शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

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,,,,,अमर,,,,

60 वर्ष पूर्व का नौगावँ याद आ रहा है ।

    तब नौगावँ कस्बा सांस्कृतिक रूप से बहुत धनी था लेकिन आधुनिकता से बहुत दूर । 

इस कस्बे की बसावट आस पास के नगरों के लिए कौतूहल थी । 132 चौराहे वाले इस कस्बे की करीब 40 किलोमीटर की चौड़ी सड़कों पर हर आधे किलोमीटर पर एक चौराहा था । सड़क के दोनों ओर पक्की चौड़ी नालियां थीं , जो  सुबह शाम , दोनों टाइम धुलती थी । अधिकतम घर एकमंजिला थे । 

        यह कस्बा चारों ओर से निकटवर्ती बड़े नगरों से आवागमन के मार्गों से जुड़ा था । छोटे से बाजार में जरूरत की सभी चीजें थीं । कुछ घरों में मोटर गाड़ियां भी थीं । और उनके लिए तत्कालीन ' बर्माशैल ' कम्पनी का एक पेट्रोल पंप भी ।  यह कस्बा सभी वर्गों और जातियों के लोगों का सामुदायिक निवास था । यहां पुलिस स्टेशन से ज्यादा मामले , कस्बे के प्रभावशाली व्यक्ति की दहलीज पर निबटते थे जिनकी रहवासी कोठी इस कस्बे की शान थी । 

       इस कस्बे में उस समय सेना के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर था जो बहुत बड़े क्षेत्र में फैला था । इस कस्बे में हवाईजहाज उतरने के लिए हवाई पट्टी थी । जिस पर यदा कदा  कस्बे की कोठी के मालिक मुन्नालाल एंड संस् के निजी हवाईजहाज अपने डैने फैलाये उतरते रहते थे । जब ही हवाई जहाज उतरता , कस्बे के लोगों की भीड़दौड़ते हुए  उसके दर्शन करने वहां पहुंच जाती । 

       इस छोटे से कस्बे में उस समय की  बड़ी महामारी के इलाज हेतु , टीबी अस्पताल था । जिसमें बड़ी बड़ी एक्सरमशीनें लगीं थी । चिकित्सा  के लिए सम्पन्न  प्राथमिक चिकित्सालय  भी था । यहां शराब बनाने की एक समृद्ध डिसलरी भी थी । 

         इस कस्बे में तत्कालीन विंध्यप्रदेश का हाई कोर्ट भी रहा , पीडब्ल्यूडी का अधीक्षणयंत्री कार्यालय भी , बड़ा पोस्ट आफिस भी और  मत्स्य विभाग का बड़ा कार्यालय भी ।

         यह कस्बा शिक्षण संस्थाओं का आकर्षक केंद्र रहा जहां तकनीकी शिक्षा हेतु पॉलिटेक्निक , प्राइमरी शिक्षा  हेतु उत्कृष्ट विद्यालय , सहकारी प्रशिक्षण का स्कूल , और सबसे महत्वपूर्ण हायर सेकेंडरी स्कूल भी था जहां से क्षात्र  आदर्श शिक्षा ग्रहण कर देश के हर कोने में नाम कमाने निकल जाते थे ।

           खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों का यह अनूठा केंद्र था । यहां के नागरिक  संस्कारित और धर्मपरायण  थे । यहां  टेनिस जैसा राजसी खेल भी प्रचलित था और सामूहिकता का प्रतीक हॉकी , बॉलीबॉल  भी । यहां की बालिकाओंऔर बालकों में बैडमिंटन भी बहुत लोकप्रिय था । 

           यहां का वार्षिक उत्सव रामलीला थी । 

खेल के लिए सुविधायुक्त कोर्ट भी थे । नगर में समृद्ध  एक पुस्तकालय भी था । 

   

             ऐसे समृद्ध , और संस्कारों के धनी नगर में प्रतिभाएं जन्म न लें ,यह तो हो ही नहीं सकता था । इसलिए  इस कस्बे में कई घरों में प्रतिभाओं ने जन्म लिया और उन्हीं में से एक प्रतिभा , नगर के शीर्षस्थ , प्रख्यात , और कानून के ज्ञाता  'श्री  जानकी प्रसाद सक्सेना ' के घर में जन्मी जिनका नाम माता पिता ने प्यार से ' अमर ' सिंह  रखा । सिंह की पदवी सम्भवतः उन्हें पारिवारिक रूप से अंग्रेजी शाशकों से मिली थी । 

         

            सब कुछ होने के बाद भी इस कस्बे में , सुगम  संगीत , और वादन की कोई परम्परा नहीं थी । अलबत्ता कुछ लोग बांसुरी पर राग रागनियां सीख कर , शास्त्रीय संगीत में निष्णात हो , बाहर निकल जगये थे । ताल वाद्य में तबले के जानकार जरूर थे किंतु वे भी महापंडित न थे । 

            अमर सिंह सक्सेना को भी संगीत में रुचि थी तो उन्हें घर में ही सितार सिखाने हेतु एक शिक्षक लगाया गया । घर में ही उन्होंने हारमोनियम पर उंगली चलाना सीखा और गाना भी । उनके घर के पीछे बने , बड़े मंदिर में एक व्यक्ति थे कालिका प्रसाद , जो उनके सितार के गुरु बने । बाद में नगर के सिध्दहस्त हारमोनियम वादक से उन्होंने हारमोनियम सीखा । स्वरों और रागों का थोड़ा ज्ञान उन्हें मिला तो सुरों की शुद्धता उनकी निधि बन गयी ।।

            लेकिन वे बंधे हुए हारमोनियम से सुरों से बंध कर ही नहीं रह गये । उन्हें सितार के तारों की मींड और स्ट्रोक ने ज्यादा आकर्षित  किया । उन्होंने जल्दी ही समझ लिया की संगीत का माधुर्य और विस्तार का अथाह समुद्र तो तारों के झंकृत होने पर है ।  हार्मोनी और सिम्फोनी में नहीं । 

             इसलिए वे तार वाद्य यंत्र के सहयात्री हो गये । और उन्होंने अपने मार्ग खुद ढूंढना शुरू कर दिए । 


              करीब 10 वर्ष की उम्र में , कक्षा 6 में , जब मैं उनके अनुज प्रताप सक्सेना का सहपाठी बना तब तक वे बेंजो नामक वाद्य यंत्र बजाने लगे थे ।  मैनें उन्हीं दिनों जाना कि वे संगीत समर्पित व्यक्ति हैं और पृयोग धर्मी भी  । सबसे बड़ी बात यह थी कि वहः विज्ञान के क्षात्र थे और हर विधा में विज्ञान का छोर पकड़ कर  तह तक जाने  से नहीं चूकते थे  ।

         वहः युग फिल्मी संगीत का स्वर्णयुग था । गीतों  में बहुत मधुरता होती थी और बोलों में जादू । उस समय शंकर जयकिशन , एसडी बर्मन , मदन  मोहन , जयदेव , ओपी नैय्यर,  नौशाद , की एक से एक मधुर धुनें अवतरित हो रहीं थीं जिसकी कम्पोजीशन तो अद्भुत होती ही थी , इंटरल्यूड तक गायन और वादन के योग्य होते थे । 

          बेंजो भारतीय वाद्य नहीं था । उसमें एक ही सुर पर ट्यून करकेँ छह तार लगते थे जिन्हें दाएं हाथ से स्प्लेक्टरम के माध्यम से झंकृत किया जाता था और बाएं हाथ से फिक्स की दबा कर धुन निकाली जाती थी । 

        

           प्रताप मुझ से करीब दस माह छोटे थे और अमर भाई मुझसे दो वर्ष बड़े ।  लिहाजा मैंने उन्हें ' भाईसाहब ' कह कर पुकारा ।

      

          एक संगीत शिक्षक का पुत्र होने के कारण संगीत भी मेरी घुट्टी में था तो मैं सहज ही अमर भाई साहब के वादन को गौर से नोटिस करने लगा ।


     मैनें देखा कि वे ' कुहू कुहू बोले कोयलिया ' जैसे शास्त्रीय संगीत आधार गीत की तानें बहुत निपुणता और शुद्धता से बजा रहे हैं तो मैं चमत्कृत हो गया ।


          किन्तु उनका मन अतृप्त था । फिल्मी संगीत में युगल गीत में स्त्री और पुरुष स्वर की पिच को वे वाद्य यंत्र पर उतार  लेने को व्यग्र थे तो उन्होंने बेंजो के सभी छहों तार हटा दिए और दो महीन तार और दो  मोटे तारों के सैट लगा कर बेंजो को अनोखा वाद्य बना   दिया ।


      मजे की बात थी कि अब मोटे तारों से  रफी साहब की  ध्वनि और पतले तारों में लता की गायकी की  धुन युगल गीत बन कर कानों में माधुर्य घोल रही थी   ।


        और हम बेंजो के इस नए रूप को देख कर  भौंचक्के थे साथ में अमर भाईसाहब की प्रयोगधर्मिता को देख कर भी ।


      ---सभाजीत


     

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  अमर भाईसाहब को बेंजो बजाते देख मेरे मन में भी बेंजो बजाने की अभिलाषा जगी । लेकिन बेंजो तो मेरे पास था  नहीं ।इसलिए मैं उसकी तलाश में जुट गया । 

उस युग में बेंजो भी कीमती वाद्य यंत्र था और बड़े शहरों में ही बिकता था ।  मैं जानता था कि मेरे पिताजी मुझे बेंजो खरीद कर तो कभी देंगें नहीं । कारण स्पष्ट था ,,,यद्यपि वे खुद एम म्यूज़ थे और लखनऊ में बाकायदा रतनजनकर की शिष्यता में शास्त्रीय संगीत सीखे थे किंतु संगीत को जीवकोपार्जन हेतु व्यवसाय बना कर नौकरी करने से वे असंतुष्ट थे ।  उनका मानना था कि कला और लक्ष्मी में छत्तीस का आंकड़ा है और तेजी से बदलते आर्थिक युग में कलाकार और कला को वहः स्टेटस  नहीं मिलता जो अन्य विषयों में सहज ही मिल जाता है । इसलिए संगीत की दुनिया में वे मुझे कदम रखने ही नहीं देना चाहते थे ।

        फिर भी उन दिनों वे व्यायज़ हायर सेकेंडरी स्कूल में ही संगीत शिक्षक थे और उनके आधीन संगीत का एक प्रकोष्ठ था जिसमें सभी वाद्य यंत्र उपलब्ध थे । 

            तो मैं स्कूल में ही एक दिन उनके उस प्रकोष्ठ में चला गया जहां एक बेंजो मैनें देखा । बेंजो देख कर मैनें जिद पकड़ ली कि वे मुझे बेंजो इशू करवा दें । लेकिन उन्होंने मुझे यह कह कर टाल दिया कि वहः खराब है । बाद में घर आकर फिर में जब जिद करने लगा तो उन्होंने साफ मना कर दिया ।

              कुछ ही दिनों बाद , जब मैं अपने एक सहपाठी रामनरेश के घर गया जो उस समय स्कूल के उप प्राचार्य के पद पर तैनात श्री गणेश सिंह के भतीजे थे , उनके घर में रामनरेश को उसी बेंजो से छेड़छाड़ करते देखा जिसे पिताजी ने मुझे इशू करने  से मना कर दिया था तो समझ गया की पिताजी ने मुझसे बचाने के लिएवहः बेंजो  वाइस प्रिंसिपल के भतीजे को इशू कर दिया था ।

                रामनरेश को संगीत से कोई रुचि नहीं थी । मेरे मांगने पर उसने वहः बेंजो मुझे दे दिया और में उसे घर ले आया । मैं उसे जब बजाने लगा तो मुझे देख कर पिताजी ने कुछ नहीं कहा ।

           अब बेंजो की प्रेरणा देने वाले अमर भाई साहब को देख  देख कर मैंने अथक रियाज़ शुरू किया और में उसे बखूबी बजाने लगा ।

           लेकिन अमर भाईसाहब के लिए तो बेंजो बहुत साधारण चीज  थी । वे तो सितार सीख कर कला में पारंगत हुए थे इसलिए वहः यात्रा मेरे लिए बिल्कुल वैसी ही थे जैसे एक बहुत कुशल पायलट आगे चल रहा हो और उसके बनाये रास्ते पर पीछे पीछे में दौड़ रहा हूं  ।

   

            कुछ ही दिनों में वे हायर सेकेंडरी पास करकेँ 1964 में छतरपुर महाराजा कालेज चले गये  । अब मैं पीछे अकेला रह गया । मैनें अमर भाईसाहब के  पदचिन्हों पर चलते हुए अपने बेंजो में भी खर्ज के दो मोटे तार लगाए और युगल गीत बजाने लगा । 

       

              तभी वे जब नौगावँ आये तो उन्होंने मुझे एक नया करिश्मा करकेँ दिखाया । उन्होंने बेंजो का कीबोर्ड निकाल दिया और पेन को तारों पर घसीट के एक गीत बजा कर दिखा दिया । बेंजो का यह नया पृयोग मेरे लिए अनोखा था किंतु यह बाज बहुत मधुर था । 


             उन्होंने ही बताया कि यह " हवाईयन गिटार " का बाज है । अब तक गिटार शब्द हम सबके लिए सर्वथा नया शब्द था । क्योंकि गिटार तो कभी रूबरू देखा नहीं था । फिल्मों में जरूर विश्वजीत एक्टर को उसे हाथों में ले कर उछलते कूदते देखा था । लेकिन यह बजता कैसे होगा यह हम लोग नहीं जानते थे ।


              इस बाज को सुनने के बाद मैनें रेडियो सीलोन की प्रातः कालीन सभा सुनना शुरू की जहां नियमित एक गीत गिटार पर बजता ही था । इसी सिलसिले में वादकों के नामों से भी परिचित हुआ ,,," वानशिपले" और एस हजारा सिंह " ,,। गीतों की मधुर धुनें सुन कर भी मेरे लिए यह पहेली ही बना रहा कि आखिर इसे बजाते कैसे हैं ।


            एक दिन जब मैं प्रताप से मिलने उसके घर गया तो प्रताप के  बाबूजी , यानी उनके पिताजी ने कहा --" सभाजीत  ,,! अमर एक गिटार ले आये हैं ,,जा कर देखो ,,!"

             तभी अमर भाईसाहब खुद अपने हाथों में एक वुडन गिटार लिए बाहर निकल आये । उन्होंने घुटनों पर उसे रख कर ,  दाएं हाथ में नेल्स पहन कर। बाएं हाथ से  स्टील के एक बार से बजाया तो अलग अलग स्ट्रिंग पर मींड में मचलता हवाईयन गिटार जैसे गाने लगा । 


            नौगावँ का  सम्भवतः वहः पहला गिटार था और अमर भाईसाहब पहले वादक । क्योंकि नौगावँ जैसे छोटे कस्बे में गिटार कभी बजा ही नहीं था । और शायद हम लोग  नौगावँ के वे पहले श्रोता  थे जिन्होंने रूबरू गिटार देखा था और जाना कि यह कैसे बजता है ।


             अमर भाईसाहब तो गिटार ले कर छतरपुर चले गये लेकिन मुझे फिर विचलित कर गये । 


                मेरे मन में गिटार के लिए लालच जगा गये और मुझे एक नया अभियान सौंप गये कि मैं गिटार तलाशूं,,।

                लेकिन जब मुझे बेंजो ही बड़ी जुगत से मिल पाया था तो अब गिटार कहां से पाऊं ,,?? 


              इसी बीच 1966 में हायर सेकेंडरी पास करकेँ मैं नौगावँ पॉलिटेक्निक में चला गया और प्रताप छतरपुर ,,,आगे के ग्रेजुएशन के लिए महाराजा कॉलिज में दाखिला लेने ।


                उधर भाईसाहब निरन्तर एक उत्कृष्ट गिटार वादक बनने के सोपान चढ़ रहे थे इधर नौगावँ में में गिटार जुगाड़ने की तलाश में भटकने लगा ।


                  जहां चाह वहां राह ,,,। मुझे भी 1967 में एक टूटा हुआ गिटार मिला जो दतिया से मुझे मेरे चाचा जी के  न्यायाधीश मित्र , श्री देवेंद्र जैन ने भिजवाया ।


           किन्तु अब वहः मौका नहीं था कि मैं अमर भाईसाहब को देख देख कर सीख सकूं ,,क्योंकि वे तो छतरपुर में थे और में उनसे 24 किलोमीटर दूर नौगावँ में ।

          और जब उन्हें , 1967 में अपने ही पोलटेक्निक कॉलिज के एनुअल फंक्शन में  मंच पर गिटार बजाते देखा तो स्तब्ध रह गया । वे अब वुडन गिटार नहीं ,,बल्कि स्व निर्मित इलेक्ट्रिक गिटार बजा रहे थे ।


            गीत था , मेरा साया फ़िल्म का , आशा भोंसले का गाया ,,," झुमका गिरा रे ,,," पूरे अंदाज़ में और बेस स्ट्रिंग ने  बीच में  जब पूछा ,," फिर क्या हुआ ,,?? "  


               तो पूरे हॉल में तालियां थमने का नाम न ली ।


          यह बाज तो बिल्कुल अलग था ,,,जिसके आगे वानशिपले और हजारा सिंह भी कहीं नहीं टिकते थे ।


               उन्होंने अब मुझे नई राह दिखा दी थी ,,की गिटार सिर्फ गाता ही नहीं बोलता भी है ,,बखूबी वैसा ही ,,जैसा गीत में कोई बोलता है ।


              मैनें भी ठान लिया ,,, अब ऐसा ही मैं भी बजाऊंगा,,।


    - ' सभाजीत ' 


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     प्रताप के छतरपुर चले जाने से , अमर दादा का विशाल घर और परिसर सूना ही हो गया । बाबूजी भी वकालत के लिए छतरपुर ही रहने लगे और परिवार भी वहीं रहने लगा । उन्होंने वहां एक बड़ा घर , रेस्टहाउस पहाड़ी के नीचे , मुख्य मार्ग पर ले लिया ।

       मेरे लिए भी पॉलिटेक्निक का नया वातावरण मिल गया और नए मित्र भी । इसलिए अब अमर भाईसाहब से और प्रताप से मिलने जुलने का क्रम शिथिल हो गया ।

       किन्तु वे कभी कभी इतवार को नौगावँ भी आ जाते थे और तब मैं उनसे मिलने का मौका नहीं चूकता था । इसीबीच एक दिन वे आये और  बोले कि तुम्हें छतरपुर के जलविहार मेले के कार्यक्रम में एक मुकेश का गीत गाना है । उनके हिसाब से मैं मुकेश के गीत ' ठीक ठाक ' गा लेता था । मैं सहर्ष मांन  गया । वे गिटार साथ लाये थे । उन्होंने कहा - ' रिदिम ' नहीं बजेगी ,,,तुम्हे मेरे हवाईयन गिटार के ' वेम्पस ' पर गाना पड़ेगा । मैं वहः भी मांन  गया  । ,,क्योंकि इस के अलावा मेरे पास चारा ही क्या था । हवाईयन गिटार पर " कॉर्ड्स " नहीं बजाए जा सकते । किन्तु सुरों के आधार पर , फ्रेट्स पर बार स्थिर रख कर वेम्पस देते हुए रिदिम देना सम्भव है ।  उन्होंने वेम्पस दिए ,,और मैनें गाया ,,' हरी भरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन । '' वे मुझे प्रेक्टिस करवा कर संतुष्ट हुए और फिर मैंने छतरपुर जा कर यह गीत गाया ।

        बिना तबले ,  के गिटार के रिदिम पर  यह गीत श्रोताओं को कुछ अलग हट कर ही लगा ।  लोगों ने तालियां बजाईं। लेकिन निश्चित था कि ये तालियां गिटार के वेम्पस के रिदिम के सर्वथा नए पृयोग के लिए थीं ।

         छतरपुर के इस नए घर में मैनें कुछ नईं चीजें देखी ,,जैसे एक रिकॉर्ड प्लेयर , कुछ एल पी रिकॉर्ड्स  , और एक नया स्पेनिश गिटार । 

          प्रताप  ने बताया कि अब भाईसाहब हवाईयन गिटार कम बजाते हैं ,,बल्कि स्पेनिश गिटार ज्यादा बजाते हैं । स्पेनिश गिटार तो पाश्च्यात संगीत की शास्त्रीयता और नियम कायदे से बंधा था  । उसके स्ट्रिंग की ट्यूनिंग भी अलग नियमान्तर्गत थी । उसमें फिल्मी धुनें बजाने का कोई स्कोप नहीं था । उसके कॉर्ड्स भी स्थापित थे जिसमें उंगलियों को सभी स्ट्रिंग्स पर , निश्चित  फ्रेट्स पर रख कर ही निकालना सम्भव था । तो भाईसाहब को इस विधा में क्या ऐसा दिखा की वे इस ओर मुड़ गये,,?? 

        इसका जवाब खुद भाईसाहब ने दिया । उन्होंने एक एल पी , रिकार्ड प्लेयर पर चढ़ाया और कहा --"  सुनो इसे ,,यह विश्व विख्यात गिटार वादक ' चैट एटकिन्स " है । जैसे भारत मे रविशंकर विख्यात हैं वैसे ही विदेश में यह व्यक्ति विख्यात है । स्पेनिश  गिटार एक पूर्ण समर्थ वाद्य  है ,, बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में सरोद या सितार । " 


           और सचमुच ,,जब मैनें वहः रिकार्ड सुना तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं । मुझे पहली बार यह समझ में आया कि पाश्चात्य संगीत में भी सौंदर्य है , मधुरता है , और शास्त्रीयता है । भाईसाहब ने बताया कि यह व्यक्ति स्प्लेक्टलम से गिटार नहीं बजा रहा है बल्कि हाथों की सभी उंगलियों और अंगूठे से सभी तारों को छेड़ रहा है और फ्रेट्स पर उसकी उंगलियां पानी की तरह चल रही हैं ।

           फिर उन्होंने वेंचर्स ग्रुप के कुछ रिकार्ड चढ़ाए जो उस समय पूरे देश में लोकप्रिय हो रहे थे । उसमें तो स्पेनिश गिटार का पूरा ग्रुप ही था ,,अद्भुत ।


           अब मुझे लगा कि और भी जहाँ हैं ,,इस जहाँ के आगे । अभी तक तो मैं फिल्मी धुनों और उसके हवाईयन गिटार पर वादन तक ही अटका था ,,लेकिन भाई साहब ने तो एक नई दुनिया के ही दर्शन करवा दिए थे ।


          मुझे याद आया कि पॉलिटेक्निक के मंच पर उन्होंने इलेक्ट्रिक गिटार बजाया था ,,तो क्या भाई साहब ने हवाईयन गिटार में  भी नया इलेक्ट्रिक गिटार  ले लिया ,,??  1967 में इलेक्ट्रिक गिटार खरीदना  और बजाना बहुत बड़ी बात थी । मैनें प्रताप से जब इस बारे में पूछा तो प्रताप हंसने लगा । उसने बताया कि यह अमर भाईसाहब की अपनी खोज और अपना पृयोग है । उनका गिटार वही पुराना वुडन गिटार है और कोई नया इलेक्ट्रिक गिटार नहीं खरीदा ।


     प्रताप ने बताया कि उन्होंने जब प्लेयर लिया तो उसी आधार पर उन्होंने कम्पन को विद्युत तरंगों में बदलने वाले प्लेयर के  एक नए पिकअप को अलग से खरीद लिया । जैसा हम सब लोगों ने पढ़ा है कि रिकार्ड पर चलते हुए , पिकअप में लगी निडिल में जो कम्पन पैदा होता है वहः इलेक्ट्रो मैग्नेट फील्ड के जरिये पिकआप विद्युत तरंग में बदल देता है ,,तो भाई साहब ने वुडन गिटार के ब्रिज पर  महिलाओं द्वारा बुनने के पृयोग में आने वाली ' क्रोशिया ' फंसाईं और उसके मुंह पर पिकअप फंसा दिया । इस तरह जो कम्पन तारों में हुआ वहः क्रोशिया के जरिये पिकप को मिला और पिकप से उन्होंने एमलीफ़ायर को जोड़ दिया ,,,तो बन गया ,," ' इलेक्ट्रिक गिटार ,,' !!


        सचमुच यह पृयोग अचंभित कर गया । विज्ञान तो हम सब पढ़ते हैं किंतु उसका इतना सार्थक पृयोग क्या कोई , कभी करता है ,,??  लेकिन भाई साहब तो बिरले निकले ।


          


           उधर ,,, स्पेनिश गिटार , हवाईयन गिटार जैसा सहज नहीं था । उसे सीखने के बाकायदा पश्चिमी संगीत के व्याकरण के बीच से गुजरना जरूरी था ।


       भाईसाहब तो कॉर्ड्स की बुक ही खरीद लाये थे । और स्टाफ नोटेशन को भी समझने की कोशिश कर रहे थे । मेरे लिए तो यह सब उपाय दुरूह थे ।


       दूसरे,,मेरे हाथ तो अभी तक हवाईयन गिटार ही नहीं आया था ,, स्पेनिश तो दूर की कौड़ी थी । यह वो समय था जब लोग स्पेनिश गिटार पर बजे ,, ' कम सेप्टेंबर ' धुन का जादू नहीं भूले थे और नृत्य में ' ट्विस्ट ' हर रईस घर का बच्चा करना शुरू कर दिया था । फिल्मों में आर डी बर्मन का पदार्पण हो चुका था , और तीसरी मंजिल फ़िल्म का ,," आजा आजा ,,में हूँ प्यार तेरा " का सुरीला इंटरल्यूड हर श्रोता के कानों में बस गया था । फ़िल्म के हर संगीत निर्देशक , यहां तक कि नौशाद भी अपनी धुनों में स्पेनिश गिटार बजवाना शुरू कर दिए थे  ।


         अब एक मुश्किल और भी थी ,,की भाई साहब नौगावँ से 24 किलो मीटर दूर हो चुके थे ,,अब उन्हें देख देख कर भी स्पेनिश गिटार सीखना सम्भव नहीं था ।


        तभी वे छतरपुर में बीएससी करने के बाद एम एस सी फिजिक्स से करने शहडोल चले गये ,,तो जो कभी कभी होना सम्भव था वहः बिल्कुल असम्भव हो गया ।


        इधर मेरी पढ़ाई भी कठिन ही थी । मैनें उस समय 1966 में , सबसे कठिन ट्रेड ' इलेक्ट्रिकल ' चुना था तो मेरे  पिताजी मुझे अधिक मेहनत के लिए आगाह करने लगे थे । वे भला मुझे गिटार क्यों ख़रीदवाते ,,?? 


   अलबत्ता मेरे आग्रह पर उन्होंने मुझे ' ताल ' सिखाना स्वीकार कर लिया । और मैनें तबले पर सभी ताल बजाने सीख लिए ।


       ऐसी स्थिति में आगे  मेरे काम आये मेरे चाचाजी  ,,'  गुणसागर सत्यार्थी ' जी । उन्होंने अपने मित्र श्री देवेंद्र जैन को कहा ,,,जो उस समय दतिया में  सिविल जज थे ।

उनके पास एक टूटा गिटार था जो कभी चाव से बजाने के लिए उन्होंने लखनऊ से खरीदा था । किंतु जज होने के कारण कभी सीख न पाए और वहः गिटार उखड़ गया था । उन्होंने कहा कि वे दतिया बस से उसे नौगावँ भिजवा देंगें ।


    अब हर शाम में बसस्टेंड जाता ,,बस कंडक्टर से पूछता ,,लेकिन गिटार का आगमन नहीं हुआ । हर दिन में उदास होकर एक गीत की पंक्तियां ,,," ये तमन्ना ही रही,, उनका पयाम आएगा ,," ,,यूँ गुनगुनाता ,,,' ये तमन्ना ही रही उनका गिटार आएगा ,,',,!!

  

          जब एक माह बीत गया तो  निराश होकर मैंने बस स्टैंड जाना बंद कर दिया । लेकिन एक शाम यूंही जब मैं शिवोम के घर गया जो पड़ोस में ही था तो देखा कि शिवोम उस प्रतीक्षित टूटे गिटार को एक कवर से निकाल कर देख रहा था । पूछने पर शिवोम ने बताया कि कोई कंडक्टर बस स्टैंड से आकर  दे गया है और बता गया है कि किन्हीं जज साहब ने दतिया से भेजा है ।

         

               उस टूटे गिटार को देख कर मुझे लगा ,,जैसे मुझे स्वर्ग मिल गया है । मैं शिवोम से वहः गिटार घर ले आया ,,और उसे जुडवाने  की जुगत में लग गया ।


                गिटार तो जुड़ गया ,,लेकिन मेरा गाइड और पायलट तो शहडोल जा चुका था । अब जो कुछ करना था मुझे मष्तिष्क में बसे उस अनुभव के आधार पर ही करना था जो भाई साहब को देख कर मिला था ।


---' सभाजीत '


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अमर भाईसाहब के शहडोल चले जाने के बाद , मुझे नौगावँ के सुगम सँगीत और फिल्मी संगीत का क्षेत्र खाली खाली लगने लगा । यद्यपि नौगावँ में  परम्परागत संगीत  की अविरल धार अभी उतनी ही सघन थी और उसका प्रभाव बढ़ रहा था । मेरे पिताजी श्री ज्ञान सागर शर्मा , शास्त्रीय संगीत के सुदृढ स्तम्भ थे । नगर के लोकप्रिय संगीतज्ञ , शिवोम के पिताजी श्री नारायणदास आहूजा जी भी संगीतज्ञ थे । और उन दिनों कीर्तन की विधा के उभरते कलाकारों में पी डब्ल्यू डी कार्यरत श्री एम पी मिश्रा जी की बहुत धूम थी ।  हर  त्योहार में , बड़े मंदिर में लोगों की भीड़ कीर्तन सुनने जुटती और मिश्रा जी , फिल्मों की नई नई धुनों पर कीर्तन करते । उनके साथ उनकी मंडली में " झींका " बजाने वाले जगदीश मास्साब  की मुद्राएं लोगों के आकर्षण का केंद्र होती ।

         लेकिन न जाने क्यों ,,मुझे यह संगीत आकर्षित ही नहीं करता था । में भाईसाहब द्वारा अपनाई गई  नइ लीक , सुगम संगीत  , फिल्मी संगीत , और वाद्य  वादन का मुरीद था । यह विडंबना ही थी कि नगर के  युवा गायक तो बनना चाहते थे किंतु वाद्य वादन के प्रति उनका कोई झुकाव नहीं था ।  यहां तक कि ताल वाद्य में भी किसी ने  जानकार होने की कोशिश नहीं की । उस समय मलखान सिंह ढोलक तो आकर्षक बजाते थे किंतु तबले जैसे परिपूर्ण ताल वाद्य से अनिभिज्ञ थे । और बिना तबले के फिल्मी संगीत या सुगम संगीत को दिशा देना सम्भव ही नहीं था ।

          जब मैं पॉलीटेक्निक के प्रथम वर्ष में था तो शिवोम के घर के बगल में , एक किराए के घर में रहता था , जिसका ऊपरी कमरा हमेशा खाली रहता था ।  उन्हीं दिनों मैनें उस खाली कमरे में सुगम संगीत की गोष्ठियां शुरू की । उस गोष्ठी में प्रदीप राव भी आते थे जो इसराज बजाते थे । वे तबले पर भी हाथ आजमा लेते थे और शायरी भी करते थे । वे प्रायः अपने स्वर में अपनी लिखी नज़्म पढ़ते । उधर शिवोम को भी " बोंगो ड्रम ' बजाने का चस्का लगा । यह चस्का उसे इसलिए लगा क्योंकि छतरपुर में महलों के निकट रहने वाले , दो चौरसिया भाई , विनोद और अशोक चौरसिया , संगीत सभाओं में जुगलबंदी में तबला और बोंगो बजाते थे , जो बहुत प्रभावी होता था  ।

       लेकिन मेरी तरह , शिवोम के पास भी ,,ललक तो थी किन्तु बोंगो ड्रम नहीं था । उन दिनों बोंगो कहीं मिलता भी नहीं था ,,सिर्फ कलकत्ता या मुम्बई जैसे महानगर को छोड़ कर , जहां से उसे लाना दुष्कर था । तो ,,शिवोम ने डालडा घी के दो छोटे और बड़े डिब्बे कटवाए और ढोलक की तरह नीचे  कुंदे लगवा कर रस्सी से ऊपर खाल मड़वा दी -- तो बन गया एक देशी बोंगो ,,!  -- अब प्रदीप ने और शिवोम ने तबले और बोंगों पर प्रेक्टिस शुरू की और जल्दी ही वे  तैयार भी होगये ,,चौरसिया ब्रदर्स को टक्कर देने । 


         मेरे पास भी गिटार आ ही गया था । किंतु मुझे रियाज़ की जरूरत थी । पिताजी का रुख यद्यपि थोड़ा नरम पड़ गया था किंतु इतना नरम भी नहीं कि मैं सब कुछ छोड़ कर संगीत साधना में लीन हो जाऊं । इसलिए मैनें प्रेक्टिस शुरू जरूर की , किन्तु रात में , उनके सो जाने के बाद ही , बाहर के कमरे में दरवाजा बंद करके दो बजे तक गिटार बजाता रहा ।

      अचेतन मन में तो , भाइसाहब को देख कर सीखा गिटार था ही ,, डी एन ए में विद्यमान मेरे अपने संगीत ने जल्दी ही मुझे पारंगत कर दिया । मैं बेस स्ट्रिंग , लीड स्ट्रिंग पर गीत बजाने के साथ साथ इंटरल्यूड्स भी बजाने लगा ।

         वे दिन सुगम संगीत और फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम दिन थे । छतरपुर जलविहार मेले में , कानपुर से दो युगल गायक ,,उषा और  राजेन्द्र परदेशी आते और अपनी आवाज़ की धूम मचा कर चले जाते ।तबले की संगत में एक अद्वितीय तबला वादक ,," हुक्मानी "  अलग से भारी फीस ले कर आता ,,लेकिन  वैसा तबला वादक दूर दूर  तक उपलब्ध नहीं था । वे अधिकतम नए  फिल्मी गीत गाते और साथ देते हुक्मानी ।  हुक्मानी हूबहू वही ठेका तबले पर बजाते जो फ़िल्म में , गीत में बजा होता ।  यह आश्चर्य का विषय था कि मात्र हारमोनियम , कण्ठस्वर , और तबले की थाप से सजी वहः महफ़िल , एक यादगार महफ़िल में तब्दील हो जाती और लीग  ' पिन ड्राप साइलेन्स ' के साथ वे मधुर गीत पुनः पुनः सुनने की शिफारिश करते। और पूरी रात यूंही गुजर जाती ।

    

       तो 1967 में ,  मेरे मन में भी एक साध जगी की मैं एक सुगम संगीत का दल बनाऊं । प्रदीप और शिवोम ताल वाद्य  के लिए तैयार हो चुके थे । उधर प्रदीप भी अपनी नॉकरी के फंड से किसी तरह एडवांस निकलवा कर एक सेकेण्ड हैंड  एकोर्डियन खरीद लाये ।  अब जरूरत थी गायक गायिकाओं की जो मंच पर राजेन्द्र परदेशी और उषा की तरह युगल गीत गा सकें । लेकिन ऐसे गायक गायक तो नौगावँ में मिलना सम्भव था ही नहीं ।

    

   हम लोगों ने मिलकर " अलंकार म्यूज़िक एशोषियेशन ' के नाम से दल बना लिया । मैनें हारमोनियम सम्हाला , प्रदीप ने तबला , शिवोम ने बोंगों ,।  हम लोगों ने वाद्य में गिटार और एकार्डियन  को जोड़ी बना लिया । प्रदीप  एकार्डियन पर , युगल गीतों में , लता की पंक्ति बजाते और मैं गिटार की बेस स्ट्रिंग पर मुकेश या रफी की गायजी पंक्ति । इंटरल्यूड हम मिलजुल कर आपस में बांट लेते ।

         लेकिन बिना गायकों के तो दल अधूरा ही था । गायक तो सहीत बोस के रूप में मिल गये किन्तु स्त्री कंठ का तो अभाव ही था । तब हम लोगों ने सोचा कि भले ही कोई बालिका ही दल में गाने लगे तो हम बच्चों के गीत गवा कर यह कमी पूरी कर लेंगें । 

        

          और हमारी यह साध पुरी की , आदरणीय चाचा जी की दो सुरीली बेटियों ,,साधना और अर्चना ने । वे बहुत मधुर गातीं थीं । तो हमने बच्चों के दो गीत ,, 'बच्चे मन के सच्चे ',,और  'बापू सुन ले ये पैगाम ,'  उनके कण्ठों में तैयार करवाये ।  


        सुगम संगीत में मुझे धुनें कम्पोज़ करने की ललक जगी । प्रदीप ने गीत लिखना शुरू किया और मैनें कम्पोज़ करना । जल्दी ही हमारे पास अपनी खुद की धुनों और गीतों का  बड़ा जखीरा तैयार हो गया । सहयोग से इस जखीरे की हर धुन मधुर बन गयी और गीत मनोहर ।  तो अब हमारे पास खुद का एक  सम्पूर्ण दल तैयार हो गया और हमने कार्यक्रम देना शुरू किया । 

    

           मुझे याद है जब , पहले कार्यक्रम में ,,  टीकमगढ़ में , मैदान में जुटी श्रोताओं के बीच ,  अर्चना की सुरीली आवाज ' बापू सुन ले ये पैगाम ' गूँजी तो चारों ओर लोग स्तब्ध रह गये । आवाज़ और गीत के बोलों ने लोगों की आंखें भिंगो दी । उधर सुहीत ने भी गाया - " चांदी की दीवार न तोड़ी ,,"  तो लोग झूम गये । हमारे स्व रचित गीत  " आँसू समझ के गम को पिये जा रहे हैं हम ,," ने भी समां बांध दिया । हमलोगों ने गिटार और एकार्डियन पर दो युगल  गीत बजाए ,," सावन का महीना " और " गाता रहे ,,मेरा दिल ,," ,,!!


          टीकमगढ़ के सफल कार्यक्रम ने हमारा हौसला बढ़ा दिया ।  फिर हमने कई कार्यक्रम दिए जिनमें अधिकतम आर्मी के आई टी बी पी ट्रेनिंग सेंटर के मंच पर आयोजित हुए । आईटीबीपी के कमांडेंट श्री रमेश अग्निहोत्री हमारे दल के बड़े प्रशंसक हो गये ।  उस मंच पर मैनें भी एसडी बर्मन का गाया गीत गाया ,,' मेरे साजन हैं उस पार,,',,।। अग्निहोत्रीजी उस गीत के मुरीद हो गये । वे कहीं अन्यत्र भी मंच पर मुझे देखते तो चिट भेज देते ,,,'  ' मेरे साजन हैं उस पार गाओ ,,सभाजीत ,,!!" !


         इसी सिलसिले में वहः दिन भी आया जब मुझे गिटार देने वाले चाचा जी देवेंद्र जैन ने पूरे दल के साथ सतना बुलवाया और हमने उनके दिए टूटे गिटार पर अच्छी हालत में गीत बजा कर सुनाए ।


           इस बीच यदा कदा  अमर भाईसाहब भी आते रहे और उन्हें यह देख कर खुशी होती कि मै गिटार बजाने लगा हूँ । अलबत्ता  मेरे पिताजी मेरी इस संगीत पार्टी से बहुत खुश नहीं थे । उन्हें चिंता सताती रहती थी कि इस संगीत पार्टी के चक्कर में , में अपना भविष्य न बिगाड़ लूं । क्योंकि उनकी एक ही साध थी कि मैं संगीतज्ञ नहीं ,,बल्कि एक इंजीनियर बनूँ ।


            और एकदिन जब अमर भाईसाहब नौगावँ आये तो पिताजी ने उनसे मेरी एक्टिविटीज को ले कर रुक्क्षता प्रकट की । अमर भाईसाहब थोड़ी देर सुने,, फिर बोले ,," मुझे नहीं मालूम की सभाजीत एक सफल इंजीनियर बन पाएगा कि नहीं ,, किन्तु वहः एक सफल कलाकार बन जायेगा ,,,इसकी में गारंटी देता हूँ ,,बशर्ते आप उसे भी  संगीत सिखा दें ,,। ,,जो जन्मजात। गुण हैं ,, उन्हें आप चाह कर भी  नहीं रोक पाएंगें । "


          बात साधारण थी किन्तु पिताजी को शायद घर कर गयी । उन्होंने मुझे  फिर संगीत के लिए रोका भी नहीं   किन्तु उन्होंने सिखाया भी नहीं । नतीजतन में शास्त्रीय संगीत में शून्य ही रह गया ।


              मैनें 1969 में डिप्लोमा पूरा किया और मुझे 1970 में  नौकरी मिल गयी तो मैं विद्युत मंडल में सबइंजीनियर बन कर बालाघाट चला गया और पीछे छोड़ गया संगीत की ,, आर्केस्ट्रा या सुगम संगीत की दुनिया ।


                     उधर अमर भाईसाहब भी भौतिकी से  एमएससी करकेँ पी एच डी रिसर्च करने सागर चले गये,,।

उन्होंने प्रारंभिक वर्षों में ' सेमी कंडक्टर ' पर रिसर्च की किन्तु बाद में उन्हें फेलोशिप में भाभा एटोमिक रिसर्च संस्थान के तत्वाधान में ' लेसर रे ' पर रिसर्च करने का ऑफर मिला तो वे पुनः नई रिसर्च के लिए मुम्बई चले गये  ।

        हम लोग 7 वर्षों के लिए एक दूसरे के जीवन से अनभिज्ञ रहे किन्तु फिर मौका आया और मेंने इन 7 वर्षों के बारे में पूरी जानकारी उनके बारे में ले ली । 


             वर्ष 1977 में कुछ साम्यतायों ने हमें समानांतर कर दिया ।


--' सभाजीत ' 


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    बालाघाट जाने पर  मेरे स्वप्न - विहंगों  को नया आकाश मिला । सतपुड़ा की गोद में बसे इस छोटे से नगर में पग पग पर बिखरी  , वन सुषमा ने मेरा मन मोह लिया । मेरा सौभाग्य था कि मेरा हेडक्वार्टर जिला मुख्यालय बालाघाट नगर  में ही बना दिया गया  । 

      1969 में ही , मेरे चाचा जी श्री गुणसागर सत्यार्थी जी ने , मेरी संगीत अभिरुचियों को देखते हुए ,  मेरे हाथों में मुझे एक नया उपहार  ,,नायलॉन स्ट्रिंग का एक  रशियन स्पेनिश गिटार थमा दिया था । इस गिटार जी आवाज़ बहुत मधुर थी । बेस स्ट्रिंग्स तो ऐसे बोलते थे जैसे सरोद की गमक हो । 

      में अपने साथ , फर्स्ट एपोइंटमेंट में ही , उसे ले कर बालाघाट गया । बालाघाट में शास्त्रीय संगीत का एक बड़ा विद्यालय था । इस विद्यालय में जिस के नाम से विद्यालय था  वही  एक कम वय का किशोर मुझे  सितार बजाते दिखा । यह बहुत प्रतिभावान युवा था । जितनी महारत उसे सितार पर प्राप्त थी  , उतनी ही महारत उसे वायलिन पर भी प्राप्त थी । तबले पर संगत के लिए , उसके छोटे भाई  भी उतने ही पारंगत थे । 

        जल्दी ही मैं उस परिवार में घुल मिल गया । बालाघाट में गिटार का कोई प्रचलन नहीं था । इसलिए मुझे उस संगीत समाज में विशेष महत्व मिला ।  मैनें देखा कि इस छोटे से नगर में नाट्य विधा भी अपने उत्कृष्ट स्तर पर विद्यमान थी । काव्य गोष्ठियां भी होती थी  जिसमें  नगर के कई प्रतिभाशाली कवि काव्य पाठ करते ।  जल्दी ही में इस नगर की मुख्य साहित्यिक एवम सांस्कृतिक धारा का अंग बन गया । 

        यहां आकर मुझे लगा कि नौगावँ में जो बहुत कुछ नहीं था ,, वो यहां बहुत कुछ था । नौगावँ में जिस संगीत की धारा को प्रवाहित करने के लिए मुझे विशेष यत्न करने पड़े थे वे यहां स्वयमेव विद्यमान थे । किंतु फिर भी यहां कलाकार बिखरे हुए थे , उनमें आपसी सामंजस्य नहीं था । इसी दौरान मेरी मित्रता नगर के एक युवा कवि ,,शरद श्रीवास्तव " से हुई  जिनके गीतों में महाकवि नीरज के भावों  जैसी कसक थी । ये गीत सुनकर मेरी धुन कम्पोजिंग की चाहत फिर जाग उठी । जल्द ही हम लोग एक दूसरे के पूरक हो गये  ,,। में धुन बनाता ,,वे गीत लिख देते ,,या फिर वे गीत लिखते में धुन बनाता ,,।  धीरे धीरे मेरे पास सुरबद्ध कई गीतों का खजाना बन गया । ये गीत सभी मनः स्थितियों के थे । फिल्मों के सर्वथा अनुकूल । तो अब हम इनका क्या करें ,,??  यह सवाल हमारे मन में कौंधा ।

          इसके निदान के लिए मैनें उपाय सोचा । मैनें एक स्पूल वाला टेपरिकार्डर खरीदा । एक छोटे छोटे दृश्य वाली स्क्रिप्ट  लिखी  । उसमें डायलॉग बुलवाए , रिकार्डिंग के वक्त ही  बैकग्राउंड संगीत डाला , और एक गीत कम्पोज़ कर के रिकार्ड किया ।  मुझे वहां मेरे मित्रों में फ्ल्यूट वादक , मेंडोलिन वादक , वायलिन वादक सहज ही मिल गये । दृश्य था ,,नायक के जन्म दिन का ,,और नायिका ने शरद के लिखे बोलों को इस प्रकार गाया ,,,," दिल दे रहा है ,,क्या क्या दुआएं ,,महफ़िल में दिलबर ,,कैसे बताएं ,,!! !  उन सीमित साधनों में भी गीत फैंटास्टिक रिकार्ड हुआ ।


            इस मेहनत का फल भी मुझे शीघ्र ही मिला । उनदिनों बालाघाट के निवासी श्री  मुकुंदभाई त्रिवेदी , नागपुर रह कर एक स्थानीय फ़िल्म " भादवाँ माता " बना रहे थे । वे बालाघाट आये तो हमने उन्हें अपना गीत और बैकग्राउंड संगीत सुनवाया । वे अपनी फिल्म के बैकग्राउंड संगीत हेतु किसी नए और सस्ते संगीतकार की तलाश में थे ,,तो उन्होंने प्रभावित होकर कहा ,,' ,आप तैयार  रहिए ,,मद्रास चलकर आप बैकग्राउंड तैयार करवाइए । अगली फिल्म में बुंदेलखंड की रीजनल फ़िल्म बनाऊंगा। ,,तब आपको फुलफ़्लेज संगीत निर्देशक बना दूंगा ,,!!" 

            शरद और मुझे लगा कि फ़िल्म जगत के रास्ते अब  हमारे लिए खुल चुके हैं और हम अपनी अगली उड़ान की कल्पना मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ के लिए करने लगे । किन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था । फ़िल्म प्रोसेसिंग और पोस्ट प्रोडक्शन के लिए मुकुंदभाई के पास पैसे ही नहीं बचे । फ़िल्म की शूटिंग क्वालिटी भी साधारण थी इसलिए किसी ने भी  पैसा लगाने से इनकार कर दिया और फ़िल्म डब्बे में चली गयी ।


          इन सब गतिवीधियों के बीच भी , में  नौगावँ से निरन्तर जुड़ा रहा ।  जिस अलंकार संगीत संघ को मैं अधर में छोड़ आया था उसे पीछे प्रदीप ने सम्हालने की कोशिश की । इस सिलसिले में मैने अपने इस ग्रुप को , गणेश पूजा कार्यक्रमों में , मंच पर कार्यक्रम देने आमंत्रित करवाया । बालाघाट मराठी संस्कृति का नगर था । वहां गणेश उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता था । इन्ही उत्सवों में एक गणेशोत्सव समिति ने आर्केस्ट्रा के रूप में नौगावँ के अलंकार म्यूजिक एसोशिएशन को बुलाया । प्रदीप दलबल सहित बालाघाट आये । 


           किन्तु संयोग ,, ,,की उस दिन घनघोर वर्षा हुई । पूरा मैदान जल से सराबोर हो गया । मंच भींग गया ,,। न जनता आ पाई ,,न कार्यक्रम हो पाया । दूसरे दिन फिर कार्यक्रम हुआ ,,,किन्तु उस भींगे भींगे समां में कोई मजा न आ पाया । ,

   ,' फिर याद कीजियेगा कभी ,,',, ,कह कर प्रदीप अपने दल को ले कर लौट गये । 


      बालाघाट में रहते हुए भी में नौगावँ से निरन्तर जुड़ा रहा । बीच बीच में जब भी आता ,,प्रदीप से , शिवोम से जरूर मिलता । एक चक्कर प्रताप के घर का भी लगाता और एक चक्कर आदरणीय चाचा जी ,,अवस्थी जी के घर का भी । 

           इस बीच छतरपुर में आकाशवाणी का केंद्र खुल गया । सारी साहित्यिक और संगीत की गतिवीधियों का आकाशवाणी केंद्र प्रश्रय दाता हो गया । तो नौगावँ की अपेक्षा  छतरपुर  अधिक महत्वपूर्ण हो गया ।


          जब भी नौगावँ आता ,,,प्रताप से भाईसाहब के बारे में खोज खबर लेता । प्रताप से ही पता चला कि भाईसाहब मुम्बई में हैं और अपने शोध के साथ साथ मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्रीज़ में अपना स्थान बनाने का प्रयास कर रहे हैं । अब तक भाईसाहब एक उत्कृष्ट स्पेनिश गिटार वादक बन चुके थे । वे मेरी अपेक्षा अधिक सक्षम संगीतज्ञ पहले ही थे । अब मुम्बई जा कर स्टाफ नोटेशन से गिटार बजाने में वे और अधिक  पारंगत हो चुके थे । सोने में सुहागा यह था कि उन्हें प्रख्यात बांसुरी वादक और फ़िल्म डिवीजन के संगीत निर्देशक श्री रघुनाथ सेठ का वरद हस्त प्राप्त था । निश्चित ही उनकी दुनिया अब मुम्बई में बसने वाले थी ,,चाहे वे भाभा एटॉमिक सेंटर के साइंटिस्ट बनते अथवा फ़िल्म इंडस्ट्रीज के उत्कृष्ट स्पेनिश गिटारिस्ट ,,दोनों ही स्थितियों में उनका भविष्य उज्ज्वल था ।  अब मुझ में और उनमें दो अंतर स्पष्ट थे ,,,- वे संगीत के एक विधिक जानकार थे ,,एक इंजीनियर की तरह और में अनुभव से सीखा  एक जानकार ,,एक कुशल मिस्त्री की तरह ।

    

             लेकिन दूसरा अंतर मेरे पक्ष में अधिक ।महत्वपूर्ण था । मैं धुनों का सृजक था और वे वादक । तो मुझे संतोष था कि मेरी संगीत की जानकारी विधिक न होने पर भी मेरे लिए तो उपयोगी ही थी । 


                  इसी श्रंखला में प्रदीप राव भी नौगावँ छोड़ कर मुम्बई जा पहुंचे ,,एक गीतकार के रूप में अपना भाग्य आजमाने ,,और शिवोम भी,,मेंडोलिन सीखने ।


               अब मुम्बई तो सबके लिए मंजिल थी । भाईसाहब के लिए भी , प्रदीप के लिए भी , शिवोम के लिए भी ।

                   और में और शरद तो एक स्वप्न देख ही रहे थे ,,मुम्बई के  लिए ।


                  किन्तु भाग्य हम सबके लिए अलग अलग रास्ते तय करने वाला था । और वे रास्ते तय होने वाले थे हमारे विवाहोत्तर जीवन के टर्निंग प्वाइंट्स से जो शीघ्र ही 1977 बन कर हमारे सामने आने वाला था ।


--' सभाजीत ' 


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नौगावँ से बाहर बालाघाट  प्रवास करते हुए मेरे  सात वर्ष यूँ व्यतीत हो  गये  जैसे  मात्र कुछ दिन ही बीते हों । इन वर्षों में मैं अपने स्वप्न सँजोता रहा और उन्हें मूर्तवत करने की राहें ढूंढता रहा । मैनें ठान लिया था कि जब तक वांछित मुकाम पर नहीं पँहुचूंगा  ,,एकाकी ही रहूंगा । 


        इसबीच देवेंद्र चाचाजी बालाघाट आये और अपना दिया हवाईयन  गिटार वापिस ले गये। में बिना हवाईयन गिटार बजाए नहीं रह सकता था , इसलिए मैनें कलकत्ता से बुक करवा कर डबलनेक गिटार खरीदा । अब मन पूरी तरह संतुष्ट हुआ कि जो स्वप्न नौगावँ में मैनें कभी  देखा था वहः अब जा कर  पूर्ण हुआ । 


          संगीत में सृजन की राह ने मुझे अलग ही दिशा में मोड़ दिया । बालाघाट के मेरे कुछ मित्रों ने , मुकुंदभाई त्रिवेदी से प्रेरणा ले कर , एक पूरी फीचर फिल्म  बालाघाट में ही बनाने की योजना बना डाली । इस अभियान में में केंद्र बिंदु बन गया । ।मुकुंदभाई ने सलाह दी कि हम लोग 16 एमएम फॉर्मेट में फ़िल्म बनाएं तो मेरे मित्र एक सेकेंडहैंड 16 एम एम कैमरे को जुगाड़ कर खरीद लाये । उससे जुड़ते ही मेरी दिशा फोटोग्राफी की ओर मुड़ गई और संगीत पार्श्व में चला गया । 


        अनन्त आकाश में उड़ने के लिए एक ओर जहां  मैं अपने पंख तौल रहा था ,,इधर नौगावँ में  मेरे माता पिता मुझे बंधन में बांधने की तैयारी में लगे थे । जैसा कि हर मध्यम वर्गीय परिवार में होता है ,,परिवार के बुजुर्गों में पौत्र को खिलाने की असीम इच्छा जाग उठती है । मेरी दादी अपने पड़पोते को देख कर ' स्वर्ग निसेनी " की तमन्ना करते करते जब स्वर्ग सिधार गईं तो मेरे माता पिता की व्यग्रता तीव्र हो गई । उन्होंने वर्ष 77 के शुरू होते ही विभिन्न कन्याओं के फोटो भेजने शुरू कर दिए । मैनें जब  विवाह के लिए स्पष्टतः मना कर दिया तो वे दुखी हो गये और कारण पूछने लगे  । 


            कमोबेश यही बात अमर भाईसाहब के साथ  घटित हुई । 1977 में वे मुम्बई में रिसर्च के अंतिम चरण में थे और  उन्हें एक वर्ष और लगना था । इस बीच फ़िल्म इंडस्ट्री के संगीत क्षेत्र में रघुनाथ सेठ के माध्यम से वे  अपनी पैठ बना चुके थे  । रघुनाथ सेठ ने उन्हें चार स्पेनिश गिटार का एक पूरा सेट  खरीदने की सलाह दी । रघुनाथ सेठ ने कहा कि यदि अमर भाईसाहब यह सेट खरीद लेते हैं तो मुम्बई में फ़िल्म इंडस्ट्री में  उन्हें शीर्षस्थ गिटारिस्ट होने से कोई नहीं रोक सकता ।  उन्हें अपने दोनों हाथों में लड्डू होने का सुखद एहसास होने लगा था । एक ओर ' लेज़र रे ' जैसे महत्वपूर्ण विषय पर महत्वपूर्ण उपलब्धि , दूसरी ओर उनके संगीत  के प्रिय साथी गिटार का  एक मुक्कमल मुकाम ।

        लेकिन तभी बाबूजी ( अमर भाईसाहब के पिताजी ) ने उन्हें अर्जेंट नौगावँ बुलाया और उन्हें विवाह बंधन में बंधने का आग्रह किया ।  अमर भाईसाहब अजीब असमंजस में पड़ गये । उन्होंने भी विवाह बंधन में   बंधने हेतु  अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी ।। उन्होंने एक वर्ष का समय मांगा किन्तु बाबूजी तो जैसे निर्णय  ही ले चुके थे कि इस वर्ष ही अब उनका विवाह  होगा । । 


         और अंत में बुजुर्गों  की  इच्छा के सामने हम दोनों को सिर झुकाना पड़ा । अमर भाई साहब का विवाह एक अंतराल में आगे पीछे  नवम्बर 77 में हुआ और मेरा दिसम्बर 77 में ।


            अमर भाईसाहब का तो नहीं पता लेकिन मेरे लिए मेरे माता पिता ने , बिलहरी निवासी एक पंडित जी से पूछा तो उन्होंने कहा मि यदि इनका विवाह 77 में नहीं हुआ तो ये सन्यास भी ले सकते हैं ।  मैनें जब स्पष्ट मना किया तो उन्होंने पंडितजी से एक ताबीज़ बनवाया । जब मैं 77 में ही रक्षाबंधन में घर नौगावँ आया तो राखी बंधने  के बाद मेरी माताजी ने वहः ताबीज़ मेरी भुजा पर यह कह कर बंधवा दिया कि यह तुम्हारा रक्षक है । 


         बाद में एक माह बाद जब उन्होंने एक फोटो भेजते हुए , मुझ से आग्रह किया कि मैं इलाहाबाद आकर कन्या देखने की रस्म तो कर दूं तो मेरे मित्रों ने सलाह दी कि देख आओ , कौन सा विवाह ही होने जा रहा है ,,निर्णय तो तुम्हें लेना है ,,कम से कम माता पिता का मन रह जायेगा तो मैं चला आया ।  समय बलवान था या ताबीज़ यह तो नहीं जानता किन्तु कन्या की मुंह दिखाई होते ही मेरी मां ने कन्या को और कन्या की मां ने मुझे अंगूठी पहनाते हुए सगाई पूर्ण होने की घोषणा कर दी और मैं मुंह बाए बैठा रहा गया  । 


           मजेदार बात यह भी हुई कि विवाह के बाद , इलाहाबाद से बरात के नौगावँ घर पँहुचते ही दूसरे दिन सुबह वहः ताबीज़ बांह से खुल कर कहीं  गिर  गया और पूरा घर खोज लेने पर भी नहीं मिला ।


बहरहाल ,,,,,,।।


**

           विवाह हम दोनों के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ । 

विवाह के छह माह बाद ही मेरा स्थानांतरण बालाघाट से लखनादौन हो गया और मुझे अपने सपनों के आकाश को छोड़ कर लखनादौन जाना पड़ा । फोटोग्राफी के नए शौक के कारण मैनें बालाघाट में स्टिल फोटोग्राफी का एक स्टूडियो बना डाला था । नौकरी के कारण ,  प्रकट में उसे में तो  चला नहीं सकता था इसलिए एक मित्र के पिताजी को उसमें बैठने को राजी कर लिया था । किंतु स्थानांतरण होते ही मेरे लिए वहः एक समस्या बन गया ।  उस स्थिति में मैनें अपने चचेरे भाई को चिरगावँ से बुलाया और चाबी उसे सौंप दी और फिर पलट कर उस ओर कभी नहीं देखा । 


     इसी तरह अमर भाईसाहब को भी अपनी रिसर्च अधूरी छोड़ कर नौगावँ वापिस  आना पड़ा । इस परिवर्तन में  उनका मुम्बई का वहः वृहत आकाश छूट गया  जिसमें वे अनन्त ऊंचाई तक उड़ान भर सकते थे ।  नौगावँ एक छोटी जगह थी जहां  संगीत के व्यवसायीकरण का कोई स्कोप नहीं था । उन्होंने जो रिसर्च की थी उसका उपयोग तो वैज्ञानिक के बतौर किसी बड़े संस्थान में नौकरी के अंतर्गत ही हो सकता था तो नौगावँ लौट के वे क्या कर सकते थे । ,,?? 


     फिर भी वे क्यों लौट आये यह बात उनको जानने समझने वालों  के लिए सवाल ही बनी रही । मैनें अपने बचपन से अमर भाईसाहब के बाबूजी को देखा था । वे मितभाषी किन्तु दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे । उनके जैसा ज्ञानी और वकालत में दक्ष कोई व्यक्ति क्षेत्र में तो क्या पूरे प्रदेश में  नहीं था । जब भी में प्रताप के घर जाता ,  बाहर पड़े तख्त पर बहुत से वकील उनसे  राय लेने को बैठे मिलते थे । अक्सर वे मेरे जाने पर , मुस्करा कर प्रताप को आवाज़  दे  कर बाहर बुला लेते या फिर मुझे अंदर जा कर प्रताप से मिल लेने को कह देते ।  प्रताप के बताए अनुसार बाबूजी  अपने युग के एक फ्रीडम फाइटर रह चुके थे । उन्होंने 1927 में बहुत छोटी उम्र में ही केमिकल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा कर लिया था । वे गणित के स्नातक थे और साथ ही उन्होंने लॉ भी कर लिया था । गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने अंग्रेजों की नॉकरी छोड़ दी थी और आजीवन फिर गांधी ने के अनुयायी रहे । 

           अपनी मेधाशक्ति से उन्होंने सफल वकालत की और सम्पत्ति भी अर्जित की । नौगावँ में उनकी गणना अग्रिम पंक्ति के लोगों में होती थी । उनकी दलीलें , लॉ के जनरल्स में दर्ज होती थीं और मिसाल की तरह उद्धत की जाती थीं । 

           अमर भाईसाहब को विज्ञान और संगीत में प्रति उन्मुख करने में उन्हीं का योगदान था । उन्होंने ही भाईसाहब को प्रारंभिक संगीत शिक्षा दिलवाने , घर में ही एक शिक्षक में रूप में व्यवस्था की थी  । यही नहीं , सागर और मुम्बई में रिसर्च करने हेतु उन्होंने ही भाईसाहब को उद्यत किया था । 

             तब जब भाईसाहब अपने अभियान में पूर्ण सफल हो गये  तो उन्हें तुरंत विवाह के लिए और नौगावँ वापिस लौटने को उन्होंने क्यों  जोर डाला,,यह  सवाल अनुत्तरित ही रहा । 

                 तब तो नहीं , बाद में प्रताप ने सम्भावित कारण  यह बताया की बाबूजी भाईसाहब को बहुत चाहते थे । भाईसाहब के नाम के पीछे सिंह शब्द लगाने का कारण कोई उपाधि नहीं बल्कि , प्रारंभिक  सन्तानों के मृत्यु के बाद , देर से भाईसाहब के जन्म होने पर , एक सिख डॉक्टर के कहने पर , रक्षात्मक भाव से सिख गुरु  के सिंह शब्द को लगाने की सलाह मांन  कर बाबूजी ने अमर नाम मे साथ सिंह शब्द जोड़ा । जब भाईसाहब जन्मे , तब बाबूजी 43 वर्ष पार कर चुके थे । इसलिए 72  वर्ष की उम्र में  आते आते वे अब पौत्र का मुख देखने को लालायित थे और कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे । वे चाहते थे कि उनकी अचल संपत्ति की देख रेख भी अमर भाईसाहब  नौगावँ रह कर  करें क्योंकि  इतनी सम्पत्ति के होते भाईसाहब उनसे दूर , परदेश  रहें यह उन्हें मंजूर नहीं था । 


             कोई भी कारण हो ,, पुत्र प्रेम , अथवा भावनात्मक आधार   ,,,इस निर्णय ने भाईसाहब की दिशा ही बदल दी ।। विवाह तो अवश्यम्भावी है ,,वहः समय पर होना निश्चित था ,,जो हुआ ,,किन्तु मुम्बई छोड़ कर नौगावँ लौट आना उनके हित में लिया निर्णय साबित नहीं हुआ ।


   किन्तु यह तो अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों की नियति ही है । बड़े पुत्र को अक्सर बुजुर्गों के निर्णय शिरोधार्य करने ही होते हैं ।  कई बार परिवार और माता पिता के सुख के लिए अपनी आकांक्षाओं को त्यागना ही पड़ता है ।


        और अमर भाईसाहब इसके अपवाद नहीं थे ।


--' -सभाजीत


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   लखनादौन, बालाघाट नगर की अपेक्षा  बहुत छोटा कस्बा था । किन्तु जबलपुर - सिवनी - नागपुर मार्ग पर स्थित होने के कारण एक  जीवंत कस्बा था । यहां से सागर जाने के लिए एक मार्ग फूटता था और एक मार्ग घँसौर जाने के लिए भी । 

        स्थान परिवर्तन के कारण , अब मुझे एकबार फिर अपरचितो के मध्य अपनी पहचान बनाने का नया काम जिम्मे आ गया । इस बार मेरे विभागीय कार्यशैली में भी  एक नया परिवर्तन आ गया था । अब मैं विद्युत वितरण के कार्य से हट कर  विद्युत लाइनों के निर्माण के उपसंभाग में आ गया था । यह मेरे लिए नई फील्ड तो नहीं थी ,,किन्तु इसमें मुझे अधिकतम गावों में होने वाले विस्तार कार्यों के निरीक्षण हेतु नगर से हट कर बाहरी स्थलों में ही रहना आवश्यक था । 

           किन्तु फिर भी जल्दी ही  मैनें उस  कस्बे में संगीत  प्रेमियों को ढूंढ निकाला ।  छोटा कस्बा होने के कारण वहां वाद्यवृंद और वादक तो नहीं थे किंतु गायक बहुत थे । वे लोग सप्ताह में , एक अलग कमरे में मिल कर बैठते और गज़लें और फिल्मी गीत गाते । 

             वे दिन चित्रा सिंह और जगजीतसिंह  के उभार के दिन थे । उनकी कोई नई ग़ज़ल आते ही लोग उस पर अपने अपने स्वरों में गाने हेतु पिल पड़ते । उन गायकों के समाज ने जल्दी ही प्रेमपूर्वक मुझे अपना लिया । वे मेरे डबलनेक गिटार वादन के कायल  हो गये  और जब कभी में उनके बीच उपस्थित न होता तो वे मुझे घर आ कर पकड़ ले जाते । मेरी पत्नी उस समय नौगावँ में ही , अपने सास ससुर के संरक्षण में रहीं क्योंकि वे मेरी प्रथम सन्तान को जन्म देने वाली थीं । 


           उधर , मुम्बई से वापिस ,नौगावँ लौट कर आने वाले अमर भाईसाहब ने भी अब अपनी अगली  पारी खेलने की कोशिश की । करीब दस वर्ष पूर्व नौगावँ छोड़ देने  वाले भाई साहब के लिए अब अपना ही गावँ अपरचित हो गया था । उनके युग के स्कूल के साथी तो कब के , अपने दाने पानी की तलाश में घोंसले छोड़ कर उड़ चुके थे । अब समान अधिकार से अंतरंग चर्चा करने वाला  उनका कोई सम वयस्क साथी नौगावँ में नहीं बचा था । अलबत्ता ,,संगीत के साथी के रूप में मुम्बई से मेंडोलिन सीख कर लौट शिवोम जरूर वहां उपलब्ध थे । प्रदीपराव भी लौट आये थे किंतु उनका एकोर्डियन खराब हो चुका था और वे एकोर्डियन बजाना छोड़ चुके थे । संगीत में एक ही बड़ी उपलब्धि नौगावँ को थी कि वहां  आदरणीय चाचाजी श्री रामरतन अवस्थी जी की सुरीली बेटी अर्चना अभी मौजूद थी । 

               वैसे छतरपुर में खुला आकाशवाणी केंद्र अब सभी रचनाकारों और संगीतकारों का आश्रय बन चुका था । युवा वाणी कार्यक्रम के तहत जहां क्षेत्रीय कलाकार अपनी गायन वादन  कला को प्रस्तुत करने लगे थे ।  वहीं इन्ही कलाकारों में छतरपुर के एक हरफन मौला कलाकार ,,सरदार मनोहर सिंह भी तेजी से उभर रहे  थे ।


             जमीनी सम्पदा की जिस देखरेख के लिए बाबूजी ने अमर भाईसाहब को बुलाया था वहः अब टेढी  खीर हो चुकी थी । चारों ओर बिखरी जमीन पर लोग अब अवैध कब्जा कर लिए थे जिसे हटाना आसान काम नहीं था । फौजदारी भाईसाहब कर नहीं सकते थे और अदालतों के मुकदमों में फैसले वर्षों तक होने वाले नहीं थे । 

              इसलिए उन्होंने अपने  प्रिय विषय संगीत को चुना और अलंकार्स ग्रुप के नाम से एक ग्रुप बनाया ।  उन्होंने संगीत के क्षेत्र में , नौगावँ - छतरपुर की दूरी को पाटने का संकल्प लिया और मनोहर सिंह को राजी किया कि वहः सभी वाद्य यंत्र खरीदे और ग्रुप में हुई आय से अपने वाद्ययंत्रों का किराया अलग से ले ले । मनोहर सिंह ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और जाज़ ड्रम सैट सहित सभी वाद्ययंत्र तथा साउंड सिस्टम को खरीद लिया ।

       

                 इस तरह एक अत्यंत सक्षम और मधुर आर्केस्ट्रा ग्रुप आनन फानन में तैयार हो गया । उन्होंने इस ग्रुप के संगीत निर्देशन का काम सम्हाला । वे परफेक्शन के पक्षधर धे । इसलिए उनके निर्देशन में सभी प्रस्तुतियां आकर्षक और मधुर बनीं ।  अलंकार्स ग्रुप ने जल्दी ही अपनी साख कायम कर ली ।  यह ग्रुप क्षेत्रीय कलाकारों का ग्रुप बना जिसमें नौगावँ  के कलाकार तो शामिल हुए ही ,,ड्रम वादक कामेश अवस्थी और उद्घोषक कुलदीप सक्सेना ने भी सतना से छतरपुर जा कर अपनी प्रतिभा दिखाई ।  इस वरूप में अर्चना अवस्थी की मधुर आवाज एक निधि थी ।  मुझसे 20 वर्ष छोटी मेरी सबसे छोटी बहिन मृदुला भी इसमें एक गायक सदस्य बनी ।करीब दो तीन वर्ष तक साथ रहने के बाद इस ग्रुप में मतभेदों के कारण बिखराव आ गया और यह ग्रुप विखंडित हो गया । 


             वर्ष 1979 के  सितंबर माह में मेरी बड़ी बेटी ने जन्म लिया । उसी वर्ष एक माह पहले ही  अगस्त 1979 में अमर भाईसाहब के घर में उनकी बड़ी बेटी ने जन्म लिया । यह संयोग ही था कि जिस एकमाह के अंतराल में हम लोगों का वर्ष 77 में विवाह हुआ था उसी एक माह के अंतराल में हमारे घर में हमारी पहली बेटियों ने जन्म लिया । आगे भी यही अंतराल बना रहा और मेरे यहाँ दो बेटियां और एक बेटे ने जन्म लिया और उनके घर में भी इसी क्रम में बेटियां और बेटा ,,तीन संतानें आईं ।


        बड़ी बेटी के जन्म के बाद , में अपनी पत्नी को भी लखनादौन ले गया । हम लोगों ने अपनी नई नवेली गृहस्थी बसाना शुरू किया । अब तक लखनादौन में मेरा वृहत परिचय लोगों से हो चुका था । बालाघाट में रहते हुए  एक व्यक्ति ने मुझे फ़िल्म लाइन का जानकार मानते हुए किरनापुर में अस्थाई टूरिंग टाकीज खोलने की इच्छा जाहिर की थी ।

           उन दिनों ही नागपुर में आज के प्रसिद्ध  फ़िल्म क्रिटिक श्री जयप्रकाश चौकसे ने सस्ती जनता टाकीज खोलने का बीड़ा उठाया था ।  वे फ़िल्म टाकीज और फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स के एकाधिकार के  विरुद्ध एक बहुत साहसिक लड़ाई लड़ने जा रहे थे । उन्होंने सुपर 8 एम एम के प्रोजेक्टर में एक ज़ूम लेंस लगा कर , 8×12 फ़ीट के स्क्रीन पर व्यावसायिक टाकीज के बराबर प्रोजेक्शन तैयार कर दिया था । इन प्रोजेक्टर्स में फ़िल्म प्रिंट भी सुपर 8 एम एम का लगता था जो सस्ता था  । तो जहां व्यावसायिक 35 एम एम की टाकीज 70 लाख में तैयार होती थी वहीं गावों में मात्र एक लाख में जनता टाकीज बनने लगी थी ।

         मैनें नागपुर जाकर चौकसे जी से बात की और तब किरनापुर में टाकीज खोलना तय हो गया । किन्तु बालाघाट से स्थानांतरण के बाद  वहः काम अधर में ही रह गया । अब लखनादौन में कुछ उत्साही लोगों ने जनता टाकीज खोलने का मन बनाया तो मैनें उन्हें सहयोग दिया ।

          लेकिन तभी फिर एकबार मेरे लखनादौन से सतना स्थानांतरण का आदेश मुझे थमा दिया गया तो मैनें विभाग में ही बागी बनने का निश्चय कर लिया । वहः आदेश 120 जूनियर इंजीनियर का एक मुश्त आदेश था । मैनें जम कर यूनियन बाजी की । पत्नी और शिशु बालिका को नौगावँ छोड़ा और जा कर जबलपुर में विभाग के विरुद्ध अपनी यूनियन के साथ डट गया । जिस अधिकारी ने आदेश पारित किया था उसके विरुद्ध कर्मचारियों को अनावश्यक सताने और नियमाविरुद्ध गलत मंशा से आदेश देने का  केस दायर कर दिया । यह लड़ाई तीन माह तक चली किन्तु मैं एक जुझारू नेता के रूप में अपने इंजीनियर बंधुओं के बीच  पूरे विभाग में प्रसिद्ध हो गया । बाद में कोर्ट ने  स्थानांतरण को नियोक्ता का अधिकार मानते हुए हमारी अपील खारिज करदी तो मुझे अंततः सतना आना ही पड़ा । लखनादौन केलोगों ने मुझे भावभीनी विदाई दी ।

              सतना आते ही मेरे कर्मचारी बंधुओं   ने मेरा फूलमालाओं से स्वागत किया । अब मैं पूरी तरह कामरेड बन गया था । बढ़ी हुई दाढी , कुर्ता और कंधे पर थैला लटका कर में विभाग के ओर छोर नाप चुका था । इसलिए सतना के अधिकारियों ने भी मुझे निंदक नियरे राखिए की नीति के अंतर्गत सतना में ही इंडस्ट्रियल एस्टेट के क्षेत्र का वितरण केंद्र कुलगवां थमा दिया ताकि मेरी गतिविधियां  उनकी निगाह में रहे  ।  अब घर से ही मेरी यूनियन गतिविधियां चलने लगीं । एक आया , एक गया ,,जैसे कई साथी अपनी समस्या लेकर आते और में उनका निवारण करता ,,उनके लिए अधिकारियों से जूझ जाता । प्रदेश स्तर में भी में सीडब्ल्यूसी का महत्वपूर्ण सदस्य था इसलिए बाहर से भी पत्राचार चलने लगा ।  इस आपा धापी में , मैं संगीत , फ़िल्म , फोटोग्राफी , गिटार सब  भूल गया । एकतरह से उन दिनों में संघर्ष शील हो गया ।


               अमर भाईसाहब भी उन्हीं दिनों। संघर्ष शील हो गये  थे ।  एक ओर जमीन जायदाद के केस , दूसरी ओर पारिवारिक दायित्व  और तीसरी ओर संगीत ग्रुप का बिखरजाना । तो उन्होंने भी फोटोग्राफी को व्यवसाय बना कर कैमरा उठा लिया ।   वे साधारण फोटोग्राफर तो थे नहीं । उनके लिए कैमरा डिवाइस नहीं बल्कि वैज्ञानिक उपकरण था । वे फोकल लेंथ , शटरस्पीड , एपर्चर , फ़िल्मस्पीड , डेप्थ ऑफ फील्ड , फ्रेमिंग के समीकरण में निष्णात थे तो उनकी खींची फोटो कुछ अलग हट कर क्लासिक ही होती थीं ।  उन्होंने अपने परिचितों के विवाह में व्यावसायिक हो कर फ़ोटो खींचने का काम किया । किन्तु व्यावसायिक मानसिकता और गुर तो उनमें था नहीं तो यह काम भी उन्होंने छोड़ दिया । वहः समय स्लाइड फोटोग्राफी और प्रोजेक्टर पर फ़ोटो दिखाने का था । कई बार यदि किसी की  स्लाइड वे खींच भी देते तो बिना प्रोजेक्टर तो वहः उपयोगी सिद्ध होती ही नहीं । दूसरे बिना स्टूडियो या शॉप के , फ्री लानसिंग फोटोग्राफी का युग नहीं था । मैगज़ीन फोटोग्राफी के लिए यदि वे उस समय ठान लेते तो दूसरे रघुराय वे जरूर होते । 


                  सतना में कामरेडी करते हुए मुझे एक दिन लगा कि मैं अपनी राह से भटक रहा हूँ । ईश्वर ने मुझे इस  काम के लिए नहीं भेजा है तो मैंने पुनः अपनी कलात्मक टीम ढूंढना शुरू किया और फिर एक बार उस ओर मुड़ गया । इस बीच मुझे यह भी भान हुआ कि बड़े होने के नाते मेरे अन्य भाई बहिनों के विवाह का कार्य भी मेरे कंधे पर है तो में उनके लिए सुयोग्य वर ढूंढने और उनके विवाह के अभियान में भी जुट गया ।


            भाईसाहब भी परिवार में बड़े थे ,,तो उन्हें भी यही भान हुआ और वे भी अपने परिवार के लिए इसी अभियान में जुट गए ।


                 इस बीच  हमारे बीच के कॉमन शौक गिटार को उन्होंने भी पार्श्व में रख दिया और मैनें भी । किन्तु मुझे फ़िल्म निर्माण हेतु एक अच्छी टीम मिल गयी तो मैं उसे भी साथ साथ करता चला गया जबकि वे फोटोग्राफी और संगीत से विरक्त होते चले गये  ।


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,," जीवन की संकरी गलियों में , 

   भटक न जाऊं कहीं अकेला ,,!!  " 


      बहुत पहले ,  क्षात्र जीवन में , ये पंक्तियां मैनें , एक गीत के मुखड़े के रूप में लिख दीं थी । उस उम्र में  भाव बोध तो था किंतु न तो जीवन की परिभाषा मालूम थी और न संकरी गलियों में भटकने का यथार्थ । 

      जब जीवनपथ पर चला तो शहर , गावँ , गली सभी  यथार्थ बन कर सामने आए ।  भाईसाहब के सामने यह यथार्थ प्रश्नचिन्ह  बन कर आया ।

       

          अपने प्रारंभिक जीवन में उन्हें कभी असुरक्षा का भाव नहीं जागा । वे एक ऐसे वटवृक्ष की छाया में थे जिसकी छाया के क्षीण होने की कल्पना वे कर ही नहीं सकते थे । किंतु वट वृक्षों की भी एक उम्र होती है , यह विचार वे कर ही नहीं सके । वे घर के बड़े सदस्य थे ।  उनके जिम्मे कई काम उनकी बाट जोह रहे थे जिनमें घर के शेष सदस्यों की शादी व्याह करना भी उनके जिम्मे थी ।  नौगावँ  वापिस लौटने के बाद  आठवर्षों के अन्तराल में उन्होंने  जुट कर अपना यह दायित्व निभाया । बहिन के विवाह के बाद उनके पिता बाबूजी का अस्वस्थता के कारण देहांत हो गया और उन्हें तब जमीनी कठोरता का सामना करना पड़ा । 

         उन्होंने लोगों की वहः स्वार्थपरिता देखी जो उनके पिता की भलमनसाहत के तले पनपी थी । उनके पास अचल संपत्ति थी लेकिन वहः एक कागज के टुकड़े से ज्यादा मूल्यवान नहीं थी  । जीवकोपार्जन हेतु  उन्हें वहः अचल संपत्ति कोई  नियमित धनोपार्जन में कोई सहायता नहीं दे सकती थी ।  लोगों ने जमीन को लावारिस समझ कर उस पर अवैध कब्जा कर लिया था । कब्जे हटवाने का अर्थ था ,,एक लंबी अदालती लड़ाई ,, जिसमें जिंदगी खप जाना निश्चित था ।  

          

          उधर उनकी अपनी खुद की गृहस्थी भी बड़ी हो रही थी । बच्चे बड़े हो रहे थे , उनके विद्यार्जन और उन्हें निश्चित दिशा देना भी उनके दायित्वों में  शुमार था । उन्हें यह भी लगा कि विवाहोपरांत वे अपने परिवार को वहः सब कुछ नहीं दे पाए थे जो उन्हें देना चाहिए था । 


      इसलिए उन्होंने सबकुछ छोड़ कर पहले एक नौकरी करना जरूरी समझा । कला के क्षेत्र से धन कमाने का प्रयास करकेँ वे देख चुके थे जो असफल सिद्ध हुआ था । अब नियमित जीवन के लिए नौकरी ही एक विकल्प था इसलिए उन्होंने छतरपुर में , एक क्रिश्चियन स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली । जो व्यक्ति भारत का एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक बनने  की क्षमता रखता था , जो  खुद एक  उत्कृष्ट संगीतज्ञ था , जो दूसरों के लिए आदर्श था , वहः जीवन की संकरी गलियों में फंस कर एक छोटी सी नॉकरी से समझौता  कर लिया था ।

        सतना , जैतवारा , नागौद , मैहर की गलियां छानते हुए , वर्ष 1989 में पदोन्नति पाकर ,,, प्रतिनियुक्ति पर मैं एक बार फिर नौगावँ पहुंचा । भाईसाहब उन दिनों नौगावँ में ही थे । वे प्रति रविवार मुझसे बात करने घर आ जाते या फिर में उनके पास पहुंच जाता । इस दौरान हम लोग गिटार से विरक्त हो चुके थे । मैनें तो गिटार बजाना बंद ही कर दिया था ,, उन्होंने  भी गिटार नहीं छुआ था । फिर भी बात संगीत की ही होती ।


           नौगावँ अब वहः नौगावँ नहीं रह गया था । में अपने पुराने साथियों को तलाशता तो या तो उनके पुत्र मिलते या फिर एक्का दुक्का वो लोग , जो निरन्तर मेहनत  करकेँ थक चुके थे । नौगावँ में विद्युत सोसाइटी षड्यंत्रों और भरस्टाचार का अड्डा बन गई थी । अपनी आदतों से मजबूर एक बार फिर में यहां भिड़ गया । लेकिन इस बार  मुझे उन लोगों से सामना करना पड़ा जो अपने थे और जो कभी सहपाठी भी रह चुके थे । इन विपरीत परिस्थितियों में मैं अपने निवेदन पर नौगावँ से स्थानांतरण ले कर रीवा जिले के दस्यु ग्रस्त क्षेत्र त्योंथर में आ गया । 

          मैनें उनदिनों अनुभव किया कि भाईसाहब विचिलित हैं । उनका संगीत क्षेत्र एकांत  हो गया था । शिवोम  वहां से दुर्ग रायपुर जा चुका था । मनोहर की छतरपुर में संगीत वतिविधियाँ शून्य थीं । वे धीरे धीरे खुद में सिमट रहे थे । किसी की परामर्श सुनना पसंद न करते ।  उनके पास विज्ञान का समुद्र था वे सबको बांटना चाहते थे लेकिन ग्रहण करने वालों  का उनके पास अभाव था । उनमें एक छटपटाहट थी ,,,किसी ऐसे व्यक्ति के साथी संगी की ,, जो उनकी रुचियों से सांझा कर सके लेकिन वैसा व्यक्ति उनके पास नहीं था ।


          त्योंथर आने के दो वर्षों बाद में रीवा आ गया और 12 वर्ष रीवा में  रहा । 2004 में स्थानांतरित हो मंडला गया और 2009 में रिटायर हो कर सतना में स्थित हो गया ।

 इस दौरान दो तीन बार नौगावँ जाना हुआ ।  भाईसाहब  कभी मिले ,,कभी नहीं मिले ।  असल में वे छतरपुर छोड़ कर इंदौर में एक स्कूल में एडमिनिस्ट्रेर के पद पर नौकरी करने चले गये  थे और वहीं रम  गये थे । अब फोन पर उनसे बीच बीच में वार्तालाप हो जाती थी । 

            इसी बीच  छोटी बेटी के विवाह के सिलसिले में  जबलपुर जाते हुए वे  मेरे यहाँ  रात में सतना   रुके ।  मेरी पत्नी ने उनके लिए पराठे बनाये तो उन्होंने बताया कि यह उनके लिए निषेध है । तेल घी उन्हें नुकसान कर रहा है और उन्हें आंतों में कष्ट होता है ,,खाना नहीं पचता । तो मेरी पत्नी ने उन्हें तुरंत गर्म रोटी बना कर खिलाई । उन्होंने हार्दिक खुशी जाहिर की और उन्हें आशीष दिया  । देर रात वे कई मुद्दों पर चर्चा करते रहे जिनमें उनके पारिवारिक मुद्दे भी शामिल रहे ।


             इस बीच वे मेरे फेसबुक मित्र बन गये ।  कई पोस्ट पर वे बेबाक टिप्पणी करते ।  मुद्दों पर तर्क वितर्क होता । तभी एक बार मुझे नौगावँ रामलीला कमेटी ने विगत में राम का अभिनय करने के सन्दर्भ में , सम्मानित करने बुलाया तो मैं रात में  प्रताप के घर रुका । संयोग से भाईसाहब भी वहीं थे । उस रात हमने एक बार कम्प्यूटर पर फिर चैट एटकिन्स को मिलकर सुना । भाइसाहब देर रात तक और अन्य कई विदेशी गिटारिस्टों के गिटार वादन को सुनवाते रहे ,,उनकी विशिष्टताओं की व्याख्या करते रहे ।  उन्हें बहुत दिनों बाद मैं मिला था तो उन्होंने मुझे बताने समझाने का कोई मौका न छोड़ा ।


          दो तीन वर्षों  बाद अचानक उन्होंने बताया की  उन्हें कैंसर डिटेक्ट हो गया है । किन्तु डरने की कोई बात नहीं वे ठीक हो जाएंगे । मुझे धक्का लगा किन्तु आशा  भी बंधी के वे ठीक हो ही जाएंगे । अब हम लोगों के बीच बातचीत की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई । में बीच बीच में उनकी खोज खबर लेने लगा । उन्होंने कहा कि डॉक्टर के कहने पर उन्होंने अपना गिटार झाड़ पोंछ कर निकाल लिया है । वे अब प्रफुल्लित रहने के लिए निरन्तर गिटार बजाएँगें तो मुझे  प्रसन्नता हुई और भय भी  जागा  कि डॉक्टर  ने ऐसा क्यों कहा ।


          अब जब भी वे फेसबुक में कोई संगीत की अथवा अपने बजाए गिटार की पोस्ट डालते  ,,तुरत फोन करके कहते कि सभाजीत इसे सुनो ,,और अपनी टिप्पणी दो । यदि मुझे एकाध दिन विलम्ब हो जाता तो वे इस बीच मुझे दो तीन बार याद दिलाते की मुझे तुम्हारी टिप्पणी का इंतज़ार है । बदलेमें में भी उन्हें अपने लिखे लेख भेजने लगा । देश की सामाजिक स्थिति से भी वे बहुत विचलित  होते तो फोन करके उन मुद्दों पर बात करते । 


             कैंसर उन्हें दिनों दिन ग्रस रहा था लेकिन अपने दर्द को वे किसी पर उजागर  नहीं होने दिए । वे मौका ढूंढते की अपने संचित ज्ञान विज्ञान को वे किस से शेयर करें  और वे किसे सौंपें । मेरे लेखों पर वे दिल खोल कर टिप्पणी करते । आडम्बरी देवी भक्तों पर लिखा ,," सिंहवाहिनी " लेख उन्हें बहुत पसंद आया । 


               एक बार मैनें उन्हें नारी विमर्श पर लिखा एक  लेख " सीता वनवास " भेजा । जब प्रतिक्रिया जानने को फोन लगाया तो मैनें देखा वे फोन पर सुबक रहे थे । रुंधे गले से वे बोले --' सभाजीत । में  इसे पढ़ते हुए  रो रहा हूँ । तुम कुछ देर बाद बात करना ।  

           

               में हतप्रभ रह गया । मुझे आश्चर्य लगा कि जो व्यक्ति कुछ वर्षों से कैंसर के भीषण दर्द को भीतर ही भीतर  झेल रहा है वहः मानवीय संवेदनाओं को झेलने में कितना असमर्थ है ,,??  


               पाँच वर्षों तक कैंसर झेलते हुए भी उन्होंने संगीत को अपनी श्रेष्ठ भेंट,,, गिटार वादन के रूप में  सौंपी । उनके पास  खुद का अच्छा गिटार नहीं था । उन्हें दूसरों के गिटार से संतोष करना पड़ा । किन्तु उन संकरी गलियों से गुजरते हुए भी भटके नहीं । उन्होंने संचित ज्ञान , विज्ञान , और कला को अविरल बहने दिया ,,दूसरों की प्यास बुझाने हेतु ।


                    सबको मालूम था कि उनका जाना निश्चित है किंतु सब चाहते थे कि वे न जाएं ।  उन्होंने भले ही कुछ कमाया नहीं किन्तु वे मुक्त हस्त से वहः सब बांट देना चाहते थे जो उन्होंने संचित किया था । दैव योग से में अपने कुटुंब का सबसे बड़ा पुत्र हूँ । लेकिन मैं फिर भी अपने से बड़े एक भाई को सदा ढूंढता रहा ताकि उससे कुछ ले सकूं ।  

                

                     अमर भाईसाहब मेरे अचेतन मन में भी सदा स्थित रहे ,,उसी बड़े भाई की तरह जो शायद मुझ  जैसा  ही था ।

         आज भी लगता है फोन आएगा ,,,और वे कहेंगें ,

  ,,,.  जल्दी से एक निवेदन सुन लो सभाजीत ,,! और फिर घण्टो बतियाएंगे , निर्देश की शैली में  अपनी बात कहते हुए  ,,!! " 


*********


            मध्यमवर्गीय परिवार में प्रतिभाएं जन्मती हैं  किंतु प्रारब्ध में अपने कंधों पर हजारों दायित्व लिए ।  उस पर भी घर के बड़े होने के नाते उनके हिस्से में  तथाकथित ' बड़प्पन ' हाथ आता है । वे इस बड़प्पन को निबाहते हुए अपने दर्द भी अपने से छोटों से शेयर करने से परहेज केरते हैं ।  विडम्बना यह भी है की  परिवार के बुजुर्गों और माता पिता को भी इन बड़ों से ही  उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति की आशा रहती है ।

             बड़े होने के नाते पुरुष को विवाहोपरांत कुछ वर्षों तक द्वंद में रहते हुए , एक हाथ में शेष परिवार का स्नेह , और एक हाथ में नवागत पत्नी का प्रेम , आकांक्षाएं सम्हाल कर , संतुलन के साथ एक पतली रस्सी पर चलना पड़ता है । यह रस्सी आर्थिक आधार की होती है जिस पर संतुलन रखे चलना सम्भव है । 

              लेकिन इस कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना बहुत बड़ी चुनोती है ।  इस परीक्षा में अक्सर खुद की आकांक्षाएं बलि भी चढ़ जाती हैं ।


               यह परिणीति दुखद है ,,किन्तु स्वाभाविक भी । मेरे मित्र शरद श्रीवास्तव ने लिखा है ,,


" ,,कैसा लगता न जाने ,,?? 

           किसी मे कंधे पर लद कर बड़े हुए ,

                  फिर हम पैरों पर खड़े हुए ,,!

                     अपने कंधे पर नया बोझ लदवाने,,।।


                   नयन की परिधि से बड़ा ,,

                             प्रश्नचिन्ह सम्मुख खड़ा ,,

                                  क्या जीने के नाम जिएंगे ,,

                                       बीता  क्रम दोहराने ,,??


                              

         और उत्तर खुद कवि ही देता है --


                       दिन रात धरा भी दोहराती,,

                                पर परिक्रिमा भी कर जाती,

                     काश धुरी पर मैं भी घूमूं ,

                           नया पृष्ठ जुड़वाने ,,।।


   और शायद यही जीवन है और यही नियति भी ।।


 - " सभाजीत " 


   !! इति !!



शनिवार, 5 सितंबर 2020

 देवदूत 

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जीवन में कुछ मित्र अचानक देवदूत बन कर हमें सीख दे  जाते है । क्या उन्हें ईश्वर भेजता है या वे अपने विवेक के कारण हमारी सहायता कर जाते हैं यह चिंतन का विषय है 

     1987 में , मेरी पोस्टिंग नागौद नगर वितरण केंद्र के अधिकारी के रूप में हुई ।

     नागौद में एक मैदान में , बसन्त पंचमी के अवसर पर एक साप्ताहिक मेला लगता था । इस मेले का आयोजन नगरपालिका नागौद के तत्वाधान में होता था । 

    मेला जनता के मनोरंजनार्थ लगता था लेकिन  नगरपालिका द्वारा संचालित होने के कारण उसकी कमेटी के पूरे सदस्य सरकारी थे , जिसमें तहसीलदार , सीएमओ, जेलर , थानेदार  , प्रमुख होते थे ।

      नागौद ठाकुर प्रधान बस्ती है । वहां अधिकतम परिहार ठाकुर रहते हैं । संयोगवश उन दिनों सीएमओ , आरआई , जेलर , थानेदार सभी ठाकुर वर्ग से थे । इस तरह मेला आयोजक समिति में  अधिकतम परिहार ठाकुरों का वर्चस्व था ।

    जहां बहुसंख्यक हों और पावर  हो वहां निरंकुशता जन्म लेती ही है । इसलिए इस मेले को जश्न की तरह मनाने के लिए अवैध धन उपार्जन का मार्ग ढूंढ ही लिया गया । मेला ग्राउंड  तो नगरपालिका ही था तो उसमें  कई साल पहले बे वजह स्ट्रीट लाइट के नाम पर नगरपालिका ने पूरे मैदान में खम्बे गड़वा लिए और मेले में लगने वाली समस्त दुकानों , खेल तमाशे वाले व्यवसायियों की  विद्युत व्यवस्था का जिम्मा खुद ले लिया । 

     नगरपालिका ,  विद्युतमण्डल को एक टेम्परेरी कनेक्शन   का आवेदन देती और एक  विद्युत मीटर मैदान के बाहर लग जाता जिसमें हो कर विद्युत सप्लाई मैदान में   नगरनिगम द्वारा बिछवाये गये स्ट्रीट लाइट के अंतर्जाल में फैल जाती और तब नगर निगम वाले उन तारों से हुक फंसाकर दुकानदारों को खुद बिजली देते जिसके रेट अपने अनुसार बसूलते । जैसे प्रति बल्ब / प्रति वाट्स / प्रति दिन । इस हिसाब से 60 वाट्स  के बल्ब का अगर एक दिन का किराया वे 50 रु0 लेते तो 100 वाट्स के बल्ब के लिए 100 रु0 प्रतिदिन ।

     

     विचित्र लीला थी । 

     

      मेरी पोस्टिंग से पहले हर वर्ष यह निर्विघ्न रूप से सरकारी चोले पहन कर खेली जा रही थी  । बिजली विभाग अपने मीटर में आई रीडिंग के आधार पर धार्मिक मेले के रेट से बिल ले लेता था जबकि अंदर के मैदान में लगी दुकानों को दस गुने रेट पर अवैध ढंग से बिजली मिलती । 

   वर्षों से हो रही इस सामूहिक लूट के विरोध की किसी ने कभी शिकायत नहीं की क्योंकि भय था कि उनकी मार पिटाई भी हो सकती है ।

     अब यह मेरा दुर्भाग्य था या उन आयोजकों का कि मेरी पोस्टिंग वहां हुई और मेला लगने का अवसर आ गया ।

      नगरपालिका वालों ने परम्परागत रूप से मेरे दफ्तर में मेले को विद्युत प्रदाय करने हेतु आवेदन दिया ।  उनके  जाने के बाद ही आठ दस दुकानदार आ गए । उन्होंने मेले की अंदरूनी लीला कथा बताते हुए हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया कि मैं उन लोगों को इस अवैध लूट से बचाऊं । मैनें पुराने रिकार्ड चैक किये  तो पाया की मीटर तो अक्सर जल गए थे और विभाग को कोई राशि मिली ही नहीं थी । जबकि दुकानदारों के हिसाब से 100 वाट्स के तीन बल्बों में आधार पर / सात दिनों की बिजली खपत की राशि 300×7 "= 2100 रुपये प्रति दुकान नगरपालिमका कर्मचारियों द्वारा डंडे के  जोर पर ली गई थी ।

    मैंने अनुमान लगाया कि मेले में तीस दुकानदार से प्रतिदिन 300 रुपये के आधार पर 9000 रुपया प्रतिदिन  वसूला गया तो आखिर यह कहां गया ,,?? ,,,

,,,क्या नगरपालिका ने अपने विकास कार्य में खर्च किया होगा ,,??? " 

   उत्तर में दुकानदारों ने बताया कि मेले के पीछे व्यवस्था हेतु लगे टेंट में , आयोजकों का देर रात तक जमावड़ा रहता था जिसमें निर्बाध शराब और मांसाहार का दौर  निरन्तर चलता था ।

      मैनें निश्चय किया कि यह कुचक्र में जरूर तोडूंगा । शायद ईश्वर ने मुझे इसीलिए यहां भेजा है । 

    मैनें दुकानदारों से कहा ,,आप अपने अपने कनेक्शन सीधे विद्युत मंडल से लो । आप लोग आवेदन करो ,,मैं आपको अपने विद्युत पोल से मीटर लगा कर कनेक्शन दूंगा । इस तरह आप अनाप शनाप हो रही लूट के शिकार नहीं बनोगे ।सब ने तुरन्त आवेदन दे दिए ।

       यह सीधा जंग ए एलान था । उन के विरुद्ध जो संगठित थे , सरकारी पावर में थे , किन्तु लुटेरे थे । अपने अवैध हित को अधिकार मानते हुए वे तुरन्त कार्यालय आये और मेज पर हाथ मारते हुए बोले --' मेले में जो वर्षों से चला आ रहा है वही होगा । आप अलग से दुकानदारों को कनेक्शन नहीं दे सकते !" 

      मैनें भी कमर कस ली । मैनें कहा -

,,,," बिजली वितरण मेरे विभाग का अधिकार है ,,आप का नहीं । में उन्हें जरूर  कनेक्शन दूंगा जिन के साथ अन्याय हो रहा है ! " 

    वे मुझे टेढी निगाहों से घूरते हुए यह कह कर चले गये ,,"  यहां हरिश्चंदयाई नहीं चलती ,,,,!! हमारे आड़े आओगे तो भुगतोगे ,,!" 

      और सचमुच मुझे भुगतना पड़ा । मेरे ऊपर जानलेवा आक्रमण हुआ और मैं मौत के मुंह में जाते हुए बचा ।

      न्याय और अन्याय की लम्बी लड़ाई शुरू हो चुकी थी । 

      शैतानों की नई नई फ़ौज उनके आक्रमण में प्रकट होना शुरू हुई तो देव दूतों की सौम्य मित्र श्रृंखला मेरे हित में ।

     कथा अभी खत्म नहीं ,, बल्कि शुरू हुई थी ।


(  क्रमशः ।)


  --' सभाजीत

---2---

वे मुझे धमकी दे कर चले गए ।

लेकिन मैनें निश्चय कर लिया ,,अब जो हो सो हो ,,यह जंग तो लड़ूंगा ही ,,।

   मैनें सभी दुकानदारों के आवेदन स्वीकृति के लिए मैहर सम्भागीय कार्यालय भेज दिए ।

     दूसरे दिन ही सम्भागीय यंत्री ने फोन पर मुझे तलब किया । शायद उन्हें भनक लग गई कि मैं  किसी परेशानी को बुलावा दे रहा हूँ ।उन्होंने कहा -" जब आज तक कोई इस पचड़े में नहीं पड़ा तो तुम क्यों पड़ रहे हो ?? वहां दादागिरी का साम्राज्य है ,,कुछ भी हो सकता है ,,जैसा चल रहा है चलने दो । " 

    लेकिन मेरी संघर्ष शील प्रवत्ति जाग चुकी थी । मैनें उन्हें बताया कि यह गरीब दुकानदारों से हो रही लूट ही नहीं है विभाग के राजस्व के प्रति डकैती है । में तो कनेक्शन दूंगा ही ,,चाहे आप सवीकृति दो या न दो ।

    सम्भागीय यंत्री जैन थे । स्वभाव से मूल्यों के संरक्षक ।

उन्होंने कहा -" ठीक है में स्वीकृति दे रहा हूँ मगर सम्हल कर रहना । " 

    लेकिन क्या दांतों के बीच रहते हुए  कोई सम्हल सकता था ?? 


      उसी शाम स्टाफ ने कनेक्शन करने शुरू कर दिए । दूसरे दिन सुबह उद्घाटन था । कोई स्थानीय मंत्री आने वाले थे ।

    उन दिनों ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का जमाना था । मेरे घर में टीवी था , जिसका एंटीना पताका की तरह मुहल्ले में सबसे ऊंचा था । चूंकि उस दिन कोई फ़िल्म आने वाली थी तो साफ दिखाई देने के कारण , मुहल्ले भर की महिलाएं मेरे यहाँ टीवी देखने आ जमीं ।

     आफिस से घर आया तो पहले कमरे में ही मजमा लगा देख कर लौट लिया । सोचा मेले ग्राउंड में हो रहे कनेक्शन देख लूं तो उधर ही चल पड़ा ।  रास्ते में एक व्यक्ति जो विद्युत ठेकेदार था और जो दुकानदारों के लिए टेस्ट रिपोर्ट देने वाला था ,  मिल गया और साथ हो लिया ।

    सूर्यास्त होने वाला था । तभी स्थल पर नगरपालिका के सीएम ओ अपने कुछ साथियों साथ रुक्ष मुद्रा में आये । 

   उन्होंने कहा -- आप हमारी ज़मीन पर किसी अन्य को , बिना मेरी परमीशन के  कनेक्शन नहीं दे सकते । दुकानदारों के कनेक्शन रोक दें ! " 

      में कहां मानने वाला था ,,! मैनें कहा सार्वजनिक मेला है ,आप भी अस्थाई कनेक्शन ले रहे हैं  दूसरे भी ले रहे हैं । आपने कौन सा भू अधिकार पत्र दिखाया है ,,? " 

    वे लोग नाराज़ हो कर मुझे घूरते हुए वापिस  चले गए । 

     मैनें ध्यान नहीं दिया । कनेक्शन होते रहे । सूर्य डूब गया और झुटपुटा हो गया ।

     तभी एक ओर से , अंधेरे में  कुछ लोग हाथों में डंडे और लोहे के रॉड  लिए उभरे । उन्होंने पास आकर कहा --

" न बे शर्मा ,,!  तोखऱ बतायदिये रहे कि बीच में टांग न अड़ा,, फिर भी तैं नइं मानीं ,,! 

    में कुछ समझता इससे पहले मेरी पीठ पर डंडे का जोरदार वार पड़ा । कुछ  सम्हलता ,,इससे पहले कंधे पर रॉड का दूसरा वार पड़ा । किसी ने मुझे ,,मां बहिन की भद्दी गाली देते हुए कमर पर जोरदार लात मारी । में बैलेंस न सम्हालपाने के कारण औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा । 

    अब मेरी छाती कमर पर जूतों के टो की मार पड़ने लगी और कंधे पर डंडे की । पैरों पर रॉड लगने लगा । 

     मुझे तब एक ही बात समझ में आ पाई की मुझ पर गुंडों ने प्राणघातक हमला कर दिया है । दिमाग ने कहा कि हर हालत में में सिर को बचाऊं वरना वहां चोट पड़ने पर सिर फुट जाएगा । 

    तो मैंने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को ढक लिया लेकिंन कब तक ढकता ,,?? 

    रॉड के एक प्रहार से हांथ कांप   गये ।

     दूसरा प्रहार होता उससे पहले कोई मेरे ऊपर मुझे ढकता हुआ लेट सा गया । 

ये ठेकेदार जैसवाल था । 

उसकी आवाज मुझे सुनाई दी कि " अब बस करो लाल साहब ! ये मर जायेगा तो बहुत दिक्कत हो जाएगी ।" 

    न जाने क्या हुआ कि वे लोग जैसवाल की बात सुन कर मुझे  गाली देते हुए एक ओर चले गये ।

     अब पूरी तरह अंधेरा हो चुका था । तभी जो लाइन मेंन  कनेक्शन कर रहे थे और जो मेरे ऊपर हमला होते ही भाग खड़े हुए थे उन्हें जाते देख कर छुपते छुपाते मेरे पास आ गये । 

    अब जैसवाल , और दो लाइनमैनों ने मिल कर मुझे उठाने की कोशिश की । मेरी शर्ट खून से भींग चुकी थी और कनपटी के थोड़े ऊपर हुए  घाव से खून बह कर मेरी पेंट भिंगोने की कोशिश कर रहा था । जैसवाल एक गलजन्दा साथ रखता था उसे उसने मेरे घाव पर कस कर बांध दिया ताकि खून न बहे । 

    लाइनमैनों ने लगभग मुझे टांग लिया और तेज डग बढाते मेरे आफिस की ओर चले । तभी मेरे एक साथी सहायक यंत्री पिकअप ले कर आ गए  । 

     किसी तरह हम लोग अस्पताल की ओर बढ़े तो किसी ने कहा। पहले थाना चलो ,,,सबसे पहले पोलिस रिपोर्ट लिखेगी तब एम एल सी होगी ।

       लिहाजा हम लोग थाने की ओर मुड़ गये । रास्ते में मेरे साथी यंत्री ने पूछा ," आप ठीक तो हैं न " ?? तो मैनें हां में सिर हिला दिया । 

     थाने पहुंच कर जैसे ही हम थाने के अंदर घुसे तो देखा --नगरपालिका के आर आई श्री सिंह अपने हाथ को थानेदार को दिखा कर मेरे विरुद्ध एक एफ आई आर लिखवा रहे थे कि मैनें चाकू से , मेला ग्राउंड में , उनकी हथेली पर वार किया है " !  उनकी हथेली थोड़ी सी कटी हुई थी जैसे खुद किसी ने अपनी हथेली को ब्लेड से काट लिया हो । " 

      अब एक एफ आई आर लिखी जा रही थी तो हमें चुपचाप इंतज़ार करने को कहा गया । 

     मुंशी को जैसे कोई जल्दी ही नहीं थी । वहः रुक रुक कर बार बार  सिंह से पूछ कर धीरे धीरे रिपोर्ट लिख रहा था जबकि वहः देख चुका था के मेरे कपड़े खून से सने हैं ।

     मेरे साथी यंत्री बिफर गये । उन्होंने थानेदार से कहा कि आप रिपोर्ट लिखो न लिखो ,,कोई बात नहीं ,,हमारा  साथी  खून से लथपथ है हम अस्पताल जा रहे हैं ,,,लेकिन याद रखो,,जिस बिजली के उजाले में तुम इनकी एफ आई आर तन्मयता से लिख रहे हो वहः एक घण्टे बाद बन्द हो जाएगी ।" 

     उन्होंने मिल कर मुझे उठाया और कमरे से बाहर निकल आये ।

     तभी थानेदार ने एक सिपाही को एक चिट लिख कर थमाते हुए कहा कि वहः हम लोगों के साथ अस्पताल जा कर एमएलसी करवा दी ।

     थानेदार की और मुंशी की नाम पट्टिका देख कर मुझे स्पष्ट हो गया कि ये सब सिंह हैं और सिंह की पहली एफआईआर लिखने का महती कर्तव्य  निर्वाह  रहे हैं ।

     मुझे मालूम था कि थानेदार महोदय भी तो मेला आयोजन समिति के सदस्य थे जो देर रात तक मेला ग्राउंड पीछे बने टेंट में जश्न का लुफ्त उठाते थे ।

  

       थाने से बाहर निकलते हुए मुझे एक हल्का चक्कर आया ,,लेकिन साथियों ने सम्हाल लिया और हम पिकप में बैठ कर अस्पताल की ओर चल दिये ।


  क्रमशः ,,,।

--3----


   आगे आगे मोटर साइकिल पर सिपाही और पीछे पीछे पिकअप में हम चार लोग अस्पताल की ओर चले ।

     जिस जैसवाल ठेकेदार ने मुझ पर लेट कर मेरी जान बचाई थी उसने थाने में आने से पहले ही हाथ जोड़ कर मुझ से विदाई ले ली थी । 

       उसने कहा था कि न जाने किस प्रेरणा से वहः मुझ पर अचानक लेट गया था और उसने हमलावरों को मना किया किन्तु अब आगे खुले रूप में वह वहां के ठाकुर समुदाय से विरोध मोल नहीं लेगा । उसने हाथ जोड़ कर मुझसे अनुनय की कि  एफ आई आर में में उसको गवाह न बनाऊं क्योंकि वह उन लोगों के विरुद्ध गवाही देने कोर्ट  नहीं आएगा और आ भी गया तो वहः कुछ भी देखने से इनकार कर देगा  ।

       बात मेरी समझ में आ गयी थी इसलिए मैनें उस रक्षाकर्ता को उसके अनुनय पर  गवाह के रूप में एफ आई आर में उल्लेखित न करने का मन बना लिया ।

     अस्पताल में जैसे डॉक्टर हम लोगों का इंतज़ार ही कर रहा था ।  अस्पताल छोटा था और उसके डॉक्टर सतना से अप डाउन करते थे । वार्ड खाली थे । सिर्फ कुछ ग्रामीण महिलाएं जो गावँ नही लौट सकती थी वे ही उन वार्डों में थीं ।

      डॉक्टर ने मुझे ओटी में लिटाया और अकेले ही मरहम पट्टी में जुट गया । मेरा चेहरा बहुत बुरी तरह सूज चुका था । उंगलियां सूज गई थी उठते बैठते नहीं बन रहा था ।

     डॉक्टर ने मेरी कनपटी का घाव देखा ,,उसने चिमटी से घाव में फंस गई बांस की पतली डंडियों को  निकाला । फिर गम्भीरत्ता से बोला - " बाल बाल बच गए शर्मा जी । कनपटी से आधा सूत ऊपर चोट लगी । दूसरी चोट  लगती तो आप स्थल पर ही मर सकते थे । " 

    उसने दवा लगा कर पट्टी बांधी और फिर बोला - "  इस चोट के अनुसार मुझे आपको अस्पताल में ही भर्ती कर लेना चाहिए । लेकिन मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप घर में ही आराम करें ।  यहां न रुकें । " 

   मैनें पूछा - " क्यों ,,? " 

   उसने धीरे से कहा - " यहां आपको खतरा है " 

  मैंने पूछा - " कैसा खतरा ,,?? " 

   उसने कहा --" जान का खतरा ।,,रात में आपको उठा कर  लोग ले जा सकते हैं ,,आपके साथ कुछ भी हो  सकता  है । "

    यहां पुलिस वाले एक सिपाही की ड्यूटी लगा देंगें । एक चौकीदार हमारे अस्पताल का भी रहता है लेकिन वहः किसी काम का नहीं ।

     पहले भी एक दो घटनाएं हो चुकी हैं ,,जो बाद में रफा दफा हो गईं !

   मैनें डाक्टर से नाम पूछा तो उसने बताया ,," राकेश शर्मा " !

    पट्टी बंधवा कर मैं व्हील चेयर पर बाहर आया तो डॉक्टर ने सिपाही को कहा ,,चोटें देख लीं है रिपोर्ट सुबह बना कर भिजवा दूंगा ।" 

       मैनें अपने साथी यंत्री से स्लाह ली उसने भी कहा - " घर में ही रहिए । वहां घर वाले साथ रहेंगे ही   ,,वहां दो लाइन स्टाफ भी रख देंगें ।  " 

       हमने घर में रहने का निश्चय किया और घर की ओर चल दिये ।

   रास्ते में ही मेरा दफ्तर पड़ता था । 

इस बीच मेरे ऊपर हुए आक्रमण की खबर सतना पहुंच चुकी थी ।

   मैं अपनी यूनियन का सर्किल सेक्रेट्री था । मैनें सतना की अन्य विभागीय यूनियनों से सम्बन्ध बना कर वृहत रैलियां निकाली  थीं । विभाग की अन्य यूनियन के पदाधिकारी मेरे आह्वान पर एक हो कर कई प्रदर्शन कर चुके थे ।

     सतना आने से पूर्व में विद्युत मंडल की सशक्त जे ई यूनियन का सी डब्ल्यू सी मेम्बर रह चुका था । नीतिगत निर्णयों में मेरी सलाह अहम हुआ करती थी ।

     एक समय था कि मैं कामरेड की तरह , दाढी बढ़ाये , झोला कंधे पर लटकाए,,आज यहां तो कल वहां घूमता था ।अपने साथियों के न्याय के लिए में किसी भी बड़े से बड़े अफसर से भिड़ जाया करता था ।

     लिहाजा जैसे ही खबर सतना पहुंची , मेरे साथी  सक्रिय हो गये। तुरन्त ही ज्ञापन बना ,,कलेक्टर , एसपी को सौंपा गया और नतीजा यह हुआ कि नागौद के पुलिस सर्किल इंस्पेक्टर को केस की रिपोर्ट देने को कहा गया ।

      जब मैं घर की ओर बढ़ा तो मेरे आफिस के पास ही सर्किल इंस्पेक्टर साहब और थानेदार खड़े मिले । अब उन्होंने हम लोगों से रिक्वेस्ट की की कृपया अपनी रिपोर्ट लिखवा दें ।

     लेकिन मेरी हालत खराब थी लिहाजा मैनें मना कर दिया । तब उन्होंने कहा कि अब थाना जाने की जरूरत नहीं ।आप अपने दफ्तर में ही बैठ कर तीपोर्ट लिख दें वही एफ आई आर मां ली जाएगी ।

      मैनें दफ्तर में बैठ कर उन सब लोगों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट की जो नगरपालिका के पदाधिकारी थे और जिन्होंने मुझ पर आक्रमण किया था ।

      दरअसल जब आर आई सिंह थाने में मेरे विरुद्ध रिपोर्ट लिखवा रहे थे तो उन्हें घेर कर वे सब लोग वहीं  खड़े थे जिन्होंने मुझ पर हमला किया था । मेरे साथी यंत्री ने साथ के लाइनमैन से उन सब के नाम कन्फर्म कर लिए थे जो अब नामजद रिपोर्ट में लिख गये ।

     रिपोर्ट लिखवा कर घर आये तो देखा सतना से मेरे माता पिता भाई वगैरह आ चुके थे ।

      घर जाते ही बिस्तर पर पड़ा तो निढाल हो गया ।

     तभी लोगों ने बताया कि युवराज नागौद मुझे देखने आए हैं ।

     युवराज नागौद एक अद्भुत गिटारिस्ट थे और मेरे संगीत रुचि के अभिन्न मित्र थे । में कभी भी उनकी गढ़ी में चला जाता था और हम दोनों की महफ़िल जुड़ जाती ।।

     उन्होंने मेरा सूजा हुआ मुंह देखा तो उनकी भृकुटी तन गई ।

चुपचाप बाहर आये और दरवाज़े पर खड़े हो कर अपने ही समाज को गालियां सुनाने लगे । वे बोले ,," ,में इस स्टेट का युवराज ,,,तुम सब को चैलेंज देता हूँ कि अब कोई मेरे दोस्त को हाथ लगा कर दिखाओ ,,,।

    तुम नहीं जानते यह संगीत का प्रेमी है,,और संगीत प्रेमी अपने भाई पर यह हमला में सहन  नहीं  करूंगा ।" 

     उन्होंने ऐसा क्यों कहा इसकी एक अलग कथा है । 

किंतु बाहर दहाड़ने के बाद वो फिर अंदर आये और मुझसे कहा ,,' किसी माई के लाल की अब हिम्मत नहीं जो इस तरफ  रुख करे  । " 

      उन के जाने के बाद में सो गया ।

  लेकिन असली सीन तो सुबह होने वाला था ।


क्रमशः

--4-- 

सुबह जल्दी आंख खुल गयी ।


   डॉक्टर के लगाए दर्द निरोधक इंजेक्शन का असर अब खत्म हो गया था । पूरे शरीर में भीषण दर्द था । न हाथ उठा रहा था न पैर । मुंह फूल कर कुप्पा हो गया था ।

    

   बिस्तर पर   आंखें मींचे चुपचाप पड़ा मैं सोचने लगा ,,क्या यह ठीक हुआ ,,??  मेरी दो बिटिया और एक बेटा था । सभी बहुत छोटे ।  मुझे उनके मासूम चेहरे दिखने लगे । और पत्नी भी । सोचने लगा अगर मुझे कल कुछ हो गया होता तो उनकी आज की सुबह कैसी होती ,,?? 

      मुझे अपने सम्भागीय यंत्री की कही हुई बात याद आने लगी ,," इतने दिन से सब चल रहा है ,,तुम क्यों इस पचड़े में पड़ रहे हो ,,?? "  

      सचमुच आदतन में  ही गलत हूँ  । मुझे क्या जरूरत थी दुकानदारों को अलग से कनेक्शन दिलवा कर विभाग के राजस्व को बचाने के लिए , दबंगों से भिड़ने की ,,?? यदि मैं मर जाता तो अनुकम्पा नियुक्ति पर मेरी पत्नी को क्या मिलता ,,?? एलडीसी की नॉकरी ,,?? या शायद न भी मिलती ।

     सोच कर मेरी आँखें गीलीं होने लगी तभी पत्नी गर्म पानी , पेस्ट , ब्रश ले कर आ गयी । उसने कहा हिम्मत करके मुंह खोलो और ब्रश करो । किसी तरह ब्रश किया और फिर आंखें बंद करके लेट गया । पत्नी अब चाय बना ले तो किसी तरह प्लेट में डाल कर एक एक घूँट पिया । कुछ खाने के लिए जबड़ा तो खुल ही नहीं रहा था ।

     पत्नी शायद मेरे मन की बात समझ गयी । बोली ,,

     " क्या सोच रहे हो ,,? " 

      " यही,,तुम लोगों के बारे में ,, अगर मुझे कुछ हो गया होता तो तुम्हारा और बच्चों का क्या होता ,,?? " 

       मेरी पत्नी बहुत ईश्वरवादी है ,,उसने मुस्कराते हुए कहा ,,

" होता कैसे,,??  आखिर हम सब का भाग्य भी तो जुड़ा है न तुमसे ,,? " 

      मुझे दिलासा मिली । निराशा ने दामन छोड़ा । मैं फिर सोचने लगा ,,आखिर ईश्वर तो है ही हमारे साथ,,वरना स्थल पर क्यों जैसवाल मेरे साथ होता ,,? ,क्यों वहः मुझे बचाता ,,?? क्यों मेरे साथ पिकअप में ले कर मेरे साथी यंत्री थाने तक जाते,,?? क्यों अस्पताल में डॉक्टर मुझे वार्न करता ,,?? , क्यों खुद पुलिस मुझसे रिक्वेस्ट करती की में एफआईआर लिखवाऊं ,,?? क्यों एक सह्रदय , संगीत प्रेमी , गिटारिस्ट , सौम्य व्यक्ति मुझे देखने आता ,,?? , और क्यों वहः दरवाजे पर खड़ा हो कर मेरी रक्षार्थ अपनी ही कौम को ललकारता ,,?? 

     सच में इस ' क्यों ' का कोई उत्तर नहीं था मेरे पास ,,! 

    

    तभी दरवाजे की घण्टी बजी और मेरे सतना के मित्र अवतरित हुए । इनमें सबसे अंतरंग मित्र थे श्री यू पी सिंह और विभागीय साथी श्री डी के शर्मा ।

     यूपी सिंह मुझे बड़ा भाई मानते थे । आते ही उन्होंने मेरे पैर छुए , फिर मेरी पत्नी के  ।फिर हंसते हुए बोले ,," क्या भैया ,,?? आपने मेरी नाक कटवा दी ! नाम ठाकुरों जैसा रखा है ,,' सभाजीत ' और खुद अपना सिर फुड़वा बैठे । अरे ,,,एकाध हाथ आप भी तो चलाते ,,!!" 

   मेरे क्लान्त मुख पर रौनक आ गयी । तभी डी के शर्मा ने कहा ,, तुम तैय्यारी कर लो , तुम्हें सतना जिला  अस्पताल रैफर कर दिया गया है ,, अब नागौद में नहीं रुकना है । "

     डी के शर्मा लिधौरा टीकमगढ़ निवासी थे और वे भी मेरे लिए बड़े भाई ही थे । एक वर्ष पूर्व वे नागौद में ही पोस्टिड थे । उन पर भी गावँ में एक विद्युत चोरी चेकिंग के दौरान हमला हुआ था और उन्होंने भाग कर जान बचाई थी । उन दिनों में सतना के औद्योगिक क्षेत्र के वितरण केंद्र का अधिकारी था । सम्भागीय यंत्री ने उनका ट्रांसफर मेरी जगह और मेरा सतना मुख्य शहर तत्काल प्रभाव से करके उन्हें राहत दी थी ।

      तभी  दरवाजे पर एक ट्रक के रुकने की आवाज़ आई । कुछ देर में ही मैहर शहर के अधिकारी श्री पी एल सिंह पूरे स्टाफ के साथ अंदर आ गये । वे मेरे परम् मित्रों में थे । हम लोगों ने मिल कर यूनियन में अपने साथियों की कई समस्याएं सुलझाएं थी ।

  उन्होंने आते ही कहा ,," में जानता हूँ ,,जिसने तुम पर हमला किया है ,,वहः मेरे ही गावँ का मेरा पट्टीदार है ,,लेकिन मैं उसे सजा दिलवाने में  सबसे आगे रहूंगा,,विश्वासः रखो  ।" 

     मेरा दफ्तर मेरे घर के पास ही था । स्टाफ मुझे देख कर वापिस लौट गया और थोड़ी देर में लाउडस्पीकर से आवाज सुनाई देने लगी ,,"प्रिय साथियों ,!,,,,,,,,!!,,,!!

   में समझ गया अब नेता गिरी और यूनियन बाजी शुरू हो चुकी है । 

    अब मैं खुद एक मुद्दा बन चुका था ,, लड़ाई का ,,,और लड़ाई शूरवीरों ने अपने हाथ ले ली है ।

     तभी सतना से ट्रक  भर कर तीन तीन यूनियनों के पदाधिकारी आ गए । किसी समय मैनें किसी मुद्दे पर सभी अलग अलग यूनियनों का एक संयुक्त मोर्चा बनाया था ,,वही संयुक्त मोर्चा रातों रात पुनर्जीवित हो गया था ।

   तब तक मैं तैयार हो चुका था । 

  तभी एक लाइन स्टाफ आया ,,,उसने बताया कि नगरपालिका के सामने भी एक टेंट गढ़ गया है । नगरपालिका वालों की यूनियन भी रैली निकाल कर एसडीएम को ज्ञापन देने जा रही है ।

    अब झूठ सच की घनघोर जंग छिड़ चुकी थी । 

 नगरनिगम वालों ने मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं नशे में धुत्त था ,, और मेले के दुकानदारों को तंग कर रहा था तो दुकानदारों ने क्रुद्ध हो कर मुझ पर आक्रमण कर दिया । तभी बिचारे नगरपालिका के आर आई साहब मुझे समझाने आये तो मैनें चाकू से उन पर वार कर दिया जिससे उनकी हथेली थोड़ी कट गई ।

       यह इल्जाम तो मैं थाने में ही अपने ऊपर लगते देख चुका था जब मैं खून से नहाया वहां बैठा था और मुंशी जी आर आई साहब की एफआईआर लिख रहे थे ।

     अब नगर निगम वालों की मांग थी कि मुझ जैसे दुर्दांत अपराधी को तुरन्त गिरिफ्तार करे । 

     इधर विद्युत मंडल की सभी यूनियन संयुक्त मोर्चा बना कर  श्री पी एल सिंह की अगुवाई में  रैली निकाल कर ज्ञापन सौंपने को तैयार हो चुकी थी और मांग कर रही थी कि आर आई सहित तीनों अपराधियों को तुरन्त गिरफ्तार करेन ,,,वरना अगला कदम ,,,नौगोद की बिजली बंद ।

    एम्बुलेंस आने में देर थी तो डी के शर्मा ने कहा कि तुम जीप के पिछले हिस्से में लंबे लेट कर तुरन्त निकल जाओ । जीप आ चुकी थी तो लोगों ने मुझे उठा कर किसी तरह जीप में लिटवा दिया और एक अलग शॉर्टकट से में नागौद के बाहर निकल आया ।

     एक अन्य वाहन में मेरे बच्चे , मेरी पत्नी , माता पिता वगैरह भी मेरे पीछे पीछे चले आये । मेरे आगे मोटर साइकिल पर सवार मेरे  मित्र , मेरे विभागीय साथी चल रहे थे और मेरी बरात जैसा यह काफिला , अपने पीछे नागौद में  लाउडस्पीकर युद्ध , ज्ञापन और रैलियों का हुड़दंग छोड कर सीधे जिला अस्पताल परिसर में आकर रुका ।

     मुझे स्ट्रेचर पर लादा गया और सीधे इमरजेंसी वार्ड में ले जा कर भर्ती करवाया दिया गया ।

  मुझे इस भागदौड़ में  सचमुच बेहोशी आ गयी ।

     इस तरह नागौद से तो निकल आया था ,,लेकिन नागौद की प्रतिछाया स्वरूप न्याय अन्याय की छाया अभी आगे इंतज़ार कर ही रही थी ।

      अस्पताल में कुछ डॉक्टर जो नागौद वालों के निकटस्थ हितैषी थे तत्काल मेरे सभी परीक्षण कर मुझे जल्द से जल्द डिस्चार्ज करवाने की जुगाड़ में लग गए,,, लेकिन एक कोई था,,,जो इनके मंसूबों पर पानी फेरने वाला था,,,और वो था सीएमओ ,,,"हक" ,,!

     

  क्रमशः,,।

,    ----4 ------

सतना का जिला अस्पताल मेरे लिए अपरिचित नहीं था । 

    यहां के  अधिकतम डॉक्टर मुझे जानते थे । मैं यहां पावर हाउस कॉलोनी में छह साल रहा था और सतना शहर का रेवेन्यू जे ई भी रह चुका था । 

       यहां के सभी डॉक्टर अंगद के पांव थे और उनका कभी तबादला नहीं होता था ।  उनके अपने क्लीनिक भी थे और जिले के प्रायः हर गावँ के मरीजों का इलाज करने के कारण हर जगह के रसूखदार लोगों से उनके सम्बंध रहते थे ।

    इसलिये इस अस्पताल के डॉक्टर  सदैव वही रहते थे ,,। 

बदलता था तो  हर एक दो साल में सीएमओ यानी मुख्य  जिला चिकित्सा अधिकारी । 

     और इस समय मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे ,,

   ,मि0 हक ।

    हक साहब का पूरा नाम मुझे नहीं मालूम था लेकिन बताते थे कि वे बेहद सख्त मिजाज , अनुशासन प्रिय , और ईमानदार आदमी थे । गलती होने पर वे किसी को बख़्शते नहीं थे और किसी भी बड़ी से बड़ी ताकत के आगे , झुकते  नहीं थे ।

      नागौद कांड की खबर सतना के लोकल अखबारों की खबर बन चुकी थी इसलिए हर डाक्टर को मालूम था कि पेशेंट सतना अस्पताल आ सकता है ।

     उधर नागौद से लोग आकर जुगाड़ लगा चुके थे कि पेशेंट को सामान्य इंज्युरी बता कर जल्द से जल्द छुटटी करवा दी जाए । 

      इसलिए मेरे अस्पताल में भरती होते ही डाक्टरों की टीम मुआयने पर जुट गई ।

      मेरे पैर , हाथ , सिर , छाती का एक्स रे लिया गया । आंख कान को टार्च से देखा गया कि कहीं खून जमा तो नहीं हुआ । बीपी नापा गया ।  मेरी सिर की पट्टी उतार कर घाव साफ किया गया ।

     तभी सीएमओ साहब भी आ ज्ञे । मैं आंखें मींचे परीक्षण करवा रहा था लेकिन कभी कभी अधखुली आंखों से देख भी लेता था ।

    सीएमओ साहब ने पूछा ,,,

     

 " हाउ डीप इस इंज्युरी ,,? " 

     

    " नथिंग  ग्रिवियस सर ,,!"  एक डॉक्टर ने तुरन्त कहा ।

    तभी   सिस्टर ने घाव पर से पट्टी हटा दी । स्टिचिंग देख कर हक साहब बिफर गए । जल्द बाजी में नागौद के डॉक्टर ने बेतरतीब स्टिचिंग कर दी थी 

 । सात टांके बोरे की तरह सिल दिए थे । उसमें से एक दो बांस के पतले रेशे उन्हें झांकते दिखे । 

     हक साहब सलीके से काम के हिमायती थे । उन्होंने पूछा --" हु स्टीच्चिड दिस ,,,? " 

      डॉक्टर्स इधर उधर देखने लगे तो किसी एक नए कहा ,," ये नागौद में ही स्टिच हुए । "

    हक साहब ने उस डॉक्टर की ओर देखते कहा ,," अभी ग्रिवियस नहीं है तो इस हालत में आगे ग्रिवियस हो जाएगा । इसे निगरानी चाहिए । इसकी घाव की पूरी सफाई करवाइए ,,रिस्टीच् करवाइए ,,।  कनपटी के पास की चोट है ,, केयर जरूरी है। ,,

   इतना कह कर वे चले गये

 । लेकिन उन डाक्टरों के मंसूबे टूट गए जो तीनदिन इलाज करके मुझे छुट्टी दिलाने के मूड में थे ।

     बाद में किसी ने बताया कि नागौद के डॉक्टर शर्मा को हक़ साहब ने गलती के लिए मेमो इशू कर दिया ,,क्योंकि वे गलती बख़्शते नहीं थे ।

     अब अस्पताल का ,,मैं खास मरीज हो चुका था ।  हर दिन , हर डॉक्टर आता ,, और चेकिंग के बाद फाइल में फाइंडिंग लिखता और फिर फाइल सीएमओ के पास निरीक्षण को जाती । 

     चोट के कारण , मुझे सिर में दर्द और भारीपन भी रहने लगा था ,,लिहाजा उपचार अब लम्बा हो गया था । 

     

     रैलियों, ज्ञापन, और भाषणों की जंग तो मैं नागौद में अपने पीछे  मैं छोड़  ही आया था सतना में अब अखबारी रिपोर्टिंग की जंग छिड़ी ।

सतना का प्रमुख दैनिक था ,,' देशबंधु । जिसके संवादाता नागौद के ही एक ठाकुर साहब थे । उन्होंने एक रिपोर्ट बना कर एडिटोरियल को भेज दी जिसमें नगरनिगम का झूठा  पक्ष हूबहू छप गया । 

    एक शराबी के रूप में स्थल पर झगड़ा करने वाले और दुकानदारों  से घूस मांगने वाले , और एक सन्त नगरपालिका अधिकारी पर चाकू से हमला करने वाले दुर्दांत  व्यति के रूप में , मेरी कीर्ति पताका पूरे क्षेत्र में फैल गई ।

    मेरे साथियों ने कुछ अन्य बाहरी अखबारों का सहारा ले कर इंदौर, जबलपुर , रीवा के अखबारों से रिपोर्ट छपवाई ,,,जो प्रतिउत्तर जैसा ही था । कुछ एक पेज के शहरी अखबार वाले भी आये और सवालिया कैप्शचन  लगा कर फ़ोटो सहित खबर छाप  दी ।

    नागौद में मेला शुरू हो चुका था और साथ ही मेरे विरुद्ध हुई एफआईआर पर इन्वेस्टिगेशन भी शुरू हो गई  ।। 

   डरे हुए दुकानदारों ने नगरनिगम की व्यवस्था स्वीकार करके , उन्ही से कनेक्शन ले लिए । 

   पुलिस इन्वेस्टिगेशन में इन डरे हुए दुकानदारों से झूठे बयान लिखवा लेना , नागौद पुलिस के लिए कठिन नहीं  था । 

  अखबार में मेरे विरुद्ध छप ही चुका था इसलिए जनमत को भी भृमित होने में कोई दिक्कत नहीं थी ।

  लगा कि अब सारी इन्वेस्टिगेशन  झूठ के पक्ष में जा कर मुझे अपराधी घोषित करवा देगी ।

   

        इस स्थिति में मेरे मित्र श्री डी के शर्मा ने अलग कदम उठाया ।  भोपाल में विधान सभा चल रही थी । वे टीकमगढ़ गये और  वहां के विधायक से विधान सभा में नागौद कांड का एक प्रश्न उठवा दिया । 

     प्रश्न के उत्तर में भोपाल से एक अलग इन्वेस्टीगेशन टीम आई ।उसने गुप्त रूप से घटना इंवेस्टिगेट की और सत्य उजागर करते हुए नगरनिगम के कर्मचारियों को दोषी ठहराते हुए रिपोर्ट भोपाल भेज दी ।

    नतीजा यह हुआ कि इन्वेस्टिगेशन सतना के एस पी ने नागौद थाने से हटा कर सतना थाने की टीम को दे दिया ।

     अब विद्युत विभाग की यूनियन ने मोर्चा सम्हाला । उन्होंने पूरे रीवा रीजन के विद्युत कर्मचारियों की रैली  आयोजित की जिसमें सीधी , शहडोल , रीवा , पन्ना , छतरपुर के कर्मचारी ट्रकों में भर कर आ गए ।

    सतना में विद्युत कर्मचारियों की अभूतपूर्व रैली निकली । जिसका एक छोर अस्पताल चौक पर था तो ,,, दूसरा छोर  पावर हाउस गेट पर ।

     ज्ञापनों से सतना ऐडमिनिस्ट्रेशन तो प्रभावित हुआ ही,,,विद्युतमण्डल का केंद्रीय एडमिनिस्ट्रेशन भी प्रभावित हुआ । अब एक के बाद एक उच्च अधिकारी जबलपुर से आने लगे और मेरी कैफियत और बयान लेने लगे ।

   लेकिन अस्पताल में नागौद हितैषी कुछ डॉक्टर अलग ही खिचड़ी पका रहे थे । वे मुझे प्रतिदिन चैकिंग  रिपोर्ट के आधार पर  स्वस्थ्य घोषित कर शीघ्र डिस्चार्ज करवा देना चाहते थे । नागौद के डाक्टर को मेमो मिल चुका था इस लिए गलत रिपोर्ट हेतु डर भी रहे थे ।

     मेरी अस्वस्थता  की खबर सुन कर दूर  दराज़ से मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे देखने आने लगे । जबलपुर के मेरे एक मित्र श्री वैश  मुझे देखने आए तो देर रात तक मेरे पास बैठ गए । वे लंबे ऊंचे कद के व्यक्ति थे और फर्राटेदार इंग्लिश बोलते थे । पहली। नज़र में वे कोई पुलिस के उच्च आफीसर लगते थे ।

  रात 11 बजे  वे बैठे थे तभी नर्स आई और मेरे सिरहाने रखी फाइल उठा ले गई  मुझे शंका हुई कि मेरी फाइल नष्ट न कर दी जाए तो मैनें वैश से कहा कि वे देखें फाइल कहां जा रही है ।

   वैश तेज कदमों से चल कर नर्स के पीछे पीछे गए जो डॉक्टर्स रूम में फाइल  दे  कर लौट गई । वैश तेजी से डॉक्टर्स रूम में घुसे जहां उन्होंने दो डाक्टरों को फाइल पलटते देखा । वैश ने सीधे उनसे अंग्रेजी में पूछा कि क्या वे आन ड्यूटी डॉक्टर्स हैं ,,?? और क्या पेशेंट को कोई नया प्रिस्क्रिप्शन देना चाहते हैं ,,?? 

    वैश  को देख कर वे उठ खड़े हुए । उन्हें लगा कि वैश कोई आफीसर है ।

   उन्होंने कहा कि वे ड्यूटी पर नहीं हैं किंतु अस्पताल के ही डॉक्टर हैं । यूंही देख रहे थे कि दवाइयां दे दी गईं हैं या नहीं । 

     उन्होंने घण्टी बजा कर दूसरी नर्स बुला कर फाइल यथा स्थान पहुंचाने को कहा ।

    लौटते में वैश ने ड्यूटी पर उपस्थित हैड नर्स को कहा कि यह केस खास है । फाइल सम्हाल कर रखें ।

     सुबह यह बात हक साहब को मालूम हो गई । उन्होंने फाइल बुला कर अपने चैंबर में अपनी कस्टडी में ले ली । उन्होंने व्हील चेयर पर मुझे वहीं अपने चैंबर में बुलाया फिर अन्य आक्टरों को वहीं बुलवा कर चैक करवा कर फाइल में उनसे स्थिति लिखवाई और डॉक्टरों को जाने दिया ।

     अब हक साहब ने मुझसे सीधे  पूछा ,,--" तुम्हारा प्रकरण क्या है ,,?? उन्होंने तुम्हारे ऊपर अटैक क्यों किया ,,?? " 

    मैनें उन्हें पूरी बात बताई ।

  वे चुपचाप मेरी बात सुनते रहे ।

  फिर फाइल पलट कर पीछे के प्रिस्क्रिप्शन देखने लगे ।

    तभी चैंबर के दूसरे पार्ट में रखे टेलीफोन की घण्टी बजी ।  

     किसी के अभिवादन के उत्तर में उन्होंने ' वालेकुम सलाम ' कहा । 

     उनकी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी । उन्होंने सामने वाले की बात का जवाब देते हुए कहा ,

    ," सांसद जी ।  अगर विश्वासः न हो तो आप अस्पताल आ जाये । ! खुद देखिए कि सिर पर डंडा पड़ने से कैसी चोट  लगती है और मुंह कैसा टेढ़ा हो जाता है । " 

    उधर से फिर कोई आवाज आई । तो थोड़ी देर ठहर कर उन्होंने कहा ,

  ," मुझे राजनीति से कोई लेना देना नहीं । में डॉक्टर हूँ और मुझे पता है कि कब किसी को भर्ती करना है और कब डिस्चार्ज " !

     इतना कह कर उन्होंने फोन बंद कर दिया ।

    वे तमतमाया चेहरा ले कर बाहर आये ।

   

   मैनें यूं दर्शाया की मैनें कुछ सुना नहीं ।

   तब उन्होंने फाइल अपनी कस्टडी में अलमारी में रखी और अटेंडेंट बुला कर व्हील चेयर पर मुझे वापिस बैड पर भेज दिया ।

 

    मेरा इलाज एक माह तक चला और में तभी डिस्चार्ज किया गया जब में पूर्णतः स्वस्थ्य हो गया ।

   

      मुझे डिस्चार्ज जल्दी  करने और  न करने का राज जब मुझे बाद में  पता चला तो मैं आश्चर्य में पड़ गया ।

--5---


 

  अस्पताल में इलाज के दौरान दो दो उल्लेखनीय उपलब्धि हुईं ।

    एक तो मेरा ट्रांसफर नागौद से मैहर हो गया दूसरे मेरी सबसे छोटी बेटी ' प्रभुता ' ने जन्म लिया । इलाज के अंतिम सप्ताह में,,मैं चलने फिरने योग्य हो गया था इसलिए प्रसूति वार्ड में भर्ती पत्नी को भी , अटेंड कर लिया ।

     इस एक माह में अस्पताल के सभी डॉक्टर , कर्मचारी मुझे जान चुके थे । बेटी ने जन्म के समय ही , गर्भ थैली का फ्लूइड इन्हेल कर लिया तो उसे सांस में दिक्कत होने लगी ।

     में उसे हाथों में उठा कर ,अस्पताल के ऊपरी भाग में बने चिल्ड्रन वार्ड में ले गया जहां चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर यादव के हाथों में सौंप दिया । डॉक्टर यादव मेरे शुभ चिंतकों और मित्रों में से एक थे । उन्होंने कहा - " चिंता न करो ,,इसे कुछ नहीं होगा । यह तो तुम्हारी रक्षक है । " 

 

      जल्दी ही अस्पताल से मेरी छुट्टी हो गई ।

      उधर मेरे और नगरनिगम  के लोगों के विरुद्ध , पुलिस ने दो अलग अलग केस बना कर नागौद लोवर कोर्ट में  चार्जशीट दायर कर दी ।

      इस तरह एक ही घटना के दो केस बने ,,जिसमें एक में ,,मैं मुजरिम था और दूसरे में सरकारी गवाह ।

     अस्पताल से छूटते ही मुझे मैहर में शिफ्ट होने की चिंता हुई ।

मैंने मैहर के पंजाबी मुहल्ले में एक मकान लिया और भाइयों से कहा कि। ट्रक में भरकर चुपचाप नागौद से सामान ला कर मैहर शिफ्ट कर दें ।

     मकान में प्रवेश करने से पहले मैं सपरिवार शारदा मां के मंदिर में  मां  के सामने गया । आंख मूंद कर मैंने उनसे कहा -- 

 ,,,,," जो आपने करवाया ,,वो मैनें किया ,,अब आगे जो आपको उचित लगे ,,वो करो ,,। " 

     मंदिर के उस ऊंचे पर्वत पर मेरा विषाद पूरी तरह धुल गया । मन ने कहा  " ,,अब तुम्हें क्या चिंता ,,?? अब तो माँ  ने तुम्हें  अपनी  गोद में मैहर  बुला लिया ।  " 

    मैहर में मेरी पोस्टिंग सम्भागीय कार्यालय में जे ई वर्क्स के कार्य के लिए हुई । वहां मेरे साथ एक ऐ ई वर्क्स सिन्हा साहब भी थे । कार्य सुचारू रूप से चलने लगा ।


    दस दिनों बाद ही नागौद से दो पुलिसवाले मेरे घर आ गये । उन्होंने कहा ," सम्मन है ,,आप को ले जा कर  नागौद कोर्ट में पेश करना है ! " 

    मेरी पत्नी ने देखा ,,वे हथकड़ी वगैरह भी लिए थे । वो घबरा गईं ।

    मैनें पत्नी को सांत्वावना दी । पुलिस वालों से कहा ,,-

    " में एक सरकारी मुलाजिम हूँ ,,मेरे आफिस का समय हो चुका है ,,मुझे आफिस जाकर एक विशेष कार्य करना जरूरी है ,,आप आफिस चलो,,विशेष फाइलें अपने साथी को सौंप कर में आप के साथ चला चलूंगा ," ! 

      थोड़ी देर ना नुकर के बाद वे मान गए । में उनके साथ आफिस गया । वहां सिन्हा साहब को फाइलें सौंपी । उन्होंने पूछा कि ये फाइलें क्यों दे रहे हो तो मैनें बताया कि मुझे गिरफ्तार करके दो पुलिस वाले नागौद ले जाने आये हैं और बाहर बैठे हैं ।

    यह सुनते ही आफिस का पूरा स्टाफ उठ खड़ा हुआ । उन्होंने पुलिस वालों को अंदर बुलाया । उन में से एक हवालदार सिपाही मेरे आफिस के बाबू का रिश्तेदार  भी था ।

    सिन्हा साहब ने फोन उठाया और सीधे सतना एस पी को लगाया । उन्होंने कहा 

,," ,,गिरफ्तारी जरूरी नहीं ,,कोई भी जमानत दे दे और मुलजिम नियत तिथि में समय पर कोर्ट में जा कर जज के सामने पेश हो जाये ,,वहां कोर्ट फिर जमानत दे देगा क्योंकि कोई गम्भीर आपराधिक प्रकरण नहीं है ।" 

   पुलिस के लोग भी तुरन्त मान गये । सिन्हा साहब ने खुद जमानत ली और पुलिस वाले उन्हें सलाम करके वापिस चले गये ।

  

   नियत तिथि पर सुबह सुबह में अपने साथी यंत्री श्री पी एल सिंह के साथ उनकी जमीन जायदाद के कागजात ले कर कोर्ट में उपस्थित हुआ । पीएल सिंह नागौद निवासी थे और कोर्ट में उनको सब जानते थे तो जमानत का काम भी तुरन्त हो गया । 

   नागौद से काम होते ही में पी एल सिंह के साथ सतना लौट आया ।

     अब मुझे एक वकील करना था जो केस लड़े । 

   पी एल सिंह ने बताया कि  दूसरे पक्ष के  विरुद्ध दायर हुआ केस सतना की एडीजे कोर्ट में ट्रांसफर हो चुका है ।

    मैनें पूछा ,," क्यों ,," ??

 तो पी एल सिंह ने बताया कि ,,"" " मारपीट में अगर चोटिल  व्यक्ति 21 दिन से अधिक दिनों तक चिकित्सकीय इलाज में अस्पताल में भर्ती रहे तो मामला संगीन हो जाता है और तब उसे गम्भीर अपराध मान कर उसकी सुनवाई जिले की एडीजे कोर्ट करती है ।,," 

     अब मेरी आँखों के सामने से सभी पर्दे हट गए,,कि क्यों लोग मुझे जल्दी ही अस्पताल से डिस्चार्ज करवाना चाहते थे ,,! 

     मुझे सांसद महोदय के फोन और उस वार्तालाप के दृश्य भी आंखों के सामने घूम गए जिसमें मुझे छुट्टी करने के लिए सांसद द्वारा दिये गए दवाब को हक़ साहब ने नकार दिया था ।

    मुझे अपराध के वे छिपे  चेहरे भी दिखने लगे जो अपराधियो को ताकत देते हैं ।

   लेकिन अभी तो एक नई जंग शुरू हुई थी ,,,कोर्ट कचहरी की जंग । जो आगे जा कर सिर्फ मुझे और मुझे ,,अकेले ही लड़नी थी ।

      मजे की बात यह थी कि यहां चाह कर भी कोई मेरी मदद नहीं कर सकता था ।न यूनियन ,,न कोई  मित्र ।

      यहां वकालत व्यवसाय थी ,, और आप की जान का मालिक एक वकील था,।

      तो मैनें एक वकील की तलाश की । 

    उधर  ऐ डी जे कोर्ट में मेरे विरोधियों का  केस आ जाने  से वे  सजा के भय से मेरे विरुद्ध और ज्यादा खूंखार हो गए ।

    कारण अलग था ।


   ऐ डी जे पाराशर साहब बड़े स्ट्रिक्ट थे । कानून के गहन जानकार । उनके कोर्ट से सजा न हो यह बहुत असम्भव बात थी । 


तो विरोधियों को भी एक बड़ा क्रिमिनल वकील ढूंढना  पड़ा ,,और उन्होंने शहर का सबसे बड़ा वकील लगाया ।

   

    अब जंग कठिन हो चुकी थी ।

 

    उन लोगोंको अपने किये की सजा मिलेगी या नहीं या फिर मुझे जेल भुगतना पड़ेगा ,,?? , यह  न्यायालय पर निर्भर था ।

  लेकिन देवदूत  तो थे ,ही ,,जो आगे मेरी सहायता में आने वाले थे ।,,

   क्रमशः,।

--6---


लेकिन,,,मुझे तो अपनी चिंता सता रही थी ।

मेरा कोर्ट तो नागौद में ही था ,,उसी बस्ती में जहां मुझ पर जानलेवा हमला हुआ था ,,जहां अभी भी उन लोगों का वर्चस्व था जिनसे में  भिड़ गया था । 

  सच कहें तो अब मैं ही रणभूमि से पलायन कर गया था और वहां अभी भी खूंखार लोगों का राज था जो अन्याय को ही अपनी ताकत समझते थे । 

     ऐसी स्थिति में हर बार पेशी पर नागौद जाना क्या मेरे लिए निरापद था ,,??  हर बार पी एल सिंह या कोई और साथी तो नागौद जायेंगें नहीं । मैहर से नागौद का  50 कि0 मी0 का रास्ता क्या कोई   नई वारदात को अंजाम नहीं दे  देगा ,,खास कर तब , जब सामने का व्यक्ति बौखला चुका हो ,,?? 

    किसी ऐसी  दूर  की जगह में नौकरी करना अब कितना दुरूह है  जहां आप कौटुम्बिक रूप से अकेले हों ,,जहां  संतुलन शक्ति का अभाव हो ,,??  जहां कोई सामाजिक दबाव आपके पक्ष में हो ही न ?? 

    ये बातें सोच कर मन घबराने लगा ।

     अब मुझे ऐसा वकील भी चाहिए था जो इस न्यायिक प्रकिया में मेरे अभिन्न मित्रों की तरह सहायक बन के मुझे उबार सके । तब  कचहरी की मंडी में ,  मैं एक साथी वकील को तलाशने लगा ।  

    ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लत ने अब तक मुझे खाकी रंग के पेंचदार , श्वेत एप्रिन के घुमावदार गलियारों से गुजार दिया था लेकिन अब काले रंग के तिलस्मी नगर से होंकर मुझे सुरक्षित  बाहर आना था ।

     दूसरे दिन इतवार था । तो मैं सुबह सुबह ही अपने एक परिचित वकील श्री खरे साहब  के घर पहुंच गया । मेरे ये मित्र वकालत में तो प्रसिद्ध नहीं हुए थे किंतु व्यंगकार के रूप में देश में प्रसिद्ध हो चुके थे । वे प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी थे तो उनका पहला लक्ष्य था ,,,' अन्याय के विरुद्ध लड़ना ,,' !

     उन्होंने कहा ,," मुझे आपका पूरा किस्सा मालूम है ,,,ईमानदारी की सही सजा आपको मिली है । "  

     मैनें पूछा ,  " ,अब क्या करूं ,,??  में नागौद पेशी में नहीं जा सकता । " 

  वे बोले --" तो मत जाओ ।  मैं आपका केस सतना ट्रांसफर करवा देता हूँ । " 

    उन्होंने एक एप्लिकेशन बनाई जिसमे झगड़े का  स्थल नागौद  बताते हुए मेरी जान को खतरा बताया और मेरी एफ आई आर , और अस्पताल की रिपोर्ट लगाई और  दूसरे दिन सीजेएम कोर्ट में केस सतना ट्रांसफर करने की विनय की ।

     खरे साहब बहुत अच्छे प्रसिद्ध व्यंगकार थे । सीजेएम साहब उन्हें जानते थे । केस जिनायन था । तो केस सतना लोवर कोर्ट में ट्रांसफर हो गया । 

      मैनें वकील साहब को धन्यवाद दिया और मां शारदा को स्मरण किया । मैनें मां से कहा ,,अब तो आप कदम कदम पर मेरे साथ आ गईं हैं ,,अब मुझे कोई चिंता नहीं ।

     लेकिन फिर भी केस लड़ने के लिए मैनें एक बड़ा वकील कर लिया क्योंकि खरे साहब सिविल केस ही देखते थे ।

   उधर ऐ डी जे कोर्ट में उन लोगों की भी पेशी शुरू हो गई ।

     न्याय पाना कोई आसान काम नहीं यह मैं न्यायालय आकर समझ गया । यहां केस फाइल , तारीखों की बैसाखियों पर लंबी छलानें लगा कर चलती है । कभी गवाह आया ,,कभी नहीं आया , कभी जज साहब बैठे,,कभी नहीं बैठे ,लेकिन मुझे दिन भर कोर्ट के द्वार के आसपास रहना जरूरी था । हांक लगते ही मुजरिम वाले कटघरे में खड़ा होना मेरी आत्मा को कचोट जाता ।

    लेकिन वकील साहब की फीस तो हर पेशी पर देना ही पड़ती थी । 

   में अपनी तनख्वाह से पैसे निकाल कर वकील साहब को पैसे देता । कोर्ट के खर्चे के नाम पर भी कुछ पैसे देने पड़ते । कभी कभी मुझे घर की जरूरतों में भी कटौती करनी पड़ती ।

      अब विभाग को मेरी लड़ाई से कुछ लेना देना नहीं था । मुझे कभी कभी पश्चाताप होता कि क्यों मैनें सम्भागीय यंत्री जैन साहब की बात पर ध्यान नहीं दिया ,,!! आखिर यह लड़ाई तो सरकारी राजस्व के हितार्थ और अन्याय के विरुद्ध ही मैनें  लड़ी थी ।

    दिन कटने लगे और दोनों केस आगे बढने  लगे  । 

  उधर एडीजे कोर्ट में सरकारी गवाह होस्टाइल होने लगे । मेरे ही लाइनमैनों ने कुछ भी देखने से इनकार कर दिया । कोई भी चक्षु दर्शी गवाह सामने आ कर  कोर्ट में स्वीकार नहीं किया कि उन आरोपियों ने मुझ पर प्राणघाती हमला किया था । अलबत्ता सीएमओ हक साहब ने जरूर सशक्त गवाही दी कि चोट घातक थी ।

   

   धीरे धीरे में उद्विग्न और निराश होने लगा । मुझे लगा कि वास्तविक अपराधियों को शायद ही सजा मिले ,,लेकिन मुझे सजा होने के पूरे आसार हैं ।

   यह सब चल ही रहा था की एक दिन एक अपरचित व्यक्ति ने बाजार में रोक कर कहा ,,' सतना के ," ,,x,,दादा ' ने खबर भिजवाई है कि आप नागौद वाले केस में समझौता कर लें ,,यह आप के लिए ठीक  होगा । ' 

    "और अगर न करूं तो ,,??" 

    " तो आप जानों,, और दादा जानेंगे !! आप बाल बच्चे दार आदमी हो। ,,कुछ ऊंच नीच हो जाये तो क्या करोगे ,,?? "  

     मैं अंदर अंदर डर गया । मैंने कहा ,," सोचता हूँ !" 

    मैनें यह बात पी एल सिंह को बताई तो वे चिंतित होते हुए बोले ,," यह खबर तो मेरे पास भी आई है । ,,,में आपको बताने वाला ही था ,! " 

     तो अब क्या करूं ?? में सोचने लगा ।

   '  x दादा ' सतना के घोषित दादा  थे । बालबच्चे दार होने का क्या  अर्थ ,,?? 

    अगर मेरे बच्चे को ही कोइ उठा ले  जाये तो कौन ठिकाना ,,?? 


क्रमशः,,,,,7,,,,

सत्य के पक्ष में , ईमानदारी की  यह लड़ाई मुझे इस स्थिति में ला कर खड़ी कर देगी यह मैनें सोचा नहीं था ।

   अब तक फिल्मों में  जो सीन देखता आया था ,,अब वो वास्तविक स्वरूप धारण करके मेरे  सामने खड़ा हो गया था ।

     घबराहट में पसीना निकलने लगा । पी एल सिंह की बात से यह स्पष्ट हो गया कि सतना के दादा भाई द्वारा भेजा गया  सन्देश सत्य है।

   सतना के दादा भाई अपराध की दुनिया के अधिपति थे । उनका सन्देश सलाह नहीं ,,आदेश की तरह ही था जिसे नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता था । 

       भय और अवसाद के बीच झूलता में ऑफिस गया । वहां जिससे भी बताया ,,वहः चुपचाप मुझे ताकता रहा ।  सबने कहा कि यह फैसला मुझे खुद लेना होगा कि मैं समझौता करूं या न करूं । अलबत्ता यह भी समझाया कि दादा भाई के सन्देश की अवहेलना   करके खुद के लिए संकट भी  मोल  न लूं । 

      आफिस में अब मन नहीं लगा । चुपचाप आधे दिन की छुट्टी ली और घर लौट आया । घर में आकर उहापोह में पड़ा सोचता रहा ।

    अंतर्द्वंद में मेरे मन में दो परस्पर विरोधी विचार मुझे मथने लगे । सोचा कि अब तक जो हुआ उतना पर्याप्त था उन लोगों को दण्ड स्वरूप हुई परेशानियों के रूप में  । व्यक्तिगत वैमनस्य बढाने से क्या लाभ ?? ,कल अगर मुझे या मेरे परिवार के साथ कोई अनहोनी हो जाये तो क्या करूंगा   ?? ,,समझौते में क्या नुकसान  है,?? 

     दूसरे विचार ने कहा  कि यह तो वही स्थिति है ,, भय और आतंक की ,,,जो नागौद में थी ,,

तो उसके सामने अब हथियार क्यों डाल रहे हो ,,?? ऐसा था तो सम्भागीय यंत्री की बात तभी क्यों नहीं मान ली थी ,,जिन्होंने कहा था ,,क्यों पचड़े में पड़ते हो ,,?? 

    यही सोचते विचारते शाम हो गई । बच्चे स्कूल से वापिस घर आये तो पत्नी को हिदायत दी कि कुछ दिन बच्चों को स्कूल न भेजें ।  

     वे उस समय तो कुछ नहीं बोलीं । रात में खाना खाते हुए पूछा ,," क्या हुआ ,,मुझे बताओ ,,!" 

      मैनें उन्हें सतना से दादाभाई द्वारा भेजे  सन्देश के बारे में बताया । अपनी विचलित मनःस्थिति के बारे में बताया ।

      लेकिन वे तो ईश्वरवादी थी ।  उन्होंने कहा ,," किसी दादाभाई की चिंता मत करो । ईश्वर से बड़ा कोई नहीं होता । '  हुई है वही जो राम रुचि राखा '।,, ईश्वर पर भरोसा रखो सब ठीक होगा । " 

      इतना कह वे तो सो गईं लेकिन मेरी आत्मा जग गई ।

     मन बोला ,," तुम तो माँ के  वरद पुत्र हो ,, सीधे माँ को क्यों नहीं बताते जा कर ,,?? वे सब देख लेंगी क्या करना है क्या नहीं । " 

      माँ का ध्यान मन  में आते ही मन बिल्कुल हल्का हो गया । कोई अवसाद न बचा । जल्दी ही नींद आ गयी ।

       सुबह स्कूटर उठाई और सीधे मंदिर के पहाड़ पर चढ़ गया । उन दिनों ऊपर मंदिर तक जाने के लिए पर्वत का घेरदार,, घुमावदार रास्ता था जिससे वाहन जाया करते थे ।

ऊपर मंदिर में आरती हो रही थी । में चुपचाप भीड़ में जा कर खड़ा हो गया ।

    कुछ देर बाद जब भीड़ छंट गई तो माँ से आमना सामना हुआ ।

     मैनें चुपचाप हाथ जोड़े और पूरी स्थिति को उनको सौंप कर कहा ,," अब आप जानो ,,,,जैसा उचित लगे  वैसा करो ,मैं मुक्त हुआ " !

      अपनी बात कह कर मैं जल्दी ही नीचे उतर आया । 

     नीचे उतरते ही सामने पी एल सिंह मिल गये । वे नगर वितरण केंद्र के अधिकारी थे ,,रोज मंदिर की विद्युत व्यवस्था देखने मंदिर आते ही थे । 

      मुझे देखते ही वे मेरा हाथ पकड़ कर मुझे पास में बने चाय के ढाबे में ले गये । वहां इत्मीनान से बैठ कर उन्होंने कहा ," ,,,


     " कल आपसे बात होने के बाद मैं सतना गया था । वहां आपका विरोधी पक्ष भी मुझे मिला था । उनसे जब पूछा कि बीच में।  'xx दादा '  को क्यों डाला तो वे बोले कि,,' क्या करें ,?? शर्मा जी झुकने वाले नहीं,,,विभाग में हमारी प्रतिष्ठा खत्म हो चुकी है ,,इधर क्रिमिनल केस दायर हो चुका है ,,एक ही रास्ता है बचने का कि शर्माजी समझौता कर लें ,,,इसीलिए ,,xxx दादा के दरबार में गये थे ,,। आप तो  अपनी जाति के हो कर भी साथ नहीं दे रहे ,,,अगर आप जिम्मा ले लें तो दादाभाई क्यों बीच में पड़ें ??'

      पी एल सिंह आगे बोले,,,, कि ,,,मैनें उनसे कहा ,,' तुमने गलत किया,,, इसलिये यह सब हुआ ,,,क्या तुम्हें अपनी गलती का एहसास है ,,??'

   वे बोले,,, " हम कान पकड़ कर शर्माजी से  क्षमा मांगने को तैयार हैं । आप इस केस से छुटकारा दिलवा दो ,,'

     पी एल सिह बोले कि,,  'तब चलो ,,पहले ,,'xxx दादा ' के दरबार में स्वीकार करो कि गलती तुम्हारी है ।' 

    वे सहमत हो गए तो वे सब मिल कर ,,'  xxx दादा ' के दरबार में गए जहां यह तय हुआ कि,,' xxx दादा '  को अब कोइ मतलब नहीं । यह दो विभागों के बीच उत्पन्न हुआ प्रकरण है ,,,कोई जातीय प्रकरण नहीं ,,,इसलिए दादा उनका पक्ष ले कर कुछ नहीं कहेंगें  ,,!,,अदालत में कोई जीते या कोई हारे इससे भी उन्हें कोई मतलब नहीं । दो पक्षों के बीच अगर हो सके तो मैं समझौता करवा दूं ,,और यदि न हो पाए तो भी  उन्हें कोई मतलब नहीं । ' 

    जिसने जैसा जो किया वो वैसा  भोगेगा,,। " 

      इतना कह कर पी एल सिंह  ने अब मूझ पर आंखें  गड़ाते हुए कहा ,

      ,,"  इस तरह अब '  दादा xxx ' तो इस इस मामले से दूर हट गये,,,,,,,,,, लेकिन,,शर्माजी,,!,,मैं,,फंस गया ,,!!,' 

   

 " आप किस तरह,,फंस गए ?? " 

  

 --- " इस तरह ,,,,कि मैनें उनसे हामीं  भर ली कि मैं आपको समझौते के लिए मना लूंगा । " 

 सिंह ने आशा भरी निगाह से मुझे ताकते हुए कहा ।

       उनकी अंतिम बात सुन कर जैसे  मैं अवसाद के गहरे समुद्र में डूब गया । पी एल सिंह ने मुझे एक आसन्न संकट से उबार लिया था लेकिन अहसान और रिश्तों से भरे  अपनत्व के एक  मीठे कुएं के जल में फिर से धकेल दिया था ।

      में कुछ कह पाता ,,उससे पूर्व ही पी एल सिंह गम्भीर स्वर में  फिर बोले,,,

   "शर्मा जी ,,! हम लोग नौकरी पेशा हैं ,,जाती दुश्मनी क्यों पालें ,,?  उधर वे लोग भी नौकरी पेशा हैं ,,,वे मान रहे हैं कि उनसे गलती हो गई है ,,वे क्षमा भी मांगने को तैयार हैं ,,तो क्यों न हम उन्हें क्षमा कर दें ,,?? ,,फिर आप तो ब्राह्मण हैं ,,आप क्षमा कर देंगें तो जीवन भर वे आपके ऋणी रहेंगे ,,। " 

   मैं फिर किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया । कल तक तो दवाब था किसी बाहुबली का ,,,आज मनुहार थी ,,याचना थी ,,उस अपने की ,,,,जो संघर्ष में मेरा सारथी बना था,,सहयोगी था  । 

    फिर भी मैनें कहा ,,

    " अब तो  क्रिमिनल केस शुरू हो चुका है,,,अब समझौता कैसे सम्भव  होगा  ,,??"

  सिंह ने कहा ,," इसका हल उनके वकील साहब ने बताया है ,,आप को कोर्ट में बस यह कहना है कि आप ने आक्रमण के समय धुंधलके में ठीक से नहीं देखा ,,,ये लोग ही  थे यह विश्वासः से नहीं कह  सकते,,!,"

      यह सीधे सीधे होस्टाइल हो जाने का सुझाव था ।

    

 ,,, लेकिन मैं यह कैसे मान लूं कि उन्हें अपने किये का पश्चाताप है ,,वे क्षमा मांगना चाहते हैं ,," ?

--मैनें अन्तिम प्रतिरोध किया ।

 

-पी एल सिंह बोले,," वे  मेरे साथ आपके घर आकर माफी मांगेंगे ,,गलती स्वीकार करेगें  ,,तब तो आप मानेंगे ,,?"


   

    मुझे लगा कि हम लोग मंदिर के नीचे बैठ कर ये बातें कर रहे हैं तो माँ की यही मंशा होगी । ,,,उसे अस्वीकार कैसे करूं ?

     

   मैनें पूछा - " कब आयेंगें वे लोग ??  माफी मांगने ,,??" 

    पी एल सिंह बोले ,," दो दिन बाद उनकी पेशी है ,,वे कल ही हाजिर होंगे आपके सामने ,,क्षमा मांगने । ,,,फिर दो दिन बाद जा कर कोर्ट में जैसा उनका वकील कहे,, वैसा आप कह दीजिये ,,। मामला ,,खत्म,,,। " 

   

मैनें हाँ कर दी ।

   

   लेकिन क्या माँ की यही मंशा थी ,,?? 

    क्या सचमुच समझौता होना सम्भव था ,,?? 

    शायद नहीं ,,,!!

    क्योंकि वह अंतिम देवदूत तो अब अवतरित होने वाला था,,,अंतिम दृश्य में ,,जिसने पूरे दृश्य को बदल दिया ।

   और जिसकी सीख मेरे हृदय में अमिट हो गई जीवन पर्यंत ।



,,सभाजीत


   क्रमशः ,,,,

,,,8,,,


   दूसरे दिन इतवार था ।

  

    सुबह सुबह ही पी एल सिंह अपनी प्लानिंग के मुताबिक नागौद के उन आरोपी लोगों के ले कर मेरे घर आ गए जिनसे मेरी लड़ाई हुई थी और जिन्होंने मुझ पर प्राणघातक हमला किया था ।

    वे कमरे में आकर एक लाइन में खड़े हो गये । फिर पी एल सिंह के निर्देश पर एक एक व्यक्ति ने रिवहीँ  अंदाज़ में आगे बढ़ कर , आधा झुक कर मुझे प्रणाम किया । वे मुंह लटकाए ,  आंखें  झुका कर ऐसे खड़े हो गये जैसे अबोध बच्चे हों और किसी टीचर की आज्ञा पालन करने  भयभीत हो कर आये हों ।

       मैनें ध्यान से देखा,, वे अबोध मुखोटे लगाए वही क्रूर चेहरे थे जिन्होंने मरणासन्न होने की स्थिति तक मुझ पर भद्दी मां बहिन की गालियों के साथ  लोहे की रॉड से घातक इतने प्रहार किये थे कि बस एक प्रहार और होता तो मेरे बच्चे अनाथ हो जाते ।

     ये वही क्रूर चेहरे  थे जो  शासकीय अधिकार के मद में चूर हो कर अवैध कमाई को अपना पैतृक अधिकार मानते थे ।

     ये वही चेहरे थे जिन्होंने मुझ पर अपने बचाव में झूठा मुकदमा ठोका था ।

     ये वही चेहरे थे जिन्होंने जिला अस्पताल तक आ कर , वहां के मुख्य चिकित्सक को अपने मन मुताबिक मेरी चिकित्सा  बाध्य करने की कोशिश की थी ।

     और ये वही चेहरे थे जो अब सिर झुका कर मुझे आदर देने का ढोंग कर रहे थे ।

     मैनें सोचा ,,क्या ये चेहरे क्षमा करने योग्य हैं ,,.? 

     आखिर माँ मुझसे क्या करवाना चाहती हैं ,?? 

     क्या क्षमा कोई आभूषण है जो वीभत्स और क्रूर व्यक्ति के गले में भी लटका दिया जाए,?? 

      तभी  पी एल सिंह ने उन्हें निर्देश दिया । सब लोग शर्मा जी से माफी मांगो ,,।

     उन्होंने एक एक कर के  कहा ,,, हमसे गलती हो गई ।

      

     पी एल सिंह ने फिर कहा ,,

  "-   पंडितजी हैं,,,अब एक एक करके आगे  बढ़ के गोड़ छुवो,,।

      सबने मेरे घुटने छू कर पैर छूने की दिखावटी प्रक्रिया पूर्ण की  ।

     अंत में पी एल सिंह ने मुझसे कहा --" देखिये सब पश्चाताप कर रहे हैं माफी मांग रहे हैं आप भी माफ कर दीजिए ,,। "

     

     मुझे यह एक लघु नाटिका से बढ़ कर कुछ और नहीं लगी ।  फिर भी चूंकि पी एल सिंह से स्वीकार कर चुका था इसलिये  सिर हिला कर हाँ  करके संतुष्टि दिखा दी ।

      बाहर निकल कर वे सब अपनी सामान्य मुद्राओं में हो गए । बाद में मेरी पत्नी ने बताया कि वे हंसे भी ।

      शायद वो अपनी उस नाट्य कुशलता पर हंसे जिसके जरिये उन्हें लगा कि वे कोर्ट में होने वाले फैसले में वे  निर्विघ्न विजयी हो जाएंगे ।

      यह सब देख कर मुझे लगा कि पी एल सिंह नहीं बल्कि पी एल सिंह का प्रस्ताव स्वीकार करके  मैं ही फंस गया हूँ ।  

      वे अपना दावँ खेल कर चले गए थे और मुझे अपने हिसाब  से 

उनके पाले में पूर्व निर्धारित खेल खेलने को आमंत्रित कर गये हैं ।

     लेकिन अब क्या हो सकता था  ? ,,वकीलों के दावँ पेंच से में अनभिज्ञ था । न्याय में सत्य प्रमाणित करना कितना कठिन है यह बात मेरी समझ में आने लगी थी । 

     तीसरे दिन पी एल सिंह घर आ गए । साथ में दो लोग  और थे जो शायद उन्ही ओपियों के रिश्तेदार थे जो माफी मांग कर गये थे ।  उन्होंने कहा ,,,जल्दी चलें ,,हो सकता है पुकार जल्दी हो जाये ,,और फिर वकील साहब बताएंगें कि कैसे और क्या बोलना है ,,।इसलिये जल्दी पहुंच कर समझ लें  तो ज्यादा अच्छा रहेगा ।

    मेरा मन मुझे अंदर ही  अंदर कोसने लगा । मुझे वकील का सिखाया वहः झूठ  बोलना था जो बिल्कुल सच नहीं था ।  लेकिन शायद मैं अब ट्रैप हो चुका था ।

     और में ही क्यों ,,शायद पी एल सिंह भी ट्रैप ही हुए थे । एक ही जाल से ,,,अपनत्व के जाल से । वे जातिवाद के भाईचारे के जाल में फंसे थे ताकि उनके बन्धु बांधव सजा से बच जाए ,,और मैं विभागीय अहसान और सहयोगी भाई चारे के जाल से ताकि पी एल सिंह का विभागीय अहसान चुका सकूं ।

    मन तो हुआ कि आज मना कर दूं किन्तु संकोच में रह गया ।  

चलते समय एक बार मंदिर की ओर नीचे से ही मुंह करके मां को प्रणाम किया और फिर सब कुछ उन्हें सौंप कर पी एल सिंह के साथ अन्य दो लोगों से घिर कर में कोर्ट पहुंचा ।

      कोर्ट शुरू हो चुका था पर न जाने क्यों जज साहब बीच में ही उठ कर अपने चैंबर में जा कर बैठ गए थे । मेरे विरोधियों के वकील साहब शहर के जाने   माने क्रिमिनल केसों के वकील थे । 

    वे जाति से ब्राह्मण और सरनेम से शर्मा ही थे । उन्होंने जाने कितने दुर्दांत अपराधियों को जेल जाने से बचाया था इसलिए वे बहुत कम समय मे प्रख्यात  हो गये थे । 

     मुझे देख कर वे मुस्कराए,,फिर उन लोगों से कहा ,,"- आखिर तुम लोग ले ही आये इन्हें ,,अब ठीक है,,आपको वही कहना है जो पहले बताया था । कोर्ट में इन्हें तुम लोगों को नहीं पहचानना है ,,बस ,,!!" 

     जज साहब अभी नहीं बैठे थे ,,तो हम लोग बाहर निकल कर आ गये । लगा अभी पुकारे के लिए देर है ,,तो पी एल सिंह ने कहा ,," चलो तब तक कहीं चाय पी लेते हैं । " 

     हम लोग पास के एक बड़े रेस्टुरेंट में घुस गए । 

       तुरन्त चाय और काफी का सुविधानुसार आर्डर हुआ । फिर किसी ने कहा ,,' एकएक रसगुल्ला हो जाये ,," !

   तभी मैनें देखा कि सामने की टेबिल पर मेरे परम् मित्र श्री लाजपत राय बैठे हैं ,,वे किसी काम से कोर्ट आये थे ।  शायद किसी से मिलने ,,क्योंकि अमूमन उन्हें कोर्ट आने की जरूरत कभी पड़ती ही नहीं थी । वे जाती से सिंधी थे किंतु सात्विक और ईमानदार । वे सतना नगर के सिंधी समाज के मुखिया थे । और सतना नगर में कोल्ड हाउस के मालिक थे ।

   उन्हें सब लोग जानते थे । न सिर्फ सतना में बल्कि आसपास के अन्य नगरों में भी । उनकी प्रतिष्ठा इतनी थी कि उनके आफिस में नगर के कई लोग समस्या सुलझाने भी चले जाते थे ।

    उन्हें देखते ही मैनें मुस्करा कर , हाथ उठा कर नमस्कार किया किन्तु उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया ।

     तभी रसगुल्ला मेज पर लग गया । मेरे विरोधी भी उनसे अच्छी तरह परिचित थे तो आदर सहित एक प्लेट रसगुल्ला उनकी टेबिल पर भी पहुंचाया ।

    उन्होंने प्लेट की तरफ किंचित न देखते हुए मेरे विरोधियों से पूछा ,," क्या बात है ,,आज बहुत अच्छा दिन है ,,आप लोगों को एक साथ देख रहा हूँ ।,,क्या हुआ आप का केस निपट गया ,,?? " 

   मेरे विरोधियों ने कहा ,," निपटा ही समझिए ,,,।,,हम लोगों में आपसी समझौता हो गया है ,,!" 

   लाजपत राय ने थोड़ा बनते हुए पूछा ,,"  क्या  केस विदड्रा हो गया  या आपके हित में फैसला हो गया ,,? " 

    मेरे विरोधियों ने उत्साहित हो कर कहा ,,," फैसला हमारे पक्ष में हुआ ही समझिए,,इसी लिये रसगुल्ला पेश किया है,,,मुंह मीठा करिए ,,शर्माजी हमारे पक्ष में बोल देंगें ,,यह तय हो गया है । " 

   लाजपत राय उठ खड़े हुए ,,रसगुल्ले की प्लेट उन्होंने सामने से सरका दी । फिर हाथ जोड़ते हुए बोले ,," रसगुल्ला तो फैसले के बाद ही खाऊंगा ,,अभी नहीं । " 

    उठने के बाद उन्होने एक भरपूर द्रष्टि मुझ पर डाली । उस द्रष्टि में ऐसा न जाने क्या था जो मुझे चीर गयी । 

     वहः द्रष्टि हिकारत की थी । क्षोभ की थी । उलाहने की थी । सवालों की थी ।तिरस्कार की थी । मित्रता की शिकायत की थी ।


     लाजपत राय की यह द्रष्टि , और उनका रसगुल्ले की प्लेट को तिरस्कृत करना मुझे बींध गया ।जिस द्रष्टि ने सदा मुझे आदर से देखा था ,जिसमें मेरी प्रतिष्ठा थी वहः आज इस रूप में क्यों मुझ पर उठी यह सोच कर में विह्वल हो उठा ।

     अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।  मैं जैसे लड़खड़ा उठा ।

     रेस्टुरेंट से बाहर आते ही मैनें कहा ,,-" मेरी तबियत ठीक  नहीं

आज मैं गवाही नहीं दे पाऊंगा ।" 

     पी एल सिंह सहित सभी अन्य लोग विचलित हो गये ।

      बोले ," अभी तो आप ठीक थे अभी क्या हुआ ,,?? " 

   मैनें कहा -" मैं नहीं जानता । लेकिन मुझसे बोलते नहीं बन रहा ,,अब मैं घर जाऊंगा । " 

    उन सब ने मुझे समझाने मनाने की कोशिश की किन्तु मेरे कान तो जैसे सनसना रहे थे ।

      मुझे लग रहा था कि कब में लाजपत राय के घर पहुंचूं ,,और उससे उसकी उस निगाह के बारे में पूछूं,, कि "  तुम क्या कहना चाहते हो ,,?? " 

      आखिर पी एल सिंह मांन  गये और अगली तारीख पर गवाही देने का वादा ले कर मुझे छोड़ दिया ।

      में वहां से निकला और स्कूटर से  सीधे लाजपत राय के घर भागा ।

     लाजपत राय घर नही पहुंचा था ,,लेकिन में उसके आफिस के बाहर पड़ी बेंच पर निढाल हो कर बैठ गया ।

      कुछ देर बाद लाजपत राय आया ,,लेकिन मुझे बिना देखे आफिस में घुस गया ।

      यह स्पष्टतः मेरी उपेक्षा थी ।

   लेकिन क्यो,?? 

        इसका जो उत्तर आगे लाजपतराय देने वाला था वहः मेरी कल्पना से बाहर था ।


 -' सभाजीत ' 

   

     क्रमशः,,

,,,9,,,


    लाजपत राय जब इस तरह मुझे उपेक्षित करके अपने कार्यालय में घुस गया तो मुझे अब अपने पर और भी ग्लानि हुई । इसी सतना नगर का जब मैं विद्युत अधिकारी था तो यह व्यक्ति मुझे  अपने आफिस के द्वार में घुसते देख कर उठ खड़ा होता था ,,,हाथ जोड़ कर नमस्ते करता था । अब ऐसा क्या हुआ जो उपेक्षा कर रहा है ।

    मेरी मझली बेटी को ठीक दिवाली पर ,अचानक बीमार होने पर , खून चढ़ाने की जरूरत हुई तो तुरन्त इसी व्यक्ति ने न सिर्फ खून का इंतजाम करवाया था बल्कि रात में रुक कर मेरा साथ दिया था । इसके आफिस में बैठ कर हम लोग घण्टों मनोविनोद करते,,तो यह खाना खाना भी भूल जाता । मेरी किसी भी समस्या को यह फोन पर ही। लोगों से बात करके सुलझा देता था । सामाजिक कार्यक्रमों में अगर मुझे देख लेता तो मेरे पास आकर बैठ जाता । कितने ही मेरे और इसके मित्र कॉमन थे ।  नागौद कांड में अस्पताल में भर्ती होने पर करीब करीब हर दिन मुझे देखने आता था ।

     फिर ऐसा क्या हुआ जो अब यह मेरी उपेक्षा कर रहा है ,,?? क्या नागौद कांड से मेरी प्रतिष्ठा इसकी नजर में धूमिल हो गई है ,,?? क्या मैहर तबादले से में अब क्या इसके लिए मूल्य हीं हो गया हूँ ,,?? 


     यह सोच कर में उठा और उसके आफिस में घुस गया । वहः अंदर पहले से बैठे दो लोगों से बात कर रहा था । मुझे देख कर उसने किंचित मुस्करा कर अभिवादन किया फिर बैठने को कह उन्ही दो लोगों से बात करने में मशगूल हो गया ।

    उनलोगों की बात जल्दी ही खत्म हो गई और जब वे चले गये तो हम दोनों कमरे में अकेले बचे ।

 अब वहः मेरी तरफ मुखातिब हुआ ,,बोला-  ," कैसे आना हुआ शर्माजी ,,! ,,मुझ से कोई काम है ,,?" 

     -" काम न होता तो क्यों आता ,,?? "- मैनें कहा ।

      " कहिये,, क्या खिदमत करूं ,,? " - उसने कहा ।

       मैनें उसके चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए पूछा ,,- " लाजपत राय ,,अभी हम लोग कोर्ट में मिले थे ,,आपने मेरी ओर देखा तक नहीं ,,क्या भूल गये ,,?? 

     " भूला तो नहीं ,,पर अब भूल जाना चाहता हूँ ,,!"

 -" क्यों ,?? 

  " इसलिए कि आज से मैनें कसम खाई है ,,की में किसी ,,' ईमानदार ' का साथ नहीं  दूंगा । "

      उसका यह वाक्य  ठंडी छुरी की तरह मेरे जेहन को जैसे बींध गया ।

      थोड़ी देर निस्तब्धता के बाद उसने मुझे घूरते हुए कहा - " क्या हुआ ? आपने समझौता करके आज उनके पक्ष में गवाही दे दी ,?? " 

      मैनें कहा --" नहीं ,,! आपके चले आने के बाद मैंने मना  कर दिया,,न जाने क्यों,,मुझे  अच्छा नहीं लगा ।" 

   लाजपत राय थोड़ी देर चुप रह कर बोला ,," शर्मा जी ! ,,आपके ऊपर हमला होने से लेकर कोर्ट जाने तक क्या आपने अपनी लड़ाई अकेले लड़ी,??" 

      मैनें कहा --" नहीं ,,!" 

   लाजपतराय बोला --" तब समझौते आ अधिकार आपने अकेले कैसे ले लिया ,,?? "  यदि आप अपने अकेले के बल पर लड़े होते तो मुझे कोई शिकायत न होती,,लेकिन मुझे दुख है कि आपने अपने दोस्तों का हकऔर सहयोग को छीन लिया !" 

    आप जानते हैं कि आप के होस्टाइल होने के बाद क्या होगा,,??,,जज आपके बारे में भी  टिप्पणी दर्ज कर सकता है,,आप की पूरी  शख्शियत पर हमेशा के लिए दाग लग सकता है । "

     दूसरे झूठे और बेईमान लोग जीत जायेंगें ,,वे लोग फिर बेईमानी करेंगें,,और आप जैसे  ईमानदार लोग फिर पिटेंगे। ,,हो सकता है मर भी जाएं । " 

    एक केस आप पर भी दायर है ,,खुद बेदाग बरी  होने के बाद वे झूठे गवाह पेश करके आपको जेल भी भिजवा देंगे,,।

     तब हम लोगों का किसी ईमानदार के साथ खड़े होने से क्या फायदा ,,?? '

    -" आपके विरोधी भी तो हमारे भी मित्र हैं । इसी आफिस में आकर उन्होंने कितने बार क्षोभ प्रकट नहीं किया कि हम उनका साथ न दे कर आपका साथ दे रहे हैं । हमारी आपस में बुराई भी बढ़ी,,,आपके खातिर । हम पग पग पर आपकी टोह लेते रहे ,,आपकी सुरक्षा के लिए ,,अभी भी दादा भाई को  हमीं ने खबर भेजी की शर्मा जी हम लोगों के बीच के आदमी हैं और अच्छे आदमी हैं ,,,तभी उन्होंने खुद को अलग किया ।

पी एल सिंह को तो दादा भाई के हट जाने के बाद उन्होंने उपयोग किया है ,,,।" 

     क्या अब भी आप उन्हें बचाने के लिए उनके पक्ष में गवाही देंगें ,,??"

       

       मुझे अब कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया था ।

     मैनें उठ कर लाजपतराय के हाथ अपने हाथ में लिए और मेरी आँखों में भर आईं ,एक बूंद उस पर चू गईं । मैनें देखा कि उसकी भी आंखें बातें करते करते भर आईं थीं ।

       अब मैं एक पल भी उसके पास नहीं रुका ।सीधे घर आया और आते  ही  मंदिर की देहरी पर जा  कर माँ को प्रणाम किया ।

    मैनें कहा --" माँ तुम्हारा नाम शारदा यूं ही नहीं है ,,तुम आदि शक्ति हो ,,लोगों के विवेक और जिव्हा में वास करती हो ,,तुम  किसी के भी माध्यम से , उसके विवेक में विराज कर , उसकी जिव्हा से कुछ भी करने में समर्थ हो । तुमने सदा सत्य के रक्षा की  हर युग में ,,,आज  मुझ पर भी असीम दया की ,,में कृतार्थ हूँ।" 

****

***********


इसके बाद का वृत्तांत बहुत छोटा है ।

  मैन दूसरी बार कोर्ट में अपनी गवाही में आरोपियों को स्पष्टतः पहचाना । उन के कृत्य को बताया ।

 जज पराशर ज़ाहब ने तीनों को तीन तीन साल की सजा से दंडित किया और उन पर तीन  तीन  हज़ार का जुर्माना किया ।


   हालांकि,, वे हाई कोर्ट जा कर फिर छूट गये ।


  मेरे केस में में बेदाग बरी हुआ ।

*****


    यह वृत्तांत मैनें लोगों के मनोरंजन के लिए नहीं लिखा,,बल्कि उस मित्र की याद में लिखा जो कुछ दिन पूर्व ही यह दुनिया छोड़ कर चले गये ।

*** 

वाट्सएप में लिखना कितना मुश्किल है ये वे लेखक जानते हैं जो लिखते हैं ।

इस लिए शाब्दिक त्रुटियोंऔर व्याकरण के लिए क्षमा ।


 ' सभाजीत '

शनिवार, 27 जून 2020


सिंहावलोकन

1956 के संभवतः अप्रैल माह में मेरे पिताजी का ट्रांसफर , पन्ना के गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल से , नौगावं के  ब्वायज़ हायर सेकेंडरी स्कूल में , संगीत शिक्षक के पद पर हुआ !मैं उस समय करीब छह वर्ष का रहा होऊंगा ! एक वर्ष पूर्व ,  मैं  कुछ दिन , पन्ना के प्रायमरी स्कूल में कक्षा एक में पढ़ा  ,,लेकिन वहां मुझे अच्छा नहीं लगता था तो दो तीन माह बाद ही , मुझे मेरे दादा- दादी जी के पास चिरगावं भेज दिया गया था ,,जहां मेने कक्षा एक की प्रारम्भिक पढ़ाई पूर्ण की ! जब पिताजी नौगावं में , ज्वाइन करके , एक मकान  ले लिए तो मुझे और मेरी माताजी को , जिन्हें मैं " बाई " कहता था , ले कर नौगावं आये !
यह मकान  नौगावं की कोतवाली के सामने ही था ! मकान का यह ऊपरी हिस्सा था और मकान के आगे एक छज्जा था !  एक माह बाद ही मेरा एडमिशन  नौगावं के प्राइमरी स्कूल  की  कक्षा दो में  करा दिया गया ! शुरू में एक सप्ताह तक  तो मेरे  पिताजी आकर मुझे  छोड़ जाते और ले जाते रहे ,,लेकिन जल्द ही मुझे घर आने का रास्ता याद हो गया !
    जल्दी ही पिताजी ने मकान बदल दिया !  कारण यह था की रात में कोतवाली में   अपराधियों की पिटाई होती तो वे बहुत आर्त  स्वर में चिल्लाते थे और उनकी दयनीय आवाजें हमें साफ़ सुनाईं देती ! मेरी बाई रात में उठ कर बैठ जातीं ,, और विह्वल हो जातीं ! तब जो नया मकान मिला ,,वह नत्थू शर्मा   चौराहे पर बना  श्रीवास्तव परिवार का मिला  !यह परिवार अच्चट्  के जमींदार साहब के कुटुंब  का था ! इस कुटुंब में कई भाई थे ,,जिनमें सबसे बड़े थे शारदा बाबू ! उनके चचेरे भाई , किशन श्रीवास्तव के हिस्से में जो मकान आया था वो ठीक हमारे बगल में था ! उसके बाद उन्ही के एक अन्य चचेरे भाई के हिस्से में यह भाग था , जो कानपुर में रहते थे ,,और इसी लिए मकान हमें खाली मिल गया !  यह मकान दोमंजिला था ,, जिसमें नीचे दो कमरे और ऊपर दो कमरे , एक छत , रसोई , वगैरह थी ! हमलोगों के लिए यह पर्याप्त  जगह थी !
    इस मकान में हम लोग करीब आठ वर्ष रहे !


     शख्शियत  -1
    "नत्थू शर्माजी "


 इस मकान में आने के बाद सबसे पहले मैनें नत्थू शर्मा जी को जाना !
  यह चौराहा ही पूरे नौगावं में , उनके नाम से ही विख्यात था ! चौराहे पर उनकी मुख्यतः दूध दही की दो कमरे वाली दूकान थी ,,जिसके एक कमरे में एक भट्टी जलती रहती थी और दूसरे कमरे में वे खोवे की बनी मिठाइयां और दही सम्हाल कर रखते !कमरों के सामने एक छपरी थी ,,जिसमें एक बहुत छोटी सी दो खंड वाली मटमैली सी रैक रखी रहती थी ! दिन में कुछ मिठाइयां , जिनमें पेड़ा  , बर्फी ,रबड़ी , मलाई ,  आदि प्रमुख रहते थे , लाकर सजा दिए जाते थे !
    सुबह सुबह उनकी दूकान पर गावं से दूध ले कर आने वालों की भीड़ मच जाती ! बड़ी बड़ी कढ़ाइयों में दूध उड़ेल दिया जाता ,,और फिर वो भट्टियों पर  औंटता रहता !
   नत्थू शर्मा जी , हष्ट पुष्ट , गोल मुख वाले व्यक्ति थे ! वे अक्सर नंगे बदन रहते ,,और एक धोती पहने रहते ! एक जनेऊ , उनके गोरी  देह  पर , पेट पर लिपटी हुई , उनके ब्राम्हण होने की गवाही देती थी ! वे स्वभाव से कड़क थे , लेकिन दिल से बहुत नरम थे !
   जल्दी ही हम उनके ग्राहक बन गए ! दही तो अक्सर शाम को ले ही आते ,, कभी रबड़ी भी खरीद लाते  !वैसी स्वादिष्ट रबड़ी और दही हमने  कहीं और   नहीं खाई ! कभी कभी वे रसगुल्ले भी बनाते थे ,,, जो मेरी ख़ास पसंद होते थे !
     कुछ दिनों बाद उनसे उधारी भी चलने लगी ,,! पहले तो वे स्ट्रिक्ट रहे,,,, बाद में ,, आलस में कहते ,,तुम्ही लिख दो  कॉपी में ! उस समय तक नौगावं में  पुराने सिक्के और पुराने बाँट ही चलते थे ,,जिनमें इकन्नी , दुअन्नी , चवन्नी , अठन्नी के सिक्के होते और वज़न के लिए , पाव , छँटाक , आध पाव , ही होते थे ! तराजू भी डंडी वाली ,, डोरियों से लटकती पल्लों की होती ,,, जिसमें कम ज्यादा हो जाए तो कोई बुराई नहीं थी ! कॉपी में लिखने की शैली भी पुरानी  थी जिसमें एक निशाँन   के बाहर सीधी खड़ी लकीरों से और आड़ी  लकीरों से पाव , छँटाक  लिख दिया जाता !
    उस समय चार आने की एक पाव मिठाई मिल जाती थी ! यानी एक रुपया सेर ,,!
   जल्दी ही शर्माजी के दो पुत्रों को मैंने देखा ,, जिसमें छोटे का नाम  गोविन्द था ,, और बड़े का नाम गोपाल  था ! दोनों ही अपने पिता जी की तरह सुदर्शन थे  !  कालान्तर में जब मेरी मित्रता छोटे भाई गोविन्द से हो गयी तो मैं उनके घर भी गया  ! जब चाची जी को देखा तो मुझे लगा की ऐसी माता जी सबको मिले ! वे भी बहुत सुन्दर और मृदु स्वभाव की थीं ! गोविन्द के साथ उसके घर जाने पर वहां हमें चाचीजी के हाथ से  रबड़ी खाने को जरूर मिलती थी !
       कुछ  वर्षों बाद , रामलीला में मुझे जब पहले  लक्ष्मण और बाद में राम के स्वरूप के लिए  चुन लिया गया तो गोविन्द ने मेरे साथ लक्ष्मण के स्वरूप का  अभिनय किया  ! वो बहुत ही मृदुऔर  व्यवहारी लड़का  था ,, और यद्यपि मुझसे पढ़ाई में बहुत जूनियर था ,,फिर भी मेरे मित्र की तरह हो गया था  !
        शर्मा जी का परिवार बहुत सुखी था  !,,,, तभी , किसी घातक रोग के कारण अचानक गोविन्द की मृत्यु हो गयी ! वह शर्माजी के लिए बहुत बड़ा आघात था ! उन्होंने दूकान बंद कर दी  और और अस्वस्थ हो गए ! फिर वे कभी नहीं उबर पाए ! यद्यपि बड़े भाई ,,विटनरी में डाक्टर के पद पर नियुक्त हो गए थे , किन्तु शर्मा जी छोटे पुत्र के वियोग को बिलकुल सहन नहीं कर पाए !
    जो चौराहा ,,कभी नत्थू शर्मा जी का चौराहा कहलाता था , जल्दी ही अपने नाम की पहचान खो दिया ! इस बीच करीब 1964  में , श्रीवास्तव परिवार में विवाद हो जाने के कारण , कानपुर वाले भाई ने अपना मकान , शारदा बाबू के छोटे भाई सतीश  को बेच दिया ,,तो हमें तुरंत मकान बदलना पड़ा !  आनन् फानन में जो नया मकान मिला ,,वह मड़ियाँ मोहल्ले में ,, जैन परिवार के बगल में मिला ! यह मकान किसी ठाकुर का था जो गावं में रहते थे  ! हम लोग जब वहां चले गए तो शर्माजी से प्रतिदिन का निरंतरता का  सम्बन्ध छूट गया !
    इस बीच गोविन्द के बड़े भाई का विवाह हुआ ! नौगावं में उस समय  एक उत्सुकता हर घर की महिलाओं को होती थी की किस घर में कितनी सुन्दर  बहू आयी है ,,??  गोविन्द के बड़े भाई की बहू की धूम पूरे नौगावं में गूँज गयी की वो अत्यंत सुन्दर है ! सभी महिलायें उसके दर्शन करने को लालायित  हो उठीं ! लेकिन मजाल जो वह कभी घर के बाहर दिख जाए ,,?? गोविन्द की माता जी का अनुशासन ही ऐसा था की बहू घर से बाहर नहीं आयी ! यहां तक की मंदिर भी नहीं गयी !
        लेकिन एक जगह ऐसी थी जहां उस बहू को आना ही पड़ा ,,,और वह था' ' पाठक फोटो स्टूडियो ',,! लिहाजा वह जब वहां अपने पति के साथ फोटो खिंचाने  आयी तो मोहल्ले की महिलायें , दूर से ही उसके दर्शन करने का यत्न करने लगे ! किसी को झलक मिली ,,किसी को नहीं ,, क्योंकि स्टूडियो के नियम भी स्ट्रिक्ट थे ,! वहां परदे का पूरा इंतजाम था !,और तुरंत फोटो खींचने के बाद वो वापिस भी हो गयी ~!
      नत्थू शर्मा जी और गोविन्द की शक्ल मेरी यादों से कभी बाहर नहीं हुई !   और न ही उस ईश्वर की क्रूरता की ,,जिसने विधान रच कर एक बहुत ही अच्छे व्यक्ति का अचानक  अवसान रच दिया !

क्या अब भी वह परिवार वहां है ,,या नौगावं छोड़ गया ,,? यह मुझे नहीं मालूम ! यदि कभी नौगावं की  पहचान के पदचिन्ह ढूंढने पड़ें तो इस शख्सियतके बारे में शोधकर्ता  जरूर पता लगाएं !

--सभाजीत



 शख्शियत -2
 किशन चच्चा और शारदा बाबू श्रीवास्तव

नत्थू शर्मा चौराहे पर बने , जिस घर में मेरा आठ वर्ष का बचपन गुजरा , वह श्रीवास्तव परिवार का तीन हिस्सों में बाँटा   हुआ बड़ा घर था ! जिस भाग में हम किराए से  रहते रहे ,  वह उन तीनों हिस्सों में से , दो खण्डों में बना  सबसे बड़ा हिस्सा था !निचले हिस्से में चार कमरे थे  जिसमें से दो कमरों को छोड़ कर हमें दो कमरे दिए गए और ऊपर का पूरा भाग जिसमें एक छोटी छत थी , एक रसोई , और तीन कमरे , हमें किराए पर रहने के लिए मिले ! इस हिस्से के मालिक , श्रीवास्तव परिवार के ही सदस्यों में से एक  थे जो कानपुर में रहते थे ,,और उन्हें हमने जिन्हें  कभी नहीं देखा ! मकान का किराया , इस मकान से सटे , एक अन्य भाग में रहने वाले , किशन चच्चा लेते थे , जिनका आँगन  , हमें अपनी छत की मुंडेर पर चढ़ कर देखने से दिख जाता था ! किशन चच्चा से हमारे बहुत घरेलु सम्बन्ध बन गए ! वे एक सज्जन  और मिलनसार व्यक्ति थे !उनके परिवार में उनकी विधवा माता जी , एक बहिन , पत्नी , एक  बिटिया और एक पुत्र   थे ! चाचीजी की मित्रता मेरी माताजी सेबहुत  जल्दी ही प्रगाढ़ हो गयी क्योंकि चाची जी को अपनी पारिवारिक चर्चाओं को शेयर करने के लिए , एक नई  हमउम्र महिला पड़ोसन  मिल गयी थी !
     इस घर में आकर हमें सबसे आकर्षक चीज दिखी , वो ऊपरी हिस्से के सड़क की तरफ बनी  , कमरे में लगी झरोखे दार खिड़की थी  जो लकड़ी की पट्टियों  से  बनी , एक लीवर से खुलने वाली पल्ले वाली  खिड़की थी ,,जिसे खींच कर हम , सड़क पर चलने वाले व्यक्ति को आसानी से देख लेते थे , किन्तु सड़क पर चलने वाला व्यक्ति  हमें नहीं देख सकता था !इसी कमरे में  दीवार में बनी एक अलमारी भी  थी ,,जिसकी तली का   पैदा हटाते ही वह , किशन चचा  की ऊपर वाले कमरे में  , दूसरी तरफ की दीवार में बनी  अलमारी में खुल जाती थी , जिस में    , हाथ डाल  कर किसी भी चीज का आदान प्रदान आसानी से इस और से दूसरी और  किया जा सकता था ! इस एक्सचेंज मार्ग का उपयोग बड़ी सहृदयता से हमारी माता जी और चाची जी के बीच होता रहा ! जब कभी भी कोई व्यंजन हमारे घर बनता तो वह इसी मार्ग से चाची जी को बुला कर थमा दिया जाता , और इसी तरह वहां से भी व्यंजन बेखटके , हमें भी मिल जाते  !उस समय सिर्फ पड़ोसियों के दिल ही एक दूसरे से मिले हुए नहीं होते थे , बल्कि घरों की  दीवारों के दिल भी एक दूसरे घर से मिले होते थे !
      उन दिनों , नौगावं में अधिकाँश  मकानों की छतें पक्की नहीं होतीं थी ! सभी पर खपरैल होती थी  जिसकी लौटावनी  ( मेंटेनेंस ) , मई माह में करवाना जरूरी होती थी !मई माह में ही मजदूर सडकों पर इस काम के लिए दिखने लगते थे , और खपरों से भरी बैलगाड़ियां भी घूमती दिखतीं  , जो सैकड़े के हिसाब से नए खपरे बेचने निकट के गावों से  नौगावं  आती थीं , ताकि टूटे खपरों की जगह नए खपरे लगाए जा सकें ! चूँकि हमारे मकान मालिक कानपुर में रहते थे , इस लिए  लौटावणी करवाने की  जवाबदारी , उन्होंने हमें ही सौंप रखी थी ! मुझे लौटावणी के काम को देखने में बहुत मजा आता था ! एक बारगी सारे खपरे , ऊपर से निकाल दिए जाते और कमरों में सीधे  धूप  पड़ने लगती !,,,फिर एक एक पंक्ति में ,  ढाल बना कर ,  खपरे इस तरह सजाये जाते की पानी उन खपरों की नालियों से बहता हुआ ,, नीचे सड़क पर गिर जाए ! कभी कभी मजदूर  ढाल  सही नहीं बनाते थे  , तो पानी खपरों में दरार बना कर   बीच कमरे में टपकने लगता ,,! इस अवसर पर फिर किसी कम वजन वाले व्यक्ति को खपरों पर सावधानी पूर्वक पैर  रखते हुए उस स्थान तक जा कर या तो ढाल सही करनी पड़ती , या  खपरा ही बदलता  पड़ता !, और इस बात के लिए मैं  घर में सबसे योग्य व्यक्ति था  जो ऊपर चढ़ कर , सटीक ढाल बना देता था  , या खपरा बदल देता था  ! भारतीय  इंजीनियरिंग का   यह शायद  पहला पाठ था , जिसने मुझे बाद में  इंजीनियरिंग की  दिशा  में धकेला !
किशन चच्चा के घर से सटा  , श्रीवास्तव परिवार के मकान का  जो तीसरा हिस्सा था , उसमें सम्मलित रूप से अपने छोटे भाई के साथ  रहते थे - ' शारदाश्रीवस्तव ' !शारदा बाबू के तीन बच्चे थे  ,,तीनों लड़के ! जबकि उनके छोटे भाई संतोष श्रीवास्तव  के एक पुत्र और एक पुत्री थी !शारदा बाबू नगर के प्रतिष्ठित लोगों में गिने जाते थे ! बाजार में उनकी एक गहनों की दूकान थी ,,,जिसमें गहने या तो सुधरते थे अथवा बनते थे ! इस दूकान में वे सेठ की तरह ,  जाकर गद्दी पर  बैठ जाते ,,और एक मुनीम , जो काम का हिसाब लेता था , उन्हें पूरा व्योरा देता था  की आज कारीगर , या सुनार कौन सा काम करेगा ! इस दूकान में अक्सर मैनें  गावं से आये जरूरतमंद लोगों को देखा , जो अपने जेवर गिरवी रख कर या तो  उधार पैसा लेने आते या फिर छुड़वाने आते थे !
        श्रीवास्तव परिवार अचट्ट गावं की जमींदारी से सम्बंधित   परिवार था ! मैंने एक दो बार ही शारदाबाबू जी के पिताजी को देखा , जो गावं से यदाकदा  , नौगावं आते थे ! वे अक्सर  अंग्रेजों के जमाने वाली फोर्ड कार से आते थे और दूसरे दिन ही लौट जाते थे ! रोबीले व्यक्तित्व के  धनी  , जमींदार साहब की आवाज़ और मुखाकृति , किसी में  भी भय  उत्पन्न कर देती थी ! इसी भय के कारण मैनें कभी उनका सामना नहीं किया !
         शारदा बाबूजी के तीन बच्चों में सबसे बड़े मुन्नन ,,यानी सुधीर श्रीवास्तव से मेरी शीघ्र ही गहरी दोस्ती हो गयी ! मुन्नन से छोटे भाइयों में बिन्दु , यानी अरविन्द मुझे भाई साहब कहने लगे ! शारदा बाबू जी , जमींदार साहब के बड़े पुत्र होने पर भी , बहुत सरल और नरम ह्रदय के व्यक्तित्व  थे ! उसी परम्परा में मुन्नन  और भी ज्यादा सरल स्वभाव के बच्चे बने , किन्तु तुनक मिजाजी , और रईसी की ठसक उन्हें वंश परम्परा में मिली ! ! उस घर में , मुझे  जिनसे बहुत स्नेह और प्यार मिला वह थीं ,',मुन्नन की माता जी '  ! वे बांदा की थीं ,, और धार्मिक आस्थाओं  में गहन विश्वाश रखती थीं ! कोई भी तीज त्यौहार , व्रत  उनसे नहीं छूटता था ! वाणीं बहुत मधुर और स्नेह सिंचित थी !
         श्रावण माह में शाम को  वे एक चौकी लगा कर , , अर्थयुक्त बड़ी रामायण पढ़तीं थी  जिसमें चौपाइयां और दोहे सस्वर होते थे और अर्थ को वे इस तरह बाँचतीं की आँखों के सामने दृश्य ही उत्पन्न हो जाता था  ! वे हम बच्चों को निर्देशित करती थीं की हर दिन रामायण जरूर सुनें ,, कोई भी प्रसंग छूटे नहीं ,,, इस लिए मैं  शाम होते ही मुन्नन के घर पहुँच कर पहली पंक्ति में बैठ जाता ! हम लोगों के पीछे दरी बिछा कर शारदा बाबू बैठते , और कभी कभी संतोष बाबू भी ! मेरे बाल मन पर राम की महिमा का जो प्रभाव पड़ा , उसमें मुन्नन की माता जी का ही योगदान है ! मैं उनका आज भी ऋणी हूँ !
      हमारे घर के सामने वाली सड़क के उस पार ,  दूसरी  तरफ , ,,, बीड़ी का एक बड़ा कारखाना था ,,जिसके मालिक शारदा बाबू ही थे ! इस कारखाने का द्वार , नत्थू शर्माजी की दूकान के सामने की तरफ से था ! लेकिन इस कारखाने को मैनें  जब भी देखा , बंद ही देखा  !मुन्नन ने बताया  की सरकारी पैसा देना बाकी है इसलिए अभी  बंद है ,,लेकिन पिताजी ने बताया है कि  जल्दी ही   शुरू हो होगा  ! इस कारखाने के पिछले हिस्से में  कार का एक  गैरिज था , जो  अक्सर खाली रहता था ! मुन्नन ने बताया की उनकी कार अचट्ट  गावं में है ,,जो जब आती है तब यहीं खड़ी की जाती है ! खाली गैरिज में  हम लोगों के खेलने के लिए  उपयुक्त जगह थी ! इस जगह में हमने कंचे खेलने शुरू किये ! सुधीर कंचों पर निशाना लगाता ,, और न लगने पर भी हेकड़ी दिखाता की वह दावं नहीं देगा ,, कारण की खेल उसके गैरिज में खेला जा रहा था  ! सीधे साधे  मुन्नन  का जमींदारी रंग उसमें साफ़ दिखने लगता था ,और तब  हम खेल छोड़ देते थे !,  ! उस समय कंचों की उधारी भी चलती थी ! उसने दो कंचे उधार दे कर अपने लिए दो दावं सुरक्षित करवा लिए ! लेकिन मैं उससे जीत गया तो उसे कुछ कंचे मुझे देने पड़े !इस तरह  मेरे कंचों की संख्या प्रतिदिन  बढ़ती  गयी !
  कंचों में एक खेल था " टोंट घिसने ' का ! इसमें दावं देने वाले को कंचे को कुहनी से धकेलते हुए , गड्ढे तक पहुंचाना पड़ता था ! वह मुझे टोंट घिसवा कर तंग करने में ज्यादा आनंद अनुभव करता था ,,,लेकिन जब उसकी बारी आती तो वह साफ़ मुकर जाता ! कंचे खेलना तो आसान था किन्तु कंचे घर में छुपाना बहुत मुश्किल था ! कारण की मेरे पिता जी ऐसे खेलों के बिलकुल विरुद्ध थे ! तब किसी कपडे में बाँध कर हम उसे ऐसी जगह छिपाते की उस पर किसी की नज़र ही न पड़े !
     प्रारम्भिक प्राइमरी कक्षाओं के साथी मित्र जरूर बनते हैं किंतु उस उम्र का असली दोस्त मुहल्ले पड़ोस का हमउम्र का लड़का ही बनता है । उस हिसाब से मुन्नन मेरे हमउम्र वो दोस्त थे जिनको न कोई और था न कोई ठौर । हम लोग हर दो घण्टे बाद मिलते,,कोई खेल खेलते ,,फिर लड़ते और फिर घर भाग लेते   ।  लगता कि अब कुट्टी हुई है तो शायद ही फिर मिलनी हो ,,लेकिन दो घण्टे बाद ही मुन्नन सब लड़ाई भूल कर फिर मेरे दरवाजे आ धमकते,,,या फिर में उनके घर पहुंच जाता  जैसे कुछ हुआ ही न हो । कद काठी में मुन्नन मुझसे भारी पड़ते थे ,,इसलिए हाथापाई में अक्सर उनसे हार ही जाता था । हमें यह कभी पता नहीं चला कि हम में कौन बड़ा है कौन छोटा,,लेकिन मुन्नन के मन में एक बात जरूर थी कि वे रईसी में बड़े हैं और में छोटा । 
      शुरू में मुन्नन के घर कुआ नहीं था । कुआं किशन चच्चा के घर में था  ,,। दोनों घरों के आंगन के बीच एक दीवार थी जिसके बीच एक दरवाजा था । कहारिन  पानी भर कर किशन चच्चा के घर से मुन्नन के घर पहुंचा कर हौदी में भर देती थी ।  
      उन दिनो देवरानी जिठानी में भी एक विशिष्टता होती थी कि कौन बड़े शहर से आई है और कौन छोटे शहर से ।,,संतोष चच्चा वाली चाची बड़े शहर कानपुर की थीं और शारदा बाबू वाली चाची बांदा की ,,तो घर में संतोष चच्चा वाली चाची का पलड़ा शहर के हिसाब से  भारी ही था । कानपुर में तो नल लगें थे जबकि यहां पानी दूसरे के  कुएं से आता था ,,,इसलिए तुरन्त ही मुन्नन के घर , हौदी वाली जगह तोड़ कर वहां पर कुँवा खुदाया गया  । 
      मैं मुन्नन के साथ खड़े हो कर रोज कुँवा खुदता देखता । शारदा बाबू कुर्सी डाल कर वहीं बैठ जाते और  हरेक फुट खुदने पर मजदूरों से रिपोर्ट लेते की कहीं पत्थर तो नहीं निकल रहा ,,?  और जब पानी निकल आया तो सब  लोग खुशी से उछल पड़े । पानी टेस्ट किया गया  तो मीठा पाया गया । नारियल तोड़ा गया ,मुहल्ले में ,बताशे बांटे गए ।
        कुवां खुदने के कुछ दिन बाद ही किशन चच्चा के आंगन और मुन्नन के आंगन के बीच का आपसी आने जाने का  दरवाजा ईंटों  से चुनवा कर हमेशा के लिए बंद करवा दिया गया । इस तरह वर्षों से आपस में जुड़े दो आंगन हमेशा के लिए अलग हो गए ।
 फिर एक दिन देखा की कारखाना खुल गया है ,,! उसमें कारीगरों को बीड़ी बनाते  मैनें देखा ! उन्हें एक छोटी सी तराजू में तौल तौल कर तम्बाखू  दी जा रही थी और बंडल में बंधे पत्तों की गड्डियां भी ! वे सब कारखाने के बरामदे में  लाइन  में बैैैठ कर बनाते दिखे । बीड़ी के बन जाने के बाद , बीड़ी  को बाद में , कारखाने के आँगन में बनी भट्टी पर सिकते  हुए देखा तो मालूम हुआ की बीड़ी की सिकाई भी होती है !बीड़ी का कारखाना हम दोनों के लिए कौतूहल का केंद्र बन गया । मुन्नन के साथ अक्सर में बीड़ी के  कारखाने में चला जाता । बीड़ी पैकिंग का काम भी हाथों के कौशल का काम था । तब मशीनें नहीं होती थी फिर भी पैकिंग में दक्ष लोग हर एक मिनट में बीड़ी के कट्टे पर झिल्लीदार कागज लपेट कर , उस पर लेइ से स्टीकर चिपका कर , सामने रखी ट्रे में फेंक देते ।
      इसी क्रम में मुझे बीड़ी कारखाने के विज्ञापन विभाग के दर्शन भी हुए । दो लोग जोकरों की विचित्र वेश भूषा में मुंह पोते , अजीब से कपड़े पहने , हाथ में लम्बा भोंपू लिए कारखाने में दिखे । मुन्नन ने बताया कि ये लोग  गावों में जा कर इन भोंपुओं को मुंह में लगा कर हमारी बीड़ी का प्रचार करते हैं ।  मुझे लगा कि ये तरीका अब बहुत पुराना है तो शायद ही कोई इन्हें सुनता होगा ।  और यह सच ही था । , 
  एक हफ्ते बाद ही कारखाना फिर बंद हो गया !  शायद इस कारखाने की बनी बीड़ी का मार्केट था ही नहीं ! उस समय की प्रसिद्द बीड़ियों में चाँद छाप बीड़ी , और गदा छाप बीड़ी का   विज्ञापन ज्यादा  प्रचलन में था ! नौगावं की सड़कों पर , दीवारों पर ये विज्ञापन जगह जगह दिख जाते थे ! इन विज्ञापनों में एनासिन, लाल तेल ,नील ,  हमदर्द के विज्ञापन प्रमुखता से छाये  रहते थे !
    बीड़ी का कारखाना जो बंद हुआ तो फिर कभी नहीं खुला ! अलबत्ता , मुन्नन की कार जरूर एक दिन गैरिज में खड़ी दिखी ! मुन्नन ने गर्व से बताया की यह कार अब कल जगत सागर  घूमने जाएगी ! मैंने मुन्नन से विनय की कि मुझे भी घुमाने ले  चलो  ,,तो मान गया ! दूसरे दिन जब कार जाने को तैयार हुई तो उसने चुपचाप मुझे भी बुला लिया ! मुन्नन के पिताजी ने मुझे देखा तो कुछ नहीं बोले ,, कहा बैठ जाओ ,,,,शायद मुन्नन ने पहले ही उन्हें राजी करवा लिया था ! ! कार सबसे पहले मुन्नालाल पेट्रोल पम्प पर गयी  जहां कुछ गैलन पेट्रोल भरवाया गया ! फिर हम लोग जगत सागर तक गए ! मैंने मुन्नन के साथ पहलीबार जगत सागर तालाब देखा ! घूम कर आये तो मेरे ऊपर मुन्नन का एक और अहसान चढ़ गया था ,,,जिसका बदला मुझे खेल में उसके द्वारा की गयी बेईमानी झेल कर ही देना था !
नौगावँ में अक्सर दिलचस्प हलचलें होती रहती थीं । उन हलचलों में कभी मुन्नन मेरे साथी होते कभी प्रतिद्वंदी ।  कभी कभी सुबह सुबह  साधु वेश में दो व्यक्ति पूरे नौगावँ का चक्कर मारते हुए हर चौराहे पर रुक कर तेज स्वर में दोहे , चौपाईयाँ पढ़ते हुए अवतरित हो जाते । शंख, झालर बजाते हुए वे पहले तीन दिन यूंही  घूमते  , फिर अनोखे ढंग से दान मांगते । उनकी मांग होती कि उन्हें  -' दो सौ अठन्नी , तीन सौ चवन्नी , चार सौ दुअन्नी , पांच सौ इकन्नी  , दान में चाहिए  एकत्रित होने पर वो हरिद्वार जायेंगें । जहां धार्मिक अनुष्ठान करेंगें ।इससे दान दाताओं को पुण्य तो मिलेगा ही , साधुओं का आशीष भी मिलेगा ।
     तब दान देने की होड़ मच जाती । जितने सिक्के मिलते जाते , साधु अपनी मांग में प्रतिदिन  उतनी मात्रा कम करते जाते ,,और एक दिन पूरा पैसा एकत्रित हो जाने पर ,  बटोर कर गायब हो जाते ।
    मुन्नन अपनी माताजी से चवन्नी लेकर , मुझे दिखाते हुए एक दो दिन में दे  देते । इस काम में मैं पीछे ही रह जाता ।
     पत्ते पर ठंडी मलाई खरीदते समय भी वे आगे रहते । यदि मैं एक आने की लेता तो वे चवन्नी की । 
     लेकिन जब दूल्हा बाबा में, हवाईपट्टी पर  कोई हवाई जहाज उतरता तो उसे देखने जाने में हम दोनों साथ होते । एक बार समीपस्थ गावँ झींझन में , एक बाबा ने एक गुफा में घुसने की घोषणा सुन कर उसे देखने  हम दोनों साथ गये ।
         उन्ही दिनों सं 1959  में नौगावं में बिजली आ गयी ! सड़कों पर कुछ ही दिनों में ट्यूबलर  खम्बे गड गए और उन में तार खिंच गए ! जब कनेक्शन होना शुरू हुआ  तो मुन्नन का घर भी अग्रणीय कनेक्शनों में शुमार हुआ ! उसके घर जब पहली बार बिजली का बल्ब जला तो मुन्नन का स्टेटस स्वयमेव बढ़ गया क्योंकि हमारे घर तब तक लालटेन ही जलती थी ! अब मुन्नन जब तब अपनी रईसी का ताव दिखाने लगा ! उसके घर में जल्दी ही बाहर के कमरे में  एक रेडियो भी लग गया  जिसमें विविधभारती के प्रोग्राम आने लगे !सैनिकों के लिए गीतमाला , मुझे बहुत पसंद था , तो मुन्नन से हर हालत में निबाहना मेरी मजबूरी बन गया ! अब वो मुझे दो बातें भी सुना  देता तो मैं चुपचाप सुन लेता ,,क्योंकि रेडियो तो उसी के घर में था !  हालांकि रेडियो से मैं कभी दूर नहीं रहा ,,क्योंकि उसी चौराहे पर बने अज़ीज़ मुहम्मद के घरमें  बहुत पहले से बैटरी वाला रेडियो था ,,जिसमें दोपहर में लगातार तेज स्वर में फ़िल्मी गीत सुनने को मिल जाते थे ,,,,लेकिन रेडियो को ताकते हुए रेडियो सुनने की बात कुछ अलग ही थी !
        थोड़ा बड़ा होने पर रुचियों के अनुरूप होने के कारण हम लोगों में जहां प्रगाढ़ता बढ़ी वहीं कई मुद्दों पर एकमत न होने के कारण बहस भी हो जाती ।  इब्ने सफी बीए के लिखे जासूसी उपन्यास हम लोग कहीं से भी जुगाड़ कर पढ़ते । लेकिन वहः खुद को कर्नल विनोद मानता और मुझे कैप्टिन हमीद । वेदप्रकाश काम्बोज के जासूसी उपन्यास  में भी वहः खुद को जासूस विजय घोषित  करता ,,जबकि मुझे ठग अल्फांसे बताता । जिस फ़िल्म की में तारीफ करता ,,उसकी वहः बुराइयां बता देता ।  अंतरिक्ष यात्रा में अमेरिका - रूस के बीच छिड़े शीत युद्ध में वहः अमेरिका की तारीफ करता और रूस की बुराई,,जबकि मेरे विचार उससे उलट रहते ।
ऐसे अवसरों पर जब हमारा विवाद बढ़ जाता तो मामला मुन्नन की माता जी के सामबे पहुंचता । अक्सर वे मेरी तारीफ करती हूं जब मेरा ही पक्ष लेतीं तो मुन्नन भड़क उठता ।
       सामाजिक श्रेष्ठता जो  उसे विरासत में मिली थी उसी आधार पर  ,,, व्यक्तिगत श्रेष्ठता  पर भी वहः समानाधिकार चाहता रहा ।    स्पर्धा में पिछड़ने पर उसे बहुत झल्लाहट होती तो कभी कभी आंख मूंद  कर चिल्लाते चिल्लाते उसकी आँखों से आंसू बह निकलते । उस की यह हालत देख कर चाची को दया भी आती और हंसी भी ,,। वे मुझे कहती,," इसे समझाओ सभाजीत,,!! ,,तुम समझा सकते हो ,,,तुम इसके दोस्त हो । "
    और सचमुच,,में उसे समझा लेता था ,,क्योंकि मैं उसका पक्का दोस्त जो था ।

      धीरे धीरे मुन्नन से मेरी  कई बातों में तकरार होने लगी !मेरी दूरियां बढ़ने लगी ! तभी रामलीला में मुझे लक्ष्मण के पात्र की भूमिका मिली ,,और नगर में मेरा अपना स्टेटस बढ़ गया ! नए नए मित्र बन गए ,, लोग पहचानने लगे तो मैनें मुन्नन की परवाह छोड़ दी !
       एक दिन मैनें देखा की बीड़ी का कारखाना पूरी तरह तोड़ दिया गया है ! उस जगह अब एक पक्का ,,कई कमरों का मकान बनाया जा रहा है ! शारदा बाबू ,,खुद खड़े हो कर उस मकान को बनवाते दिखे ! गैरिज भी टूट गया ,,और कार भी कहीं चली गयी ,,! शायद वह बेच दी गयी थी ! मकान के एक बाजू में चार दुकानें बनाएं गयी ,,और शेष भाग रहने के लिए बना !  चर्चा से पता चला की शारदा बाबू और संतोष बाबू में बंटवारा हो गया है ,, और कारखाने वाला हिस्सा उन्हें मिला है ! मकान जल्दी ही तैयार हो गया और मुन्नन मेरे घर के सामने आकर रहने लगा !
        जो दुकानें बनीं ,,उनमें एक दूकान शारदा बाबू ने खुद अपने लिए सुरक्षित करके , उसमें कपडे की दूकान खोल दी ! बाजार वाली सोने चांदी की   दूकान किन्ही कारणों से पूरी तरह बंद हो गयी ! कुछ दिनों बाद वह भी बेच दी गयी !
 जमींदारी के स्टेटस को त्याग कर शारदा बाबू  व्यवसायी बनने की दिशा में मुड़  गए !  हालांकि ,, अनुवांशिक जमींदारी की आदत  ने उन्हें व्यवसायी भी  नहीं बनने दिया !
      मुन्नन से दूरी बनने के बावजूद भी , मुन्नन की माता जी मुझे उसी स्नेह और प्रेम  से बुलाती थीं ! मैं उनके पास बैठ कर यहाँ वहां के बहुत से समाचारों से उन्हें अवगत करवाता रहता था ! मुन्नन का क्रोध बहुत जल्दी ही सातवें आसमान पर चढ़ जाता ! उधर अरविन्द अपनी छवि एक तीक्ष बुद्धि वाले की छवि बनाने में जुट गया ! तो जब मुन्नन की माता जी , अरविन्द की तारीफ़ करती तो मुन्नन अपना आपा खो बैठता !
     तभी 1964  में  जिस मकान में हम लोग रहते थे , उसे संतोष बाबू ने खरीद लिया ! हमें आनन् फानन में मकान बदलना पड़ा ,,तो हम देवी जी की मड़ियाँ के पास , जैन परिवार के मकान के बगल में बने एक मकान में शिफ्ट हो गए !
    नत्थू शर्मा का चौराहा छूटते ही ,, हमारा सम्बन्ध मुन्नन के परिवार से पूरी तरह छूट गया !

     लेकिन मुन्नन के साथ बिताये  दिन , और उस परिवार के लोगों की यादें मेरे मन पर आज भी अमिट  हैं !  शारदा बाबू का व्यक्तित्व ,, और उनकी जमींदारी की ठसक , उनका अतीत भी , ,,मेरे  लिए एक यादगार बात है ! ,

--सभाजीत