शनिवार, 9 सितंबर 2017





  **** " सबूत " *****

   वह एक लम्बी टाटा सफारी गाड़ी के सामने तनी हुई खड़ी थी ! वह ट्रेफिक पुलिस की वर्दी में थी और साथ में थे दो , डंडा धारी सिपाही !
  वह बार बार हाथ में लिया हुआ एक नोटिस लहरा रही थी ,,,और गाड़ी का मालिक   अपनी  गाड़ी के   डोर पर अड़ा हुआ उसे घूर रहा था ! गाड़ी का मालिक बार बार उसे कह रहा था --- ' मेडम आप मुझे जानती नहीं है ,,इसलिए ये बत्तमीज़ी कर रही हैं ,,!  आज तक किसी ट्रेफिक इन्स्पेक्टर की हिम्मत नहीं हुई  जो वह हमारी गाड़ी का चालान काट देता  ! आप नयी हैं इसलिए मैं आपको माफ़ कर रहा हूँ ,,! "

   लड़की ने कहा , ... ' मुझे फर्क नहीं पड़ता की मैं नयी हूँ या पुरानी  " आपने अपनी गाड़ी पार्किंग लाइन के बाहर रोड पर खड़ी  है ,,नियम के अनुसार यह , अपराध है , और इस पर आपका यह चालान मेने काटा है   आप चाहें तो अभी भुगतान करदें या फिर कल हमारे दफ्तर में आकर भुगतान करदें ,,,!  यदि भुगतान नहीं किया तो हम आपकी गाड़ी सीज़ करवा  लेंगे   !"

   इस बीच कुछ तमाशाइयों की भीड़ वहां जुड़ने लगी !  कुछ संभ्रांत लोग भी आ गए !

   एकत्रित लोगों में कुछ लोग दांत निकालते हुए  गाड़ी मालिक की तरफदारी करने लगे ,,!  वे उस लड़की से बोले ,,
   
        "  हद हो गयी ,,! आप गाड़ी पर लगा पार्टी का झंडा नहीं देख रहीं ,,?   ये शहर के बड़े नेताजी की गाड़ी है ,,,कम से कम इसे तो बख्श दो ,, आज अगर पैसा उगाना ही है तो किसी और चौराहे पर खड़ी हो जाओ ,,,लगता है आपका टारगेट पूरा नहीं हुआ इसलिए आप अड़ गयीं हैं ! "

    लड़की की आवाज़ तल्ख़ हो गयी ,,,वह बोली ,," आप अपनी राय अपने पास रखो ,,!  यह सरकारी मामला है ,,,इसमें दखल डालने पर आप पर भी कार्यवाही हो जाएगी ,,समझे ,,! "

    राय देने वाला व्यक्ति कुछ कहता इससे पहले ही भीड़ को हटाता हुआ एक स्थूल शरीर का युवा नेता आगे आगया ,,,! उसने गाड़ी मालिक से पूछा -- " क्या हुआ भैया " ?

   गाड़ी मालिक ने  लापरवाही से उस पर निगाह डाली ,,,और बोला ,,"  अरे कुछ नहीं ,,,नयी नयी   नौकरी है ,,,वर्दी का रौब दिखा रही हमें ! "  वह स्थूल काय युवा उस लड़की की और मुखातिब हो कर कहने लगा ,,,___

      " मालुम नहीं की यह विधायकजी के भतीजे है ,,,मुन्ना बाबू ,,! पूरा शहर इन्हे जानता है  और आप इन्ही से पंगा ले रही हैं ,,, आप इन्हे जाने दीजिये ,,,इस पी साहब आपको इन्हे चालान देने पर कोई तमगा नहीं दे देंगे ,,बल्कि आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी  समझीं ,,"

   मुझे यह जान कर क्या करना है की कौन किसका रिश्तेदार है या कौन नहीं ,,! " ---- लड़की ने तल्खी से जबाब दिया ,,, आप सब खुद देख लें की यह गाड़ी साइड की पटरी पर बनी सफ़ेद पार्किंग लाइन के  बहुत बाहर रोड पर खड़ी है ,,,अभी बहुत सी गाड़ियों का रेला यहाँ फंस गया था जब ये गाड़ी लॉक करके शॉपिंग करने गए थे ,,"

     अब कुछ सभ्रांत लीग नहीं बीच में कूदने लगे ,,!  बोले ---- क्या विधायकों के रिश्तेदारों के लिए कोई अलग से ट्रेफिक नियम बने हैं ,,?? हम सबने भी तो अपनी गाड़ियां यहां पार्क की थी ,,लेकिन सब सफ़ेद लाइन के अंदर थी  ,,! "

  गाड़ी मालिक ने उन लोगों को घूर कर कहा --" आप लोग चुप रहें ज्यादा नेतागिरी ना करें ,,, पुलिस रोज शरीफ आदमियों को ट्रेफिक के नाम पर परेशान करती है ,,,लेकिन जब उन्हें अपने अफसर के लिए पैसे की जरुरत पड़ती है तो वे ' वसूली ' में उतर आते हैं ,,मैंने तो यही देखने के लिए जानबूझ कर गाड़ी रास्ते में खड़ी की है ,,देखें कौन मुझसे पैसा वसूलता है ,,? "!

   सभ्रांत लोगों में से एक बुजुर्ग ने आपत्ति की ,,,--" लेकिन आप सरेआम गाड़ी सड़क के बीच खड़ी किये हैं ,,,और फ़ालतू बातें कर रहे हैं ,,?   आपको चालान की राशि जमा करने में क्या आपत्ति है ,,?? "

    स्थूलकाय युवा नेता बोला ,,,--"ऐ ययय   चाचा ,,, अपने काम से काम रखो    अब यह इज्जत का सवाल है ,,,भैया जी आप गाड़ी चालु करो  ,,, आगे बढ़ाओ देखते हैं कौन रोकता है ,,??

     लड़की गाड़ी के सामने  जम  कर खड़ी हो गयी ! वह हिलने का नाम भी नहीं ले रही थी ! पता नहीं किस मोरल वेल्यू से प्रभावित हो कर उसके साथ के सिपाहियों ने भी डंडे सम्हाल लिए !

   तभी कार का शीशा  नीचे  हुआ  और  कार के अंदर बैठी  एक वृद्धा महिला ने झाँक कर  पूछा --" क्या बात है मुन्ना ,,,क्यों रार बढ़ा रहे हो ,,?? "

   गाड़ी  मालिक ने कार में बैठी मां को समझाते हुआ कहा। ."कुछ नहीं ,,,कार का  ऐo  सीo   चालु है ,,आप आराम से बैठो ,,थोड़ी देर में  चल रहे  हैं ,,! "

    स्थूल काय युवा नेता ने कहा ---' भैयाजी आपसे कहा ना आप कार में बैठ कर कार आगे बढ़ाओ ,,, आपको कोई नहीं  रोकेगा  !  मैं डी एस पी साहब को फोन करता हूँ !  "

    गाड़ी मालिक कार में बैठ गया ,,, लड़की कार के सामने अपने सिपाहियों के साथ खड़ी रही ,, गाड़ी मालिक ने कार को झटके के साथ,, बैक,, किया ,,लोग हट गए ,,,फिर गाड़ी मालिक ने कार को थोड़ा साइड करके  सफ़ेद लाइन के अंदर कर  दिया  ! दरवाज़ा खोल कर वह फिर बाहर आया और बोला ---" राजू,,,,अब  बुलाओ डी एस पी साहब को ,,इन्हे इनका आयना दिखा दूँ ,!

   ज्यादा देर नहीं लगी ,,,डी एस पी साहब की पीली बत्ती वाली गाड़ी वहां उपस्थित हो गई !  वर्दी वाली लड़की ने आगे बढ़ कर अपने अफसर को सेल्यूट किया  ,! अफसर ने गुर्राई आवाज़ में पूछा ,,--" क्या बात है इंपेक्टर प्रीती ' सड़क पर क्यों मज़मा लगाए खड़ी हो ,,??

    लड़की कुछ जबाब देती उससे पहले ही गाड़ी मालिक बोल उठा ,,__' नमस्कार डी एस पी साहब ,,!  ये आपने कैसे कैसे इंस्पेक्टरों को भर्ती करवा   लिया  डिपार्टमेंट में ,,??

    दी एस पी ने गाड़ी मालिक को देखा और  कूद कर बाहर आगया ,,, बोला ,," अरे  मुन्ना  जी ,,आपने फोन पर याद  किया था हमें क्या परेशानी हो गयी आप  को हुकुम करें ,,! "

    गाड़ी मालिक ने आँखे तरेरते हुए कहा ---  आप खुद देख  लें ,,मेरी गाड़ी पार्किंग लाइन के अंदर खड़ी है ,,,मेरी माताजी बीमार हैं ,, यहाँ कुछ शॉपिंग के लिए दवाइयां लेने आया तो आपकी इन  इन्स्पेक्टर साहिबा ने मेरे ही गाड़ी का चालान काट दिया ,,,,और पैसे मांगने लगीं ,,  अरे आप लोगों को कभी जरुरत हो तो हमें ही सीधे आदेश दे दिया करें ,,, ये चालान से वसूली का नाटक क्यों करते हैं ,,!
! "

   लड़की बिफर गयी  बोली --"  झूठ बोल रहे हैं ये सर ,,! ,,इन्होने अभी अभी यही गाड़ी बेक करके पार्किंग लाइन के अंदर की है ,,! "

    " भाई सत्यवादी हरिश्चंद्र तो पुलिस में ही होते है ,, सबूत सामने है ,,,गाड़ी कहाँ खड़ी है  दिख रही है  ,,,फिर भी अड़े बैठे हैं ,,, पैसे जो चाहिए इन्हे ,,! " ... गाड़ी मालिक का चमचा नेता राजू बोला ,,!!

  ,,,"  आप चाहें तो भीड़ में खड़े इन लोगों से पूछ लें ,,, ये बताएँगे आपको ,,! " --- लड़की ने प्रतिवाद किया ,,!
      डी एस पी ने  इन्स्पेक्टर को डांटते हुए कहा ,,," क्या मुझे नहीं दिख रहा की गाड़ी कहाँ खड़ी है ,,,जो और लोगों से पूछूं ,,? यह  नोटिस केंसिल करो , मुन्ना भैया को जाने दो ,," "

     अब लड़की जान की परवाह किये बिना अड़  गयी ,,,"  मेरे पास सबूत है सर ,,,ये देखिये ,,,मेरे मोबाइल में फोटो है ,,,गाड़ी इन्होने पहले जहाँ खड़ी थी वह साफ़ साफ़ दिख रहा है ,,! "

      ,,," अरे छोडो मोबाइल ,,,और फोटो ,,,अदालतें सबूत में गवाह मांगती हैं मिस प्रीती ,,बेकार की जिद ना करो  मुन्ना बाबू को जाने दो ,,! "

     इन्स्पेक्टर रुआंसी हो गयी ,,,बोली ,,,' सर,,,,! मेरे सिपाही ने वह वीडियो  भी  बनाया है जिसमें ये गाड़ी बेक  कर के गाड़ी को पार्किंग लाइन के अंदर कर रहे हैं ,,, ,,,पूरी भीड़ खड़ी है ,,! "

     '  कौन सी भीड़ ,,?? "--- राजू हंसने लगा ,,! ,,,वह भीड़ की और मुखातिब हो कर  बोला --- ' क्यों भाइयो  ,,?? आप लोग जाएंगे अदालत में गवाही देने ,,??
 
    पल भर में भीड़ खिसकने लगी ,.,,!   गाड़ी  मालिक विजेता की मुद्रा में प्रीती को देखने लगा ,,, बोला     "   डी एस पी साहब ,,,ऐसे अफसरों को पब्लिक ड्यूटी में क्यों लगाते हैं ,,,जिन्हे  समझने बुझने की तमीज नहीं ,,,वो तो में हूँ ,,कोई और होता तो इतनी देर में बलवा हो जाता ! "

   "  आप फ़िक्र ना करें मुन्ना भाई ,,,में प्रीती को पब्लिकडयुटी से हटा कर आफिस अटैच कर दूंगा ,,, आखिर हमारा भी तो फ़र्ज़ है ,,, पब्लिक के साथ ' ना इंसाफ़ी ' ना हो ,,! "


     प्रीती ने एक बार फिर कोशिश की ,,," लेकिन सर  ये फोटो , ये वीडियो झूठे नहीं है ,,,ये पूरा सबूत हैं ,,, इन्होने नियम तोड़े हैं ,,! "

    अब डी एस पी साहब का पारा चढ़ गया ,,,"  शट अप ,,,!! तुम हमीं से जबान लड़ा रही हो ,,, ? ये सबूत किस काम के ,,जब कोर्ट पूछेगा ,,,है कोई ' चश्मदीद गवाह " ,,??

,,,, तभी कार की खिड़की खुली ,,! कार में बैठी वृद्धा बाहर निकली ,,-- बोली --" हाँ में हूँ चश्मदीद गवाह
   मेरा बेटा झूठ बोल रहा है डी एस पी साहब ,,, इसने कार गलत खड़ी की थी ,,,और उस लड़की ने सही चालान काटा ,,! "

    महिला को देखते ही डी एस पी ने आदर से  महिला को प्रणाम किया ,,,,!   बोले ''' अरे आप इतनी देर से अंदर बैठी सब देख रहीं है भाभी जी  ,,,लेकिन चुपचाप बैठी रहीं ,," ,,!

   "  हाँ में सब देख रही थी सब सुन रही थी ,,,देख रही थी की मुन्ना कब तक अपनी औकात की धौंस दिखाता है ,,",,!

       गाड़ी मालिक अचकचा गया ,,,कुछ बोलने को हुआ की  वह वृद्धा फिर बोल उठी ,,, " तेरे पिता  फ्रीडम फाइटर थे ,,, उन्होंने  लाठियां   झेली  जेल गए ,,,लेकिन झूठ कभी नहीं बोले ,,,!  यही कारण है की उनके मरने के बाद उनके सबसे छोटे भाई को जनता ने उनकी साख पर विधायक बनाया !  आज तू उस विधायकी की धौंस उसे दिखा रहा है जो कानून की हिफाजत में लगी है ,,? लानत है तुम पर ,,,कोई नहीं देगा तो में दूंगी गवाही कोर्ट में बेटी ,,,तुम वह चालान इस कार पर चिपकाओ ,,,देखें कौन तुम्हे रोकता है ,,? "

    अब बचे खुचे लोगों में सन्नाटा खिच गया    जैसे  सब को सांप सूंघ   गया  हो ,,!

    गाड़ी  मालिक   पर  तो जैसे घड़ों पानी फिर गया था !    उसने चुपचाप बटुआ खोला चालान के पांच सोउ रूपये निकाले    और सर झुका कर बोला ,,"" आय एम् सारी  प्रीतीजी ,,!  आप यह रसीद काटें ,,,अब इसके बाद ऐसे गलती में कभी नहीं करूंगा ,,!!


,,,,,,, सभाजीत शर्मा
 i


गुरुवार, 7 सितंबर 2017



कमर भर पानी में ,
खडे होकर ,
अपलक ताकते हुए .. आसमान में .,

एक अंजुली पानी .
.फेंका था ..,
तुम्हारी तरफ ...,
जो वापिस आ गिरा 
मेरे ही मुह पर ... ,
शायद तुम प्यासे नही थे ,
प्यासा था ...मै ही ..!

हाँ ...प्यासा था मैँ ...,
साल के पन्द्रह दिनो में .,
तुम्हे याद करने के लिये ..,
इन पन्द्रह दिनो में ही तो ..,
एक दिन तुम्हारा था ..,
जन्म का नही .,
तुम्हारी मृत्यु का ...,
उस विदा का .दिन ,
जब तुम चले गए थे ,
सदा के लिये ...!!

य़ाद आने को तो ,
कई बातें थीं ...,
तुम्हारी ऑर मां की ..,
वो मां का कंघी काढ देना ..,
मोजे पहनाना ..,
और तुम्हारा ..
सायकिल में लगी छोटी सीट पर मुझे बैठा कर ,
बाजार ले जाना ..,!
अपना पेट काट कर ,
मुझे पढाना ..,
ऑर मेरे अफसर बनने पर ,
गर्व से मुझे निहारना ..!!

लेकिन पन्द्रह दिन तो ,
यूँ ही गुज़र गये ...,
इधर उधर पानी देते ,
कोवों को बुलाते ..,
पंडित को खिलाते ..,
ना तुम याद आये ना तुम्हारी य़ादें ..!

एक दिन ,तुम्हारे ..,टूटे बक्से में .
दिख गये ...तुम ऑर मां ,...एकसाथ ..!
जब एक पैन ..ओर पुराना टिफिंन ..
एक कोने में धन्से हुए , टकरा गये मेरी ऊँगलियो से ..,
ना जाने क्यू ..
सहसा ..बिलख गयीं ..मेरी आँखे ..,
फफ़क कर रो पडा मैं ..,
वह पानी ,
धार बन कर बह गया , आँखो से ..,
अविरल रुका ही नही ,
ज़िसे मैने फेंका था ...अंजुली भर ..,
नदी में धन्स कर .., 
मेरे होठों को कर गया ..तर ., 
आकंठ की 
लगा अब कोई प्यासा नही ..रहा ..,
ना तुम ..,
ना मैं .. !!



sabhajeet 


शनिवार, 17 जून 2017


पिता ,,,!
 
   तुम्हे याद करता,,,, गर भूल जाता  जब ,,!
 लेकिन तुम्हे भूला ही कब ,,??

मेरे बेटे ने ,
मुझसे बहस की ,,,बराबर हो कर ,
तो मुझे लगा ,,,
 जैसे में खड़ा हूँ ,,,बेटा बन कर ,
और तुम खड़े हो मुझमें  समाये .!
वही धैर्य ,  वही  समझ , वही चुप्पी ,
लगा जैसे गुजरे दिन  फिर लौट आये ,,!

 पत्नी ने   ,
  बेटे  की हिमायती में ,
 बदलते वक्त के तकाजे ,
 जब मुझे समझाए ,
तो लगा ,,,की तुम ही सुन रहे थे ,जैसे ,माँ से ,
 ,
 दुनियादारी की  घिसी पिटी  बातें ,,
देख रहे थे ,,,चुचाप ,,,
  वे गुजरे लम्हे ,
 जो अपनों के लिए ,
 तुमने गवाएं  ,,!

 पोते का मुंह  देख कर ,
 जब तुम्हारे नयन ,, खुशी की बूंदों से छलछलाये ,
वही खुशी के आंसू मेरी भी आँखों में ,
पीढ़ी के आगे बढ़ जाने पर ,
उमड़ आये ,,!
वो संस्कारों की गठरी ,
 जो तुमने अपने पूर्वजों से ले कर ,
 नवागतों को  सौंपी थी , ,,
 वही कर्तव्य मैंने भी दोहराये ,,!

कदम कदम पर जब ,
 तुम मुझसे छूटे ही नहीं ,
तो अब डरता हूँ ,,,की
 कैसे तुम मोक्ष पाए ,,?
जीवंत रहे हर जगह , मुझमें ही ,
तो कहाँ विसर्जित हो पाए ,,??

,,,,,सभाजीत

शुक्रवार, 17 जून 2016


    "  सावित्री " -' सत्यवान '  और ' यम ' ,,



  ' सत्यवान  ' के प्राण हरण करके ,,,,' यम '  गहन अंधकार के उस मार्ग पर चल पड़े जहाँ कुछ भी दृश्य नहीं था ! यह वह मार्ग था जहां पर सिर्फ अंधकार था ,,,अनन्त अन्धकार ,,,और प्रकाश   का प्रवेश जहाँ वर्जित था! वे सदैव की  भाँति  आश्वस्त थे  कि  उनके इस एकाकी मार्ग पर सिवा उनके कोई और  यात्रा नहीं कर सकता!   तभी उन्हें लगा ,,, कि  आज कुछ असम्भव सा होने वाला है !  उन्होंने  चारो और देखा , फिर पीछे मुड़े तो उन्हें एक ' साया ' अपने साथ साथ चलता प्रतीत हुआ !
 उन्होंने पूछा --" कौन ' ,,,?
  किंचित हास्य भरे स्वर में एक स्त्री कंठ उन्हें सुनाई दिया ---' 'सब कुछ   जानने  वाले , अंधकार में भी  चलने वाले देव ,,,क्या आप को नहीं मालुम की आप के पीछे कौन है ,,??
  यम की छठी इंद्री जाग्रत हुई !
 उन्होंने भी हास्य भरे स्वर में उत्तर दिया ,,, ' जानता हु ,,, किन्तु पहचानना नहीं चाहता !  तुम ' अश्वपति ' की पुत्री  ' सावित्री ' हो ! "
  ' आप  मेरे पिता को  पहचानते  हैं किन्तु मुझे नहीं ,,,ऐसा क्यों देव ,,?? "
  यम  गम्भीर हो उठे ,बोले ---  ," इसलिए , क्यूंकि ,,, ' अश्वपति '  एक तपस्वी है ,,, वह राजा के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुआ ,,,और  ' अश्व ' रूपी अपनी सभी इंद्रियों की रास को अपने ' बस ' में रखने में समर्थ है !  ' तपस्या ' एक साधना है ,,,और जो इसमें सफल होता है , 'यम ' की निगाहों में वह हमेशा आदर का पात्र होता है !'
  --- तो आप जैसे ' समर्थ देव को मुझे पहचानने में  शंका क्यों ,,??
 यम इस बार जोर से हँसे ,,,__ " तुम्हे ना पहचानू यह कैसे संभव है ,,? तुम,, '  सविता ' हो ,,, भले ही तुम्हे लोग ' सावित्री ' कह कर बुलाते हैं ,,,किन्तु मैं अपनी परम शक्ति  ' अंधकार '  की एक मात्र ' शत्रु  '   सविता को ना  पहचानूँ ,,,,?,, यह संभव नहीं ,,, तुम्हारा उदय किस क्षण हो जाएगा ,,,और तुम कब मेरे इस अंधकार के साम्राज्य को छिन्न भिन्न कर दोगी ,,, उस क्षण को पहचानना कठिन है !,  इसलिए में जान कर भी तुम्हे पहचानना नहीं चाहता !  "
 अब सावित्री भी मुखरित हो गयी  !  वह बोली --' देव  आप सूर्य ' को तो पहचानते ही हैं ना ,,? '
--- हाँ सूर्य को पहचानता हूँ ,,,जैसे अंधकार  एक ' सत्य ' है उसी प्रकार  प्रकाश ' भी ,,,और वह सूर्य का ही रूप है !   "
   --  तो '  देव ' ,,, मैं इन दोनों सत्य के बीच की  वह बिंदु  हूँ   , जहाँ से ' सत्य अपना स्वरूप बदलता है !,,,, क्या में  अंधकार और प्रकाश की तरह ,  उसी कोख से उत्पन्न हुई वह  शक्ति नहीं हूँ  जो ' सत्य ' के स्वरूप को एक क्षण में  बदल देती है  ,? "
  यम थोड़ा  थम  गए ! उन्होंने कहा ---" यह बात में जानता हूँ ,,,इसलिए इस गहन अंधकार में भी  तुम्हे  मेरे पथ का अनुसरण करते देख मुझे आश्चर्य नहीं हुआ !  तथापि अब मेरा अनुसरण छोड़ दो ,,,क्यूंकि मैं इस अंधकार में ही विलीन हो जाऊंगा ,,,,जबकि  तुम्हारा ' विलीन ' होना संभव नहीं ! "
  सावित्री हंसी !   बोली ---' आप सहर्ष विलीन हो देव ,,!  किन्तु उस ' सत्य ' के साथ नहीं  जो कभी विलीन नहीं होता ! "
    ---' किस सत्य के साथ ? "  यम  थोड़ा  हिचकिचाए  !
   --- उस सत्य के साथ जो आपकी मुट्ठी में कैद है ,,और जिसे आप सदा के लिए अंधकार में  अपने साथ विलीन कर देना चाहते हैं !"
----" मेरे मुट्ठी में तो ' सत्यवान ' के प्राण है ,,, और जिसने जन्म लिया उसे समाप्त होना ही है  यह तो नियति है सावित्री ! "
       ----' देव "   यदि सत्य को धारण करने वाला , सत्य को संचालित रखने वाला , भी अन्धकार में सदा के लिए विलीन हो जाएगा ,,,तो सत्य  किस तरह इस मृत्यु लोक में प्रदर्शित होगा ,,??
    यम अब ठिठक कर खड़े हो गए !    वे बोले--- ' सत्यवान ' अमर नहीं हो सकता सावित्री !"
'----'क्या आपका यह परम सेवक,' अंधकार ' अमर है देव ,,?  क्या 'प्रकाश भी अमर है देव ,,,"  क्या ये नित जन्मते और मरते नहीं ,,?? " सावित्री ने पूछा !
     यम समझ गए थे की वह सावित्री के वाक् चातुर्य में उलझ गए हैं ,,! सबसे बड़ी चिंता उन्हें यह होने लगी की अंधकार  के क्षीण होने का   समय भी निकट आ रहा था ,,,,और तब ' सावित्री ' किसी भी क्षण अंधकार को  प्रकाश  में बदल देने वाली थी ! अंधकार की समाप्ति का अर्थ था उनकी यात्रा में ' अवरोध ' !

   वे बोले ,,,-- तुम चाहती क्या हो  ? अपना अभिप्राय स्पष्ट करो ,,! "
    सावित्री बोली----- ' अमर तो कुछ भी नहीं देव ,,!     जन्म के बाद मृत्यु  और मृत्यु के बाद जन्म एक शास्वत सत्य है !    यही एक ऐसा सत्य है जिसकी निरंतरता बनी ही रहनी चाहिए ,,!  किन्तु देव ,,, जब ' सत्य ' को धारण करने वाले ' सत्यवान ' को ही आप अंधकार में विलीन कर देंगे तो जन्म मृत्यु के इस चक्र का ओचित्य भी क्या  बचेगा ??,,,    सत्य सिर्फ एक शक्ति है ,   किन्तु इसे धारण करने वाला ' शिव ' भी चाहिए !  भले ही निरंतरता बनाये रखने के लिए जन्म मरण हो ,,,किन्तु '  सत्यवान  ' को एक अवसर भी तो मिलना चाहिए की वह अपने सत्य को दूसरे उत्तराधिकारी  को थमा कर जाए ,,!  और मैं यही कहना  चाहती हूँ की सत्यवान ने अपना वह ' कर्म ' अभी पूर्ण  नहीं किया है ,,,,इसलिए अभी आप उसे अपने साथ ले कर नहीं जा सकते ! "

    यम ने दूर नज़रें फैलाई तो पाया की अंधकार क्षीण होने लगा था ,,! सावित्री की आभा बढ़ रही  थी ,,,, अब अंधकार में यात्रा संभव नहीं थी !    उन्होंने पुनः सोचा  और निश्चित किया की "  सत्यवान ' को उन्हें लौटा देना चाहिए ,,, जब तक वह अपना कर्म पूरा ना करे ,,,और सत्य को धारण करने वाला अन्य व्यक्ति पैदा ना कर ले उसे मृत्यु देना उचित नहीं !  रह गयी ' समय ' चक्र की बात तो वह तो चलायमान है ,,,स्थिर नहीं की पुनः लौट कर ना आये ,,!

     यम  ने मुस्करा कर कहा --- ' शब्द ' भी एक ' शक्ति ' है सावित्री ,,,, यह समय को बाँध  सकती  हैं ,,, विचारने को विवश कर  सकती  हैं ,,,शब्द ,,  जय पराजय के प्रतीक हैं !  तुमने जिस शब्द शक्ति के प्रयोग से ' सत्य ' की व्याख्या ' की वह स्तुत्य है !  मैं तुम्हारे लिए ' सत्यवान ' को छोड़ रहा हूँ ,,, किन्तु इसे   निरंतरता देना तुम्हारा कर्तव्य है !   जाओ तुम वापिस लौट कर अपने उस ' सत्यवान  ' से मिलो जिसकी अभी   उस मिथ्या जगत में  जरुरत ,,शेष है " ,,! "
 यह कह कर यम अंधकार में विलीन हो गए !
  प्रकाश की वह ' आभा ' फूट पडी थी ,,, जिसे लोग " पौ फटना ' कहते हैं !


---------"  सभाजीत शर्मा ' सौरभ '

शनिवार, 7 मई 2016

 ******

इधर कुछ दिनो से , कई मित्रों के ब्लॉग मे , प्यार को लेकर कई किस्से लिखे जा रहें हैं !प्यार क़ी कथाओं का अंबार लगा है !बुक में फेस है  , फेस पर पूरी बुक है , वाट्सअप  पर मेसेज हैं ,मेसेज में बूझो तो प्यार  है ,,,   प्यार पर कविता है , कविता में प्यार है ,,  और प्यार क़ी परिभाषाएं भी अपरम्पार हैं ,,! !

ऐसे  मे मेरे टुटपूंजिया विचार वाले ब्लॉग पर जब कोई टिप्पणी मुझे नही मिली तो मेरे  दिल ने कहा,-

 ' यार !! तुम भी तो सोचो ,कुछ  लिखो , लोगों को बताओ की प्यार क्या है ,,!  क्या तुमने कभी प्यार किया ?या फिर तुम्हे भी कभी प्यार हुआ ?'

दिल के उकसाने पर जब  मेने यादों क़ी पिटारी  खोली तो प्यार का एक  वाक़या , जो आक्सीजन लेने के लिए कई सालों से दिल की कोठरियों में , आजीवन सज़ा भोगता ,  अंदर छ्टपटा रहा था, उछल कर बाहर आ गया !उसे देखते ही मेने कहा ;- ' हाँ शायद यही है वह सब कुछ , जिसकी मुझे  जरुरतहै  क्योंकि मैं उसकी पहरेदारी करते करते   चुक  चुका था ,,और वह भी अँधेरे में पड़े पड़े मरणासन्न हालत में पहुँच चुका था ! इसलिए अब उसके आज़ाद होने  न होने  से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था !

  
 आज से  करीब ४० साल पहले ,,,सन 1974 मे ,  शायद में चौबीस वर्ष का  रहा होऊंगा ! यह   उम्र प्यार के लिए बिलकुल मुफीद थी ,,क्योंकि तब मैं  जवान था !,,कहते हैं ,, ,,, प्यार के लिए जवानी  उतनी ही जरूरी  होती है , जितनी क़ी बिजली को बहने के लिए तार क़ी ! बिजली को अगर बहने के लिए तार चाहिए तो जवानी को ठहरने के लिए प्यार चाहिए !
उस वक्त़ , प्यार करने के लिए मुझमे पर्याप्त गुण मौजूद थे , जैसे क़ी में गिटार बजाता था, कविता लिखता था,गीत गाता था, और चश्मा लगाता था !
चश्मा लगाना उस समय का एक उच्चस्तरीय गुण था क्योंकि फ़िल्मो मे हीरोइने या तो चश्मा लगाने वाले अमिताभ , जितेन्द्र, जैसे जीनियस हीरो पर मरती थी या फिर अमोल पालेकर जैसे किसी निरे बुद्धू किरदार  पर.!
खैर !!..
,,,, मैं  जीनियस दिखने क़ी कोशिश करता था, और यह अंदाज़ लगाने क़ी कोशिश करता रहता था कि जीनियस दिखने के कारण ,  कितनी युवा लड़कियाँ मुझे आँखों क़ी कोर से निहार रही है ! .,उस समय शर्म और प्यार का कॉकटेल चलता था,,,,  नीट  प्यार नही चलता था,,इसलिए यह जांनना बड़ा मुश्किल था की कोई मुझे प्यार कर रहा है या नहीं ,,! फिल्मों में  भी उस समय  तक ,,सीधे सीधे ,," आई लव यूं  " का डायलॉग पैदा  नहीं हुआ  था !
!एक दिन मेरे एक विभागीय मित्र ने मुझे फिल्म दिखाने को कहा ! मैंने  उसकी बात मान ली ! क्यौकि वह मेरा मित्र ही नही, मेरा हम उम्र और मेरा  गहन प्रशंसक था ! इतना गहन प्रशंसक  कि  अगर  वह कोई लड़की होता तो   मैं शायद  उसके प्यार मे फँस कर उसी से विवाह कर लेता !
उस छोटे से शहर मे बालकनी से फिल्म देखने वालों कि संख्या बहुत थी !इसलिए हमे बालकनी में सबसे पीछे की कतार का टिकट नहीं मिला  बल्कि  बीच क़ी कतार का टिकिट मिला !टिकिट ले कर हम दोनो टाकीज़ मे घुस कर अपनी सीट पर बैठ गए !
थोड़ी देर मे सभी सीटें भर गयी, और स्क्रीन के पीछे  लगा स्पीकर उस समय के  हिट गाने बजाने लगा ! बैठने के बाद ,  आदतन मेने अपने चारों ओर निगाहें घुमाई - कैसे कैसे लोग,और कैसी कैसी युवा लड़कियाँ कहाँ कहाँ बैठी है,, ज़रा देख तो लूँ  ,,!! !
देखा तो मेरे आगे क़ी दो कतार छोड़ कर  , तीसरी कतार से एक सुंदर आकृति , घूम कर मेरी ओर देख रही थी !मुझे खुद  क़ी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई और उसने  तुरंत अपना मुँह वापिस मोड़ लिया  !

बला का सौंदर्य था !-
गोरा रंग,सुंदर नाकनक्श,  बड़ी बड़ी  आँखें , सुराहीदार गर्दन पर बल खाती लंबी चोटी , और गुलाबी होंठ ,, ,!! क्या मादक स्वरूप था ,,!!  में हतप्रभ रह गया !
स्क्रीन पर तो सुंदर हीरोइन दिखने मे अभी देर थी ! लकिन यह हीरोइन तो टाकीज़ मे ही विद्यमान थी  और ,, ठीक मेरी पंक्ति के एक पंक्ति के आगे ,,!!
तभी उस मूर्ति ने फिर पीछे मूड कर देखा !- उसके पतले गुलाबी होंठ प्यार क़ी मुद्रा मे हँसे, और फिर फैल गए , छिपे हुए दाँतों क़ी धवल पंक्ति भी अपनी छटा बिखेर गई !

मुझे देख कर उसने फिर अपनी गर्दन वापिस मोड़ ली !
यह घटना फिर से घटती, इस से पहले ही अंधेरा हो गया और स्क्रीन " फिल्म डिवीज़न क़ी ब्लेक एन्ड व्हाइट  करतूतों की  भेंट" चढ़ गई ! थोड़ी ही देर में मूल फिल्म  भी चालू हो गयी !
मेरा मन अब स्क्रीन पर बिल्कुल नही लग रहा था !मेरा मित्र मुझे फिल्म के सोन्दर्य पक्ष के बारे मे बताने लगा !मसलन- फिल्माया गया  द्रश्य कितना सुंदर है, हीरोइन कितनी भोली है हीरा उसे कैसे चाहता है वग़ैरह.वगैरह ! लकिन मे तो अपनी सीट के आगे क़ी तीसरी कतार मे नज़र गडाने लगा - ! ना जाने कब वह सुराहीदार गर्दन मुड़े और और फिर मुझे देख ले और कहीं  मैं उसकी नज़रों के तीर से वंचित न  हो जाऊं ! !
और तभी ,, फिर मेरी आरज़ू पूरी हुई ! जैसे ही स्क्रीन पर रोमांटिक गीत शुरू हुआ , फिल्म के हीरो,, हीरोइन  ने  घास पर लोटें , लगानी शुरू कीं ,,  हीरो ने अपना मुँह हीरोइन के मुँह के पास ले जाकार गाना  गाना शुरू किया  , तभी वह गर्दन फिर पलटी!
इस बार उन आँखों मे रोमांस का नशा था !मेरी ओर देख कर वह फिर उसी अदा से मुस्करा कर ,  वापिस पलट गई ! मेरा दिलतो बल्लियों   उछलने  लगा !

 मन में एक मीठी सी गुदगुदी उठने लगी --
- " हे भगवान !! यह कौन है जो मुझ मे इतनी दिलचस्पी ले रही है ??
    इतनी सुंदर कन्या के लिए तो मे सभी गुणों से पूर्ण होने पर भी खुद को उसके योग्य नही समझता था !
    

 नशे के घूँट  पीता  हुआ बेसुध सा मैं  फिल्म मे क्या हुआ कैसे हुआ   कुछ  नही देख पाया !सिर्फ़ सम्मोहित सा टकटकी लगाए , अंधेरे मे आगे क़ी तीसरी पंक्ति की   सीट पर आँखे गड़ाए बैठा  रहा !
तभी इंटरवल हुआ , और हॉल रोशनी से जगमगा उठा !
लकिन इस बार उस लड़की ने पीछे  मुड़कर नही देखा !
मेरे दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे हिलाया और कहा - " चलो सौरभ चाय पिलाओ !"
में अनमने भाव से उठ गया !  चाय के स्टाल पर कुछ  और दोस्त मिले -सभी ने कमेंट किए _ क्या शानदार फिल्म है !! ,तुम्हे कैसी लगी सौरभ ?
 मैं  चुप रहा !,,,,,मुझे जो शानदार दिखा था ,उसके आगे फिल्म  देखने का कोई अर्थ न था ! मुझे जो दिख गया था उसे मैं  भूल नही पा रहा था !
बाहर  निकल कर ,,लाबी मे आकर मेरे मित्र ने  पूछा --
-"क्या बात है यार ? खोए खोए से क्यो हो ? क्या सेंटिमेंटल हो गए हो ?"
मेने कहा - " नही यार !!"
-"तो कुछ तो  है ही ,,,, बतलाओ !!"- मेरा दोस्त मेरे पीछे ही पड़ गया !
मेने सोचा - फिल्मों मे हीरो के प्यार का राज़दार उसकाअपना प्यारा  दोस्त ही तो होता है ! तो क्यों ना मे अपने इस दोस्त को अपना राज़दार बना लू ?
मेने उसे बताया _ "यार ! टाकीज़ मे मेरे सीट के आगे बैठी एक लड़की मुझे मुड़   मुड़  कर,, बार बार देख रही है !मैंने पहले उसे कभी नहीं देखा ,,मुझे समझ में नहीं आ रहा है की वह ऐसा क्यों कर रही है ,,!
दोस्त मुस्कराया ,! फिर रुक कर  धीरे से  बोला -"  यह प्यार का मामला है - 'भाई ! तुम प्यार को पहचान नही रहे हो ! "
-" लकिन मेने तो उसे पहले कभी देखा ही नही !"-
-"  तुमने उसे भले ही ना देखा हो ,पर उसने तुम्हे पहले ज़रूर देखा है ! हो सकता है - कभी तुम गिटार बजा रहे हो और वह श्रोताओं मे बैठी रही हो ! या फिर तुम कविता पढ़  रहे हो और वह प्रशंसकों  में बैठी हो ,, ..तब,..या फिर.कभी तुम ,,,,,,,,!.""
-" बस बस रहने दो भाई !!,,, मैं इतना जानता हूँ की मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा ,, अब  चलो जल्दी अंदर चलो मे तुम्हें उसको दिखाता हूँ !"
में उसका हाथ पकड़ कर वापिस हाल मे आया  !

लकिन मेरी किस्मत !!- उसी समय हाल मे फिर अंधेरा हो गया !
अपनी सीट पर जाकर हम लोग बैठ गये ! मेरे दिल मे थोड़ी थोड़ी गुदगुदी होने लगी! मेने तब तक प्यार सिर्फ़ फिल्मों मे ही देखा था !लकिन ना तो प्यार किया था और ना ही मुझे प्यार हुआ था ! लेकिन आज  यह घटना तो जैसे  मुझे प्यार के पोखरे मे डुबोने जा रही  थी!
यह कैसे मुझे जानती है ..?क्या वाकई मेरे किसी गुण से प्रभावित है ..?क्या वाकई मुझ से प्यार करना चाहती है ..? या इसे  मेरी सूरत शक्ल  भा गयी ,,?   मे धीरे धीरेपोखरे में  डूबने लगा !
तभी मेरे दोस्त ने मेरा हाथ दबाया ! मेने चौंक कर उसे देखा तो उसने अंधेरे मे मुझे इशारा किया - -,
सामने क़ी सीट क़ी गर्दन फिर  मुड़ी  हुई थी !लकिन जब तक मे उसे देखता वह फिर सीधी हो गई !
फिल्म का समय जल्दी ही ख़तम हो गया ' दी एंड ' के पहले ही  अपने अपने परिवारके साथ आये सभ्य लोग उठ कर दरवाजे क़ी ओर बढ़ लिए !जल्दी ही दरवाजे पर भीड़ जमा हो गयी !इस धक्कामुक्की में हम लोग पीछे हो गए !
  मैं धक्का खाते हुए दरवाजे से  जल्दी बाहर निकलने क़ी कोशिश करने लगा - ताकि बाहर निकल कर उस सुंदर कन्या को पूरी तरह ठीक से देख तो  सकूँ !
लकिन ऐसा नही हुआ !

  भीड़ ने मुझे बहुत पीछे  धकेल दिया था  !

-ज्यों त्यों बाहर आकर ,  मित्र का हाथ पकड़ कर मे जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरने को हुआ तो देखा  कि वह कन्या पूरी सीढ़िया उतर कर मुझ से काफ़ी आगे निकल गई है !
 भीड़ मे जगह बना कर मैं  तेज़ी से नीचे उतरा ! लकिन तब तक वह कन्या बाहर लान मे पहुँच गई - और एक लेंब्रेटा स्कूटर पर उचक कर बैठ गई !
मुझे  कुछ  दिखा नही तो मेने उस लेंब्रेटा का नंबर नोट कर लिया !
 नंबर प्लेट यद्यपि बरसात मे पानी खाकर धुंधली  हो गई थी , फिर भी मेने उसका नंबर हथेली पर लिख लिया
- एल ओ वी 22 16... !
  मुझे तसल्ली हुई ,,,कम से कम अब मुझे उस कन्या के बारे मे एक सूत्र मिल गया था ,,,,लॅंब्रेटा का नंबर..!
तभी मेरा दोस्त आ गया !  बोला --
- " क्या हुआ यार !! तुमने उसे देखा..?"
-" नही यार !! नही देख पाया ! लकिन वह लंबी , छहररे बदन क़ी सुंदर लड़की है !! बाकी उसकी अदाएं तो देख ही चुका हूँ !"
दोस्त फिर मुस्कराया , बोला- "मेने काफ़ी कुछ  देख लिया  - यार! वो  मेरी भाभी बनने लायक है !"

" भाभी ??" - मैं  चौंका !

- " हाँ भाभी !! यानी तुम्हारी पत्नी !" -- अब दोस्त भी शरारत से मुस्कराने लगा !

मेरी बची खुची बुद्धि भी ख़तम हो गई !!,,,,मेने कहा -
" लकिन मे तो उसे  जानता  ही नही "
दोस्त बोला -" अब हम उसे जान लेंगे ! लेंब्रेटा का नंबर है  न हमारे पास !"
मेने गिरते पड़ते अपनी मोटर साइकिल क़ी ओर कदम बढ़ाए !! दोस्त को घर ड्राप  कर  के मैं  जब अपने घर पहुँचा  तो देर रात तक पहले तो नींद नही आई,!

और जब आई तो स्वप्न मे मुझे कई लेंब्रेटा दिखे !
   

*********                                     
                                       ..............
दूसरे दिन मेरे प्यारे दोस्त क़ी मेहरबानी से , यह खबर बिजली क़ी तरह मेरेअन्य  दोस्तों के बीच फैल गई !

किसी को विश्वाश ही नही हुआ , कि में प्यार भी  कर सकता हूँ - अथवा  मुझे प्यार हुआ  होगा ! क्योंकि प्यार के प्रयोगात्मक कार्य मेने कभी किये ही  नही  थे !

  जबकि मेरे मित्रों मे सभी तरह  लोग थे !

सिविल कांट्रेक्टर, लेखक, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, गीतकार , संगीतकार वग़ैरह वग़ैरह..,!

मुझ से मिलने पर वे सब  पूछने लगे -

" मिला लेंब्रेटा का पता ..?"
  लेकिन  में क्या जबाब देता ..??

मेरे एक मित्र जो इरिगेशन विभाग मे इंजीनियर थे , प्यार मे बहुत एक्सपर्ट थे ! उन्होने कई बार प्यार किया था !और प्यार के सभी लटकों झटकों से परिचित थे!उनके लिए प्यार तो जैसे कबड्डी थी !
एक और मित्र जो साउथ इंडियन थे , उन्होने प्यार करके एक बंगाली लड़की को अपनी पत्नी बनाया था , अपनी पत्नी के अलावा वे  मुझे  भी बहुत चाहते थे !उन्हें मुझ पर बहुत तरस आता था की मैं इस मामले में कितना नादाँ हूँ !!
एक तीसरे मित्र एक कालेज के  प्रोफ़ेसर थे !उन्होने एक डिप्टी कलेक्टर की बेटी के प्यार मे डूबकर , घर से भागकर आर्य समाज मंदिर मे विवाह किया था ! फिर वे एक महीने गायब रहे थे ,,क्योंकि उनके भावी ससुर ने पुलिस पीछे लगा दी थी ! बाद में बेटी ने ही मामला सुलटाया !
ये सब मुझे प्यार से ग्रसित  मानकर , मेरी मुफ़्त सेवा के लिए तत्पर हो गए !

 और दुसरे दिन ही  ग्रुप बना कर , सब लोग एक साथ मेरे घर आ धमके !
बोले -

" हम आज ही से शुरू करेंगे अभियान..!"

"कैसा अभियान ? "- मैंने  सकपका कर पूछा !

मेरे अभिन्न मित्र ने , जो टाकीज़ मे मेरे साथ था ,  मुस्कराकर  कहा -
" देवी सीता को  ढूंढने  का अभियान "

सभी लोग एक बार ज़ोर से हँसे !फिर मेरी ओर शरारत भरी निगाह उठा कर बोले-
" अपनी भाभी को तलाशने का अभियान !"

 लेकिन मैं  न हंस सका , न गंभीर हो सका!
 और उधर  ,,दिल था की मान ही नही रहा था कि वह लड़की मुझे नही चाहती होगी,
  ,,, उसका टाकीज़ मे मुड़कर देखना और मुसकराना मुझे बार बार याद आ जाता था !
  फिर भी अपने मन को दबाकर मैं  मौन ही रहा !-क्योंकि एक " भाभी " 'शब्द मेरे दिल मे गुदगुदी करने लगा था !

मेने कहा-

" लकिन कैसे ? में तो उसे जानता ही नही, कभी भी पहले उसे नही देखा ! सिर्फ़ एक स्कूटर का नंबर  है मेरे पास !"

वे  हँसते हुए बोले -- -
" वही तो है जादुई चाबी !, अब देखो हम क्या करते है!"

मेरे इंजीनियर मित्र अपने साथ एक परिचित' मेकेनेक ' को लाए थे !

उन्होने उसे नंबर देते हुए कहा-

" शहर के  हर मेकेनेक की  दुकान को छान मारो  !यह स्कूटर कहाँ सुधरता है , शाम तक पता लगा कर बताओ 

 !"
मेकेनेक ने नंबर को कई बार देखा- पढ़ा, शारलक होम्स कि तरह उसकी चतुर आँखे फैली और सिकुड़ी, लकिन उन मे चमक नही आई !

सब लोग समझ गए , वह इस नंबर के बारे में ज़्यादा कुछ नही जानता !

वह बोला -

"में राजदूत मोटर साइकिल बनाता हूँ ! लेंब्रेटा स्कूटर आजकल बहुत कम रह गए हैं - फिर भी में दो घंटे मे आकर आपको बताता हूँ !"

जब वह मुड़कर वापिस चला गया तो दोस्तो क़ी चौकड़ी फिर सक्रिय हुई !

प्रोफ़ेसर मित्र , जो इंग्लिश लिट्रेचर के प्रोफ़ेसर थे, ने पूछा -
कुछ अंदाज़ करो , वह कन्या तुम्हारे किस गुण से प्रभावित हुई होगी ?- जैसे कविता से, या गायन से या...,या तुम्हारे इस जीनियस रूप से ?..

मुझे अपने अपने ढेर सारे गुणों से चिढ़ होने लगी ! पता नही उसे क्या अच्च्छा लगा होगा ?

मुझ से तो अच्छे मेरे ये मित्र गण थे जिनके पास सिर्फ़ एक ही गुण था - ' लड़की को मोहित करने का गुण !'

मोहित करने के लिए प्रोफ़ेसर मित्र ने रोमांटिक नॉविलों का सहारा लिया था !
 साउथ इंडियन  मित्र  ने जोक्स का !
    और  इंजीनियर मित्र ने सुहाने गीतों के केसेट देकर लड़की का दिल जीता था !

सभी एक ही गुण के धनी थे !

 लड़की पटाने के ,,,!!

में ने कहा- " में क्या जानू वह मेरे किस गुण को चाहती है ?"

 साउथ इंडियन मित्र की   बंगाली पत्नी भी साथ आई थी !वह बोली -
-

"बाबा ! क्या तुम रोमांटिक कविता लिखते हो ?"

मेने कहा- " नही"

तो फिर रोमांटिक गाने ज़ोर ज़ोर से गाते हो ?

मेने कहा -
" नही भाभी ! मुझे जो अच्छा लगता है , उसे ही मैं गाता बजाता ,- लिखता पढ़ता हूँ ! मैं   तो कलाकार हूँ ,,  सिर्फ कला से  रोमांस करता हूँ !"

-"लड़की को लड़के कि कौन सी चीज़ अच्छी लग जाए ,ये तुम लोग नही जान सकते ! बासु  ने तो मुझे एक बार अपने हाथों से खाना बना कर खिलाया ,  और  मैं  इन पर मर मिटी ! क्या शानदार मच्हली बनाता है बासु  !"
सब हंस पड़े !

 लेकिन मैं चिंतित हो उठा ,,,घबराने लगा !
 ना जाने किस बात पर रींझ कर वह कन्या मुझसे प्यार कर रही होगी  ! जिस गुण  को वह मुझमें सोच रही होगी और वह उसे नहीं मिला तो आगे क्या होगा ,,? - बहुत ही भयानक बात थी !लड़कियां धोखा खाने पर भी  बहुत खतरनाक सिद्ध होतीं हैं ,,यह मैंने कुछ उपन्यासों में  पढ़ रखा था !  ,,  मैं सोच ही रहा था 
कि  तभी वह मेकेनेक विजेता कि तरह लौट कर वापिसलौट  आया!,,,आते ही बोला -

-"भाई जी ! वह स्कूटर" डी एफ ओ द्विवेदी 'का है ! बहुत बिगड़ता है, बार बार राजू मेकेनेक के गेरेज़ मे जाता है ! कई बार तो पार्ट न मिलने कारण हफ़्तों वहीं खड़ा रहता है  !"

" होय " -- सभी ने ज़ोर से एक हुंकार भरी !

" द्विवेदी डी.एफ.ओ. को  मैं  जानता हूँ !"- इंजीनियर मित्र ने कहा- " वो सिविल लाइन मे मेरे क्वाटर के आगे तीसरी लाइन मे रहते है!"

--'तीसरी लाइन'?,,,,   मैनें  सोचा - यह तीसरी लाइन टाकीज़ मे भी थी और अब फिर सामने  आ रही है ! अजीब संयोग है !

- " तो फिर पहला प्रयोग !!', आज मेरे घर मे संगीत सभा होगी, जिसमे द्विवेदी को सपरिवार बुलाया जाएगा ! सौरभ का  गिटार बजेगा!

'और अगर द्विवेदी नही आए , या वह कन्या को साथ नही लाए तो ?'

प्रोफ़ेसर दोस्त ने आशंका ब्यक्त की !

-"तो फिर हम अपने क्वाटर के उपर  लाउडस्पीकर लगाएँगे ! उसका मुँह' भाभी ' के घर कि तरफ करेंगे , ताकि प्यार कि धुनें सुन कर वह बाहर आए !"

" होय " - सभी ने समवेत स्वर मे फिर जोरदार हुंकार भरी1

में सोचने लगा - ये लोग क्या कर रहे है - !

तभी बासु  बोला -

-"अगले दिन अगला प्रयोग होगा !  मैं  कन्या के घर के ठीक सामने इस आशिक को अपने स्कूटर से हल्की टक्कर मारूँगा !ये गिर कर बेहोश होने की एक्टिंग करे - हम इसे उठाकर लड़की के घर मे ले जाएँगे - फ़र्स्ट मेडिकल हेल्प के लिए !,,,, वहाँ दोनो एक दूसरे को जी भर कर देख लेंगे !"

यह पूरी तरह फिल्मी सीक़वेंस थी ! मुझ मे अन्य गुण तो थे - लकिन मेने कभी एक्टिंग नही की थी !जो कुछ मेरे पास था ,, ओरिजनल ही था !

मेने कहा - " यह मैं  नही कर पाउगा !"

प्रोफ़ेसर ने कहा - " यह बिजली का इंजीनियर है !मीटर चेक करने के लिए वहाँ जाए !वह लड़की इसे बैठाल  कर चाय पिलाएगी और ढेर सारी मीठी मीठी बाते करेगी !"


  इस बार  "होय "- की  सबसे उँच्ची हुंकार उठी !

मेकेनेक बोला - " भाई जी ! आप अपना संदेश मुझे टेप करके देदे मे उसे दे आउग! !"

यह रिस्क थी ! टेप अगर ग़लत हाथो मे पड़ गया तो फ़ज़ीहत है !

   मैंने  कहा - " पहला प्रयोग ठीक है !  मैं  आज इंजीनियर मित्र के घर मे गिटार बजाउँगा !इससे कुछ हुआ तो ठीक  वरना मैं यह घटना भूल जाऊंगा !"
-

-'होय " - सबने फिर हर्ष मिश्रित हुंकार भरी !

   नतीज़न रात को महफ़िल सजी !

   लेकिन डी एफ ओ ने सभा मे आने से इनकार कर दिया !!

उस रात को एक लाउडस्पीकर लाया गया !, उसका मुँह कन्या के घर की तरफ किया गया !  एम्प्लीफायर  का  फुल  वोल्यूम खोला गया !

मेने गिटार पर  गीत बजाने  शुरू किए ! मेरा प्रिय गीत था - ' चंदा मामा दूर के '! उसे सुन कर दोस्तों ने मुंह बिचकाया बोले - "यह ठीक नही" !

मेने दूसरे  पुराने गीत,, शुरू किए - 'ये जिंदगी उसी की है ' , 'आजारे अब मेरा दिल पुकारा ', 'जाग दर्द इश्क जाग ,'

लकिन मेरे दोस्त झल्ला उठे !


- " ये क्या मर्सिया गा रहे हो भाई   ?? रोमांटिक गीत बजाओ  ,,!!"
   जैसे मेरे सपनों की रानी कब आएगी तूँ.... या रूप तेरा मस्ताना ,,,  !"

 लेकिन ,,नये गीतों की मेरी प्रेक्टिस नही थी , मेरी  पसंद के गीत तो पुराने मेलोडियस गीत ही थे ! ,,,फिर भी दोस्तों के कहने पर नए गीत बजाने की कोशिश करने लगा !

गीतों की प्रेक्टिस न होने के कारण गिटार बेसुरा बजने लगा !

थोड़ी देर मे , बगल मे रहने वाले , घर द्वार वाले बंगाली  मोशाय  आ गए !
बोले - " अब बंद कीजिए यह संगीत ! 'रात '' खराब' हो रही है ! सोने दीजिए हमें !"

मेरे मित्र उनसे उलझने लगे !
' हमारा घर है '-हमारा मन है ', हम जो चाहें सो करें ', वगेरह वगैरह  !

तभी मुहल्ले के बहुत से और विवाहित अन्य  सभ्य ब्यक्ति आ गए !

  वे कहने लगे की आप  लोग बेवजह शोर मचा रहे हैं ,,हमारी नींद खराब हो रही है ,,हम डिस्टर्ब हो रहे हैं ,,!
युद्ध का वातावरण बनते देख मेने गिटार बंद कर दिया !

प्रयोग की वह रात निराशा भरी रही ! उसके बाद दो तीन दिन तक सभी मित्र अपने अपने कामों में उलझे रहे , अतः कोई किसी से नही मिल पाया !

हाँ ,  मैं  ज़रूर उस डी एफ ओ के क्वार्टर के सामने से एक  बार गुज़रा लकिन मुझे वह चेहरा दोबारा  नही दिखा !

  बल्कि ,,मुझे उस क्वार्टर के माली ने घूमते देख कर टोका -

" राह भटक गये हो क्या साहब ?"
  मैनें  शरमा कर कहा - " कुछ ऐसा ही है !"

चौथे दिन हम सब दोस्त फिर इंजीनियर मित्र के घर एकत्रित हुए !
सभी लोग मुझे कन्या से मिलवाने के उपायों पर चर्चा करने लगे !

तभी पड़ोसी बंगाली महोदय तूफान की तरह ड्राइंग रूम मे घुसे !घुसते ही बोले -

- " क्यों दत्ता ,,, ! कुछ सुना तुमने ?? "

मेरे मित्र ने पूछा -
" क्या हुआ ? "

बंगाली महाशय - बोले

-" वो डिप्टी कलेक्टर नारंग  मल्होत्रा  का बाइस साल का जवान लड़का , फाँसी लगा कर मर गया !"

" डिप्टी कलेक्टेर नारंग का लड़का ??,,,यु मीन ,,'नीरज ' ?" ,,,,वह दुबला सा काला क़ाला ,,बदशक्ल लड़का,,,' नीरज' ?"

"हाँ ! वही  नीरज , !,,,,,, पुलिस आई है !,,,,"  जानते हो तलाशी लेने मे क्या मिला ??"

-"क्या मिला ?"

- "ढेर सारे प्रेम पत्र ! " - बंगाली महाशय थोड़े ब्यांगात्मक लहजे मे बोले !

-"प्रेम पत्र ?? - किसके प्रेम पत्र ?"

-" और किसके प्रेम पत्र ! ! - उसके क्वार्टेर के सामने रहने वाले डी.एफ.ओ.द्विवेदी  की लड़की के हाथ के लिखे प्रेम पत्र !"

हम सब अवाक रह गये !

मुझे तो जैसे साँप ही सूंघ गया !

हमारे चेहरे पढ़ते हुए बंगाली महाशय बोले -

"- वो लोग प्यार करता था छुप छुप कर ! उधर चार दिन पहले , फिल्म देखने भी गया था दोनों !लड़की अपने पिता के साथ गई थी , नीरज अकेला गया था ! लड़के में कोई  गुण  नहीं थे ,, ं एक  नंबर का आवारा ,, पढ़ाई में कई बार फेल हो चुका था , डी एफ ओ  द्विवेदी तो उससे बहुत चिढ़ता था !- उस दिन मैं  भी गया था फिल्म देखने ! मेने उन दोनो को प्यार भरे इशारे करते भी देखा था !- लड़की का पिता भी  वो इशारे भाँप गया था ! "

हम सब बंगाली महोदय का मुँह तकने लगे !

बंगाली मोशाय - मेरी ओर मूड कर बोले -
"अरे  ओ सोरभ !" तुम भी तो था,,, उस दिन टाकीज़ मे यार ! नीरज ठीक तुम्हारे पीछे वाली सीट पर ही तो बैठा था !-बिल्कुल ठीक  तुम्हारे पीछे !- वही नीरज ,,,,!!,,,आज मर गया !"

मेरे कान सनसनाने लगे ! मुझे कुछ भी सुनाई देना  बंद हो गया !
बंगाली मोशाय शायद आगे कह रहे थे -

" ' सिलि लोग !' ज़रा सी बात पर आज कल ये लड़के जान दे देते है !उसकी चिट्ठी शायद डी एफ ओ ने पकड़ ली थी ! दूसरे दिन ही लड़की को ननिहाल भेज दिया , और लड़के के बाप से लड़के की शिकायत कर दी  ! साला लड़का इतनी सी बात पर फाँसी लगा लिया !"

इतना कह कर बंगाली मोशाय आँधी की तरह वहाँ से बाहर निकल गए !दूसरे घरों मे यही खबर देने !

उसके जाने के बाद में सकपकाया हुआ थोड़ी देर बैठा रह गया !

में समझ गया - ' उस दिन वह कन्या लगातार मुड मुड कर मेरे पीछे बैठे नीरज को देख रही थी !दोनो के बीच नज़रों के तीर , ठीक मेरे सिर के उपर हो करही  चल रहे थे !'

      और ,, मैं ,,?? ,,  मैं उस दिन ,, बीच मे  एक ,बैडमिंटन कोर्ट के   
, 'नैट'   'की तरह था !जिसे छू कर नज़रो की शटल , इस कोर्ट से उस कोर्ट मे जा रही थी ! यानी द्विवेदी की सुन्दर लड़की के कोर्ट से नीरज के कोर्ट में ,,!

  ,,,, बेचारा ,,,' नैट ,,,' बीच मे बेवज़ह ही झूल गया था  !

 तभी बाहर कोई रेडियो बजने लगा !,,,,गीत था - 

,,,,,' मारे गए गुलफाम अजी हाँ मारे गए ..गुलफाम ..,!"
  मैं सोचने लगा ----
गुलफाम कौन था ..???

' मैं  या नीरज या कोई और ???',

 यह पहेली सुलझाने की मैं   बेकार कोशिश करने लगा !

लेकिन मेरा दिल भी तभी  बार बार यह सवाल करने लगा
मुझे उस समय क्या हुआ था ??


    .. प्यार ,,,या प्यार का अहसास ,,???
  और ,,,,,
'   क्या ,, मैनें  प्यार किया था या मुझे प्यार हुआ था ?'.


उसके बाद भी ,,,
बहुत दिनों तक मैं जूझता रहा -
  लेकिन प्यार की यह  गुत्थी  सुलझा  नहीं सका !
   चूँकि मैं  बहुत सोचने के बाद भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा ,,,तब भी नहीं और तब के बाद  अभी तक भी ,,,कभी नहीं ,, ,,,इसलिए ,,,, मेने प्यार के उस वाकये को फिर से कबाड़ की तरह पिटारे मे ठूंस दिया !

   
,,,,,,,शायद प्यार के जानकार, प्यार के  विशेषज्ञ  मुझे कभी  कुछ बता सकें !,,,यह प्रतीक्षा अभी भी है ,,!!



   --' सभाजीत 
         
     चेतावनी  :-  ( यह एक कहानी है , इसे आत्म कथा समझने की भूल ना करें !)

_

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

    "   प्रेम  ,,,,,,

    प्रेम   का अर्थ ,,,
  ' मांडू ' ओर '   ताजमहल   ' की     दीवारो  पर  , 
   लिख दिया  ,, इतिहासकारो  ने ,

    प्यार के जानकारो  ने ,
    पढ़ाये , हमें ,
    उच्चतम  शिखर  पर 
    कलश मे  मढे  कुछ नाम ,
   ' लैला -मजनू "  , ' शीरी -फरहाद " ,,,सलीम अनारकली ' 
     वगेरह ,,वगेरह ,,!!

      बचपन से ,
      गणित के पहाड़ो  की तरह , 
      रेट रहे यही नाम , ,
      यादो के बस्ते में ,
      ठुसे रहे यही कागज़ ,   
    ,,, प्यार के मायने ,,
       एक ,,' नर ' एक ,मादा ' ,,!!
       और टपकते रहे ,,,  फटे  बस्तों  से , 
      यहाँ -वहा , सब जगह , 
      पेन्सिल और रबर की तरह ,,!!

       निश्छल चांदनी से , नहाये 
      ब्रक्षो  के झुण्ड , 
       खिलखिलाती नदी , 
       इठलाते समुद्र , 
       गुनगुनाती  धूप   सेकते  , 
        उत्तंग शिखरों से ,,, जब हो गया प्यार मुझे , 
        तो ,,, हंस दी दुनिया ,,
        मेरी नासमझी पर ,,!!

       गणित के समीकरण ने , 
       उकसाया  मुझे , 
       प्यार के कुछ ,,,सवालो को हल करने के लिए , 
       और में ढूंढता रहा ,  कलश के नामो के बीच , 
         कुछ और बात , 

       '   भरत  ' की नंगे पैर ,,' मनुहार ' ,,
         और मूर्छित  लक्ष्मण  की छाती पर ,
         ' राम ' की अनवरत हिचकियाँ ,,,,!
           अत्तेत के धुंए में  विलीन हुए ,,
          ' सुदामा ' के दो मुट्ठी ,,चावल ,, 
           और सत्य के दीवाने , 
           चांडाल ,,' हरिश्चंद्र ' का ' मृत्यु कर ' ,, मांगता ,,
            फैला हाथ ,,!!

          योग था की ' संयोग ' ,,
           प्यार के व्यापारियों ने  भी  , 
           बेचीं    वही  बाते  , 
           बार ,,बार ,,,हर बार ,,

        कि   बन गया  , 


           प्यार   का   ' अमृत  घट  ' ,,
          ' प्रेम रोग ' ,,!!

   ,,,,,,,,,,,,,,,, सभाजीत 

   
 
   
    

रविवार, 28 जून 2015

                                              "     सीता  बनवास "   

      







                       राम कथा में दो बनवास की घटनाएँ  उद्धृत  की गई  हैं !  एक बनवास त्रिया हठ पर, पिता के वचन पालन करने हेतु , स्वयं स्वीकार  किया गया  बनवास है ,  जो  राम को बुलाकर  उन्हें  पूरी स्थिति समझा कर दिया गया- तथा दूसरा बनवास एक पति द्वारा अपनी पत्नी सीता को दिया गया  बनवास है  जिसमेँ उसे बुला कर उसे स्थिति समझाने की कोई आवश्यकता नहीँ समझी गई  !  एक बनवास  , एक स्त्री द्वारा ,  एक पुरुष को , अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु दिया गया ,,,,,जबकि दूसरा बनवास एक पुरुष द्वारा  एक  स्त्री को , स्वयं को लोकोपवाद से बचने हेतु  दिया गया   !  एक बनवास मेँ पत्नी अपने पति का साथ देने हेतु  उन दुरूह स्थानो  पर  जाने के लिए स्वयँ को समर्पित कर देती है जहाँ  पग पग  पर उसे खतरा  है -- दूसरे बनवास में पति के साथ की बात तो दूर ,  पत्नी के जाते समय पति  उससे मिलना भी नहीं चाहता  ,  उससे मुह छिपाता है !  एक बनवास मेँ राज्य की पूरी जनता विचलित हो जाती   दूसरे  बनवास में किसी का  मुह  नहीँ  खुलता !      एक बनवास खुले आम है , दूसरा चोरी- छिपे !   यह  कैसी विडंबना है   ?,,,  क्या  दूसरा बनवास,  बनवास नहीँ बल्कि किसी राजा द्वारा रचित  राज्य  निष्कासन का किसी को दिया गया  दंड  है अथवा किसी पति द्वारा  ,  पत्नी का त्याग है   ? ,,,, या फिर राजा के निष्कलंक स्वरुप को अक्षुण रखने हेतु की गई कोई कार्यवाही  है ,,?  सीता वनवास का प्रसंग इन प्रश्नो के उत्तर आज  भी ढूंढ  रहा है !

                      राजा राम के दरबार की कल्पना जब की जाती है  तो  राज सिंहासन पर  , राम   ,  अपनी पत्नी के साथ  बिराजे दिखाते हैं   यानी राम-राज्य सीता के बिना अपूर्ण है ! राम के व्यक्तित्व को पूर्णता देने वाली   यह वही  सीता है ,  जिनका वियोग राम के लिए   असह्य  था   !  यह  वही सीता है ,  जिनकी  की खोज में राम ने आकाश पाताल एक कर दिया था और यह   वही सीता है , जिनके लिए राम ने महाबली रावण से दुर्दांत युद्ध करके ,   उसे समूल नष्ट किया था ,  और सीता को वापिस  लाकर  सिंहासन पर ,  अपने बाम अंग बैठाया  था ! ,,,,,, जिस रावण के साथ राम ने हजारोँ वानरोँ की सहायता से   ,  विभीषण की गुप्त सूचनाओं के सहयोग से   ,  लक्ष्मण के अद्मय साहस और वीर हनुमान की समर्पित सेवा के सहयोग  से युद्ध करके विजय पाई   राम की उसी  अर्धांग्नी सीता ने उसी रावण से प्रतिदिन अपनी तेजोमय वाणी   ,   सतीत्व की  की  ढाल ,    अदम्य साहस ,   निर्भयता  के  कवच को बांधकर एक माह तक अकेले  युद्ध किया  और प्रतिदिन  उसे हराया  !  ,,,,,,  सत्य तो ये है अपने   बध  से पूर्व ही   ,  सीता  का सामना प्रतिदिन करके   रावण  पहले ही मर चुका था  ! ना तो उसमे  आत्म बल बचा था और   ना ही  नीति बल    जिससे  वह राम के  समक्ष  थोड़ा भी  टिक  सकता   !

                      लंका विजय के बाद   लोकोपवाद  के भय से राम अपनी पत्नी सीता को सहज ही तुरंत स्वीकार नहीँ करते !   वे  जनमानस की उन कमजोरियोँ को जानते थे जो किसी पर भी   , कभी भी  ,  कोई उंगली उठाने से नहीँ  हिचकती   है  !  इसलिए  वे ,  सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए कहते हैँ   ! अग्नि परीक्षा इस बात के लिए की जाती है सीता यह सिद्ध  करें की   पर-पुरुष   की नगरी में   , अपने हरण के बाद भी  ,  एक पतिव्रता नारी रुप मेँ रही   ,,,,,  और  उन्हें किसी ने स्पर्श नहीं किया !  अग्नि परीक्षा में  स्वयं  अग्नि ने उपस्थित होकर राम से कहा   की सीता  स्वयं  अग्नि है और अग्नि  सदा ही  दोषमुक्त ही रहती है  !!  ,,, उसे कुदृष्टि से स्पर्श करने वाला    स्वयं ही  जल जाता है और इस प्रकार सीता   पूर्णतः   दोष रहित हे  !

                  एक स्त्री के लिए इतनी परीक्षा काफी  है  जिसमेँ   स्वयं देव ही आकर  यह सिद्ध  करदें की स्त्री  निर्दोष हे,,,!    और इसलिए राम  उन्हें  पुनः स्वीकार करते है !,,,वे उन्हें अर्द्धांगनी  की प्रतिष्ठा  देकर , सम्पूर्णता के साथ ,  राज्य सिंघासन पर प्रतिष्ठित करते हैँ,,,!

                 लेकिन वही राम , कैसी विडम्बना  है की ,  फिर लोकोपवाद से बचने के लिए ,  अपनी ' सती ' पत्नी को , बनवास दे देते हैं , वह भी उस अवस्था में जब की वह ' गर्भवती ' है !   जिस राम-राज्य में , सिंहासन पर एक   स्त्री ' पत्नी ' के रूप में , पुरुष के बराबर से बैठने की अधिकारिणी बनती है , उसी राम-राज्य में , वही स्त्री , बिना अपराध सिद्ध हुए , बिना सफाई का अवसर प्राप्त हुए ,  बनवास की अधिकारणी बन जाती है !  तब यह प्रश्न उठता है की " राम-राज्य ' की  आदर्श   अवधारणा  में ' स्त्री ' की क्या स्थिति है ,,,??

                 रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास इस प्रश्न और प्रसंग पर चतुराई से कन्नी काट लेते हैँ   !   वे राम राज्य में प्रजा और नर नारी को पूर्ण पाते हे  !  उनकी निगाहोँ मेँ राजाराम   के  राज्य मेँ स्त्री पुरुष भी ,  उन्ही  मूल्योँ से सुसज्जित हे  ,  जिस से   की स्वयं  राम हे,,,!  सभी जन  ,  राग   द्वेष , काम , क्रोध ,  लोभ , मोह , कपट , छल ,  जेसे सभी दुर्गुणोँ   से  दूर हे ,,,!  ,,,, स्त्रियाँ पति अनुरागी है और पति एक पत्नी व्रत ,,,!   सभी  जनता  ,  रघुनाथ और जानकी को आदर सहित   पूजती  है,,,!

         " सासुन्ह  सादर जानकी , मज्जन  तुरंत कराई ,,,!
             दिव्य बसन  अरु भूषणः , अंग अंग सजे बनाई ,,,!!
               राम -वाम दिस शोभती , रमा रूप गुन खानि ,
                 देख मातु सब हरसहि , जन्म सुफल निज जानि ,,,!!

     प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा , तुरतहि दिव्य सिंहासन माँगा ,,!!
       रवि सम तेज सो बरनि ना जाइ ,  बैठे राम द्विजन सर नाइ ,,,!!
         ' जनक-सुता ' समेत रघुराई ,,पेखि प्रहरसे  मुनि समुदाई ,,!!
            राम राज बैठे त्रैलोका ,  हर्षित भये , गए सब सोका ,,,!!

           बयरु ना कर काहू सं कोई , राम प्रताप विषमता खोई ,,!!
             दैहिक , दैविक , भौतिक तापा , राम राज काहू नहीं व्यापा ,,!!
               सब नर करहि परस्पर प्रीती , चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति ,,!!
           
             एक नारि व्रत रत सब झारी ,  ते मन वचन क्रम पति हितकारी ,,,!!


                               दूसरी और , सीता के बारे में गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं --

            ' पति अनुकूल सदा रह सीता , सोभा खानि शुशील विनीता ,,!!
                 जानती कृपा-सिंधु प्रभुताई ,  सेवति चरण कमल मन लाइ ,,!!
                  दुइ सूत सुन्दर सीता जाये ,   लव-   कुश  वेद पुरानन्ह गाये ,,!!
                    दोउ विजई , बिनई  गन मंदिर , हरि प्रतिबिम्ब  मानहु अति सुन्दर ,,,!!

                    लेकिन संस्कृत रामायण के रचियता महर्षि बाल्मीक सीता बनवास के प्रसंग को विस्तार से उल्लेखित करते हैँ   !  श्रीमद वाल्मीकीय  रामायण  के ४२  वे सर्ग  से लेकर  ९२   सर्ग  तक जानकी बनवास की मार्मिक कथा हे    !  ४४ वे सर्ग में  भद्र ने राम को बताया -  की  पुरवासियों  के मन में सीता के चरित्र को लेकर शंकाएँ उठ रही है    !  वे कहते हैँ रावण पहले बलपूर्वक सीता को  उठा कर ले गया उनका अपहरण किया फिर लंका में अपने  अन्तःपुर के क्रीड़ावन ,  अशोक वाटिका में अनेक दिन रखा    वे  बहुत दिनोँ राक्षसो के  वष में होकर  रही   ,  तब भी श्री राम उनसे  घृणा  क्यूँ नहीँ करते   ? ,,,  अब हम लोगोँ को भी स्त्रियोँ की ऐसी बातेँ सहन करनी पड़ेगी ,,,,क्यूंकि राजा जो करता है   पृजा उसी का अनुसरण करती है,,!

                       राम सूचना से अत्यंत विचलित हो गए   !   उन्होंने  मित्रोँ से सलाह ली  !  मित्रोँ ने कहा-    यह दूत  सही कहता हे !
               तब राम ने अपने भाइयो को बुला कर कहा ---  ' नर श्रेष्ठ बंधुओं   !!   मैँ लोक निंदा के भय से अपने प्राणोँ और तुम सब को भी त्याग सकता हूँ ,,,, फिर सीता को त्यागना कौन सी बडी बात है    !,,,  समस्त  श्रेष्ठ  महात्माओं का सारा शुभ आयोजन,,, उत्तम कीर्ति की स्थापना के लिए ही होता है,! ,, जिसकी अपकीर्ति लोक में चर्चा का विषय बन जाए,,  वह  नरक मेँ गिर जाता है   !  अतः  हे लक्ष्मण    !!  ,,,, तुम मेरी आज्ञा मानकर  ,  कल  प्रातः  ही रथ पर आरुढ़ होकर  ,  सीता को उस पर ले जाकर  ,  राज्य की सीमा के बाहर छोड दो   ! ,,  मेरे निर्णय के विरुद्ध कुछ मत कहो,,,!  यदि तुम लोग मेरा सम्मान करते हो   तो  सीता को यहाँ से वन में ले जाओ    !
                  46 वे सर्ग में  ,  लक्ष्मण राम की आज्ञा अनुसार सीता को इस भ्रम मेँ रखकर  ,  रथ पर आसीन  करवाते हैं  कि  उन्होंने  जो एक दिन पूर्व  ऋषियों  के आश्रम देखने की  इच्छा  राम से ब्यक्ति की थी  ,  राम उसकी पूर्ति करना चाहते है   !  सीता इसके लिए खुशी खुशी तैयार हो गई और रथ पर चलकर वन को चले दी   !   45 वेँ  सर्ग  में  नाव  से  गंगा  के  उस  पार   उतरने  के बाद   ,  लक्ष्मण दुखी मन से सीता को राम का निर्णय सुनाते हे और रोककर अपनी मनोदशा व्यक्त करते हैँ   !  राम द्वारा अपने त्यागे जाने का निर्णय सुनकर सीता बहुत दुखी होती है  ,,,  वे कहती है  -  ,, ',  लक्ष्मण   !! '  ,,,,   निश्चय ही विधाता ने मेरे शरीर को केवल दुख भोगने के लिए ही रचा है   ,,,   मेने  पूर्व  जन्म में  क्या पाप किए   ,,,  अथवा किसका स्त्री से विछोह करवाया  की शुद्ध आचरण  होने पर भी , महराज ने मुझे त्याग दिया   ??   ,,,हे सौम्य ,,!! ,, पहले मेने बनवास के दुखों में पड़ कर भी , उसे सह कर , राम के चरणो का अनुसरण करते हुए  , आश्रम में रहना पसंद किया था ,,,किन्तु अब में  अकेली  , प्रियजनों से रहित होकर , किस प्रकार  आश्रम में निवास करूंगी ,,?? ,,,,किससे  अपना दुःख कहूँगी ,,??   यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे   की महात्मा  राम ने  किस अपराध पर तुम्हे त्याग दिया है   तो मैं उन्हें  अपना कौन सा अपराध   बताउंगी  ,,?? ,,,मैं चाहू तो अभी  गंगा में डूब कर स्वयं को समाप्त कर  दू किन्तु  ऐसा अभी नहीं कर सकती   क्योँकि ऐसा करने पर मेरे पति का ' राजवंश '  नष्ट हो जाएगा !  (  सीता  उस समय गर्भवती थी )  ,,,किन्तु हे लक्षमण ,,!,,,, तुम तो वैसा ही करो , जैसा महराज ने आज्ञा दी है ,,,!!  "

                    लक्ष्मण से सीता का यह कथन आज भी उन प्रश्नोँ को लेकर प्रासंगिक है जिसमेँ स्त्री का प्रथम  मूल्य पुरुष के जीवन में   भोग्या  के रुप मेँ  हे   ! ,,,  क्या  सतीत्व  का   अर्थ  ,  स्त्री के मात्र शरीर से संबंधित है और क्या स्त्री को एक धन के रुप में धारण करने वाला पुरुष  ,    उसके ऊपर पर-पुरुष  की छाया के विचार से ही आक्रांत हो उठता है  ? ,,,  भारत में राम राज्य से पूर्व किसी भी कथा में  लोकोपवाद से बचने के लिए  स्त्री  के  त्याग का कोई विवरण नहीँ मिलता है किंतु सीता के त्याग के बाद जैसे समाज में स्त्री त्याग  ,  एक परिपाटी बन  गया   !!  शरत चंद्र के कथा साहित्य में आजादी के पूर्व की सामाजिक  स्थितियाँ में  ,  स्त्री त्याग की घटनाएँ प्रचुरता में वर्णित है  !  सतीत्व की परीक्षा पर ,  कसौटी पर स्त्रियाँ बार बार कसी जाती रही और   उन्हें समाज में स्वयम को पति भक्त सिद्ध करना जरुरी रहा  !
                 दूसरा प्रश्न उस  न्याय  को लेकर भी है जिसमेँ दंड देने के पूर्व पूर्व अपराधी को अपनी सफ़ाई  देने  अधिकार हे  !   सीता को बनवास देते समय राम ने उनसे  एक बार भी यह चर्चा करना उचित नहीं समझी  की इन परिस्थितियों में वे क्या करें ,,?   क्या अपनी सहधर्मणी  पर लगने वाले मिथ्या  दोष पर  , अकुला कर  वे स्वयं एक बार राजपाट त्यागने की पेशकश नहीं कर सकते थे ,,?

                    एक अन्य  रामायण के रचनाकार --' राधेश्याम ' ने  अपनी रचना में  इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार किया ---
        ",,,लक्षमण बोले - व्यर्थ है - यह सब राय- उपाय ,,
              जांच ' आंच ' से हो चुकी , फिर भी त्यागी जाय ,,?? "
   
            हे नाथ दया करिये - छाती छलनी हो जाती है ,
              शब्दों की लड़ी नहीं है ये - शूलों की लड़ी कहती है ,,
                निर्दोषनि नारी दंड पाये , क्या यह ' अधर्म ' का काम नहीं ,,?
                 ऐसे कामो को करके , क्या रघुकुल होगा बदनाम नहीं ,,??
                   अबला अर्धांगनी , महासती , निर्दोष निकाली जाती हैं ,,
                     पृथ्वी आकाश देखते हैं , ' कौशलपुर ' कितना ' घाती ' है ,,!!
                       ' धिक्कार ' उस प्रजा पालने पर , जो यु सर चढ़ जाए प्रजा ,,
                     संतोष पूर्ण शासन पर भी   , पूरा संतोष ना पाये प्रजा ,,,!!  "

               इसी अवसर पर भरत कहते हैं ---
 
                    ' तरह तरह की साक्ष्यों से  , सबको संतोषित कर देंगे ,,
                        ' माता ' में कोई दोष नहीं , यह बात प्रमाणित कर देंगे ,,!
                 दब जाना ऐसे अवसर पर , अपनी भीरुता बताता है ,
                ' सच्चा ' चुप रहे  ' समय ' पर तो ,   झूठा ' सच्चा हो जाता है ,,!
                 फिर हाथ नहीं आएगा वह ,, जो हाथों से खो जाएगा ,
                ' गृहलक्ष्मी ' को गर त्यागोगे , तो गृह उजाड़ हो जाएगा ! "


           पवनसुत हनुमान भी  चुप नहीं रहते ,,,वे बोलते हैं ---

                    जिन आँखों ने सतवंती की , ' आभा ' देखी है लंका में ,
                    जिन कानो ने  , क्षत्राणी की , गर्जना सुनी है लंका में ,,
                   जो ' अग्नि परिक्षा ' की घटना  , अवलोक चुके हैं - आँखों से ,
                    वे ही निर्णय कर सकते हैं माता का चरित प्रमाणों से ,,!
                     इस पतिव्रत का उदाहरण , है कही नहीं त्रय लोको में ,
                   महलो में रहने वाली ने , रखा पति धर्म '  अशोकों ' में ,,!!"
   
          हनुमान त्रिजटा  को भी साक्षी बता कर आगे कहते हैं ---
                             
             उनसे पूछो - माता क्या है ,,जो साथ रही है माता के ,
            जिनने अपनी आँखों देखे वे दिवस अशोक वाटिका के
        यदि नहीं एक दिन  वह  होती ,  तो चिता वहां पर जल जाती ,
         यह राज-सभा जो लगी आज ,  होकर सुनसान बदल जाती ,!!
           माता ने रखा पतिव्रत है , अपनी हड्डिया सुखाकर  है ,
          छूना क्या ,,देखा ना कभी ,  निश्चर को दृष्टि  उठा कर है ,,!
          कब मिटता है ' सत ' का प्रकाश ,  ' शंका की ' रज ' छा ' जाने पर ,,
          होता है ' चन्द्र ' नहीं मैला , बादल के आगे आ जाने पर ,,!
           दुर्दैव , अवध के खेतों में , ' अपयश ' के बीज बो गया है ,
           अंधे समाज को जाने क्या यह आज अचानक हो गया है ,,!!
              यदि बदला इसका लेने को , ' जगजननी ' शीश उठाएगी ,
               ' सूरज ' काला पड  जाएगा , पृथ्वी चौपट  हो जाएगी ,,,!!

                 राधेश्याम रामायण के रचियता कवि ,  सीता के त्यागे जाने के बाद , प्रजा में और समाज में हुए बदलाव पर  टिप्पणी करते हुए ,, खुद भी कहते हैं ----

             जो अंग वेद पाठी था , वह बकवादी होता जाता है ,
               जो वर्ण देश का ' रक्षक ' था  वह व्यसनी होता जाता है ,,!
               जो ज्योति दिव्य व्यवसायी थी , वह व्यभिचारों में धाई है ,
               जो जाति  सभी की सेवक थी ,, वो सबके सर चढ़ आई है ,,!
                जो ब्रम्हचर्य व्रतधारी थे ,  लौकिक सुख उनका ' कर्म ' हुआ ,
                 पत्नीव्रत रखने के बदले , पत्नी त्यागन ही धर्म हुआ ,,!!

           एक अन्य चित्रण में , बाद में सीता सुत लवकुश प्रजा को ललकारते हुए बोलते हैं --

                जो जनता जनप्रिय राजा से , रानी का त्याग कराती है ,
                 सतवंती के पावन सत पर , मिथ्या संदेह उठाती है ,
                जिनके विचार भ्रम  भूल भरे , त्यागन की हद तक जाते हैं ,
                 उस जनता को गुरुकुल ही से , हमदोनो शीश नवाते हैं ,,!!

                        श्रीमद् बाल्मीकि रामायण में लव कुश राम दरबार में जाकर रामकथा  गा कर  सुनाते  है जो बाल्मीक  द्वारा रचित थी ! उसी समय राम को ज्ञान होता है की लव कुश उनके पुत्र  हैं !  वे अपने दूतो  को  आश्रम भेजकर बाल्मीकि को यह सूचना  भिजवाते  है   की यदि  सीता दरबार मेँ आकर,  समस्त प्रजा के समक्ष , अपने शुद्धता का परिचय दें  तो वे  पुनः उन्हें  स्वीकार  कर लेंगे !
         सीता बाल्मीक के साथ आती हे और सभी उपस्थित प्रजा के सामने कहती है   की  अगर उन का सतीत्व सही है   और  यदि  वे  मन वचन और कर्म से  मात्र राम अनुगामिनी है   और  किसी के प्रति भी अनुरागी नहीँ है तो प्रथ्वी  उन्हें  सम्मान सहित अपनी गोद मेँ स्थान दे  !

                यही होता है  पृथ्वी  फटती है और सीता उस में समा जाती है  ! 

                       राम का सीता को त्यागना   उन्हें ,,  निरपराध बनवास भेजना निश्चय ही रामराज्य की एक  कलंकनीय  घटना हे ! विवश नारी का पराधीन रहना और  स्वेच्छा  से पर पुरुष पर आसक्त होने में बहुत अंतर है   !  सीता ने  तो रावण के अशोक  वन  मेँ रहते हुए  सदेव अपने पति  का ही  ध्यान किया ,,,,वे सदेव राम- अनुरागी रही ,,,,यह जानते हुए भी राम ने उन्हें त्यागा ---यह न्याय विरुद्ध था !

                राजा को लोक अपवाद से बचना चाहिए यह सत्य है  ! आरोपोँ से  घिरे  राजा को कोई नेतिक अधिकार ,  राज करने का शेष  नहीँ होता यह भी सत्य है !  किंतु ऐसी स्थिति मेँ  राजा को  स्वयं  राज त्याग  कर देना चाहिए जब उसके किसी प्रियजन पर ही प्रजा उंगली उठाये ! ,,,,  समय सबसे बलवान चीज हे,,,,  यदि वह मिथ्या आरोप  मढ़वाता  है तो वह  सत्यता का भासं भी शीघ्र ही करवाता है  !  राजा के लिए चाहे समुदाय हो  अथवा  एक व्यक्ति दोनों ही  न्याय  पाने के लिए सामान रूप से हकदार  होते  हे और समुदाय के आगे एक निर्दोष को दंड देकर अपना कर्तव्य  पूर्ण  मान  लेना एक भयंकर भूल ही मानी जाएगी  !  समुदाय को प्रसन्न करने के लिए किसी एक निर्दोष की  बलि  लेना एक बड़ा पाप हे   !,
                ,,,, सीता हर काल में पैदा होती हे    !! ,,,,  पति- पत्नी का रिश्ता  एक बहुत पवित्र रिश्ता हे    इसमे परस्पर  विश्वास ही  रिश्ते  के  आधार स्तंभ हैँ  !  यदि यह आधार स्तंभ रेत की दीवार  जैसे होंगे  और पति अपनी पत्नी पर अकारण ही  संदेह  करेगा  तो  सीता बनवास होते रहेंगे  और  अंत मेँ सीता के लोप हो जाने पर राम सिर्फ  विलाप  ही करते रह जायेंगे तथा उनकी कीर्ति भी उस चंद्र के समान रह जाएगी  जिसमेँ एक दाग  सदेव  के लिए सबको  दीखता  रहेगा !  

   - सभाजीत '  सौरभ  '