  और फिर वह एक ओझा की  तरह थिरकता  है  उसके मुँह से कबीले वाले मन्त्रों की आवाजें निकलती हैं  )

,,,,' ढब ढब ,,,चिक चिक ,,हुम्मा हुमा ,,चिकग्ग  चिकग्ग डब डब ,, डैम डैम खट खट ,,,,,हो ,,!  हो ,,,,,!!,,
,,,(,झूम झूम  कर उच्च स्वर में चींखते हुए ),,,,,,
,,,,,,,,"    चल सामने आ ,,,जिन्न ऐ    मसान,,, ले कर अपने सब सामान,,,!!  ओ  मरघट के राजा ,, बजा बाज़ा ! होजा हाज़िर मेरे आगे  जोड़ कर अपने हाथ ,,,ले हुकुम ,,और कर पूरा  काम ,! खींच ला उसे ,,,जिसका बताऊँ मैं  नाम ,, बना दे उसको  मेरा गुलाम ,,,  दिग दिग चिक चिक ढब ढब ,,!"

   (  नेपथ्य में भूतों की  आवाज़ें   चीखें  ) ( एक घरघराई आवाज़ --,",,हुकुम करें मेरे आका " )

  गौरव सिंह -" - आजा  मसान के राजा ,,,चल पेश कर  एक भूत  ,,,डायरेक्टर का ,भूत ,  जो बने मेरा गुलाम ,,!!"
     ( नेपथ्य से ,,,   घिघयाते स्वर में  आवाज़ )


  ----" हाज़िर हूँ ओझा ,,,!  मेरे आका ,,!! लेकर एक गुलाम,,,!   एक मरा हुआ भूत,,!,, एक पुराने डायरेक्टर का ,भूत ,! "   दें हुकुम ,,,करूँ क्या इसका ,,?? :

  गौरव सिंह ( ओझा ) --"  -भूत,,??   मरे हुए डायरेक्टर का ,,??  मैं क्या पाउँगा उस मरे हुए  भूत से ,,??   मुझको तो पेश कर एक ज़िंदा   वर्तमान डायरेक्टर   जिसके खींच सकूँ में कान ,,!"

  ( मंच पर गिरता पड़ता  पायजामा कुर्ता पहने , दुबला पतला  व्यक्ति , चश्मा लगाए आता है ,,)

   ओझा ---  ओ  हो ,,!  तो आप आ गए हृदयेश जी ,,?? मैंने तो माँगा था मसान के राजा से एक पहुंचे हुए डायरेक्टर का भूत  जो मिले मुझे वर्तमान बन कर ,,! "

  डायरेक्टर --- " मैं भूत ही हूँ  सरकार ,,!!  मैं तो हूँ इस पर सवार ,,!  सिर्फ शरीर ही  मूढ़ हृदयेश का है ,,,बाकी तो मैं ही हूँ इस पर सवार !  कितने दिनों से ,, कर रहा हूँ इसके शरीर पर राज , और पूरी कर रहा हूँ वह साध ,,,जो पूरी ना  कर सका था  शेक्सपीयर के ज़माने में ,,मंच पर ,,,थियेटरों में   ,,,,एक्टरों की बगावत के कारण ,,! "
ओझा --" -ओ  हो   ,,तो आप  हृदयेश के शरीर पर कब्ज़ा जमाये एक विदेशी    भूत हैं ,??  खूब मिले ,, आज आपने ही मुझे उस नाटक से निकाल दिया था जो आप खेलने जा रहे हैं ,,?? ,
डायरेक्टर ---" ,,,हाँ सरकार !!   मैंने ही वह गलती की थी ,,!  मुझे क्या मालूम  था की आप ओझा हैं ,, भूतों की चोटी पकड़ कर रख सकते हैं ,,,वरना मैं  ऐसी गलती कभी ना करता ,,! "
ओझा --( हँसता है )  ,,,चोटी ,,??    हाँ  लम्बी लम्बी ज़ुल्फ़ों की   चोटियों में मुझे ख़ास दिलचस्पी रही है ,,,लेकिन अफ़सोस  किसी चोटी वाली  ने मुझे कभी घास नहीं डाली !  हाय ,,,ओझा बन कर मिली भी तो क्या ,,?? ,,,,एक भूत की चोटी ,,!! (  निःश्वास लेता है )   हाय रे भाग्य ,,!!"
डायरेक्टर --" तो हुकुम दे सरकार ,,,मुझे क्यों याद फ़रमाया ,,अपने दरबार में ,,?? "
 ओझा -- " तो बता ,,!!  मुझे   क्यों निकाला तूने   उस ड्रामे से ,,क्या कमी है मुझमें ,,??  क्या मैं कलाकार नहीं ,,?? "
 डायरेक्टर --- "  हैं सरकार ,,लेकिन मुझे एक ' चोटी " के कलाकार की जरुरत थी ,और आप ,,,,!!
ओझा --"   ,,,, एक चोटी का कलाकार ,,??  क्या मतलब है तेरा ,,?? क्या मुझे चोटी रखवाना जरूरी था ,,?? ,,क्या तेरा मकसद ,, दो चोटी  वालियों  से पूरा नहीं हो रहा था ,,??
डायरेक्टर ---( दांत निकालते हुए )  ,,," नहीं हुज़ूर ,,! "  मेरा मतलब उन चोटियों से नहीं ,,जिसकी ओर  आप इशारा कर रहे हैं ,,,!"
ओझा -- " तो फिर। .?"
 डायरेक्टर --   "  मुझे ऊंचा  कलाकार   चाहिए था ,,! "
ओझा ---"   वाह  रे डायरेक्टर ,,!!  कलाजगत में भी ऊंच  नीच  ,,??,,,यानी ऊंचा कलाकार ,,,नीचा कलाकार ,,!!,,,अगड़ा कलाकार  पिछड़ा कलाकार ,, तरक्की की और बढ़ता कलाकार ,,तरक्की से ,घटता कलाकार ,,!!  क्या बक रहा है तू ,,?? "
डायरेक्टर -- " बक नहीं रहा हूँ हुज़ूर ,,!  यही सच है !आज पूरा कला जगत इन्ही वर्गों में बंटा  हुआ है ,,,, ! सभी कलाकार  ,,आज स्टार , सुपरस्टार , हीरो , करेक्टर आर्टिस्ट  और विलेन की छवि में जाने जाते हैं ! रंगमंच भी वरिष्ठ , कनिष्ठ , कलाकारों के वर्ग में बंट गया है  !  कला क्यों है , किसके लिए है ,, किसी को मालूम  नहीं है ! मालूम   है तो सिर्फ अपना  भविष्य  ,,!  यदि ऊंचा डायरेक्टर बनना  है तो ऊंचा कलाकार लेना  ही पड़ता  है !   आखिर मेरे भी  भविष्य का सवाल जो था !
ओझा -- " तो खुद को ऊंचा करने की चाह में तूने मुझे नीचा दिखाया ,,??   क्यों ,,??
 डायरेक्टर --" नहीं हुज़ूर ,,एक और भी बात थी !!"
  ओझा --- " वो क्या मरदूद ,,?? "
डायरेक्टर  -- " ( थोड़ा हड़बड़ाते हुए ) ,,," वो आप रीना के साथ ज्यादा बातें करते थे ,,! "
ओझा -- " तो उससे  तुझे  क्या ? तू तो डायरेक्टर था ,, ना की स्कूल  का हेड मास्टर   जो स्टूडेंट पर निगाह रखे ? "
  डायरेक्टर --" आखिर रीना मेरी खोज थी ,,! "
ओझा -- " क्या मतलब ,,?? तेरी खोज का क्या मतलब ,,? "
 डायरेक्टर --" उसे मैं ही खोज कर लाया था नाटकों में ,काम करने के लिए ,! इसके लिए मैंने ही मनाया था उसके बाप को ,,,वरना वह तो नाटक को नाच गाना मानता था ,,,' निकृष्ट कार्य " ,!
ओझा - " भूल गया तू ,,??  भूल गया ,,?? उसके बारे में किसे तुझे सबसे पहले  किसने बताया था ,,??  भूल गया तू की उसके घर का पता तुझे किसने दिया था ,,?? "
  डायरेक्टर --" आपने हुज़ूर  ,,! लेकिन तब वह सिर्फ आर्केस्ट्रा में गाती  थी ,, नाटक नहीं जानती थी ,!! "
ओझा -  (  व्यंग से   हँसता  हुआ ) ,, " किसने बनाया तुझे डायरेक्टर  मूढ़ ,,?? लडकियां और एक्टिंग एक ही चीज है ,,,यह   सच तुझे  नहीं मालूम  ,,??   क्या तुझे नहीं मालूम  की वह कितने ड्रामे आज तक कर चुकी है ,,??
  डायरेक्टर --" मेरा मतलब स्टेज से था हुज़ूर ,,! स्टेज पर तो उसे मैं ही लाया ! "
ओझा --" हूँ ````!!,,,और अब किस स्टेज तक पहुंचा चुका है तू उसे ,,?? "
डायरेक्टर --( चौंक कर ) ,, क्या मतलब हुज़ूर ,,?? "
ओझा ---( अट्ठास करते हुए )  हां हां हां ,, मुझे नाटक से निकाल कर तू समझता है की काँटा निकल गया ,,?? "
  डायरेक्टर -- " आप गलत समझ रहे हैं हुज़ूर ,,!  मैं वैसा डायरेक्टर नहीं ,,! "
ओझा -- " तब मेरा  रीना से बातें करने से तेरा क्या जा रहा था ? " ,,बता ,,,मुझे क्यों निकाला नाटक से ,,?? "
डायरेक्टर --" --" आप उस राही  के नाटक में भी इंट्रोड्यूस करवाना चाहते थे उसे ,,! "
ओझा -- " तो उससे तुझे क्या परेशानी थी ,,?? कलाकार किसी की बपौती तो नहीं है ,,वे कहीं भी काम कर सकते हैं ,,तू क्यों रोकना चाहता था उसे ,,??
डायरेक्टर --" -(-हकलाते हुए ) ,,,राही  मेरा राइवल है ,,? "
ओझा --" राइवल  के मायने दुश्मन ,,?? "
डायरेक्टर  --  " नहीं कम्पटीटर ,,! "
ओझा -- तो क्या कम्पटीशन खराब बात  है ,,? कम्पटीशन से तुझे क्या परेशानी ,,?? "
डायरेक्टर --" कम्पटीशन में  वो बाज़ी जीत लेता हुज़ूर तो शहर में कोई मुझे कैसे पूछता ,,? "   रीना के बिना वह नाटक कर ही नहीं सकता था ,,,उसके पास कोई   स्त्री पात्र  नहीं है ,,वह  ,, बे सहारा है ,,! " ,
  ओझा ---"  ओह ```!  तो कम्पटीशन तू ऐसे करता है की  वह कोई कर ही ना सके ,,?? "   क्यों ,,??"
  डायरेक्टर --(" फुसफुसा कर ),,," हाँ हुज़ूर यही पालटिक्स है ,,! परदे के पीछे की पॉलिटिक्स ,,! "
ओझा --( तेज स्वर में क्रोध से )   तो तू पॉलिटिक्स भी करता है ,,नाटकों में पॉलिटिक्स ,,?? "
डायरेक्टर -- " पॉलिटिक्स  तो हर जगह है  हुज़ूर ,,??  कुछ लोग तो नाटक ही  पॉलिटिक्स के लिए करते हैं ,,,कहने को नाटक है ,,,लेकिन है वह शुद्ध पॉलिटिक्स ,,! "
ओझा ---" मसलन ,,?? "
डायरेक्टर ---" मसलन ,,,,मसलन अब क्या बताऊँ ,,!
 ( तभी जैसे नेपथ्य  से आती आवाजें सुनता है ,,) कान लगा कर ) ,,,(  स्वतः )  ,,," अरे यह दत्ता यहां क्यों आ रहा है ,,? " ,(,,चुप हो जाता है )
ओझा -- ( चिल्ला कर )  चुप क्यों हो गया ,,,?? जबाब दे ,,?? "
डायरेक्टर ( फुसफुसाते स्वर में ) ,," हुज़ूर वो दत्ता आरहा है ,,, मेरा एक और  राइवल ,,! मुझे यहां पा कर ना जाने क्या सोचेगा ,,! रयूमर उड़ाएगा ,,! "
ओझा  ---"( आँख सिकोड़ कर ) ,, ,,??  रयूमर ,,??   दत्ता ,,?? "  ये सब क्या कह रहा है तू ,,"" ?
डायरेक्टर--- " हाँ सरकार रयूमर ,,! ये दत्ता रयूमर उडाने  में माहिर है  यह नुक्कड़ करता है ,,! "
ओझा ----" अब नुक्क्ड़ क्या चीज है ,,? "
डायरेक्टर --" नुक्कड़ नाटक है  हुज़ूर ,,! अब मुझे छोड़ दीजिये ,,मैं इसके सामने नहीं पड़ना  चाहता ,, चाहे तो आप मुझे फिर पकड़वा लीजियेगा ,,, मैं हाज़िर हो जाऊंगा ,,! "
ओझा ---" अरे नहीं ,,,! फैसला तो आज ही करूंगा ,,! भूतों की कचहरी लगवाउँगा   तू चाहता है तो  अभी मैं कुछ इलाज किये  देता हूँ ,,,जब तक यह यहां  रहेगा हम इसे देखते रहेंगे लेकिन यह हमें नहीं देख पायेगा  ,! "
  डायरेक्टर --" जल्दी कीजिये हुज़ूर ,,वह आ गया ,! "
      (
 ओझा हाथ में धूल उठा कर  फेंकता है ,, मंच के उस हिस्से का प्रकाश जहाँ ये दोनों खड़े हैं बहुत मद्धिम हो जाता है  बाकी मंच प्रकाशित रहता है ),

      ( दत्ता दो लड़कों के साथ आता है   सबके कन्धों पर थैले लटके हैं ,,,जिन में कागज़ वगैरह भरे हैं )

 ( एक लड़का ) राजीव ---,,," देखा दादा ,,!!  है ना वैसी ही जगह  जैसी आप चाहते थे ,  एकांत ,,?? "
    दत्ता ---" हाँ राजीव ,,! अच्छी जगह है   और रोड से अधिक हटकर भी नहीं है ,,! "
   (  दूसरा लड़का )  प्रसून ----" अब इस जगह आराम से रिहर्सल  हो सकती है   और किसी को कानो कान खबर भी नहीं होगी ,,! "
  राजीव --- "  एक बात तो है दादा ,,,! तहलका मच जाएगा   जब ' रचना ग्रुप ' को मालूम  होगा ,,,रातों रात नाटक तैयार हो गया ,,,कब और कैसे ,,,वे लोग  जान ही नहीं पाएंगे ,,! '
    दत्ता -- --  ( गंभीरता से ) -" हूँ ,,,,```!`` "
    प्रसून --( एक पत्थर को हाथ से  झाडते  हुए ) ,,, " दादा ,,आप यहाँ बैठो   इस पत्थर पर हम नीचे बैठ जाते हैं ,,! "
 दत्ता ---"  अरे नहीं ,,नहीं ,, मैं पत्थर पर क्यों ,,??   नहीं प्रसून हम सब बराबर हैं ,, हम सब एक साथ ही बैठेंगे जमीन पर ,,!"
 ( राजीव  सबके साथ बैठ जाता है  )
  राजीव --" ,,दादा ,,!  प्रसून एक बार झटका खा चुका है ,,! "
 दत्ता _  " कैसे ?? "
राजीव ---"पहले  जब प्रसून हृदयेश के यहाँ रिहर्सल  में शामिल हुआ था  तब ,,"
  दत्ता  ---  " कैसे प्रसून ,,,कैसे ,,?? "
प्रसून ---" अरे वो मेरी कोई गलती नहीं थी ,,,  मैं नया नया था ,,! "
राजीव ---- " मैं बताता हूँ ,,! दादा ,,, प्रसून धोखे से उस कुर्सी पर बैठ गया जिस पर हृदयेश बैठते थे ,,! डायरेक्टर की कुर्सी पर ,,!  बस  हृदयेश गरम हो गए ,,! "
 प्रसून ---" अरे वे तो कुछ नहीं  बोले ,,, उनके चमचे गौरव ने तो आगे बढ़ कर  हाथ झटक कर मुझे नीचे उतार दिया !
राजीव ---" गौरव ने ,,?? उसकी ये मज़ाल ,,?? "
दत्ता ---" अरे कोई कुर्सी पर बैठने से ही डायरेक्टर हो जाता है   क्या "" ??   हृदयेश को  खुद भी  अभी आता ही क्या है ,,? मैं पूछता हूँ कौन जानता है नाटकों की दुनिया में  हृदयेश को   ? "
प्रसून --" दादा ,,,! आपके  पैर  की तो धूल भी नहीं है वह ,,! "
दत्ता --- " अरे दिल्ली में ,,, प्रलयेश जी ने ,, बहुत रोका ,,,कहा की क्या करेगा  जा कर ,वापिस ,  चल मुंबई ,,,,तुझे अनिमेष जी से मिलवा देता हूँ ,,  तू जल्दी ही चमक जाएगा   लेकिन मैंने कहा ,,,नहीं ,,,मैं तो वहीं उन लोगों के बीच काम करूंगा जहां मेरे लोग हैं  जिन्हे  मेरी जरुरत है ,,! "
प्रसून ---" और वह जबलपुर अधिवेशन में भी तो गए थे आप ,,? "
 दत्ता --- " हाँ बहुत लोग आये थे वहां ,,कह रहे थे वर्कशाप कर  डालो ,,! हम आ जाएंगे ,,,लेकिन ,,!
 राजीव --- "  लेकिन क्या दादा ,,??   कर लीजिये ना एक वर्कशाप ,, देखियेगा हृदयेश के सब  आर्टिस्ट  टूट कर इधर ना आजायें तो कहियेगा ,,! "
प्रसून ---"   हाँ दादा ,,!  कर  लीजिये एक वर्कशाप ,,! कल यूनिवर्सिटी गया था तो सर भी कह रहे थे  की तुम लोग वर्कशाप करो ,,, तो ग्रांट में दिला दूंगा ! "
दत्ता --- "  सर तो कहते कुछ हैं ,,,करते कुछ ,,!! मैंने पिछली बार तुम्हे सचिव बनवाने की कोशिश की तो उन्होंने राजेश को सचिव बनवा   दिया ! " ,,,,कहने लगे ,,,प्रसून जूनियर है अभी ,," ,,!
प्रसून ---( रुआंसा हो कर )  हम कब तक जूनियर ही रहेंगे  दादा ,,??  सीनियर जो काम नहीं कर पाते   वो हम सब कर देते हैं   दरी बिछाने से नुक्कड़ों पर नाचने तक ,,! ,,, कभी हम  कहते हैं की हमारी क्या स्टेटस है ,,? "
राजीव ---"   प्रसून ठीक कह रहा है दादा ,,! प्रसून के पापा को किसी ने एक बार कह दिया था की आपका लड़का पढ़ता लिखता नहीं है   नुक्कड़ पर भिखारी बना नाटक कर रहा है   तो उन्होंने प्रसून को खूब डांटा ,,! "
दत्ता ---"  वो,,,,'  राजा - भिश्ती -  और सरकार ' वाले  नुक्कड़  में ,,?? "
प्रसून ---हाँ दादा ,,!  वो क्या हुआ  की रजनी कार से वहीं से निकल  रही  थी उसने मुझे भिखारी बने देख लिया था ! "
दत्ता ---"  ये रजनी कौन ,,?? "
 प्रसून ---" वो मेरे पड़ोस में ही रहती है ,,, पी डब्लू डी  के  एस ई साहब की लड़की ! "

 राजीव ---"  अरे सीधे क्यों नहीं बताता है की तेरी फेयॉन्सी ,,,दादा से  क्यों शर्माता है ,,?? "
दत्ता ( हँसते हुए ) ----"  अरे फियांसे ,,?  तो क्या हुआ ,,तू  डर  गया क्या ,,?    क्या सोचता है की वह तुझसे दूर हो जाएगी ,,?? "
प्रसून --- "  नहीं दादा ,,!    सचमुच अब वह कतराने लगी है ,,! मिली थी तो कह रही थी ,,---तुम अब भिखारी मत बनना  ,,! मेरी सहेलियां मुझे चिढ़ा रही हैं ! "
दत्ता ---(  गंभीरता से ) ,,," देखो प्रसून ,,,,यह कला है ,,,सच्चा कलाकार किसी भी रोल से नहीं डरता है ,, अब देखो इस नए नुक्कड़ में  जो रोल मैं तुम्हे देने जा रहा हूँ  वह एक  '  कोढ़ी  '  का है ,,! "
 प्रसून ---"  ( थूक गटकते हुए ) ,,, कोढ़ी का ,,???? दादा ,,,यह रोल आप राजीव को नहीं दे सकते क्या ,,?? "
राजीव----"  क्यों तुम्हे क्या तकलीफ है    इस रोल में  ,,? "
प्रसून ---" नहीं अब मैं कुछ और करना चाहता हूँ ,,!  ,,, कोढ़ी का रोल मुझसे बनेगा नहीं ,,! "
राजीव ---   "  वो तू छोड़ प्रसून ,,! दादा तो मिटटी के पुतले से भी शानदार रोल करवा लेते हैं ,,फिर तू तो टीम का माना हुआ आर्टिस्ट है ,,! "
प्रसून --- " नहीं दादा !  मैं अभी से कहे देता हूँ ,,! यह रोल मैं  नहीं करूंगा   ,,,, मुझे आप कोई भी दूसरा रोल दे दें ! "
दत्ता ---" तुम लोगों में यही कमी है ,,! तुम लोग कला के लिए अभी भी पूरी  तरह समर्पित नहीं हुए हो ,,!   ,,, अब मुझे देखो ,,! ,,, आज प्रयलेश मुझे मानते हैं ,,, तो जानते हो क्यों ,,?? ,,   एक नुक्कड़ में उन्होंने मुझे सपेरे का रोल दिया ,, जिसे सांप काट लेता है ,,,तो मैं दिल्ली की गंदी बस्ती में वहीं लोट गया ,,,ना पानी देखी ना धूल ,,!

     ( अचानक नेपथ्य में  एक भूत  की आवाज़ ,,,नाक के स्वर में ,,," बहुत खूब ,,बहुत खूब ,," ,,)

   राजीव ---(-चौंक कर )---" यहां कोई और भी है क्या ,,? "
  दत्ता --- " यहां और कौन होगा ,,?? भ्रम है ,,! "

   प्रसून --- ( मनुहार के स्वर में ) ,,"   दादा ,,!!  इस बार हम लोग थियेटर ना कर लें ,,? "
 राजीव ---"  हृदयेश के पास रह कर इसकी थियेटर की भूख नहीं गयी  दादा ,,! "
  दत्ता --"   थियेटर में क्या रखा है ,,?   जगमगाती लाइट  ,,रंगीन परदे ,,स्पॉट ,,,  डिमर ,,,  म्यूजिक ,, ड्रेस ,, मेकअप ,,,,,,इन सबके बीच  कहाँ है  निर्देशक  ,,??    अरे यही देखना है तो फिल्म देख लो  ,,क्या जरुरत है नाटक की ,,? नाटक तो सर्वहारा के लिए  होना चाहिए   ना की चमचमाती कार , स्कूटर पर चढ़ कर थियेटर में देखने आने वाले  लोगों के   मनोरंजन  के लिए ! "
प्रसून ---" लेकिन हृदयेश तो कहते थे ,,,,,"
 दत्ता ----"  क्या कहते थे हृदयेश ,,?? यही की नुक्कड़ बेकार है ,,?  नुक्कड़ तो भुक्कड़ करते हैं   ,,,जिनके पास थियेटर का किराया , लाइट वगैरह का पैसा देने को नहीं होता ,,,वही ना ,,?   और जो ग्लेमर थियेटर में है वह नुक्कड़ में कहाँ ,,,??  उन्होंने कहा और तुम मान गए ,,? "
राजीव ---" नहीं दादा ,,!   प्रसून समझदार है ,, वह सचाई जानता था ,,, ! "
  दत्ता --"  हृदयेश तो नाटकों के नाम पर  अपने लिए  पैसा और  वाहवाही  बटोरते हैं ,, हम लोग ना पैसा खर्च करते हैं ,,,ना कमाते हैं ,,! हम नाटक करते हैं   तो आम लोगों के लिए ,, उन्हें जगाने के लिए !  हम मेसेज देते है ,, , ,,, संघर्ष करने के लिए ,,व्यवस्था बदलने के लिए ,,! "
प्रसून ---"  हृदयेश कह रहे थे की मेसेज तो  थियेटर में भी  होता  हैं ,,! "
दत्ता ---"    लेकिन     वह किसके काम   आएगा  ,,? लोग सिर्फ इंटरटेनमेंट करने   आएंगे ,, ,, और घर जा कर सो जाएंगे   इधर तो हमारे नुक्कड़ों से लोग शिक्षा लेते हैं ,, उनमे जोश आता है ,,,जागरूकता आती है ,, वे  व्यवस्था के दोष जानते हैं ,, और उनमे संघर्ष की इच्छा जागती है    जो जरूरी है ,,! आखिर नाटक की कोई सामाजिक वजह भी तो होनी चाहिए ,,?? "
राजीव ---" हाँ  यही बात सर भी कहते हैं ,,! "
दत्ता --- "  बिलकुल नाटक में वह ताकत है की मुर्दे भी जाग जाएँ ,, चिल्लाने लगे इंकलाब ज़िंदा बाद ,,,! "

   (  तभी नेपथ्य से कई भूतों के समवेत स्वर सुनाई देते है ,,, नाक के स्वर में ,,,' इंकलाब ज़िंदाबाद ,,,इंकलाब ज़िंदाबाद ,,'    ही ही ही ही ही!!!!!  )
राजीव  (  चौंकते हुए ) ,,,"  दादा ,,!  यहां कोई है जरूर ,, ! "
दत्ता --- " मुझे तो कुछ नहीं दीखता ,,! "
प्रसून ---( डरते हुए,,,उठते हुए  ) ---"  दादा ,,आज माफ़ करें ,,,पापा दौरे से लौटने वाले हैं   मुझे जल्दी घर जाना है ! "
राजीव ---"   हाँ दादा ,,!   और अब शाम हो गयी है   अन्धेरा  छा  रहा है ,,, यहां पास में ही एक कब्रिस्तान है   यहां इस समय के बाद यहां कोई नहीं ठहरता ,,! "
दत्ता --" ( उठते हुए )  " तो ठीक है ,,! अब यह जगह आगे रिहर्सल के लिए तय ,,!  हम लोग रोज पांच बजे यहीं मिलेंगे  ,,ठीक ,,, !

    ( नेपथ्य में भूतों की आवाजें ---' एक नुक्कड़ यहां भी कर लो ,,हमने बहुत दिनों से नाटक नहीं देखा है ,,,ही,,,ही,,,ही,,,ही,,,ही,,,!! " )
राजीव  ( घबरा कर ) ,,,अब चलिए दादा ,, ! "
    ( दत्ता , राजीव जाने लगते हैं ,,पीछे पीछे प्रसून )
 प्रसून ,,," दादा लेकिन एक बार थोड़ा सोच लीजियेगा  ,,,अगर कोढ़ी वाला  रोल राजीव को दे दें  तो ,,,,,!
  (  सब मंच से बाहर निकल जाते हैं )

 ( रोशनी बढ़ती है ,,,मंच के दूसरे कोने में खड़े ओझा ,,और डायरेक्टर दिखते हैं ,,  ओझा घूरता हुआ खड़ा है  वह दत्ता प्रसून , और राजीव को जाते हुए देख रहा है   फिर  मुड़  कर )

   ओझा ---" अरे कहाँ गए मरदूद ,,!  औ  मसान के भूत !! ,,,क्या भाग गया तेरा कैदी ,,"?
  मसान का भूत  -- ( नेपथ्य से ) ," ,यही हूँ हुज़ूर ,,, अभी आपने इजाजत ही कहाँ दी थी   मैं इसे पकडे बैठा हूँ ,,  अपनी गिरफ्त में ,,! "

   डायरेक्टर आगे आता है ,,,

   ओझा ----,,,,,,"    हूँ,,,,,,  तो तू बता रहा था पॉलिटिक्स के बारे में ,, पॉलिटिक्स जो नाटकों में होती है ,,,बता कहाँ है पॉलिटिक्स ,,?? "
   डायरेक्टर ---" पॉलिटिक्स तो दूध में पानी की तरह मिली   रहती  है ,, लेकिन दिखती नहीं ! ,,,हाँ जांच करने पर  पकड़ी जा सकती है ! "
  ओझा --- "  अच्छा तो बता ,,, ये नाटक भी अब नुक्कड़ों पर क्यों होने लगे ,,? हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था ! "
  डायरेक्टर --- " यह हिन्दुस्तान है हुज़ूर ,,,यहां नाटक ही होता है ,,,रोज नाटक ,, ! औरतें ,, पत्नी  का नाटक करती हैं ,  आदमी पति का ,,अफसर साहब का ,, बाबू चमचे का ,, नेता सेवक का ,,, सब नाटक करते हैं ,, सिर्फ नाटक नहीं जानती है तो जनता ,, वो सिर्फ नाटक देखती है ! "
  ओझा --- " वो तो ठीक ,,!  लेकिन नुक्कड़ पर नाटक की क्या जरुरत है ,,?  क्या तू भी करता है नुक्कड़ पर नाटक ,?? "
डायरेक्टर --- मैं तो नहीं ,,,पर इन को दिखाने के लिए मेरे चेले कर देते हैं कभी कभी   एकाध  नुक्कड़ ,,! "
 ओझा --- "  तो बता क्यों करवाता है तू नुक्कड़ नाटक ,,?  वहां नाटक की क्या जरुरत है ,,?  वहां तो खुदबखुद   कुछ ना कुछ रोज ही होता रहता है  नाटक जैसा ,,,,फिर तू क्यों  खेलवाता है नाटक वहां ,,? '
डायरेक्टर -- " अब क्या करें ,, ? थियेटर के किराए बढ़ गए हैं ,,  , मेकअप , लाइट  साउंड  में पैसा लगता है ! कुर्सी का किराया लगता है ! यहां तक की मुख्य अतिथि जुगाड़ने , उनका सम्मान करने में भी अलग से पैसा खर्च हो जाता है !    मेरे चेले कहते  हैं की कुछ तो करो हृदयेश भाई ,,,,हम खाली बैठे हैं ,,, दूसरे लोग नाटक कर रहे हैं ,,,तो उनकी तसल्ली के लिए कर देता हूँ नाटक  ,,कभी कभी नुक्कड़ों पर भी ,,! "
ओझा ---" तो इसका  क्या  मतलब,,,,,?    तू नाटक से गलियों के तमाशे पर उतर आएगा ,,??  क्या तुझे नाटक और तमाशे के फर्क का भी शऊर नहीं ,,?? "
डायरेक्टर -- " तमाशा भी तो नाटक ही है हज़ूर ,,!  तमाशे  में दर्शकों को जुटाने की जरुरत  भी  नहीं ,,!   वे अपना काम छोड़ कर  आ  जाते हैं    तमाशा देखने ,,! "
ओझा --" तो फिर नाटक की नज़ाकत का क्या होगा ,,??  क्या शेक्सपीयर के नाटक भी  नुक्कड़ पर होंगे ,, रोमियो जूलियट   सडकों पर प्रेमा लाप करेंगे ,,?? कालिदास की शकुंतला   नुक्कड़ों पर फूल चुनेगी ,,? "
डायरेक्टर --" नहीं हुजूर ,,!  इसीलिये तो मैंने अर्ज़ किया  की नुक्कड़  पर  नाटक नहीं  ख़ास नाटक ही चलते हैं   जिसमें पॉलिटिक्स की चाशनी हो ,,! "
ओझा --" और कला ,,??  '  वह कैसे ज़ाहिर होगी  नुकडों पर ,,?? "
डायरेक्टर --" कला नुक्कड़ों पर नहीं होती ,,! वह तो होती है शीतल कमरों में बैठ कर नुक्कड़ गढ़ने में !  कला नाटकों में घुली रहती है ,, लोगों को अपने रंग में रंगने की कला ! अपने विचारों को उन पर चस्पां करने की कला !  और सच बताऊँ हुजूर की यही चतुराई है ,,यही कला है ,,,और यही पॉलिटिक्स है ! "
  ओझा ---" तो,,,इस्सलिये तूने  मुझे अपने नाटक से निकाला , इसीलिये  कहता  है की मैं ऊंचा कलाकार नहीं ,? "
  डायरेक्टर --" मुझे माफ़ करदें  हुजूर  मैं आपको फिर रख लूंगा   एक मौका दें ,,! "
ओझा ---(  जोर से अट्ठास के साथ ) --" हां,,हां,,हां,, तू मुझे नहीं पहचान रहा है बेवकूफ ,,, !  मैं ओझा हूँ ,,कोई कलाकार नहीं ,,  मुझे तू क्या मौका देगा ,,? "
 डायरेक्टर --" मैं राइटर से एक नया नाटक लिखवा लूंगा हुजूर ,,! ,,," दा   ग्रेट ओझा " ,,,उसमे आपको मौका दूंगा  ओझा की एक्टिंग का ,,नाटक अन्धविश्वाशों पर आधारित होगा  ,, अंधविश्वासों को  उजागर करेगा ! वह तरक्की की हिमायती करेगा ,,,! आम के आम गुठलियों के दाम ' ,,!
ओझा ---"  यानी तू नाटकों के जरिये मेरा मखौल उड़ाएगा ,, मेरी छीछालेदर  करेगा  मुझे जलील करेगा ,,? ,,और खुद को तरक्की पसंद ज़ाहिर करेगा ,,वाहवाही लूटेगा ,,क्यों ,,? "
डायरेक्टर --- " वक्त का तकाजा है हुजूर ,,,अब झाड़ फूंक पर से सबका विश्वाश उठ गया है ! सब जान गए है की ओझा क्या चीज है ,,! कबीले ख़त्म हो गए हैं ! अब ओझा की जगह डाक्टर हैं ,, आज के ओझा ,,! ज़माना बदल गया है हुजूर ,,, आपका ज़माना हवा हो गया ! "
 ओझा ---" लेकिन तू यह भूल  तू एक भूत  है  और मैं ओझा ,,! भूत  को ओझा ही झाड़ते हैं ,,डाक्टर नहीं ,,! मैं अभी तुझे तेरी औकात दिखाता हूँ ,,! "    ( हवा में हाथ उठाता है )
डायरेक्टर -- " नहीं हुजूर माफ़ करें ,,,मैं कोई और सब्जेक्ट ले लूंगा ,,! स्त्री शशक्तिकरण , साक्षरता ,  स्वच्छता , ,, एक से बढ़ कर एक टॉपिक हैं ,,मैं उस पर राइटर से एक नया नाटक लिखवा लूंगा   ! मुझे बख्श दें ,,,मैं फिर शान में गुस्ताखी नहीं करूंगा ! "
ओझा --"  तेरा राइटर ना हुआ ,,, जैसे कोई टाइप राइटर हो गया !,, और  तू जो चाहेगा वह लिख देगा ,,!  पहले सब्जेक्ट , फिर रेफरेंस ,  और अंत में  योर  सिन्सरियाली ,फैथ्फुली ! ,, !
डायरेक्टर --- " राइटर ऐसी ही चीज है हुजूर !  कई आत्माएं जिनका लिखा कभी  छप  नहीं सका था ,, आज के नौजवानो पर काबिज है !    उस ज़माने में उस  समय  उनकी कोई  डिमांड नहीं थी ,,,इसलिए अब वे डिमांड पर   लिख रहे  हैं ! "
ओझा --"  ठहर जा मरदूद ,,!   मैं देखता हूँ तेरे उन खटारा टाइपराइटरों  के भूतों को  ,, तू तो छोड़ इस हृदयेश   के चोले को   ,,,और  लटक जा  उस पीपल के पेड़ पर ,,! ,,,  छोड़ इसे ,,,नहीं तो गाड़ दूंगा  हमेशा के लिए ,,! "
डायरेक्टर -- "(  घिघयाते हुए ) ,,,, मेरी गलती माफ़ कर दें सरकार ,,,मुझे जाने दें ,, मैं अब किसी आर्टिस्ट से पंगा नहीं लूंगा ,,,किसी को ड्रामे से   निकालने की हिमाकत नहीं  करूंगा  ! "
ओझा --- "  हिमाकत तो तू तब करेगा जब तुझे मैं कोई मौका देने दूंगा ! तेरे जैसा पुराना भूत  तो फिर नए चोले  बदल लेगा ! पहचान में भी नहीं आएगा !  नाटक में नुक्कड़ और नुक्कड़ में  तमाशे  का कॉकटेल बनाता रहेगा !  बाद में ना बचेगा नाटक , ना नुक्कड़ , ना तमाशा !   इसलिए तू छोड़ इस हृदयेश को ,, मुक्त कर इसे ,  और लटक जा उस पीपल पर  फ़ौरन ,,! "
डायरेक्टर ---( अचानक भयानक आवाज़ बदल कर  धमकी देते हुए  ) ,," ,,मैं नहीं छोडूंगा इसे   ओझे  ,,!   मैं सदा इस पर सवार  रहूंगा यह मेरा शिकार है ,,इसे मैं अपने साथ ले कर जाऊंगा ! "
ओझा --- " ,,अरे निक्कम्मे ,,!  तू तो क्या ,,, तेरा बाप भी छोड़ेगा इसे ,, क्यों इसकी ज़िंदगी खराब कर रहा है ,,इसके भी बाल बच्चे हैं ,, तेरे कारण घरबार छोड़ कर सिर्फ नाटक कर रहा है ,, बे मतलब नाटक ,,!   इसके घर के सदस्यों का भी तो ख़याल कर ,,, यह उनकी और ध्यान भी नहीं दे पा रहा है ! "
डायरेक्टर ---"   मुझे किसी से कोई मतलब नहीं है ,, मेरी खुराक तो नाटक है ,,,नाटक  खाता  हूँ  ,!, नाटक पीता  हूँ,,,   सिर्फ नाटक और नाटक ,  इसके सिवा कुछ नहीं , इसे छोड़ दूंगा तो कहाँ से पाउँगा अपनी खुराक ,,?? "
  ओझा --- ( हाथ में धूल उठाते हुए ) ,,,तो ले यह खुराक ,,,मैं तुझे गाड़े देता हूँ !
डायरेक्टर --- ( चीखते हुए ) अरे अरे ,,! ऐसा ना करना हुजूर ,,, मैं इसे छोड़े देता हूँ ,,,लेकिन मेरे छोड़ने पर भी नाटक    तो होते ही रहेंगे  ,,,!   जब तक राइटर का भूत   ज़िंदा है   आप क्या कर लेंगे ,,? "
ओझा ---:" तू लटक  पीपल पर ,,! और देख की मैं क्या इलाज करता हूँ राइटर के  भूत  का ,,! "
डायरेक्टर _ "  ( रुंधे स्वर में ) .." ठीक है मैं इसे छोड़ कर लटक जाता हूँ पीपल पर   लेकिन राइटर से निबटना आसान नहीं है हुजूर ! "

    (  घर्घरा  कर डायरेक्टर गिर जाता है )
( ओझा दूसरी दिशा  में मुड़  कर बोलता है )
ओझा ---"  अरे ओ  मसान के भूत ,,,पकड़ ला राइटर के बच्चे को ! "
 मसान का भूत ,,(  नेपथ्य से ) ,," कबसे पकड़ के  रखा  हूँ   सरकार   इसे !   मैं जानता था   आप यही हुकुम करेंगे   इसलिए पहले से ही पकडे बैठा हूँ ! "
ओझा ---" आगे कर  आगे कर ,,,लाइट में आने दे उसे ,,! "
(  एक बड़े दांत वाला ,,लम्बे बाल रखाये   दुबला पतला  चश्मा लगाए ,, व्यक्ति  आगे आता है )
 राइटर --- "  मैं तो कबसे लाइट में आने को ही तरस रहा हूँ,,,माननीय  ओझा जी !   मुझे लाइट में ला दें   तो आजीवन गुलाम रहूंगा ! "
ओझा --- "  क्या तुझे अभी तक कोई ऐसा   ग्रुप या गॉड फादर  नहीं मिला   जो तुझे  लाइट में ला देता ,,? " ,,,मेरे ही नाम को रोने के लिए बचा था तूँ ,,? "
राइटर --" मैं थोड़ा थोड़ा  सभी  ग्रुप में रहा ! सब ने मुझे निकाल दिया ! मेरी रचनाएं चुरा कर खुद अपनी किताबें छपवा लीं !  मैं इसी तरह भटकता रहा ,,,एक भूत की तरह ,,! "
ओझा --- "  अच्छा ,,तो तू भूत नहीं ज़िंदा है ,,? "
ओझा --- " मैं " सेमी भूत ",,हूँ   दिमाग से ज़िंदा ,,, शरीर से मरा ,,!  और अभी ज़िंदा ही रहूंगा जब तक मुझे कोई राष्ट्रीय पुरूस्कार  नहीं मिलता ,   अभिनन्दन   नहीं होता ,, मैं कैसे मर सकता हूँ ,,"
ओझा --- '  ओह ??? तो तुझे लिखने का चस्का कैसे लगा ? ,"
राइटर --- "   बस    यौ  ही ,,, !  प्रोफ़ेसर था  यूनिवर्सिटी में अक्सर हड़ताल रहती थी ,, क्लासेस महीनो नहीं लगती थी ,,, खाली बैठा था ,, मेरे दिमाग ने कहा -- ' कुछ लिख ज्ञान प्रकाश ',,   और में लिखने लगा ! ,,
ओझा -- " अच्छा तो  क्या क्या लिख डाला अभी तक ,,? "
राइटर --" मत पूछिए सरकार ,,!  पैंतीस नाटक ,  अस्सी  कहानियां ,, बारह  रेडियो  आपेरा ,  आठ नुक्कड़ , कई रूपांतर ,  और अनेखों अखबारी लेख ,,! "
ओझा --"  ( चीख कर ) ,,क्यों लिखे   क्यों लिखे तूने इतने  आर्टिकल ,, ?  क्या तेरा हाथ दर्द नहीं दिया ,,? "
राइटर --- "  मेरा तो कुछ भी दर्द नहीं दिया ,,, हाँ ,,,जिसे मैंने रचना पढ़ने को दी ,,उसका  सर  जरूर दर्द किया   ,,! "
 ओझा --- "  क्यों हुआ उन्हें सर दर्द ,,? "
राइटर ---"  साहित्य में मेरे अभिनव प्रयोगों के कारण ,,,मैं प्रयोगधर्मी जो था ,,! "
ओझा -- "  कैसे प्रयोग,,? "
 राइटर -- अब क्या बताऊँ ,,,मैंने नाटकों में   नौटंकी डाली , नौटंकी में तमाशा मिलाया ,, , तमाशे में लावणी , लावणी में लोक गीत ,   लोकगीतों में  नयी  कविता ,,,नई  कविता में ,,,,
 ओझा --- "  बस बस ,,,! अब तो मेरा भी सर दर्द  से फटने लगा !   अरे ओ   अतिज्ञानी ,,  तूने ऐसा क्यों किया ,,, अलग अलग विधाओं के तो अलग अलग रस   होते  है   अलग अलग स्वाद ,,,,तूने इनकी खिचड़ी क्यों पका दी ,,? "
राइटर --- "  यह मेरा दायित्व था ,,!   लेखकीय धर्म था !  भला मैं कैसे चुप बैठता ,,  कुछ अलग हट  कर  लिखना था मुझे ,,,और फिर समय की भी  डिमांड थी  ,,, साहित्य बिना प्रयोगों के अधूरा  था ,,! "
ओझा --- " तो क्या हुआ तुझे हासिल ,,?  हुआ तेरा अभिनन्दन ,,? मिला तुझे कोई पुरस्कार ,,?   बनी कोई रचना पुरस्कार के योग्य ,,? '
  राइटर --- " मुझे तो मेरी सारी रचनाएँ पुरस्कार के योग्य लगी !  अभिनन्दन  के लायक !  लेकिन उन लोगों ने कहा ,,,अभिननंदन का खर्चा उठाओ ,,,हम करवा देंगे अभिनन्दन ,,! "
ओझा -- " किन लोगों ने कहा यह ,,? "
 राइटर --- " मेरे दोस्तों ने ,,,उन ग्रुपों ने  जसमे में शामिल हुआ   लेकिन मेरे पास खर्चा नहीं था इसलिए मैं बस लिखता गया   लिखता गया   एक के बाद एक रचना   ताकि मैं अमर हो जाऊं ,,   दुनिया मुझे याद करे की था कोई  लेखक ! "
ओझा --- " अरे ओ   टाइपराइटर ,,!  क्या तू नहीं जानता  की एक ही रचना बहुत होती है  किसी लेखक को अमर करने के लिए !  महाभारत , रामायण , कादम्बरी ,  अभिज्ञानशाकुंतलम , रोमियो जूलियट , क्या काफी नहीं हुए एक लेखक को अमर करने के लिए !    फिर तू क्यों लगा रहा   लगातार इस मानसिक प्रजनन में ,,? "
डायरेक्टर --  नेपथ्य से (  दूर से चिल्ला कर ) ,, " यही है दुष्ट हुजूर ,,! यही लिखता है    और मुझे मजबूर करता है  फिर नाटक खेलने के लिए ! "
राइटर ,,,---( मुड़कर  नेपथ्य में देखता हुआ डायरेक्टर से लड़ते हुए ) ,,"   अच्छा ,,?  मैंने कब कहा की तुम खेलो ,,?   उलटे तुम ही मुझसे डिमांड करते रहे की अब इस पर लिख दो ,, अब उस पर लिख दो ,,,मुझे रेडियो कांट्रेक्ट मिल रहे हैं ,,! "
ओझा --- "  और तूने लिख दिए ,,,?  तू राइटर था की जो मांगोगे वही मिलेगा की इश्तहारी अंगूठी ,,? "

 (    नेपथ्य में   एक बहुत की हंसी ,,,ही,,ही,,ही,,ही,,  हां,,हां,,हां,,)
ओझा -  " ये कौन हंस रहा है ,,? "
नेपथ्य से --- "  कोई नहीं सरकार   मैं हु  मसान का भूत ,,, आज आपने अच्छी कचहरी लगवाई ,,
ओझा --- " क्या तुम अकेले ही बैठे हो मसानी भूत इस   अदालती कार्यवाही मैं ,,? '
मसानी भूत --- :"  नहीं सरकार ,,,इधर उधर से घूमते कई भूत यहां आकर बैठते जा रहे हैं    अब आप हुकुम देंगे तो  मुझे ढूंढने के लिए कहीं बाहर ना जाना पडेगा   सब यही मिल जाएंगे ,,"
ओझा --- " बहुत अच्छे मसानी भूत  ,,सब पर नजर रखो ,,, कोई भागे नहीं ,,! "
लेखक --- " तो क्या मैं अब बरी  हुआ ,,? "
ओझा --- " अभी तो तुझे बहुत जबाब देने हैं ,,,दुष्ट तू बोलता जा ,, "
 राइटर -- "  मैं क्या बोलूं ,,? कहें तो  मैं लिख देता हूँ मुकदमो पर एक नाटक ,, " अन्यायी ओझा का न्याय " ,,! "
ओझा --- "   नहीं ,,,,,लिख ,, एक अवसरवादी लेखक की मौत "
 राइटर -- "  मैं कहाँ ज़िंदा हूँ ,,,?   मैं तो समझो  कब का मर चुका !  जब से मैंने डिमांड पर लिखा !  उसी दिन से  एक लेखक से एक भूत बन गया !,"
ओझा --- "  तो आखिर तेरे आर्टिकलों का क्या हुआ ,,? '
राइटर --- "  मेरी कई रचनाओं की ह्त्या तो इसी डायरेक्टर ने की !   मैंने लिखा कुछ और ये खेला कुछ ,,,ना यह मुझे समझा ,,,ना मैं इसे ,,! "
डायरेक्टर ( नेपथ्य से दूर से चीखते हुए ) ,,, "  यह लिखता ही ऐसा था   मुझे क्लाइमेक्स बदलने पड़ते थे ,,! "
राइटर। .( लड़ते हुए ) ,,तू तो मेरा नाटक ही बदल देता था   स्त्री पात्र नहीं मिली  तो उसका हिस्सा काट दिया ,,!    बूढ़ा पात्र नहीं मिला तो ,,जवान लड़कों को रुई की दाढ़ी लगा कर  बूढ़ा दिखाया !,,,बूढ़ों को मेकअप करके जवान ,,!   मेरे पात्र मखौल बन कर रह गए ,,!
डायरेक्टर  ( नेपथ्य से ) ,,"  मैं मज़बूर था   स्थिति ही वैसी थी   आर्टिस्ट नहीं थे ,,,नाटक की डिमांड थी ,,! "
ओझा ---( डपट कर ) ,," चुप कर बदमाश ,,!   तू डिमांड पर खेलता रहा ,,,यह डिमांड पर लिखता रहा ,,,तुम लोग पेशा कर रहे थे   या कला की सेवा ,,? '
(  नेपथ्य से   एक आवाज़ ) --- " अरे पेशे वालों को भी कहाँ छोड़ा इन्होने ,,  इनकी वजह से तो मेरा जमा जमाया धंधा ही चौपट हो गया ? '
  ओझा --- " यह कौन बड़बड़ा रहा है ,,? '
नेपथ्य से मसान का बहुत --- " यहां एक   भूत  बैठा है  ,,, प्रकाशक का  भूत,,,वही बड़बड़ा रहा है ! "
लेखक ---" बुलवाएं उसे सरकार ,,,कचहरी में  वह  मेरी रायल्टी खा गया है  ! "
               (   एक भूत ,,,, प्रकाशक  का,,,, कूद कर आगे आता है ! )
  प्रकाशक --" मुझे बहुत   घाटा हुआ है  सरकार   एक किताब नहीं ,बिकी ,!   मैं प्रेस की उधारी के सदमे से ही स्वर्ग सिधार गया ! "
राइटर --- " झूठ ,,, फिर से झूठ ,,,  स्वर्ग सिधारे होते तो यहां होते   इस ओझा के पास ,,? '
ओझा --- "    क्या  मतलब  ,,?  क्या यह स्वर्ग से लौट आया ,,? "
राइटर -- "  नहीं  ओझा जी यह यहीं नर्क भोग रहा है ,,! किसी की रायल्टी खा कर किसी को स्वर्ग कैसे मिल सकता है ,,?  यह   प्रेस और बुक डिपो के सामने बैठ कर  आने जाने वालों को ताकता है ,,, क्या कोई किताब बिकी ,,?? "
ओझा --- " क्यों जी ,,,तुमने इसकी रायल्टी क्यों नहीं दी ,,? '
 प्रकाशक --"  रायल्टी ,,??? "   मेरे घर के पुरे कमरों में सिर्फ इसी की किताबें  भरी पडी हैं ,, कभी बिकी ही नहीं ,,!  अब उसे फाड़ कर मेरी बीबी अंगीठी या चूल्हा जला रही है ! "
राइटर --- "  कहीं तो काम   आ रही हैं  मेरी कृतियाँ ,  उसी की रायल्टी दे दो ,,! "
 डायरेक्टर (  दूर से ) --- " मैंने रीना को एक बार इसकी किताबों के पन्नो पर भेल पुरी  खाते देखा था ! "
ओझा --- ( अचानक   चौंक  कर ,   मर्माहत स्वर में ) ,,,"   हाय ,,हाय !  रीना भी गयी क्या काम से ,,, ?? भेल पुरी  खा कर  टाइम गुजार रही है क्या ,,? '
  डायरेक्टर ---" नहीं हुजूर ,,!  उसकी तो काफी डिमांड है !  हर डायरेक्टर अपने नाटक में उसे  काम देना चाहता है ,,,दत्ता , मिर्ज़ा ,  राही  ,,   उसे क्या कमी ,,?   भेल पुरी   तो वह शौकिया खाती है   मजबूरी  में नहीं ! "
ओझा --- " खैर ,,,बताओ ,,प्रकाशक महोदय ,,की तुम तुम्हारी किताबें क्यों नहीं बिकी ,,? " ,,,कहाँ फंस गए तुम ,,"
 प्रकाशक --- " मैं फंसा नहीं ,,,फंसा लिया गया हुजूर ,,! मैं तो सीधा सादा प्रेस वाला था ,,, यूनिवर्सिटी में  स्टेशनरी और  प्रिंटिड   फ़ार्म सप्लाई करता था  ! आर्डर लेता था ! "
  ओझा -- " तो अचानक  प्रकाशक कैसे बन गए ,,? "
प्रकाशक --- यह वहां प्रोफ़ेसर था ,,, ये बोला ,,प्रकाशक बन जाओ ,, !  बड़े फायदे हैं ,, ! मेरी एक पूरी   किताब छाप दो ,  यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में ही हज़ार  प्रतियां  लग जाएंगी ,, और फिर ऐसी कई कई यूनिवर्सिटीज हैं ,, कई कई लाइब्रेरियों ,,में कई कई प्रतियां  लग जाएंगी ,,, बाकी बुक स्टालों पर  और कुछ अकादिमियों में बंटवा  देंगे ,,, कुछ यारों को थमा कर पैसा वसूल लेंगे ,, लिख देंगे ,, सप्रेम भेंट ,,! "
ओझा --- " क्यों रे  ज्ञानी ,,,उर्फ़ ज्ञान प्रकाश ,,!  तूने किसी बड़े प्रकाशक को क्यों नहीं पकड़ा ,,?? "   इसे क्यों बर्बाद किया ,,? "
राइटर -- "( रुआंसे स्वर में ) --"   बड़े प्रकाशक तो मुझी से पैसा मांग रहे थे   पूरा   पैसा  छपने से पहले  एडवांस !  मेरे पास कहाँ से आता ,,? '
ओझा --- " कैसी है यह नाटकों की दुनिया ,,?   रंगों में बदरंग ,,! "
राइटर _  " और इसने  किताब भी वैसी ही  छापी --   बदरंगी  ! ना गेटअप , ना कोई आकर्षक रंगीन आवरण ,,! प्रिंटिंग इतनी डिफेक्टिव की  ,,!   डायलॉग में मैंने जहां अबला लिखा था ,,इसने छाप दिया तबला ,!  ऐसे ही कमला को गमला , लज़ीज़ को अज़ीज़ ,   कानी को रानी ,   छैला को मैला ,,!   भला फिर कैसे बिकती किताब ,,! "
प्रकाशक -- " "  प्रूफ रीडिंग के लिए दी तो थी तुम्हें ,,! फिर क्या संशोधन किये तुमने उस वक्त ,,? "
  राइटर -- "  मैंने अधिक ध्यान    नहीं दिया ,,!   मेरी बीबी मास्टरनी थी  ,, तीसरी क्लास की कापियां जांच रही थी ,, वह बोली इत्मीनान रखो मैं जांच दूंगी ,,, !  मैं उस समय बहुत बिज़ी था ,,  एक जरूरी सब्जेक्ट पर  हॉट डिमांड पर लिख रहा था ,,, बर्निंग टॉपिक था ,,,इसलिए उसे ही दे दी ,, और दूसरे दिन   उसी से मांग कर यह  वापिस ले गया ,,, ! "
  प्रकाशक ---"  और वह   किताब   सिर्फ तीसरी क्लास का सब्जेक्ट बन कर रह गयी !   किसी ने नहीं खरीदी  सरकार ,,!   मैं लुट  गया  ,,,सदमे में मेरी जान चली गयी ,! "
  डायरेक्टर --- "  उस किताब से मैंने कुछ ड्रामे  भी किये थे   हुजूर ,,!  मुझे   पूरे  डायलॉग बदलने पड़े ,,, डायलॉग बदलने से  सब्जेक्ट और क्लाइमेक्स   सभी कुछ बदल गया !

     (  नेपथ्य से ,,,भूतों की आवाज़ें ,, कहीं ,दर्शक तो नहीं बदलने पड़े ,,, ही ही  ही  ,,, खी   खी   खी  ,,! )
कई और भूत ---ही ही  ही ,,,खी  खी  खी ,,,)
 राइटर --- " लेकिन  उस किताब से एक नाटक ,," गहरा रंग " तो खूब चला था ,,,इस डायरेक्टर ने खूब कमाया उससे ,! "
  डायरेक्टर -- " गहरा रंग तो जमा था गहरी रंगीन लाइट से   गहरे रंग की ड्रेस से ,,   और रीना की वजह से ,,,गहरे लाल रंग की लिपस्टिक   खूब जंच  रही थी उस नाटक में ,,! "
ओझा --- "  तुम गहरे में जा रहे हो डायरेक्टर ,,,बाहर निकलो वरना डूब  जाओगे ,,,बेमौत मरे जाओगे समझे ,,! "


राइटर --- "  जिन खोजा  तिन  पाइयाँ। ..गहरे नाटक पैठ " ,,! "
डायरेक्टर --- " क्या गहरे नाटक पैठ ,,???  मैं तो तभी से मुँह छिपाए घूम रहा हूँ    पता नहीं  कब मिल जाए वो   ओझा  --- " कौन "
  डायरेक्टर -- " अरे वही डेकोरेटर   जिसने उस नाटक में टेंट , लाइट माइक , कुर्सियां सप्लाई की थीं ,,! "
ओझा ---"  क्यों ,,,उससे क्यों भाग रहे हो तुम ,,? "
  डायरेक्टर --- " बड़ा हेवी  बिल है उसका ,,,कहता है   तीस कुर्सियां टूट गयीं ,, दो दरी चोरी  चली गयी ,, छह हेलोजन फ्यूज हुए ,  माइक बिगड़े , चादर  आर्टिस्ट ले गए ,,! "
प्रकाशक --- " एक दिन वह भी मरेगा ,,! सदमे से ,,! अगर ऐसे ही दो चार नाटक और हुए तो  वह भी घाटा उठाएगा ,, बनेगा ,,,भूत ,,! "
ओझा --- " बहुत नुक्सान कर रहे हो तुम लोग   सभी दिशाओं में ,,! ,,, यह प्रकाशक तो भूत बन ही गया , साहित्य में भी अपूरणीय क्षति कर  रहा है यह राइटर ,, कैसे होगा ,, कैसे बचेगा यह रंग कर्म का संसार ,,! "
राइटर --- "  मुझे तो मुंबई से बुलावा आगया है ,,, वहां तो रोज सेट पर ही बैठ कर डिमांड पर लिखने का काम है ,,, मुझे अब इस रंग कर्म से क्या लेना देना ,, जिसके भाग्य में जो लिखा है वह भोगे ,, ! "
  प्रकाशक ---" ये सब ऐसे ही लोग हैं ,,  एक दूसरे को दच्चा देने वाले। .!   खुद के नाम और खुद के भविष्य के भूखे ,,!   इन्हे तो सजा मिले की  अगले जनम में ये प्रकाशक और डेकोरेटर बने ,,   भारी घाटा उठायें ,,,और भूत बने ,,!
 

   (  नेपथ्य में सभी भूत --- ही ,,ही,,ही,,खी  खी खी ,,,)

   ओझा -- ( जोरदार स्वर में ) --- " चोप्प ,,,! तू लोग किसी के भी दुःख में हँसते हो    ,,,क्या संवेदनाएं खो गयी हैं तुम्हारी ,,? '
  मसान का भूत --- " आखिर भूत ही तो हैं सरकार ,,!  क्या जाने की कब हंसना है कब रोना ,,! "

डायरेक्टर --- " यही वजह है ,,,यही वजह है ,,!   जिससे मैंने नाटकों में बड़े बदलाव किये !   दर्शक ना कभी किसी के सगे  हुए हैं ,,ना होंगे ,,!   बे मतलब ताली बजा  दें ,, जब चाहें हंस दें ,,,और जब चाहे   तो औरतें रोने लगें !  बच्चे तो  शोर करते ही रहेंगे  ! चाहे क्लाइमेक्स हो चाहे कोई संवेदनशील दृश्य ,,कहो तो उबासी लेने लगें !   उन्हें तो वही करना है जो वे चाहेंगे ,,,सब के सब भूत ,,! "
ओझा--" लेकिन अब उस डेकोरेटर का क़र्ज़ कैसे उतारोगे ,  तुम डायरेक्टर ,? "
डायरेक्टर -- " एक नया नाटक खेल कर ,,! "
ओझा --- " नुक्कड़ पर खेलोगे ,,? "
डायरेक्टर --- " नुक्कड़ पर पैसे कहाँ से मिलेंगे ,,?   और थियेटर में तो फिर से कर्जा लद  जाएगा ! "
ओझा -  "  फिर " ? '
डायरेक्टर ---" इस बार तो शायद रीना भी नहीं मानेगी ,, उसकी माँ  बीमार है   उसे भी पैसा चाहिए ,,मांग रही थी ,! "
ओझा --- ( दुखी हो कर )  रीना की माँ  बीमार है ,,,, ? (  उसाँस  ले कर ) --" लगता है लास्ट स्टेज आ गयी ,!
डायरेक्टर -- " हाँ हुजूर ,,! ,, रीना की माँ  को कैंसर है   , उसका भाई बे रोजगार है ,,! वह भले घर की लड़की है !  आर्केस्ट्रा में तो वह इसलिए गाती  थी  क्यूंकि पैसे उसे तुरंत मिल जाते थे ! हफ्ते में आर्केस्ट्रा किसी ना किसी प्रोग्राम में एक बार बुक हो ही जाता था ,,,कभी किसी संस्था में ,,, कभी किसी शादी में ,,कभी किसी बर्थ डे  पार्टी में ,, कुछ ना कुछ आर्केस्ट्रा के जरिये वह पा ही जाती थी ,,,अब नाटक में क्या मिलेगा ?? मजबूर है ,,इसलिए मायूस भी थी ! "
ओझा --- "  (  लेखक से ) ,," तुम कुछ लिख  दो   सामयिक ही सही पर शो अच्छा जाना चाहिए    शायद नाटक  हिट  हो जाए ,,  रीना की जरुरत पूरी   हो जाए ! "
 राइटर --- " मैं खुद भूखा हूँ सरकार ,,,कलम तो चल जाएगी   लेकिन पेट में रोटी कैसे आये ,,??? "   अब तो  यह प्रकाशक भी मर चुका है ,,,इसके प्रेस में भी बैठना पड़ता है ,,!   आखिर वह घर भी तो मेरा ही है ,, मेरी भौजी है वह ,,,,मेरे भतीजे हैं वहां ,,! "
प्रकाशक --- " मैं तो सचमुच भूत बन चुका हूँ ,,! सिर्फ  किताबें बची हैं ,,,कोई खरीद ले   तो यह लेखक पैसा ले ले ,,,कुछ नया लिख दे ,, मुझे कोई उज्र नहीं ! ,,,चाहे तो  नाटक के सभी पात्रों को बाँट दे ,,! "
राइटर --" भला कौन खरीदेगा  किताबें ,,? '
ओझा --- " मैं खरीदूंगा ,,! मेरे पास हैं पैसे ,,! "
प्रकाशक -- " आपके पास हुजूर ,,?? "
ओझा -- "  हाँ मेरे पास एक करामाती अंगूठी है ,!  इसे तुम ले लो ! बाजार में ऊँचे दाम बिकेगी ,, जितना पैसा चाहोगे   मिलेगा ,,! ,,सब निबट जाएगा !  रीना को पैसे मिलना ही चाहिए   ! "
राइटर ---"  यह क्या लेगा यह अंगूठी ,,  यह तो भूत है ,,मुझे दीजिये ,, मैं बेचता हूँ इसे बाजार  में ,,!   नया नाटक होना ही चाहिए ,,,चाहे जिस कीमत पर हो ,,! "

     ( ओझा उंगली से अंगूठी निकाल कर देता है )
    ( अचानक  तेज चकाचोंध ,,, विचित्र आवाजे ,, फिर ओझा का शरीर कांपता है ,, ओझा बड़बड़ाता है ,,ढब ढब ढब,,   खप खप खप ,,   डम डम डम  ,,,ढब ढब ,,,,,, और गिर पड़ता है )
 अचानक मंच पर अन्धकार ) फिर धीरे धीरे प्रकाश उभरता है ,,, पूरा  मंच खाली है ,, सिर्फ गौरव सिंह  मंच के बीच पड़ा है )
   गौरव सिंह ( उठ कर मंच  बैठता  हुए  आँखे  मल कर खड़ा हो जाता है )


    गौरव सिंह --- " यह सब क्या था ,  गौरव सिंह ,?? यह मैं क्या देख रहा था ? ,, मेरी अंगूठी कहाँ गयी जो उस औघड़ ने दी थी ,,? ,,,अरे,,!!!,,, वो तो गायब हो गयी ,,!   और जेब में पचास का नोट ,,?    ( टटोलकर )  ,,हैं,,,!!!!   ,,यह तो वैसा का वैसा ही रखा है ,,!   और ऊपर वाली जेब में यह क्या गड रहा है ,,?  अरे ,,!!  यह तो  मेरी सिगरेट है   ,,वही चुराई गयी सिगरेट ,,!   तो फिर  वह सब क्या था ,,?  क्या मैं सपना देख रहा था ,,? ",,तो क्या झूठ था वह त्रिलोकीनाथ ,, और उसकी करामाती अंगूठी ,,! "
  ( धीरे धीरे आगे आता है )
   "  चलो सिगरेट तो बची है ,, उसे ही फूंकें ,,! " लेकिन आखिर सच क्या है   वो नाटक या   यह सिगरेट ,,या फिर मेरे पास रखा यह पचास का नोट ,,?? " ,,, मुझे तलाशना होगा   मुझे तलाशना होगा की रीना को आखिर आर्केस्ट्रा में क्यों गाना पड़ा ,,?   वह नाटकों में क्यों गयी ,?   कला के लिए या फिर माँ  की बीमारी के लिए ??,, ,,,,या फिर घर की अहम् जरूरतों के लिए ,,?   तलाशना होगा कि नाटकों से उसे क्या मिला ,,? ,, वाहवाही ,,? यश ??  या फिर आत्म संतोष ?
     दुनिया के रंगमंच के जीवंत पात्र  कृत्रिम  रंग मंच पर क्या कर रहे हैं ,,?   किसके लिए कर रहे हैं ,,?   और उनके करने से कुछ हो भी रहा है की नहीं ,,??
     जब तक मुझे यह सब पता नहीं चल जाता ,,, नहीं करूंगा मैं ,,,नाटक ,,!  नहीं करूंगा कुछ भी ,,!  करूंगा तो सिर्फ एक काम ,,, रीना की मदद   सच्ची मदद ,, जिसकी उसे सख्त जरुरत है ,,!  ,,,चाहे फिर मुझे इस एकलौते पचास  के  नोट को ही खर्च क्यों ना करना पड़े ,,! "

  ( इति,,,)

  ---- सभाजीत























"
















सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

कठोरता का प्रतीक चिन्ह ,,,
' पाषाण ' होता है ,,' पुरुष ',,!
और स्त्री होती है , ,,,,
' प्यार ' की एक 'छैनी ',,,!!

हर छैनी ,, 
काटती है , छांटती है , तोड़ती है , एक 'पाषाण ' को ,
जीवन भर , ,,,,
और गढ़ देती है उसे ,
एक ' आकार ' में ,,,!!

कुछ बनाती हैं ,,आकर्षक मूर्तियां ,
कुछ अनगढ़ ,,, बेडौल,, आकृतियां ,,,!!
और कुछ ' छार छार कर देती है उसे तोड़ते,,तोड़ते ,,!!

हर हालत में अस्तित्व खो देता है पाषाण ,,
अपने ' मूल- रूप ' को खोकर ,,!

किन्तु छैनी रहती है,,,
सदा अस्तित्व में ,
अपनी शाश्वत ' धार ' के साथ,,,!!

--- सभाजीत

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

gahre pani paith

" गहरे पानी पैठ ........." !!

मानव जीवन में ' मित्र' शब्द का अद्भुत अस्तित्व है ॥

अन्ग्रेजी में जहाँ इस सम्बन्ध को एक शब्द - " फ्रेंड " के नाम से सीमित दायरे में बाँध दिया गया है , वहीं हिंदी में इस को कई नामों --' मित्र ', 'सुह्रद', 'सखा' से परिभाषित किया गया है । मित्रता वह अनुभूति है जिसे लिंग , स्थान , जाति, के बन्धनों में नहीं बांधा जा सकता । हिंदी में जहाँ पुरुष मित्र को ' सखा' के रूप में संबोधित किया गया है वहीँ ' स्त्री ' मित्र को ' सखी ' के रूप में । वृन्दावन की कई स्त्रियाँ , कृष्ण की सखी थी - और कृष्ण ने मित्र भाव से इनके साथ जीवन जिया ।

मित्र भाव - " सम- भाव " है । इसमें ना तो कोई बड़ा होता है , ना कोई छोटा । इसमें उम्र भी कोई अस्तित्व नहीं रखती । ' सम-भाव ' सामान अनुभूतियों , सामान विचारों , और सामान पसंद से उपजता है । यह निष्कपट , निष्कलंक होता है । बाल्य काल के मित्र इसी सम- भाव के साथ आगे बढ़ते है । कृष्ण की सखियाँ , कृष्ण को बिना देखे नहीं रह पाती थी - वे उनके साथ शरारतों में सम-भाव से सम्मलित होती थी । अपने - अपने दांव को निष्कपट भाव से खेलने वाले ये मित्र अनोखे थे - जो चोर- सिपाही का खेल क्रमशः खेलते रहते थे ।

मित्र भाव में 'ज्ञान ' की कोई भूमिका नहीं । ज्ञान मनुष्य के चारों ओरकई तर्क ,, कई दायरे खडा कर देता है , जो मित्र भाव में सर्वथा वर्जित है । " राम कथा " में " राम " सदेव ग्यानी के स्वरूप में ही हमारे सम्मुख आते है .इसी कारण उनके मित्रों की सूची शून्य है । " राम - सुग्रीव " अथवा " विभीषण - राम " मित्रता , उद्येश्यों की प्राप्ति के लिए की गई राजनेतिक संधि है , अतः मित्रता के दायरे में नहीं आती । यह विडम्बना ही है की राम के जीवन में मित्रता का नितांत अभाव है , जबकि कृष्ण का युवा काल " मित्र -रस " से रसा - पगा है । यही कृष्ण जब ग्यानी हो जाते है तो मित्रों को खो देते है । कृष्ण - अर्जुन का सम्बन्ध भी मित्रता के दायरे में नहीं आता , क्योंकि वहा " सम- भाव " नहीं है । ग्यानी कृष्ण जब अपनी बाल्य काल की सखियों को "अनासक्ति " का पाठ पढ़ाने की चेष्टा , अपने दूत " उद्धव " के जरिये करते है , तो उद्धव - " सम भाव ' के शब्द बाणों से आहत होकर , ज्ञान की अपनी क्षत - विक्षित पोथी को लेकर कृष्ण के पास वापिस लोट आते है ।

मनुष्य के अन्य सम्बन्ध सीमित है , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असीमित है । पिता का सम्बन्ध ' एक ' है , माँ का -एक , पत्नी का - एक , भाई बहिनों के - तीन चार , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असंख्य हो सकते है । यहीं आकर मित्र शब्द -" सखा" शब्द से भिन्न हो जाता है । सखा - " अस्तित्व " है और मित्र - " अनुभूति " । 'अस्तित्व' हमारे जीवन का 'सहभागी' होता है , जबकि 'अनुभूति ' विचारों से 'सहभागिता' करती है । सखा या सखी के सामने हम ह्रदय के पट पूरी तरह ख़ोल देते है , वह हमारी संवेदनाओं की सहभागिता करता है , निष्कपट , निष्कलंक भाव से , ओर हम अपना बोझ उतार कर उसे दे देते हीवह ब्प्झ जो हम अंतस में ढो रहे होते हैं , उसे मात्र सखा ही ग्रहण कर सकता है , मित्र दिलासा दे सकता है , उपाय बता सकता है, सहानुभूति प्रकट कर सकता है , हमें बोझ रहित नहीं कर सकता ।

पश्चिम से आई सभ्यता ओर तकनीक ने , मित्रता के दायरों को विशाल समुद्र में बदल दिया है । आधुनिक युग में मित्रता के लिए हमारे सामने भीड़ खड़ी है । हम जिसे चाहे , उसे मित्र के रूप में चुन सकते है । मित्रता के इस मंच को उत्पन्न करने वाली कई साइट्स आपस में व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता में संघर्ष रत है ओर लोगों को कई विकल्प देती है ओर - लोग अपनी अपेक्षाओं ओर सुविधाओं के हिसाब से इनका उपयोग करते है ।

युवा वर्ग में मित्रता का मानदंड - ' फेस ' है । वे चेट्स करना चाहते है । मनोरंजन मित्रता का उद्येश्य है । ओर अपने अकाउंट में अधिकतम संख्या में " हिट्स " जोड़ना चाहते है । इस व्यापारिक जगत में , विचारों के लिए उनके पास समय नहीं है । जबकि " वयस्क " " व्यक्ति , वहां वहां से तलाशकर जुगाड़े गए संदेशों से खुद को व्यक्त करना चाहते है । वे चाहते है की लोग उनको चिन्हित करें , वे  लोकप्रिय  हों । वे अपनी भावनाओं को फ़िल्मी गीतों के माध्यम से भी स्फुटित करते है ओर अपना सहभागी तलाशते है । आधुनिक काल खंड से प्रायः कट गया उम्र दराज़ व्यक्ति , विचारों को व्यक्त करने से डरता है , क्योकि वे विचार आधुनिक समाज को स्वीकार्य नहीं । ऐसे लोगों की संख्या इन मंचों पर लगभग नगण्य ही रहती है ।

स्त्रियाँ इन नायाब मंचो की शोभा होती है । दाम्पत्य जीवन की कठिन नाव पार सवार स्त्रियाँ , मित्रता की नाव पर भी एक पैर रखना चाहती है, किन्तु इसके लिए वे डरी सहमी भी रहती है । मित्रता का मुखौटा लगा कर , अपरिपक्व , असामाजिक तत्व उनसे अप्रसांगिक बातें करने का प्रयत्न करते है । इस लिए अधिकाँश स्त्रियाँ - " नो चैट " की तख्ती के साथ - अपने ज़ोन पर ताला लगा कर रावण से ठगे जाने की सभी संभावनाएं ख़त्म कर देती है । ये स्त्रियाँ विचारों की दुनिया में सहभागिता चाहती है , अपने विचार व्यक्त करना चाहती है , किन्तु इसके लिए जो मित्र उन्हें चाहिए , उन्हें इन मंचों पर ढूंढना उनके लिए कठिन होता है । अधिकतर पुरुष , मित्रता की आड़ में स्वच्छंद स्त्री मित्र की तलाश करता है , जबकि यथार्थ में कोई भी स्त्री कभी स्वच्छंद होती ही नहीं । वस्तुतः जो भी स्त्री- पुरुष स्वच्छंदता की परिभाषा में आते है , उनके लिए मित्रता कोई मायने नहीं रखती , क्योंकि वे मित्रता को एक खेल के रूप में ही लेते है ।
मित्रता के इस विशाल सागर में , आज मित्रता मछलियों की तरह तैर रही है । किन्तु सागर का पानी 'खारा' है - उसमें मिठास नहीं है । और इसीलिए मित्रता की उस स्वाभाविक मिठास की प्यास हमें तब भी बनी ही रहती है । " नो स्ट्रेंजर " के नारे के पीछे , हम अपरिचित नहीं रहते , किन्तु पूर्णतः परिचित भी नहीं होते । वस्तुतः संमाज से बड़ा कोई मंच , सखा या मित्रता के लिए हो ही नहीं सकता । अपने घर के दरवाज़े बंद करके हम पडोसी से बात चीत करने से भी कतराते है , किन्तु आकाशीय मार्ग पर चर्चा करके एक " कल्पनीय " समाज की सरंचना कर रहे होते है , जहां - " मुख- चित्रों " के पीछे छिपे , किसी अपने जैसे व्यक्ति की हमें तलाश होती है । यह एक मृग मारीचिका है जो मानसिक सूख तक सीमित रहती है ।
हमें अपने संसार को रचने की स्वतन्त्रता है सुख़ की अनुभूति हमारी अपनी है , वह जहां मिले उसे पाना हमारा अधिकार है । अपने विचारों पर टिपण्णी या तालियाँ पाकर हमें सूख या संतोष मिल सकता है , किन्तु मित्रता का - " सम भाव " नहीं । वह फिर भी हम से बहुत दूर रहता है । जैसा की मेने कहा - " सम-भाव " " अस्तित्व " है , " अनुभूति नहीं , इसलिए मंचीय मित्रता के साथ साथ , हमें अपने घरों के दरवाज़े खोल कर , पड़ोस में भी एक मित्र ढूंढना होगा । यह मित्र एक अस्तित्व होगा । यह मित्र आपसे मज़ाक कर सकता है , आपकी संवेदनाओं में शरीक हो सकता है , अन्याय के विरुध्ध कंधे से कंधा मिला सकता है और वैचारिक सहभागिता भी कर सकता है ।
अपने पड़ोस में ऐसे मित्र को ढूँढना एक कठिन बात है । क्योंकि मित्रता में " ज्ञान " वर्जित है और अस्तित्व पूर्ण मित्रता में 'ज्ञान' आड़े आता है । ज्ञान हमारे बीर्च " स्टेटस " की दीवार खड़ी करता है , और हम में अपने अस्तित्व का अहम् पैदा करता है .और इसी कारण मित्रता नहीं मिलती । कृष्ण यदि खुद को " इश्वर " स्वरुप में गोपियों के समक्ष प्रस्तुत करते तो वे उनके सखा नहीं बन सकते थे ।
कबीर ने कहा -
" जिन खोजा तिन पाइयां , गहरे पानी पैठ ॥,
हों बौरा डूबन दारा , रहा किनारे बैठ ।।"
मित्रता का मोती पाना है तो गहराई में उतरना ही होगा । किनारे बैठे व्यक्ति को , लहरों की सतह पर उतराते हुए मोती नहीं मिल सकते । 'दिया' अपने नीचे अन्धेरा रख कर दूर तक कालिमा से युध्ध करता है किन्तु उसे 'सूर्य ' नहीं कहा जा सकता । सूर्य की किसी भी दिशा में चारों और सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश ही है । मित्रता सूर्य की तरह है - जिसे अपने चारों और प्रकाशित होना ही चाहिए ।
------सौरभ
   ( सभाजीत शर्मा )




रविवार, 9 जून 2013

bhatkaan


















जीवन की संकरी गलियों में ,
 भटक ना जाऊं  कहीं अकेला .., !!

प्यार माँगना चाहा  जिससे ,
उसने सदा मुझे ठुकराया ..,
जिसने मुझसे प्यार किया कुछ ..,
उससे मैं खुद हो कतराया ..!

पता  नहीं पतझर कब आया ..,
 जहाँ कभी बसंत था खेला  ..!!

सारे  दिन अनुभव करता था ..,
 मेरे भी पीछे कोई है ..,
मेरी तरह किसी नादा की ..,
 मनचाही मंजिल खोई है .., !

'पग- ध्वनि ' खुद की ही पायी ..,
 जब  मुड  देखा संध्या की बेला ..!!

किससे क्या कुछ कहूँ अजब जब ,
 दुनिया का ही द्रष्टिकोण है ..,
 जो वाचाल उसे सब सुनलें ..,
 कौन सुने उसकी जो मौन है ..,

भाषाओं के ग्रंथों खरीदे ..,
भावों पर खर्चा ना धेला .., !!

--सभाजीत

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

लघुकथा - 1
:

:: उपदेश :::

 कृष्ण ने अर्जुन को अपने केबिन में बुलाया !
 श्री कृष्ण तिवारी अफसर थे जबकि अर्जुन दवे उसका मातहमत  !
  अर्जुन के अन्दर घुसते ही कृष्ण ने ' सखा भाव '  से कहा -
- " बैठो  अर्जुन "
   अर्जुन बैठ गया तो कृष्ण  ने पूछा  - 
- " कैसी तबियत है अब तुम्हारी वाइफ़ की ..?? "
- " ठीक है सर !! ... नरम गरम तो चलती ही रहती है ..! " 
- " भई... तुम भी अजीब आदमी हो ...! ,  बाल बच्चों और घर  की तरफ  कोई ध्यान नहीं देते ..!! "
- " क्या करूँ सर "- अर्जुन ने शिथिल भाव से कहा--"  डिपार्ट मेंट के वर्क से ही फुर्सत नहीं मिल पाती ..,!"
   कृष्ण मुस्कराए ..!,,,  फिर ' दार्शनिक भाव ' में  अर्जुन  पर नज़रें गडा दी ! -
- " घर में किसी को कुछ हो गया  तो क्या दे देगा  तुम्हें डिपार्टमेंट ..?? ... अरे पहले  घर देखो  ... यह  सरकारी काम काज तो चलता ही रहेगा ..! "
 _ " यस सर ..!! " ... अर्जुन को लगा जैसे उसके घाव पर कोई मरहम लगा रहा हो  !
कृष्ण ने दराज खोली ,  सौ रुपयों की एक गड्डी तोड़ कर  उसमें से दस नोट तोड़  कर अलग किये  .. फिर एक लिफाफे में डाल कर , अर्जुन की और उछाल दिए !
- "  " मेहता ' दे गया था ..! ..., तुम्हारा जायज हक़ है इस पर ..! ... उसकी फ़ाइल है तुम्हारे सेक्शन में ... आज ही नोटशीट बना लाओ तो   अप्रूव कर दूँ ! .."
 अर्जुन ने कृतज्ञ भाव से कृष्ण को देखा ,,फिर  लिफाफा उठा कर मोड़ा  और  चुपचाप जेब में डालते हुए कहा  -  " जी  सर .." !
 कृष्ण बोले - " और अपने परिवार का ध्यान रखा करो ..! ... आखिर कमाते किसके लिए हो ..?? ...उन्ही के लिए ना .??.... मेहता कह रहा था की तुम ' संकोची '  हो ...उससे कुछ लेते ही नहीं !.......ऐसी बात है तो  मुझसे ले लिया करो   ... आखिर इस महगाई में कैसे चलेगा तुम्हारा ..?? "
- " जी सर " -- अर्जुन का स्वर भक्ति भाव में धीमा हो गया ! वह उठने लगा तो कृष्ण बोले -
_ " आजकल कोई किसी का सगा नहीं  अर्जुन ! वक्त पर कोई काम नहीं आता ..., ना मित्र ना रिश्तेदार ..!!   काम आती है तो ' विष्णु - प्रिया ' ..यह लक्ष्मी ..!.,  बेवकूफी में जिससे तुम परहेज करते रहते हो  ..!! "
 अर्जुन उठ कर हाथ बाँध कर खड़ा हो गया !
-" और हाँ !... .. फाइलें तो बनती ही ' निबटने ' के लिए हैं ..., तुम नहीं निबटाते  तो मेहता किसी और बाबू से निबटवा  लेता  ! .. यह  सरकारी ' माया जगत  ' है ...और  याद रखो तुम महज   एक  किरदार ..!! "
- जी सर "  ... अर्जुन की आँखें मुंद  गयीं !
- "जाओ अब  नोटशीट बना कर जल्दी ले आओ ..!! "

 अर्जुन बाहर निकला तो उसका चेहरा चमक रहा था !
  कृष्ण ने उसे ' तत्व- ज्ञान ' दे दिया था !
, वह अपनी ' सीट ' पर आरूढ़ हो .. , ' गांडीव ' की तरह ..' पेन ' हाथ में धारण कर .,,,.. नोट शीट पर ' शब्दों '  की  बाण वर्षा करने लगा !


-सभाजीत


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लघुकथा-2 

:: लकी ::

 
दोनों  दोस्त ढाबे पर बैठे थे !

रफीक साइकिल के पंक्चर बनाता था और मंजीत डबलरोटी बेचने का काम करता था !

--" कैसे फंस गयी वो यार तुमसे ,,""  रफीक ने मंजीत से उसकी मुहब्बत का राज जानना चाहा !
- बस यूँ ही ,,धीरे धीरे ,,! " 
- धीरे,,धीरे ,,? क्या बचपन से जानता था तू उसे ,,??" 
--",, अरे नहीं यार ,,!! वो मुलाकात  तो अभी  एक महीने पहले,ही हुई थी,,,, दिनेश के कारण ,,! " 
-" कैसे,,"?? 
-" वो दिनेश से उसका कुछ चल रहा था ! मैं वहां डबलरोटी बेचने जाता था !  दिनेश ने कहा कि  मैं उसका सन्देश उसे दे दिया करुँ ,,! "
-" फिर ,,"??
-" फिर वह मुझे पूछने लगी ,, मुस्करा कर बात करने लगी ,,मैं भी सुबह शाम दोनों टाइम वहां जाने लगा ,,मेरी पुकार सुन कर वह रोज बाहर निकलने लगी ,,!  एक दिन मैंने डबलरोटी के पैकिट पर उसे लिख कर दे दिया ,,' आई लव यूं ',, और उसने भी दस रूपये के नोट  पर लिख दिया --' इलू,,इलू,! ," 
 --"  वाह । . ,, ऐसा क्या भा  गया उसको तुम्हारे अंदर ,,"?? 
-" उसने कहा कि  मेरा ' हेयरकट ' उसे पसंद है ,,, बिलकुल सलमान लगता हूँ ,,! " 
    रफीक ने लम्बी सांस छोड़ी  फिर मंजीत से बोला --
  - "  तू लकी है यार ,, तेरा धंधा भी अच्छा है ,,! " 
    मंजीत हंसा ,, बोला --" तुझे नहीं मिली  अभी तक कोई ,,?? " 
   रफीक ने गहरी उंसास भरी ,,बोला --
--" मेरी साइकिल की दुकान तो लड़कों के स्कूल के सामने है ,,दिन भर पंक्चर बनाते और साइकिल में हवा भरते ही बीत जाता है ,,! महीनों सैलून नहीं जा पाता  ,,,, मुहब्बत कैसे हो ,,?? " 



   ---- सभाजीत 



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लघुकथा-3 


सोमवार, 8 अप्रैल 2013


 " ज़माना "
- वे बड़ी देर से पहले साहब के गेट पर , और फिर कारीडोर में , ,,,साहब के बंगले से निकलने का इंतज़ार करते रहे ! एक अन्य व्यक्ति , जो बाद में चमचमाती कार से आया    , वो भी कारीडोर में बैठ कर  साहब के  बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा  ! थोड़ी देर बाद आखिर चपरासी ने दरवाजे से पर्दा हटाया और,,, एक अधेड़ , रुआबदार अफसर के दर्शन हुए ! बाहर निकल कर वे पहले मुरलीधर की और मुखातिब हुए और  सवालिया  निगाह उन पर डाली - ,
वे हड़बड़ाकरसाहब के आदर में  खड़े हो गए और बोले --
" मैं ....मुरलीधर पाठक ..! ...मुझे मनोज जी ने भेजा था आपके पास ..! "
--" अच्छा जी कहिये ..! " अफसर का स्वर उभरा ! .
" वो मेरे बच्चे के सिलेक्शन का मामला था !  मनोज जी ने  यह पत्र भी दिया है ..." ! कहते हुए मुरलीधर जी ने एक पत्र अफसर को थमा दिया !

" अच्छा अच्छा ..." -अफसर ने पत्र हाथ में थाम लिया !

" देखिये ...!! " - मुरली धर जी की आवाज़ थोड़ी कांपने लगी -   
,,,, " मेरा बेटा वैसे मेरिट में है ! यूनिवर्सिटी टाप की थी उसने !...मैं यह सिफारशी पत्र ना लिखवाता ,लेकिन मनोज जी मेरे पुराने ज़माने के मित्र हैं - वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं .., उन्होंने ही  कहा  कि थोड़ी शिफारिश हो तो कोई बुरी बात नहीं ! ..कह रहे थे कि  आपके बड़े भाई को नोकरी उन्होंने ही दिलवाई थी -- शिफारश पर ..., "

" हाँ हाँ ...मैं जानता हूँ मनोज जी को ..." ..अफसर का स्वर ' शुष्क ' हो चला था ! 
  फिर ...वह दुसरे व्यक्ति की और मुड़ गया !

--" जी मैं मायाराम अग्रवाल हूँ .., " दूसरा व्यक्ति स्वर में मिठास घोलते हुए बोला---" घंटाघर चौक पर सराफे की दूकान है मेरी ! ..."

- कहिये क्या काम है आपको ..? " -- अफसर के स्वर में फिर गुरुता आ गयी !

- " कोई ख़ास नहीं ..., बस दर्शन के लिए चला आया ..., ये कुछ नमूने हैं , मेडम देख लेंगी तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी ..! " -- कहते हुए मायाराम ने एक  भारी  लिफाफा अफसर को थमा दिया !

- " अच्छा..! अच्छा ..! "... अफसर के स्वर में भी मिठास आगई !

- और सर ... उस लड़के का नाम लिफाफे पर ही लिखा है , जिस के लिए आज आपसे महापौर जी ने बात की थी ! " -- मायाराम ने करफुसफुसाकर कहा ..! और फिर झुक कर नमस्कार करके चला गया !

अफसर ने लिफाफे को चिट्ठी पर रख लिया ! फिर मुरलीधर की और मुड़ कर बोला -

- .." मनोज जी को मेरा प्रणाम कहियेगा !,,,,, देखिये ,,,! अब वो ज़माना नहीं रहा बहुत बदल गया है ! ... देश बहुत आगे बढ़ गया है .., बहुत तरक्की हो गयी है ! सब जगह हाई टेक है .. कंप्यूटर का ज़माना है .., , शिफारिशें नहीं चलती ! .. कोशिश करूंगा लेकिन कोई वायदा नहीं कर सकता ,,,! " --
   कह कर अफसर तेजी से मुडा और पर्दा उठा कर फिर बंगले में घुस गया !
            -  सभाजीत
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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

" लाइफ आफ्टर डैथ "



( मरणोपरांत जीवन )



'लाइफ आफ्टर डैथ ' एक रहष्यमय विषय है वर्षों से लोगों के लिए एक कोतुहल रह़ा है कि , मृत्यु के बाद क्या होता है ? हम कहाँ जाते है , क्या करते है , और क्या मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है ?



इस विषय पर पश्चिमी समाज में कई तर्क , कथाएँ प्रचिलित है रहस्यवादी शोधकर्ताओं ने ऐसे कई लोगों के इंटरव्यू लिए - जो कुछ समय के लिए मृत घोषित किये जा चुके थे करीब करीब सभी तथाकथित मृतकों का अनुभव एक जैसा ही सामने आया -एक लम्बी सुरंग की यात्रा , एक प्रकाश पुंज से साक्षात्कार , और फिर लाख टके का एक प्रश्न - " क्या तुमने अपने सभी काम पूर्ण कर लिए है - क्या तुम संतुष्ट हो ?" उत्तर अगर 'हाँ ' में हुआ तो निश्चित मृत्यु और अगर ' ना ' में हुआ तो पृथ्वी पर वापसी



भारत में हिन्दू धर्म में एक पूरा पुराण ही " लाइफ आफ्टर डैथ " के लिए लिख दिया गया है । प्रत्येक घर में - " गरुण " पुराण के रूप में , किसी मृत्यु के वाद इसका वाचन किया जाता है । पंडितों के अनुसार , पुनर्जन्म से बचने के लिए ' मोक्ष ' की कल्पना की गई है -और मोक्ष पाने के लए विधि -विधानों की । किसी मृत्यु के बाद यदि मृतक का कर्म नहीं हुआ , पिंड दान नहीं हुआ , 'प्रयाग' - 'गया' जाकर श्राद्ध नहीं किया गया , ब्राम्हणों को भर पेट भोजन नहीं दिया गया , तो मृतक मृयु क्र पश्चात भी इसी लोक में रहेगा -" भूत योनी " में । मरणोपरांत कोई भी नहीं चाहता की उसके परिजन भूत योनी का जीवन जियें , इसलिए सभी , अपनी हेसियत से बढ़ चढ़ कर इन कर्म कांडों को करते है ।





आर्य समाज के प्रवर्तक , स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक - " सत्यार्थ प्रकाश " इस विषय पर व्यापक चर्चा की है - जो सनातनी धर्मावलम्बियों को मंजूर नहीं है । मेरी पत्नीk घोर सनातनी है - वह इश्वर के कई स्वरूपों में विश्वास करती है - हर देवालय में माथा टेकती है - वर्ष के प्रत्येक तीज त्यौहार - बिना भूले चूके- कलेंडर देख कर मुहूर्त के अनुसार मनाती है । दिन भर वृत रहकर , शाम को विशेष व्यंजन -" फलाहारी " बना कर खाती है , जिसे खाने में मेरी भी रूचि रहती है । विवाह बेदी पार सात फेरे लेते समय मेने कुछ कसमें खाई थी जिनमें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की एक कसम भी शामिल थी । यह कसम गाहे बगाहे में पूरी करता रहता हूँ - उनके साथ - " कथा कीर्तन , धर्म व्याख्यानों में भाग लेकर ।
लिहाजा एक धार्मिक व्याख्यान माला में उनके साथ में भी गया । आयोजकों ने विशाल मंडप तैयार किया था । मंच फूलों से सजा था । स्त्री और पुरुष वर्गों के अलग अलग बैठने की व्यवस्था थी - ताकि धर्म के बीच स्त्री पुरुषों के बीच का प्रेम सिर ना उठा ले । मंच पर व्यास गद्दी थी और व्यास गद्दी पर , क्लीन शेव्ड , रेशमी भगवा वस्त्र धारी ,ललाट पर त्रिपुंड लगाए, गले में रुद्राक्ष धारण किये , उँगलियों में कई करामाती पथ्थरों की अंगूठियाँ पहने , गोर वरनी पुरुष विराज मान था । मंच के बाएँ और आर्केस्ट्रा था , जिसमें बांसुरी प्रमुख थी । ' संगीत, प्रकाश , और दवानी का अद्भुत करिश्मा व्याख्यान में घुल मिल गया , जिसे सुन कर सभी रस विभोर हो गए ।
कथा सुन कर जब वापिस घर आया तो मन बोझिल हो उठा मेने सोचा - मेने तो कुछ भी नहीं किया है - इह लोक और परलोक सुधारने के लिए मृत्यु के बाद चौरासी लाख योनियाँ मुंह बाए मेरा इंतज़ार कर रही है " कूकर - शूकर , जलचर- नभचर , कीट- पतंग , सभी तो बनना पडेगा फिर इन जन्मों के बीच एक टाइम स्लाट और भोगना पडेगा - " भूत - योनी " का - पीपल पर लटक कर , इस बात का इंतज़ार करना होगा की कब मेरे पुत्र गया जाकर मुझे मोक्ष दिलाएं मुझे अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं है वे बहुत ही आलसी और काम टालू प्रवत्ति के है
भरी मन से चुपचाप आँखें बंद कर के मैं लेट गया सोया ही था की अचानक एक बजे मेरी नींद खुल गयी घबरा कर उठ बैठा तो देखा कि एक व्यक्ति मेरे पलंग के पास , कुर्सी पर बैठा मुझे ताक रहा है मेरी पूरी तंद्रा भंग हो गयी उस आदमी को अपने शयन कक्ष में पाकर , मेने डरते हुए पूछा -
" भाई साहब !! आप कौन है और मेरे शयन कक्ष में इतनी रात में कैसे घुस आये ? "
जबाब में वह मुस्कराने लगा
मेने सोचा - जरुर ही यह चोर है पूरी गेंग होगी इसके बाकी साथी मेरे परिवार के अन्य कमरों में माल असबाब कि तलाशी कर रहे होंगे और यह मेरे ऊपर पहरेदारी करने के लिए बैठाया गया होगा मेने हिम्मत बाँध कर फिर पूछा -
" भैया !! कृपया मेरे सवाल का जबाब दें आप अन्दर मेरे कमरे में कैसे प्रवेश किये ?"
वह व्यक्ति गंभीर हो उठा मुझे ताकने लगा फिर धीरे से गहन आवाज़ में बोला -
" हम कहीं भी -जा सकते है हमारे ऊपर कोई बंधन नहीं है "
" भला कैसे ? बिना मेरी परमिशन के आप मेरे निजी शयन कक्ष में कैसे कर बैठ सकते है यह क़ानून विरुध्ध है "
उसने फिर मुझे ताका और ठंडी आवाज़ में बोला-
" क्यौकि हम 'हवा ' है हम 'मरे' हुए व्यक्ति है "
" मरे हुए ?? - यानी भूत ?? " - में सिहर उठा तो पुराण सही कहते है प्रमाण स्वरूप एक भूत मेरे कमरे में उपस्थित था मेने पूछा-
" भूत ?? तो आप भूत है ? "
जबाब में वह चुपचाप मेरी और एक टक देखता रहा फिर बोला -
" भूत तो जो व्यतीत हो गया वह 'समय' है , हम भूत नहीं "
"नहीं ? तो फिर क्या है ?"
" आत्मा !! सिर्फ आत्मा !! इश्वर का एक अविनाशी अंग !!"
" क्या आपका मोक्ष नहीं हुआ ?"क्या आपके पुत्रों ने आपका तर्पण , मोक्ष नहीं करवाया ? "
इस बार वह थोड़ा मुस्कराया फिर बोला -
" हमें मोक्ष कि आकांक्षा नहीं "
" मोक्ष की आकाक्षा नहीं - भला क्यों ? "
" क्योंकि हम मरणोपरांत जीवन जीने में विश्वाश करते है , हम मरणोपरांत जीवन जीने वाले लोग है "
" अजीब बात है !! आप जीवित रहते हुए भोग विलास से तृप्त नहीं हुए , जो मृत्यु उपरान्त भी जीवन चाहते है ? "
" भोग-विलास तो शरीर करता है आत्मा नहीं "
" यदि भोग - विलास नहीं चाहिए तो आप जीवन क्यों चाहते है ? "
" इसलिए की हम जीवित रहेंगे तो समाज भी जीवित रहेगा "
कैसी अजीब आत्मा है - मेने सोचा धर्म व्याख्यानों में तो मृतक के नाम पर कई कर्म कांडों और अच्छे भोजन की बात कही जाती है मृतक का दायित्व परिजनों तक सीमित रहता है और यह है कि मरने के बाद भी ' समाज ' के लिए बात किये जा रहा है मेने सोचा- बड़े काम की आत्मा है क्यों ना इससे मृत्यु उपरान्त जीवन का रहस्य पूछ लू। मेने पूछा -
" महोदय !! क्या मृत्यु उपरान्त भी जीवन होता है ? "
" जरुर !!- हम तो उसे जी ही रहें है "
" " क्या आप स्वेक्षा से उसे जी रहे है ? "
वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर उदास भाव से बोला -
" आप उसे स्वेक्षा या मज़बूरी कुछ भी कह सकते है "
" यदि मज़बूरी हो तो वह क्या हो सकती है ? " - मेने अब उससे चुटकी लेना शुरू कर दिया ।
"मृत्यु के उपरान्त भी हमारे ' नाम ' अभी संसार में जीवित है , लोग हमें याद रखे है । जब तक नाम जीवित है हम मर ही नहीं सकते ।
मृत्यु उपरान्त जीवन के रहस्य की कुछ परतें मेरे समक्ष खुलने लगी । मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी ।
" महोदय !! क्या में आपका वह नाम जान सकता हूँ जिसके कारण आप अभी भी संसार में विद्यमान है ? "
" नाम ?? कुछ भी कह सकते हो हमें क्योंकि हम नाम से ज्यादा , अपने काम के कारण जीवित है यह बात और है की यह पार्थिव दुनिया हमें अब सिर्फ नाम से ही जानती है ।" " मान लो की मैं 'शेलेन्द्र ' हूँ ! गीतकार शैलेन्द्र ! मेने कई गीत लिखे , लोग अभी भी गुनगुनाते है । मुझे याद करते है । इसलिए मेरा नाम मर नहीं रहा है । "
यह एक कड़वा सत्य था । शैलेन्द्र के गीत अमर थे । उन्होंने फ़िल्मी गीतों में साहित्यिक उपमाओं का सहज प्रयोग किया था । पहले एच , एम् वी, वालों ने अपने व्यवसाय हित में रिकार्ड बना कर , उन्हें बेच कर , गीतकार का नाम जीवित बनाए रखा , अब वे ही गीत यु ट्यूब पर फिर से चहक रहे थे । लोग भी उन गीतों को अभी भी गा रहे थे , भूल ही नहीं पा रहे थे ।
" आप से यह पाप कैसे हो गया महानुभाव ? लोग तो आज कुछ भी उलटा सीधा लिख देते है । धड़ल्ले से बिक जाता है - लोगों को यह याद भी नहीं रहता की गीतकार कौन है उसका नाम क्या है । "
" हम तो आदतन अच्छा लिखते रहे , चाहते तो भी सस्ता नहीं लिख सकते थे । फिर एसा पाप करने वाले तो बहुत लोग है । "
" यानी बहुत सी आत्माएं है जो अभी भी जीवित है ? "
" हाँ !! मिलना चाहोगे और लोगों से ? "
" लेखकों में भी हैं कोई ?"
" सभी वर्गों में है । जो मृत्यु उपरान्त जीवन जी रहे है , लेखकों में बहुत है । किससे बात करना चाहोगे ?- " शरत चन्द्र जी से करोगे ? '
" शरत चन्द्र ?? ' यानि बंगाल के प्रसिध्ध लेखक - । " क्या वे भी मरणोपरांत जीवित होंगे ? "
" क्यों ना होंगे ? उनका भी तो समाज से सरोकार रहा । सभी रचनाएं मर्मस्पर्शी , सभी कथाएं समाज के लिए । "
" एक बात बताएं "- मेने हिचकिचाते हुए पूछा - ' मरणोपरांत आप कहाँ निवास कर रहे है ? क्या पीपल पर - जैसा की पुरानो में कहा गया है ? "
" पीपल पर ??- " वह हंसा - " हम भला वहां क्यों निवास करेंगे ?? हम तो विभिन्न कई जगहों पर बस रहे है ."
" जैसे ?? "
" जैसे में गीतों में , शरत चन्द्र साहित्य में , गांधी भारतीय मानस में , विवेकानंद ज्ञान में , मुकेश गायकों में , राज कपूर अभिनय में ....."
" लम्बी फेहरिस्त है । मेने मन में सोचा । लकिन फिर एक प्रश्न मन में उठा -ये आज मुझसे मिलने मेरे शयन कक्ष में क्यों आये इन्हें मुझसे क्या सरोकार है ? प्रकट में पूछा -
" में बहुत कुछ जान गया हूँ । किन्तु एक बात नहीं समझ पाया । "
" क्या ? "
" यही की आप आज यहाँ मेरे शयन कक्ष में कैसे आये ? "
वे गंभीर हो गए । फिर धीरे से बोले -
" कुछ नहीं सिर्फ तुमसे मुलाक़ात करनी थी । "
" मुलाक़ात !! मुझसे ?? भला क्यों ? "
" क्योंकि देर सबेर तुम भी हमारे साथी बनोगे । हमारे साथ रहोगे । "
" आपके साथ क्यों ? मुझे मोक्ष नहीं मिलेगा क्या ? "
" मोक्ष तो होता ही नहीं । "
" मोक्ष नहीं होता ? पुराण , पंडित , कर्मकांडी कह रहे है की मोक्ष होता है ।"
" वे अपनी क्षुधा से मोक्ष पाने के लिए यह व्यवस्था बनाएं है , वरना मोक्ष तो होता नहीं । "
" तो क्या सभी जीवों को मृत्यु के पश्चात इस योनी , यानि आत्मा योनी में विचरना पड़ता है ? "
" नहीं "
" नहीं ?? " - " तो फिर हम आप ही क्यों विचरेंगे इस योनी में ? '
" क्योंकि हमें समाज की चिंता है ।"
" और जो समाज की चिंता नहीं करते ?'
" उनके लिए " चौरासी लाख योनी " का क्रम है ही । ' कीट-पतंग', शूकर - कूकर, जलचर- नभचर , ...."
में पेशोपेश में पड़ गया । मेने सोचा , इन्ही से पूछ लूँ , की मैं क्या करूँ ।
" मुझे बतलाएं की मैं क्या करूँ ? "
" यदि कीट- पतंग , शूकर कूकर बनना पसंद हो तो वही करो , जैसा दुनिया कहती है - " हल्का- फुल्का , मनोरंजक , विषयों पर विचार विनमय करो , लिखो । चौरासी लाख योनियों की यात्रा करो , भोग करो , जनन करो , बार बार मरो । "
" और यदि कीट पतंग नहीं बनना हो तो ? "
" तो अपना नाम जीवित रखो । मरणोपरांत जब तक तुम्हारा नाम जीवित रहेगा तुम भी रहोगे - हमारी तरह समाज के लिए साहित्य में समाये रहोगे सदा के लिए । "
एक और कुवां था तो दूसरी और खाई । कुँए से तो बाहर निकला जा सकता था , किसी प्यासे के द्वारा लटकाए गए घट को पकड़ कर बाहर आया जा सकता है , लकिन खाई से ? वह तो निगल ही जायेगी । मेने देखा वह व्यक्ति धीरे धीरे धुवां हो रहा था । मेने उससे कहा -
" एक आखरी बात ! मरणोपरांत जीवन का क्या यही अर्थ है । "
" हाँ , बिलकुल यही !! और कुछ भी नहीं । " - उसने ओझल होते हुए कहा ।
में बड बढाने लगा - में ' आत्मा योनी में रह लूंगा किन्तु लिखूंगा तो सिर्फ सामाजिक सरोकार के लिए । में किसी भी हालत में कीट पतंग नहीं बनना चाहूँगा ।"
तभी किसी ने मुझे झाझ्कोरना शुरू किया । उठ कर देखा तो पाया की पत्नी मुझे उठा रही है - " क्या बडबडा रहे हो ? उठो दिन निकल आया है - आज आवला नवमी है पंडित जी ने बत्ताया है की आज के दिन मुहूर्त पर पूजा करने पर सीधे मोक्ष मिलता है , मुझे मंदिर जाना है , चलो कार ड्राइव करो ।"
__________ सभाजीत शर्मा ' सौरभ'