शनिवार, 5 सितंबर 2020

 देवदूत 

******

जीवन में कुछ मित्र अचानक देवदूत बन कर हमें सीख दे  जाते है । क्या उन्हें ईश्वर भेजता है या वे अपने विवेक के कारण हमारी सहायता कर जाते हैं यह चिंतन का विषय है 

     1987 में , मेरी पोस्टिंग नागौद नगर वितरण केंद्र के अधिकारी के रूप में हुई ।

     नागौद में एक मैदान में , बसन्त पंचमी के अवसर पर एक साप्ताहिक मेला लगता था । इस मेले का आयोजन नगरपालिका नागौद के तत्वाधान में होता था । 

    मेला जनता के मनोरंजनार्थ लगता था लेकिन  नगरपालिका द्वारा संचालित होने के कारण उसकी कमेटी के पूरे सदस्य सरकारी थे , जिसमें तहसीलदार , सीएमओ, जेलर , थानेदार  , प्रमुख होते थे ।

      नागौद ठाकुर प्रधान बस्ती है । वहां अधिकतम परिहार ठाकुर रहते हैं । संयोगवश उन दिनों सीएमओ , आरआई , जेलर , थानेदार सभी ठाकुर वर्ग से थे । इस तरह मेला आयोजक समिति में  अधिकतम परिहार ठाकुरों का वर्चस्व था ।

    जहां बहुसंख्यक हों और पावर  हो वहां निरंकुशता जन्म लेती ही है । इसलिए इस मेले को जश्न की तरह मनाने के लिए अवैध धन उपार्जन का मार्ग ढूंढ ही लिया गया । मेला ग्राउंड  तो नगरपालिका ही था तो उसमें  कई साल पहले बे वजह स्ट्रीट लाइट के नाम पर नगरपालिका ने पूरे मैदान में खम्बे गड़वा लिए और मेले में लगने वाली समस्त दुकानों , खेल तमाशे वाले व्यवसायियों की  विद्युत व्यवस्था का जिम्मा खुद ले लिया । 

     नगरपालिका ,  विद्युतमण्डल को एक टेम्परेरी कनेक्शन   का आवेदन देती और एक  विद्युत मीटर मैदान के बाहर लग जाता जिसमें हो कर विद्युत सप्लाई मैदान में   नगरनिगम द्वारा बिछवाये गये स्ट्रीट लाइट के अंतर्जाल में फैल जाती और तब नगर निगम वाले उन तारों से हुक फंसाकर दुकानदारों को खुद बिजली देते जिसके रेट अपने अनुसार बसूलते । जैसे प्रति बल्ब / प्रति वाट्स / प्रति दिन । इस हिसाब से 60 वाट्स  के बल्ब का अगर एक दिन का किराया वे 50 रु0 लेते तो 100 वाट्स के बल्ब के लिए 100 रु0 प्रतिदिन ।

     

     विचित्र लीला थी । 

     

      मेरी पोस्टिंग से पहले हर वर्ष यह निर्विघ्न रूप से सरकारी चोले पहन कर खेली जा रही थी  । बिजली विभाग अपने मीटर में आई रीडिंग के आधार पर धार्मिक मेले के रेट से बिल ले लेता था जबकि अंदर के मैदान में लगी दुकानों को दस गुने रेट पर अवैध ढंग से बिजली मिलती । 

   वर्षों से हो रही इस सामूहिक लूट के विरोध की किसी ने कभी शिकायत नहीं की क्योंकि भय था कि उनकी मार पिटाई भी हो सकती है ।

     अब यह मेरा दुर्भाग्य था या उन आयोजकों का कि मेरी पोस्टिंग वहां हुई और मेला लगने का अवसर आ गया ।

      नगरपालिका वालों ने परम्परागत रूप से मेरे दफ्तर में मेले को विद्युत प्रदाय करने हेतु आवेदन दिया ।  उनके  जाने के बाद ही आठ दस दुकानदार आ गए । उन्होंने मेले की अंदरूनी लीला कथा बताते हुए हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया कि मैं उन लोगों को इस अवैध लूट से बचाऊं । मैनें पुराने रिकार्ड चैक किये  तो पाया की मीटर तो अक्सर जल गए थे और विभाग को कोई राशि मिली ही नहीं थी । जबकि दुकानदारों के हिसाब से 100 वाट्स के तीन बल्बों में आधार पर / सात दिनों की बिजली खपत की राशि 300×7 "= 2100 रुपये प्रति दुकान नगरपालिमका कर्मचारियों द्वारा डंडे के  जोर पर ली गई थी ।

    मैंने अनुमान लगाया कि मेले में तीस दुकानदार से प्रतिदिन 300 रुपये के आधार पर 9000 रुपया प्रतिदिन  वसूला गया तो आखिर यह कहां गया ,,?? ,,,

,,,क्या नगरपालिका ने अपने विकास कार्य में खर्च किया होगा ,,??? " 

   उत्तर में दुकानदारों ने बताया कि मेले के पीछे व्यवस्था हेतु लगे टेंट में , आयोजकों का देर रात तक जमावड़ा रहता था जिसमें निर्बाध शराब और मांसाहार का दौर  निरन्तर चलता था ।

      मैनें निश्चय किया कि यह कुचक्र में जरूर तोडूंगा । शायद ईश्वर ने मुझे इसीलिए यहां भेजा है । 

    मैनें दुकानदारों से कहा ,,आप अपने अपने कनेक्शन सीधे विद्युत मंडल से लो । आप लोग आवेदन करो ,,मैं आपको अपने विद्युत पोल से मीटर लगा कर कनेक्शन दूंगा । इस तरह आप अनाप शनाप हो रही लूट के शिकार नहीं बनोगे ।सब ने तुरन्त आवेदन दे दिए ।

       यह सीधा जंग ए एलान था । उन के विरुद्ध जो संगठित थे , सरकारी पावर में थे , किन्तु लुटेरे थे । अपने अवैध हित को अधिकार मानते हुए वे तुरन्त कार्यालय आये और मेज पर हाथ मारते हुए बोले --' मेले में जो वर्षों से चला आ रहा है वही होगा । आप अलग से दुकानदारों को कनेक्शन नहीं दे सकते !" 

      मैनें भी कमर कस ली । मैनें कहा -

,,,," बिजली वितरण मेरे विभाग का अधिकार है ,,आप का नहीं । में उन्हें जरूर  कनेक्शन दूंगा जिन के साथ अन्याय हो रहा है ! " 

    वे मुझे टेढी निगाहों से घूरते हुए यह कह कर चले गये ,,"  यहां हरिश्चंदयाई नहीं चलती ,,,,!! हमारे आड़े आओगे तो भुगतोगे ,,!" 

      और सचमुच मुझे भुगतना पड़ा । मेरे ऊपर जानलेवा आक्रमण हुआ और मैं मौत के मुंह में जाते हुए बचा ।

      न्याय और अन्याय की लम्बी लड़ाई शुरू हो चुकी थी । 

      शैतानों की नई नई फ़ौज उनके आक्रमण में प्रकट होना शुरू हुई तो देव दूतों की सौम्य मित्र श्रृंखला मेरे हित में ।

     कथा अभी खत्म नहीं ,, बल्कि शुरू हुई थी ।


(  क्रमशः ।)


  --' सभाजीत

---2---

वे मुझे धमकी दे कर चले गए ।

लेकिन मैनें निश्चय कर लिया ,,अब जो हो सो हो ,,यह जंग तो लड़ूंगा ही ,,।

   मैनें सभी दुकानदारों के आवेदन स्वीकृति के लिए मैहर सम्भागीय कार्यालय भेज दिए ।

     दूसरे दिन ही सम्भागीय यंत्री ने फोन पर मुझे तलब किया । शायद उन्हें भनक लग गई कि मैं  किसी परेशानी को बुलावा दे रहा हूँ ।उन्होंने कहा -" जब आज तक कोई इस पचड़े में नहीं पड़ा तो तुम क्यों पड़ रहे हो ?? वहां दादागिरी का साम्राज्य है ,,कुछ भी हो सकता है ,,जैसा चल रहा है चलने दो । " 

    लेकिन मेरी संघर्ष शील प्रवत्ति जाग चुकी थी । मैनें उन्हें बताया कि यह गरीब दुकानदारों से हो रही लूट ही नहीं है विभाग के राजस्व के प्रति डकैती है । में तो कनेक्शन दूंगा ही ,,चाहे आप सवीकृति दो या न दो ।

    सम्भागीय यंत्री जैन थे । स्वभाव से मूल्यों के संरक्षक ।

उन्होंने कहा -" ठीक है में स्वीकृति दे रहा हूँ मगर सम्हल कर रहना । " 

    लेकिन क्या दांतों के बीच रहते हुए  कोई सम्हल सकता था ?? 


      उसी शाम स्टाफ ने कनेक्शन करने शुरू कर दिए । दूसरे दिन सुबह उद्घाटन था । कोई स्थानीय मंत्री आने वाले थे ।

    उन दिनों ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का जमाना था । मेरे घर में टीवी था , जिसका एंटीना पताका की तरह मुहल्ले में सबसे ऊंचा था । चूंकि उस दिन कोई फ़िल्म आने वाली थी तो साफ दिखाई देने के कारण , मुहल्ले भर की महिलाएं मेरे यहाँ टीवी देखने आ जमीं ।

     आफिस से घर आया तो पहले कमरे में ही मजमा लगा देख कर लौट लिया । सोचा मेले ग्राउंड में हो रहे कनेक्शन देख लूं तो उधर ही चल पड़ा ।  रास्ते में एक व्यक्ति जो विद्युत ठेकेदार था और जो दुकानदारों के लिए टेस्ट रिपोर्ट देने वाला था ,  मिल गया और साथ हो लिया ।

    सूर्यास्त होने वाला था । तभी स्थल पर नगरपालिका के सीएम ओ अपने कुछ साथियों साथ रुक्ष मुद्रा में आये । 

   उन्होंने कहा -- आप हमारी ज़मीन पर किसी अन्य को , बिना मेरी परमीशन के  कनेक्शन नहीं दे सकते । दुकानदारों के कनेक्शन रोक दें ! " 

      में कहां मानने वाला था ,,! मैनें कहा सार्वजनिक मेला है ,आप भी अस्थाई कनेक्शन ले रहे हैं  दूसरे भी ले रहे हैं । आपने कौन सा भू अधिकार पत्र दिखाया है ,,? " 

    वे लोग नाराज़ हो कर मुझे घूरते हुए वापिस  चले गए । 

     मैनें ध्यान नहीं दिया । कनेक्शन होते रहे । सूर्य डूब गया और झुटपुटा हो गया ।

     तभी एक ओर से , अंधेरे में  कुछ लोग हाथों में डंडे और लोहे के रॉड  लिए उभरे । उन्होंने पास आकर कहा --

" न बे शर्मा ,,!  तोखऱ बतायदिये रहे कि बीच में टांग न अड़ा,, फिर भी तैं नइं मानीं ,,! 

    में कुछ समझता इससे पहले मेरी पीठ पर डंडे का जोरदार वार पड़ा । कुछ  सम्हलता ,,इससे पहले कंधे पर रॉड का दूसरा वार पड़ा । किसी ने मुझे ,,मां बहिन की भद्दी गाली देते हुए कमर पर जोरदार लात मारी । में बैलेंस न सम्हालपाने के कारण औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा । 

    अब मेरी छाती कमर पर जूतों के टो की मार पड़ने लगी और कंधे पर डंडे की । पैरों पर रॉड लगने लगा । 

     मुझे तब एक ही बात समझ में आ पाई की मुझ पर गुंडों ने प्राणघातक हमला कर दिया है । दिमाग ने कहा कि हर हालत में में सिर को बचाऊं वरना वहां चोट पड़ने पर सिर फुट जाएगा । 

    तो मैंने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को ढक लिया लेकिंन कब तक ढकता ,,?? 

    रॉड के एक प्रहार से हांथ कांप   गये ।

     दूसरा प्रहार होता उससे पहले कोई मेरे ऊपर मुझे ढकता हुआ लेट सा गया । 

ये ठेकेदार जैसवाल था । 

उसकी आवाज मुझे सुनाई दी कि " अब बस करो लाल साहब ! ये मर जायेगा तो बहुत दिक्कत हो जाएगी ।" 

    न जाने क्या हुआ कि वे लोग जैसवाल की बात सुन कर मुझे  गाली देते हुए एक ओर चले गये ।

     अब पूरी तरह अंधेरा हो चुका था । तभी जो लाइन मेंन  कनेक्शन कर रहे थे और जो मेरे ऊपर हमला होते ही भाग खड़े हुए थे उन्हें जाते देख कर छुपते छुपाते मेरे पास आ गये । 

    अब जैसवाल , और दो लाइनमैनों ने मिल कर मुझे उठाने की कोशिश की । मेरी शर्ट खून से भींग चुकी थी और कनपटी के थोड़े ऊपर हुए  घाव से खून बह कर मेरी पेंट भिंगोने की कोशिश कर रहा था । जैसवाल एक गलजन्दा साथ रखता था उसे उसने मेरे घाव पर कस कर बांध दिया ताकि खून न बहे । 

    लाइनमैनों ने लगभग मुझे टांग लिया और तेज डग बढाते मेरे आफिस की ओर चले । तभी मेरे एक साथी सहायक यंत्री पिकअप ले कर आ गए  । 

     किसी तरह हम लोग अस्पताल की ओर बढ़े तो किसी ने कहा। पहले थाना चलो ,,,सबसे पहले पोलिस रिपोर्ट लिखेगी तब एम एल सी होगी ।

       लिहाजा हम लोग थाने की ओर मुड़ गये । रास्ते में मेरे साथी यंत्री ने पूछा ," आप ठीक तो हैं न " ?? तो मैनें हां में सिर हिला दिया । 

     थाने पहुंच कर जैसे ही हम थाने के अंदर घुसे तो देखा --नगरपालिका के आर आई श्री सिंह अपने हाथ को थानेदार को दिखा कर मेरे विरुद्ध एक एफ आई आर लिखवा रहे थे कि मैनें चाकू से , मेला ग्राउंड में , उनकी हथेली पर वार किया है " !  उनकी हथेली थोड़ी सी कटी हुई थी जैसे खुद किसी ने अपनी हथेली को ब्लेड से काट लिया हो । " 

      अब एक एफ आई आर लिखी जा रही थी तो हमें चुपचाप इंतज़ार करने को कहा गया । 

     मुंशी को जैसे कोई जल्दी ही नहीं थी । वहः रुक रुक कर बार बार  सिंह से पूछ कर धीरे धीरे रिपोर्ट लिख रहा था जबकि वहः देख चुका था के मेरे कपड़े खून से सने हैं ।

     मेरे साथी यंत्री बिफर गये । उन्होंने थानेदार से कहा कि आप रिपोर्ट लिखो न लिखो ,,कोई बात नहीं ,,हमारा  साथी  खून से लथपथ है हम अस्पताल जा रहे हैं ,,,लेकिन याद रखो,,जिस बिजली के उजाले में तुम इनकी एफ आई आर तन्मयता से लिख रहे हो वहः एक घण्टे बाद बन्द हो जाएगी ।" 

     उन्होंने मिल कर मुझे उठाया और कमरे से बाहर निकल आये ।

     तभी थानेदार ने एक सिपाही को एक चिट लिख कर थमाते हुए कहा कि वहः हम लोगों के साथ अस्पताल जा कर एमएलसी करवा दी ।

     थानेदार की और मुंशी की नाम पट्टिका देख कर मुझे स्पष्ट हो गया कि ये सब सिंह हैं और सिंह की पहली एफआईआर लिखने का महती कर्तव्य  निर्वाह  रहे हैं ।

     मुझे मालूम था कि थानेदार महोदय भी तो मेला आयोजन समिति के सदस्य थे जो देर रात तक मेला ग्राउंड पीछे बने टेंट में जश्न का लुफ्त उठाते थे ।

  

       थाने से बाहर निकलते हुए मुझे एक हल्का चक्कर आया ,,लेकिन साथियों ने सम्हाल लिया और हम पिकप में बैठ कर अस्पताल की ओर चल दिये ।


  क्रमशः ,,,।

--3----


   आगे आगे मोटर साइकिल पर सिपाही और पीछे पीछे पिकअप में हम चार लोग अस्पताल की ओर चले ।

     जिस जैसवाल ठेकेदार ने मुझ पर लेट कर मेरी जान बचाई थी उसने थाने में आने से पहले ही हाथ जोड़ कर मुझ से विदाई ले ली थी । 

       उसने कहा था कि न जाने किस प्रेरणा से वहः मुझ पर अचानक लेट गया था और उसने हमलावरों को मना किया किन्तु अब आगे खुले रूप में वह वहां के ठाकुर समुदाय से विरोध मोल नहीं लेगा । उसने हाथ जोड़ कर मुझसे अनुनय की कि  एफ आई आर में में उसको गवाह न बनाऊं क्योंकि वह उन लोगों के विरुद्ध गवाही देने कोर्ट  नहीं आएगा और आ भी गया तो वहः कुछ भी देखने से इनकार कर देगा  ।

       बात मेरी समझ में आ गयी थी इसलिए मैनें उस रक्षाकर्ता को उसके अनुनय पर  गवाह के रूप में एफ आई आर में उल्लेखित न करने का मन बना लिया ।

     अस्पताल में जैसे डॉक्टर हम लोगों का इंतज़ार ही कर रहा था ।  अस्पताल छोटा था और उसके डॉक्टर सतना से अप डाउन करते थे । वार्ड खाली थे । सिर्फ कुछ ग्रामीण महिलाएं जो गावँ नही लौट सकती थी वे ही उन वार्डों में थीं ।

      डॉक्टर ने मुझे ओटी में लिटाया और अकेले ही मरहम पट्टी में जुट गया । मेरा चेहरा बहुत बुरी तरह सूज चुका था । उंगलियां सूज गई थी उठते बैठते नहीं बन रहा था ।

     डॉक्टर ने मेरी कनपटी का घाव देखा ,,उसने चिमटी से घाव में फंस गई बांस की पतली डंडियों को  निकाला । फिर गम्भीरत्ता से बोला - " बाल बाल बच गए शर्मा जी । कनपटी से आधा सूत ऊपर चोट लगी । दूसरी चोट  लगती तो आप स्थल पर ही मर सकते थे । " 

    उसने दवा लगा कर पट्टी बांधी और फिर बोला - "  इस चोट के अनुसार मुझे आपको अस्पताल में ही भर्ती कर लेना चाहिए । लेकिन मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप घर में ही आराम करें ।  यहां न रुकें । " 

   मैनें पूछा - " क्यों ,,? " 

   उसने धीरे से कहा - " यहां आपको खतरा है " 

  मैंने पूछा - " कैसा खतरा ,,?? " 

   उसने कहा --" जान का खतरा ।,,रात में आपको उठा कर  लोग ले जा सकते हैं ,,आपके साथ कुछ भी हो  सकता  है । "

    यहां पुलिस वाले एक सिपाही की ड्यूटी लगा देंगें । एक चौकीदार हमारे अस्पताल का भी रहता है लेकिन वहः किसी काम का नहीं ।

     पहले भी एक दो घटनाएं हो चुकी हैं ,,जो बाद में रफा दफा हो गईं !

   मैनें डाक्टर से नाम पूछा तो उसने बताया ,," राकेश शर्मा " !

    पट्टी बंधवा कर मैं व्हील चेयर पर बाहर आया तो डॉक्टर ने सिपाही को कहा ,,चोटें देख लीं है रिपोर्ट सुबह बना कर भिजवा दूंगा ।" 

       मैनें अपने साथी यंत्री से स्लाह ली उसने भी कहा - " घर में ही रहिए । वहां घर वाले साथ रहेंगे ही   ,,वहां दो लाइन स्टाफ भी रख देंगें ।  " 

       हमने घर में रहने का निश्चय किया और घर की ओर चल दिये ।

   रास्ते में ही मेरा दफ्तर पड़ता था । 

इस बीच मेरे ऊपर हुए आक्रमण की खबर सतना पहुंच चुकी थी ।

   मैं अपनी यूनियन का सर्किल सेक्रेट्री था । मैनें सतना की अन्य विभागीय यूनियनों से सम्बन्ध बना कर वृहत रैलियां निकाली  थीं । विभाग की अन्य यूनियन के पदाधिकारी मेरे आह्वान पर एक हो कर कई प्रदर्शन कर चुके थे ।

     सतना आने से पूर्व में विद्युत मंडल की सशक्त जे ई यूनियन का सी डब्ल्यू सी मेम्बर रह चुका था । नीतिगत निर्णयों में मेरी सलाह अहम हुआ करती थी ।

     एक समय था कि मैं कामरेड की तरह , दाढी बढ़ाये , झोला कंधे पर लटकाए,,आज यहां तो कल वहां घूमता था ।अपने साथियों के न्याय के लिए में किसी भी बड़े से बड़े अफसर से भिड़ जाया करता था ।

     लिहाजा जैसे ही खबर सतना पहुंची , मेरे साथी  सक्रिय हो गये। तुरन्त ही ज्ञापन बना ,,कलेक्टर , एसपी को सौंपा गया और नतीजा यह हुआ कि नागौद के पुलिस सर्किल इंस्पेक्टर को केस की रिपोर्ट देने को कहा गया ।

      जब मैं घर की ओर बढ़ा तो मेरे आफिस के पास ही सर्किल इंस्पेक्टर साहब और थानेदार खड़े मिले । अब उन्होंने हम लोगों से रिक्वेस्ट की की कृपया अपनी रिपोर्ट लिखवा दें ।

     लेकिन मेरी हालत खराब थी लिहाजा मैनें मना कर दिया । तब उन्होंने कहा कि अब थाना जाने की जरूरत नहीं ।आप अपने दफ्तर में ही बैठ कर तीपोर्ट लिख दें वही एफ आई आर मां ली जाएगी ।

      मैनें दफ्तर में बैठ कर उन सब लोगों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट की जो नगरपालिका के पदाधिकारी थे और जिन्होंने मुझ पर आक्रमण किया था ।

      दरअसल जब आर आई सिंह थाने में मेरे विरुद्ध रिपोर्ट लिखवा रहे थे तो उन्हें घेर कर वे सब लोग वहीं  खड़े थे जिन्होंने मुझ पर हमला किया था । मेरे साथी यंत्री ने साथ के लाइनमैन से उन सब के नाम कन्फर्म कर लिए थे जो अब नामजद रिपोर्ट में लिख गये ।

     रिपोर्ट लिखवा कर घर आये तो देखा सतना से मेरे माता पिता भाई वगैरह आ चुके थे ।

      घर जाते ही बिस्तर पर पड़ा तो निढाल हो गया ।

     तभी लोगों ने बताया कि युवराज नागौद मुझे देखने आए हैं ।

     युवराज नागौद एक अद्भुत गिटारिस्ट थे और मेरे संगीत रुचि के अभिन्न मित्र थे । में कभी भी उनकी गढ़ी में चला जाता था और हम दोनों की महफ़िल जुड़ जाती ।।

     उन्होंने मेरा सूजा हुआ मुंह देखा तो उनकी भृकुटी तन गई ।

चुपचाप बाहर आये और दरवाज़े पर खड़े हो कर अपने ही समाज को गालियां सुनाने लगे । वे बोले ,," ,में इस स्टेट का युवराज ,,,तुम सब को चैलेंज देता हूँ कि अब कोई मेरे दोस्त को हाथ लगा कर दिखाओ ,,,।

    तुम नहीं जानते यह संगीत का प्रेमी है,,और संगीत प्रेमी अपने भाई पर यह हमला में सहन  नहीं  करूंगा ।" 

     उन्होंने ऐसा क्यों कहा इसकी एक अलग कथा है । 

किंतु बाहर दहाड़ने के बाद वो फिर अंदर आये और मुझसे कहा ,,' किसी माई के लाल की अब हिम्मत नहीं जो इस तरफ  रुख करे  । " 

      उन के जाने के बाद में सो गया ।

  लेकिन असली सीन तो सुबह होने वाला था ।


क्रमशः

--4-- 

सुबह जल्दी आंख खुल गयी ।


   डॉक्टर के लगाए दर्द निरोधक इंजेक्शन का असर अब खत्म हो गया था । पूरे शरीर में भीषण दर्द था । न हाथ उठा रहा था न पैर । मुंह फूल कर कुप्पा हो गया था ।

    

   बिस्तर पर   आंखें मींचे चुपचाप पड़ा मैं सोचने लगा ,,क्या यह ठीक हुआ ,,??  मेरी दो बिटिया और एक बेटा था । सभी बहुत छोटे ।  मुझे उनके मासूम चेहरे दिखने लगे । और पत्नी भी । सोचने लगा अगर मुझे कल कुछ हो गया होता तो उनकी आज की सुबह कैसी होती ,,?? 

      मुझे अपने सम्भागीय यंत्री की कही हुई बात याद आने लगी ,," इतने दिन से सब चल रहा है ,,तुम क्यों इस पचड़े में पड़ रहे हो ,,?? "  

      सचमुच आदतन में  ही गलत हूँ  । मुझे क्या जरूरत थी दुकानदारों को अलग से कनेक्शन दिलवा कर विभाग के राजस्व को बचाने के लिए , दबंगों से भिड़ने की ,,?? यदि मैं मर जाता तो अनुकम्पा नियुक्ति पर मेरी पत्नी को क्या मिलता ,,?? एलडीसी की नॉकरी ,,?? या शायद न भी मिलती ।

     सोच कर मेरी आँखें गीलीं होने लगी तभी पत्नी गर्म पानी , पेस्ट , ब्रश ले कर आ गयी । उसने कहा हिम्मत करके मुंह खोलो और ब्रश करो । किसी तरह ब्रश किया और फिर आंखें बंद करके लेट गया । पत्नी अब चाय बना ले तो किसी तरह प्लेट में डाल कर एक एक घूँट पिया । कुछ खाने के लिए जबड़ा तो खुल ही नहीं रहा था ।

     पत्नी शायद मेरे मन की बात समझ गयी । बोली ,,

     " क्या सोच रहे हो ,,? " 

      " यही,,तुम लोगों के बारे में ,, अगर मुझे कुछ हो गया होता तो तुम्हारा और बच्चों का क्या होता ,,?? " 

       मेरी पत्नी बहुत ईश्वरवादी है ,,उसने मुस्कराते हुए कहा ,,

" होता कैसे,,??  आखिर हम सब का भाग्य भी तो जुड़ा है न तुमसे ,,? " 

      मुझे दिलासा मिली । निराशा ने दामन छोड़ा । मैं फिर सोचने लगा ,,आखिर ईश्वर तो है ही हमारे साथ,,वरना स्थल पर क्यों जैसवाल मेरे साथ होता ,,? ,क्यों वहः मुझे बचाता ,,?? क्यों मेरे साथ पिकअप में ले कर मेरे साथी यंत्री थाने तक जाते,,?? क्यों अस्पताल में डॉक्टर मुझे वार्न करता ,,?? , क्यों खुद पुलिस मुझसे रिक्वेस्ट करती की में एफआईआर लिखवाऊं ,,?? क्यों एक सह्रदय , संगीत प्रेमी , गिटारिस्ट , सौम्य व्यक्ति मुझे देखने आता ,,?? , और क्यों वहः दरवाजे पर खड़ा हो कर मेरी रक्षार्थ अपनी ही कौम को ललकारता ,,?? 

     सच में इस ' क्यों ' का कोई उत्तर नहीं था मेरे पास ,,! 

    

    तभी दरवाजे की घण्टी बजी और मेरे सतना के मित्र अवतरित हुए । इनमें सबसे अंतरंग मित्र थे श्री यू पी सिंह और विभागीय साथी श्री डी के शर्मा ।

     यूपी सिंह मुझे बड़ा भाई मानते थे । आते ही उन्होंने मेरे पैर छुए , फिर मेरी पत्नी के  ।फिर हंसते हुए बोले ,," क्या भैया ,,?? आपने मेरी नाक कटवा दी ! नाम ठाकुरों जैसा रखा है ,,' सभाजीत ' और खुद अपना सिर फुड़वा बैठे । अरे ,,,एकाध हाथ आप भी तो चलाते ,,!!" 

   मेरे क्लान्त मुख पर रौनक आ गयी । तभी डी के शर्मा ने कहा ,, तुम तैय्यारी कर लो , तुम्हें सतना जिला  अस्पताल रैफर कर दिया गया है ,, अब नागौद में नहीं रुकना है । "

     डी के शर्मा लिधौरा टीकमगढ़ निवासी थे और वे भी मेरे लिए बड़े भाई ही थे । एक वर्ष पूर्व वे नागौद में ही पोस्टिड थे । उन पर भी गावँ में एक विद्युत चोरी चेकिंग के दौरान हमला हुआ था और उन्होंने भाग कर जान बचाई थी । उन दिनों में सतना के औद्योगिक क्षेत्र के वितरण केंद्र का अधिकारी था । सम्भागीय यंत्री ने उनका ट्रांसफर मेरी जगह और मेरा सतना मुख्य शहर तत्काल प्रभाव से करके उन्हें राहत दी थी ।

      तभी  दरवाजे पर एक ट्रक के रुकने की आवाज़ आई । कुछ देर में ही मैहर शहर के अधिकारी श्री पी एल सिंह पूरे स्टाफ के साथ अंदर आ गये । वे मेरे परम् मित्रों में थे । हम लोगों ने मिल कर यूनियन में अपने साथियों की कई समस्याएं सुलझाएं थी ।

  उन्होंने आते ही कहा ,," में जानता हूँ ,,जिसने तुम पर हमला किया है ,,वहः मेरे ही गावँ का मेरा पट्टीदार है ,,लेकिन मैं उसे सजा दिलवाने में  सबसे आगे रहूंगा,,विश्वासः रखो  ।" 

     मेरा दफ्तर मेरे घर के पास ही था । स्टाफ मुझे देख कर वापिस लौट गया और थोड़ी देर में लाउडस्पीकर से आवाज सुनाई देने लगी ,,"प्रिय साथियों ,!,,,,,,,,!!,,,!!

   में समझ गया अब नेता गिरी और यूनियन बाजी शुरू हो चुकी है । 

    अब मैं खुद एक मुद्दा बन चुका था ,, लड़ाई का ,,,और लड़ाई शूरवीरों ने अपने हाथ ले ली है ।

     तभी सतना से ट्रक  भर कर तीन तीन यूनियनों के पदाधिकारी आ गए । किसी समय मैनें किसी मुद्दे पर सभी अलग अलग यूनियनों का एक संयुक्त मोर्चा बनाया था ,,वही संयुक्त मोर्चा रातों रात पुनर्जीवित हो गया था ।

   तब तक मैं तैयार हो चुका था । 

  तभी एक लाइन स्टाफ आया ,,,उसने बताया कि नगरपालिका के सामने भी एक टेंट गढ़ गया है । नगरपालिका वालों की यूनियन भी रैली निकाल कर एसडीएम को ज्ञापन देने जा रही है ।

    अब झूठ सच की घनघोर जंग छिड़ चुकी थी । 

 नगरनिगम वालों ने मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं नशे में धुत्त था ,, और मेले के दुकानदारों को तंग कर रहा था तो दुकानदारों ने क्रुद्ध हो कर मुझ पर आक्रमण कर दिया । तभी बिचारे नगरपालिका के आर आई साहब मुझे समझाने आये तो मैनें चाकू से उन पर वार कर दिया जिससे उनकी हथेली थोड़ी कट गई ।

       यह इल्जाम तो मैं थाने में ही अपने ऊपर लगते देख चुका था जब मैं खून से नहाया वहां बैठा था और मुंशी जी आर आई साहब की एफआईआर लिख रहे थे ।

     अब नगर निगम वालों की मांग थी कि मुझ जैसे दुर्दांत अपराधी को तुरन्त गिरिफ्तार करे । 

     इधर विद्युत मंडल की सभी यूनियन संयुक्त मोर्चा बना कर  श्री पी एल सिंह की अगुवाई में  रैली निकाल कर ज्ञापन सौंपने को तैयार हो चुकी थी और मांग कर रही थी कि आर आई सहित तीनों अपराधियों को तुरन्त गिरफ्तार करेन ,,,वरना अगला कदम ,,,नौगोद की बिजली बंद ।

    एम्बुलेंस आने में देर थी तो डी के शर्मा ने कहा कि तुम जीप के पिछले हिस्से में लंबे लेट कर तुरन्त निकल जाओ । जीप आ चुकी थी तो लोगों ने मुझे उठा कर किसी तरह जीप में लिटवा दिया और एक अलग शॉर्टकट से में नागौद के बाहर निकल आया ।

     एक अन्य वाहन में मेरे बच्चे , मेरी पत्नी , माता पिता वगैरह भी मेरे पीछे पीछे चले आये । मेरे आगे मोटर साइकिल पर सवार मेरे  मित्र , मेरे विभागीय साथी चल रहे थे और मेरी बरात जैसा यह काफिला , अपने पीछे नागौद में  लाउडस्पीकर युद्ध , ज्ञापन और रैलियों का हुड़दंग छोड कर सीधे जिला अस्पताल परिसर में आकर रुका ।

     मुझे स्ट्रेचर पर लादा गया और सीधे इमरजेंसी वार्ड में ले जा कर भर्ती करवाया दिया गया ।

  मुझे इस भागदौड़ में  सचमुच बेहोशी आ गयी ।

     इस तरह नागौद से तो निकल आया था ,,लेकिन नागौद की प्रतिछाया स्वरूप न्याय अन्याय की छाया अभी आगे इंतज़ार कर ही रही थी ।

      अस्पताल में कुछ डॉक्टर जो नागौद वालों के निकटस्थ हितैषी थे तत्काल मेरे सभी परीक्षण कर मुझे जल्द से जल्द डिस्चार्ज करवाने की जुगाड़ में लग गए,,, लेकिन एक कोई था,,,जो इनके मंसूबों पर पानी फेरने वाला था,,,और वो था सीएमओ ,,,"हक" ,,!

     

  क्रमशः,,।

,    ----4 ------

सतना का जिला अस्पताल मेरे लिए अपरिचित नहीं था । 

    यहां के  अधिकतम डॉक्टर मुझे जानते थे । मैं यहां पावर हाउस कॉलोनी में छह साल रहा था और सतना शहर का रेवेन्यू जे ई भी रह चुका था । 

       यहां के सभी डॉक्टर अंगद के पांव थे और उनका कभी तबादला नहीं होता था ।  उनके अपने क्लीनिक भी थे और जिले के प्रायः हर गावँ के मरीजों का इलाज करने के कारण हर जगह के रसूखदार लोगों से उनके सम्बंध रहते थे ।

    इसलिये इस अस्पताल के डॉक्टर  सदैव वही रहते थे ,,। 

बदलता था तो  हर एक दो साल में सीएमओ यानी मुख्य  जिला चिकित्सा अधिकारी । 

     और इस समय मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे ,,

   ,मि0 हक ।

    हक साहब का पूरा नाम मुझे नहीं मालूम था लेकिन बताते थे कि वे बेहद सख्त मिजाज , अनुशासन प्रिय , और ईमानदार आदमी थे । गलती होने पर वे किसी को बख़्शते नहीं थे और किसी भी बड़ी से बड़ी ताकत के आगे , झुकते  नहीं थे ।

      नागौद कांड की खबर सतना के लोकल अखबारों की खबर बन चुकी थी इसलिए हर डाक्टर को मालूम था कि पेशेंट सतना अस्पताल आ सकता है ।

     उधर नागौद से लोग आकर जुगाड़ लगा चुके थे कि पेशेंट को सामान्य इंज्युरी बता कर जल्द से जल्द छुटटी करवा दी जाए । 

      इसलिए मेरे अस्पताल में भरती होते ही डाक्टरों की टीम मुआयने पर जुट गई ।

      मेरे पैर , हाथ , सिर , छाती का एक्स रे लिया गया । आंख कान को टार्च से देखा गया कि कहीं खून जमा तो नहीं हुआ । बीपी नापा गया ।  मेरी सिर की पट्टी उतार कर घाव साफ किया गया ।

     तभी सीएमओ साहब भी आ ज्ञे । मैं आंखें मींचे परीक्षण करवा रहा था लेकिन कभी कभी अधखुली आंखों से देख भी लेता था ।

    सीएमओ साहब ने पूछा ,,,

     

 " हाउ डीप इस इंज्युरी ,,? " 

     

    " नथिंग  ग्रिवियस सर ,,!"  एक डॉक्टर ने तुरन्त कहा ।

    तभी   सिस्टर ने घाव पर से पट्टी हटा दी । स्टिचिंग देख कर हक साहब बिफर गए । जल्द बाजी में नागौद के डॉक्टर ने बेतरतीब स्टिचिंग कर दी थी 

 । सात टांके बोरे की तरह सिल दिए थे । उसमें से एक दो बांस के पतले रेशे उन्हें झांकते दिखे । 

     हक साहब सलीके से काम के हिमायती थे । उन्होंने पूछा --" हु स्टीच्चिड दिस ,,,? " 

      डॉक्टर्स इधर उधर देखने लगे तो किसी एक नए कहा ,," ये नागौद में ही स्टिच हुए । "

    हक साहब ने उस डॉक्टर की ओर देखते कहा ,," अभी ग्रिवियस नहीं है तो इस हालत में आगे ग्रिवियस हो जाएगा । इसे निगरानी चाहिए । इसकी घाव की पूरी सफाई करवाइए ,,रिस्टीच् करवाइए ,,।  कनपटी के पास की चोट है ,, केयर जरूरी है। ,,

   इतना कह कर वे चले गये

 । लेकिन उन डाक्टरों के मंसूबे टूट गए जो तीनदिन इलाज करके मुझे छुट्टी दिलाने के मूड में थे ।

     बाद में किसी ने बताया कि नागौद के डॉक्टर शर्मा को हक़ साहब ने गलती के लिए मेमो इशू कर दिया ,,क्योंकि वे गलती बख़्शते नहीं थे ।

     अब अस्पताल का ,,मैं खास मरीज हो चुका था ।  हर दिन , हर डॉक्टर आता ,, और चेकिंग के बाद फाइल में फाइंडिंग लिखता और फिर फाइल सीएमओ के पास निरीक्षण को जाती । 

     चोट के कारण , मुझे सिर में दर्द और भारीपन भी रहने लगा था ,,लिहाजा उपचार अब लम्बा हो गया था । 

     

     रैलियों, ज्ञापन, और भाषणों की जंग तो मैं नागौद में अपने पीछे  मैं छोड़  ही आया था सतना में अब अखबारी रिपोर्टिंग की जंग छिड़ी ।

सतना का प्रमुख दैनिक था ,,' देशबंधु । जिसके संवादाता नागौद के ही एक ठाकुर साहब थे । उन्होंने एक रिपोर्ट बना कर एडिटोरियल को भेज दी जिसमें नगरनिगम का झूठा  पक्ष हूबहू छप गया । 

    एक शराबी के रूप में स्थल पर झगड़ा करने वाले और दुकानदारों  से घूस मांगने वाले , और एक सन्त नगरपालिका अधिकारी पर चाकू से हमला करने वाले दुर्दांत  व्यति के रूप में , मेरी कीर्ति पताका पूरे क्षेत्र में फैल गई ।

    मेरे साथियों ने कुछ अन्य बाहरी अखबारों का सहारा ले कर इंदौर, जबलपुर , रीवा के अखबारों से रिपोर्ट छपवाई ,,,जो प्रतिउत्तर जैसा ही था । कुछ एक पेज के शहरी अखबार वाले भी आये और सवालिया कैप्शचन  लगा कर फ़ोटो सहित खबर छाप  दी ।

    नागौद में मेला शुरू हो चुका था और साथ ही मेरे विरुद्ध हुई एफआईआर पर इन्वेस्टिगेशन भी शुरू हो गई  ।। 

   डरे हुए दुकानदारों ने नगरनिगम की व्यवस्था स्वीकार करके , उन्ही से कनेक्शन ले लिए । 

   पुलिस इन्वेस्टिगेशन में इन डरे हुए दुकानदारों से झूठे बयान लिखवा लेना , नागौद पुलिस के लिए कठिन नहीं  था । 

  अखबार में मेरे विरुद्ध छप ही चुका था इसलिए जनमत को भी भृमित होने में कोई दिक्कत नहीं थी ।

  लगा कि अब सारी इन्वेस्टिगेशन  झूठ के पक्ष में जा कर मुझे अपराधी घोषित करवा देगी ।

   

        इस स्थिति में मेरे मित्र श्री डी के शर्मा ने अलग कदम उठाया ।  भोपाल में विधान सभा चल रही थी । वे टीकमगढ़ गये और  वहां के विधायक से विधान सभा में नागौद कांड का एक प्रश्न उठवा दिया । 

     प्रश्न के उत्तर में भोपाल से एक अलग इन्वेस्टीगेशन टीम आई ।उसने गुप्त रूप से घटना इंवेस्टिगेट की और सत्य उजागर करते हुए नगरनिगम के कर्मचारियों को दोषी ठहराते हुए रिपोर्ट भोपाल भेज दी ।

    नतीजा यह हुआ कि इन्वेस्टिगेशन सतना के एस पी ने नागौद थाने से हटा कर सतना थाने की टीम को दे दिया ।

     अब विद्युत विभाग की यूनियन ने मोर्चा सम्हाला । उन्होंने पूरे रीवा रीजन के विद्युत कर्मचारियों की रैली  आयोजित की जिसमें सीधी , शहडोल , रीवा , पन्ना , छतरपुर के कर्मचारी ट्रकों में भर कर आ गए ।

    सतना में विद्युत कर्मचारियों की अभूतपूर्व रैली निकली । जिसका एक छोर अस्पताल चौक पर था तो ,,, दूसरा छोर  पावर हाउस गेट पर ।

     ज्ञापनों से सतना ऐडमिनिस्ट्रेशन तो प्रभावित हुआ ही,,,विद्युतमण्डल का केंद्रीय एडमिनिस्ट्रेशन भी प्रभावित हुआ । अब एक के बाद एक उच्च अधिकारी जबलपुर से आने लगे और मेरी कैफियत और बयान लेने लगे ।

   लेकिन अस्पताल में नागौद हितैषी कुछ डॉक्टर अलग ही खिचड़ी पका रहे थे । वे मुझे प्रतिदिन चैकिंग  रिपोर्ट के आधार पर  स्वस्थ्य घोषित कर शीघ्र डिस्चार्ज करवा देना चाहते थे । नागौद के डाक्टर को मेमो मिल चुका था इस लिए गलत रिपोर्ट हेतु डर भी रहे थे ।

     मेरी अस्वस्थता  की खबर सुन कर दूर  दराज़ से मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे देखने आने लगे । जबलपुर के मेरे एक मित्र श्री वैश  मुझे देखने आए तो देर रात तक मेरे पास बैठ गए । वे लंबे ऊंचे कद के व्यक्ति थे और फर्राटेदार इंग्लिश बोलते थे । पहली। नज़र में वे कोई पुलिस के उच्च आफीसर लगते थे ।

  रात 11 बजे  वे बैठे थे तभी नर्स आई और मेरे सिरहाने रखी फाइल उठा ले गई  मुझे शंका हुई कि मेरी फाइल नष्ट न कर दी जाए तो मैनें वैश से कहा कि वे देखें फाइल कहां जा रही है ।

   वैश तेज कदमों से चल कर नर्स के पीछे पीछे गए जो डॉक्टर्स रूम में फाइल  दे  कर लौट गई । वैश तेजी से डॉक्टर्स रूम में घुसे जहां उन्होंने दो डाक्टरों को फाइल पलटते देखा । वैश ने सीधे उनसे अंग्रेजी में पूछा कि क्या वे आन ड्यूटी डॉक्टर्स हैं ,,?? और क्या पेशेंट को कोई नया प्रिस्क्रिप्शन देना चाहते हैं ,,?? 

    वैश  को देख कर वे उठ खड़े हुए । उन्हें लगा कि वैश कोई आफीसर है ।

   उन्होंने कहा कि वे ड्यूटी पर नहीं हैं किंतु अस्पताल के ही डॉक्टर हैं । यूंही देख रहे थे कि दवाइयां दे दी गईं हैं या नहीं । 

     उन्होंने घण्टी बजा कर दूसरी नर्स बुला कर फाइल यथा स्थान पहुंचाने को कहा ।

    लौटते में वैश ने ड्यूटी पर उपस्थित हैड नर्स को कहा कि यह केस खास है । फाइल सम्हाल कर रखें ।

     सुबह यह बात हक साहब को मालूम हो गई । उन्होंने फाइल बुला कर अपने चैंबर में अपनी कस्टडी में ले ली । उन्होंने व्हील चेयर पर मुझे वहीं अपने चैंबर में बुलाया फिर अन्य आक्टरों को वहीं बुलवा कर चैक करवा कर फाइल में उनसे स्थिति लिखवाई और डॉक्टरों को जाने दिया ।

     अब हक साहब ने मुझसे सीधे  पूछा ,,--" तुम्हारा प्रकरण क्या है ,,?? उन्होंने तुम्हारे ऊपर अटैक क्यों किया ,,?? " 

    मैनें उन्हें पूरी बात बताई ।

  वे चुपचाप मेरी बात सुनते रहे ।

  फिर फाइल पलट कर पीछे के प्रिस्क्रिप्शन देखने लगे ।

    तभी चैंबर के दूसरे पार्ट में रखे टेलीफोन की घण्टी बजी ।  

     किसी के अभिवादन के उत्तर में उन्होंने ' वालेकुम सलाम ' कहा । 

     उनकी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी । उन्होंने सामने वाले की बात का जवाब देते हुए कहा ,

    ," सांसद जी ।  अगर विश्वासः न हो तो आप अस्पताल आ जाये । ! खुद देखिए कि सिर पर डंडा पड़ने से कैसी चोट  लगती है और मुंह कैसा टेढ़ा हो जाता है । " 

    उधर से फिर कोई आवाज आई । तो थोड़ी देर ठहर कर उन्होंने कहा ,

  ," मुझे राजनीति से कोई लेना देना नहीं । में डॉक्टर हूँ और मुझे पता है कि कब किसी को भर्ती करना है और कब डिस्चार्ज " !

     इतना कह कर उन्होंने फोन बंद कर दिया ।

    वे तमतमाया चेहरा ले कर बाहर आये ।

   

   मैनें यूं दर्शाया की मैनें कुछ सुना नहीं ।

   तब उन्होंने फाइल अपनी कस्टडी में अलमारी में रखी और अटेंडेंट बुला कर व्हील चेयर पर मुझे वापिस बैड पर भेज दिया ।

 

    मेरा इलाज एक माह तक चला और में तभी डिस्चार्ज किया गया जब में पूर्णतः स्वस्थ्य हो गया ।

   

      मुझे डिस्चार्ज जल्दी  करने और  न करने का राज जब मुझे बाद में  पता चला तो मैं आश्चर्य में पड़ गया ।

--5---


 

  अस्पताल में इलाज के दौरान दो दो उल्लेखनीय उपलब्धि हुईं ।

    एक तो मेरा ट्रांसफर नागौद से मैहर हो गया दूसरे मेरी सबसे छोटी बेटी ' प्रभुता ' ने जन्म लिया । इलाज के अंतिम सप्ताह में,,मैं चलने फिरने योग्य हो गया था इसलिए प्रसूति वार्ड में भर्ती पत्नी को भी , अटेंड कर लिया ।

     इस एक माह में अस्पताल के सभी डॉक्टर , कर्मचारी मुझे जान चुके थे । बेटी ने जन्म के समय ही , गर्भ थैली का फ्लूइड इन्हेल कर लिया तो उसे सांस में दिक्कत होने लगी ।

     में उसे हाथों में उठा कर ,अस्पताल के ऊपरी भाग में बने चिल्ड्रन वार्ड में ले गया जहां चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर यादव के हाथों में सौंप दिया । डॉक्टर यादव मेरे शुभ चिंतकों और मित्रों में से एक थे । उन्होंने कहा - " चिंता न करो ,,इसे कुछ नहीं होगा । यह तो तुम्हारी रक्षक है । " 

 

      जल्दी ही अस्पताल से मेरी छुट्टी हो गई ।

      उधर मेरे और नगरनिगम  के लोगों के विरुद्ध , पुलिस ने दो अलग अलग केस बना कर नागौद लोवर कोर्ट में  चार्जशीट दायर कर दी ।

      इस तरह एक ही घटना के दो केस बने ,,जिसमें एक में ,,मैं मुजरिम था और दूसरे में सरकारी गवाह ।

     अस्पताल से छूटते ही मुझे मैहर में शिफ्ट होने की चिंता हुई ।

मैंने मैहर के पंजाबी मुहल्ले में एक मकान लिया और भाइयों से कहा कि। ट्रक में भरकर चुपचाप नागौद से सामान ला कर मैहर शिफ्ट कर दें ।

     मकान में प्रवेश करने से पहले मैं सपरिवार शारदा मां के मंदिर में  मां  के सामने गया । आंख मूंद कर मैंने उनसे कहा -- 

 ,,,,," जो आपने करवाया ,,वो मैनें किया ,,अब आगे जो आपको उचित लगे ,,वो करो ,,। " 

     मंदिर के उस ऊंचे पर्वत पर मेरा विषाद पूरी तरह धुल गया । मन ने कहा  " ,,अब तुम्हें क्या चिंता ,,?? अब तो माँ  ने तुम्हें  अपनी  गोद में मैहर  बुला लिया ।  " 

    मैहर में मेरी पोस्टिंग सम्भागीय कार्यालय में जे ई वर्क्स के कार्य के लिए हुई । वहां मेरे साथ एक ऐ ई वर्क्स सिन्हा साहब भी थे । कार्य सुचारू रूप से चलने लगा ।


    दस दिनों बाद ही नागौद से दो पुलिसवाले मेरे घर आ गये । उन्होंने कहा ," सम्मन है ,,आप को ले जा कर  नागौद कोर्ट में पेश करना है ! " 

    मेरी पत्नी ने देखा ,,वे हथकड़ी वगैरह भी लिए थे । वो घबरा गईं ।

    मैनें पत्नी को सांत्वावना दी । पुलिस वालों से कहा ,,-

    " में एक सरकारी मुलाजिम हूँ ,,मेरे आफिस का समय हो चुका है ,,मुझे आफिस जाकर एक विशेष कार्य करना जरूरी है ,,आप आफिस चलो,,विशेष फाइलें अपने साथी को सौंप कर में आप के साथ चला चलूंगा ," ! 

      थोड़ी देर ना नुकर के बाद वे मान गए । में उनके साथ आफिस गया । वहां सिन्हा साहब को फाइलें सौंपी । उन्होंने पूछा कि ये फाइलें क्यों दे रहे हो तो मैनें बताया कि मुझे गिरफ्तार करके दो पुलिस वाले नागौद ले जाने आये हैं और बाहर बैठे हैं ।

    यह सुनते ही आफिस का पूरा स्टाफ उठ खड़ा हुआ । उन्होंने पुलिस वालों को अंदर बुलाया । उन में से एक हवालदार सिपाही मेरे आफिस के बाबू का रिश्तेदार  भी था ।

    सिन्हा साहब ने फोन उठाया और सीधे सतना एस पी को लगाया । उन्होंने कहा 

,," ,,गिरफ्तारी जरूरी नहीं ,,कोई भी जमानत दे दे और मुलजिम नियत तिथि में समय पर कोर्ट में जा कर जज के सामने पेश हो जाये ,,वहां कोर्ट फिर जमानत दे देगा क्योंकि कोई गम्भीर आपराधिक प्रकरण नहीं है ।" 

   पुलिस के लोग भी तुरन्त मान गये । सिन्हा साहब ने खुद जमानत ली और पुलिस वाले उन्हें सलाम करके वापिस चले गये ।

  

   नियत तिथि पर सुबह सुबह में अपने साथी यंत्री श्री पी एल सिंह के साथ उनकी जमीन जायदाद के कागजात ले कर कोर्ट में उपस्थित हुआ । पीएल सिंह नागौद निवासी थे और कोर्ट में उनको सब जानते थे तो जमानत का काम भी तुरन्त हो गया । 

   नागौद से काम होते ही में पी एल सिंह के साथ सतना लौट आया ।

     अब मुझे एक वकील करना था जो केस लड़े । 

   पी एल सिंह ने बताया कि  दूसरे पक्ष के  विरुद्ध दायर हुआ केस सतना की एडीजे कोर्ट में ट्रांसफर हो चुका है ।

    मैनें पूछा ,," क्यों ,," ??

 तो पी एल सिंह ने बताया कि ,,"" " मारपीट में अगर चोटिल  व्यक्ति 21 दिन से अधिक दिनों तक चिकित्सकीय इलाज में अस्पताल में भर्ती रहे तो मामला संगीन हो जाता है और तब उसे गम्भीर अपराध मान कर उसकी सुनवाई जिले की एडीजे कोर्ट करती है ।,," 

     अब मेरी आँखों के सामने से सभी पर्दे हट गए,,कि क्यों लोग मुझे जल्दी ही अस्पताल से डिस्चार्ज करवाना चाहते थे ,,! 

     मुझे सांसद महोदय के फोन और उस वार्तालाप के दृश्य भी आंखों के सामने घूम गए जिसमें मुझे छुट्टी करने के लिए सांसद द्वारा दिये गए दवाब को हक़ साहब ने नकार दिया था ।

    मुझे अपराध के वे छिपे  चेहरे भी दिखने लगे जो अपराधियो को ताकत देते हैं ।

   लेकिन अभी तो एक नई जंग शुरू हुई थी ,,,कोर्ट कचहरी की जंग । जो आगे जा कर सिर्फ मुझे और मुझे ,,अकेले ही लड़नी थी ।

      मजे की बात यह थी कि यहां चाह कर भी कोई मेरी मदद नहीं कर सकता था ।न यूनियन ,,न कोई  मित्र ।

      यहां वकालत व्यवसाय थी ,, और आप की जान का मालिक एक वकील था,।

      तो मैनें एक वकील की तलाश की । 

    उधर  ऐ डी जे कोर्ट में मेरे विरोधियों का  केस आ जाने  से वे  सजा के भय से मेरे विरुद्ध और ज्यादा खूंखार हो गए ।

    कारण अलग था ।


   ऐ डी जे पाराशर साहब बड़े स्ट्रिक्ट थे । कानून के गहन जानकार । उनके कोर्ट से सजा न हो यह बहुत असम्भव बात थी । 


तो विरोधियों को भी एक बड़ा क्रिमिनल वकील ढूंढना  पड़ा ,,और उन्होंने शहर का सबसे बड़ा वकील लगाया ।

   

    अब जंग कठिन हो चुकी थी ।

 

    उन लोगोंको अपने किये की सजा मिलेगी या नहीं या फिर मुझे जेल भुगतना पड़ेगा ,,?? , यह  न्यायालय पर निर्भर था ।

  लेकिन देवदूत  तो थे ,ही ,,जो आगे मेरी सहायता में आने वाले थे ।,,

   क्रमशः,।

--6---


लेकिन,,,मुझे तो अपनी चिंता सता रही थी ।

मेरा कोर्ट तो नागौद में ही था ,,उसी बस्ती में जहां मुझ पर जानलेवा हमला हुआ था ,,जहां अभी भी उन लोगों का वर्चस्व था जिनसे में  भिड़ गया था । 

  सच कहें तो अब मैं ही रणभूमि से पलायन कर गया था और वहां अभी भी खूंखार लोगों का राज था जो अन्याय को ही अपनी ताकत समझते थे । 

     ऐसी स्थिति में हर बार पेशी पर नागौद जाना क्या मेरे लिए निरापद था ,,??  हर बार पी एल सिंह या कोई और साथी तो नागौद जायेंगें नहीं । मैहर से नागौद का  50 कि0 मी0 का रास्ता क्या कोई   नई वारदात को अंजाम नहीं दे  देगा ,,खास कर तब , जब सामने का व्यक्ति बौखला चुका हो ,,?? 

    किसी ऐसी  दूर  की जगह में नौकरी करना अब कितना दुरूह है  जहां आप कौटुम्बिक रूप से अकेले हों ,,जहां  संतुलन शक्ति का अभाव हो ,,??  जहां कोई सामाजिक दबाव आपके पक्ष में हो ही न ?? 

    ये बातें सोच कर मन घबराने लगा ।

     अब मुझे ऐसा वकील भी चाहिए था जो इस न्यायिक प्रकिया में मेरे अभिन्न मित्रों की तरह सहायक बन के मुझे उबार सके । तब  कचहरी की मंडी में ,  मैं एक साथी वकील को तलाशने लगा ।  

    ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लत ने अब तक मुझे खाकी रंग के पेंचदार , श्वेत एप्रिन के घुमावदार गलियारों से गुजार दिया था लेकिन अब काले रंग के तिलस्मी नगर से होंकर मुझे सुरक्षित  बाहर आना था ।

     दूसरे दिन इतवार था । तो मैं सुबह सुबह ही अपने एक परिचित वकील श्री खरे साहब  के घर पहुंच गया । मेरे ये मित्र वकालत में तो प्रसिद्ध नहीं हुए थे किंतु व्यंगकार के रूप में देश में प्रसिद्ध हो चुके थे । वे प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी थे तो उनका पहला लक्ष्य था ,,,' अन्याय के विरुद्ध लड़ना ,,' !

     उन्होंने कहा ,," मुझे आपका पूरा किस्सा मालूम है ,,,ईमानदारी की सही सजा आपको मिली है । "  

     मैनें पूछा ,  " ,अब क्या करूं ,,??  में नागौद पेशी में नहीं जा सकता । " 

  वे बोले --" तो मत जाओ ।  मैं आपका केस सतना ट्रांसफर करवा देता हूँ । " 

    उन्होंने एक एप्लिकेशन बनाई जिसमे झगड़े का  स्थल नागौद  बताते हुए मेरी जान को खतरा बताया और मेरी एफ आई आर , और अस्पताल की रिपोर्ट लगाई और  दूसरे दिन सीजेएम कोर्ट में केस सतना ट्रांसफर करने की विनय की ।

     खरे साहब बहुत अच्छे प्रसिद्ध व्यंगकार थे । सीजेएम साहब उन्हें जानते थे । केस जिनायन था । तो केस सतना लोवर कोर्ट में ट्रांसफर हो गया । 

      मैनें वकील साहब को धन्यवाद दिया और मां शारदा को स्मरण किया । मैनें मां से कहा ,,अब तो आप कदम कदम पर मेरे साथ आ गईं हैं ,,अब मुझे कोई चिंता नहीं ।

     लेकिन फिर भी केस लड़ने के लिए मैनें एक बड़ा वकील कर लिया क्योंकि खरे साहब सिविल केस ही देखते थे ।

   उधर ऐ डी जे कोर्ट में उन लोगों की भी पेशी शुरू हो गई ।

     न्याय पाना कोई आसान काम नहीं यह मैं न्यायालय आकर समझ गया । यहां केस फाइल , तारीखों की बैसाखियों पर लंबी छलानें लगा कर चलती है । कभी गवाह आया ,,कभी नहीं आया , कभी जज साहब बैठे,,कभी नहीं बैठे ,लेकिन मुझे दिन भर कोर्ट के द्वार के आसपास रहना जरूरी था । हांक लगते ही मुजरिम वाले कटघरे में खड़ा होना मेरी आत्मा को कचोट जाता ।

    लेकिन वकील साहब की फीस तो हर पेशी पर देना ही पड़ती थी । 

   में अपनी तनख्वाह से पैसे निकाल कर वकील साहब को पैसे देता । कोर्ट के खर्चे के नाम पर भी कुछ पैसे देने पड़ते । कभी कभी मुझे घर की जरूरतों में भी कटौती करनी पड़ती ।

      अब विभाग को मेरी लड़ाई से कुछ लेना देना नहीं था । मुझे कभी कभी पश्चाताप होता कि क्यों मैनें सम्भागीय यंत्री जैन साहब की बात पर ध्यान नहीं दिया ,,!! आखिर यह लड़ाई तो सरकारी राजस्व के हितार्थ और अन्याय के विरुद्ध ही मैनें  लड़ी थी ।

    दिन कटने लगे और दोनों केस आगे बढने  लगे  । 

  उधर एडीजे कोर्ट में सरकारी गवाह होस्टाइल होने लगे । मेरे ही लाइनमैनों ने कुछ भी देखने से इनकार कर दिया । कोई भी चक्षु दर्शी गवाह सामने आ कर  कोर्ट में स्वीकार नहीं किया कि उन आरोपियों ने मुझ पर प्राणघाती हमला किया था । अलबत्ता सीएमओ हक साहब ने जरूर सशक्त गवाही दी कि चोट घातक थी ।

   

   धीरे धीरे में उद्विग्न और निराश होने लगा । मुझे लगा कि वास्तविक अपराधियों को शायद ही सजा मिले ,,लेकिन मुझे सजा होने के पूरे आसार हैं ।

   यह सब चल ही रहा था की एक दिन एक अपरचित व्यक्ति ने बाजार में रोक कर कहा ,,' सतना के ," ,,x,,दादा ' ने खबर भिजवाई है कि आप नागौद वाले केस में समझौता कर लें ,,यह आप के लिए ठीक  होगा । ' 

    "और अगर न करूं तो ,,??" 

    " तो आप जानों,, और दादा जानेंगे !! आप बाल बच्चे दार आदमी हो। ,,कुछ ऊंच नीच हो जाये तो क्या करोगे ,,?? "  

     मैं अंदर अंदर डर गया । मैंने कहा ,," सोचता हूँ !" 

    मैनें यह बात पी एल सिंह को बताई तो वे चिंतित होते हुए बोले ,," यह खबर तो मेरे पास भी आई है । ,,,में आपको बताने वाला ही था ,! " 

     तो अब क्या करूं ?? में सोचने लगा ।

   '  x दादा ' सतना के घोषित दादा  थे । बालबच्चे दार होने का क्या  अर्थ ,,?? 

    अगर मेरे बच्चे को ही कोइ उठा ले  जाये तो कौन ठिकाना ,,?? 


क्रमशः,,,,,7,,,,

सत्य के पक्ष में , ईमानदारी की  यह लड़ाई मुझे इस स्थिति में ला कर खड़ी कर देगी यह मैनें सोचा नहीं था ।

   अब तक फिल्मों में  जो सीन देखता आया था ,,अब वो वास्तविक स्वरूप धारण करके मेरे  सामने खड़ा हो गया था ।

     घबराहट में पसीना निकलने लगा । पी एल सिंह की बात से यह स्पष्ट हो गया कि सतना के दादा भाई द्वारा भेजा गया  सन्देश सत्य है।

   सतना के दादा भाई अपराध की दुनिया के अधिपति थे । उनका सन्देश सलाह नहीं ,,आदेश की तरह ही था जिसे नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता था । 

       भय और अवसाद के बीच झूलता में ऑफिस गया । वहां जिससे भी बताया ,,वहः चुपचाप मुझे ताकता रहा ।  सबने कहा कि यह फैसला मुझे खुद लेना होगा कि मैं समझौता करूं या न करूं । अलबत्ता यह भी समझाया कि दादा भाई के सन्देश की अवहेलना   करके खुद के लिए संकट भी  मोल  न लूं । 

      आफिस में अब मन नहीं लगा । चुपचाप आधे दिन की छुट्टी ली और घर लौट आया । घर में आकर उहापोह में पड़ा सोचता रहा ।

    अंतर्द्वंद में मेरे मन में दो परस्पर विरोधी विचार मुझे मथने लगे । सोचा कि अब तक जो हुआ उतना पर्याप्त था उन लोगों को दण्ड स्वरूप हुई परेशानियों के रूप में  । व्यक्तिगत वैमनस्य बढाने से क्या लाभ ?? ,कल अगर मुझे या मेरे परिवार के साथ कोई अनहोनी हो जाये तो क्या करूंगा   ?? ,,समझौते में क्या नुकसान  है,?? 

     दूसरे विचार ने कहा  कि यह तो वही स्थिति है ,, भय और आतंक की ,,,जो नागौद में थी ,,

तो उसके सामने अब हथियार क्यों डाल रहे हो ,,?? ऐसा था तो सम्भागीय यंत्री की बात तभी क्यों नहीं मान ली थी ,,जिन्होंने कहा था ,,क्यों पचड़े में पड़ते हो ,,?? 

    यही सोचते विचारते शाम हो गई । बच्चे स्कूल से वापिस घर आये तो पत्नी को हिदायत दी कि कुछ दिन बच्चों को स्कूल न भेजें ।  

     वे उस समय तो कुछ नहीं बोलीं । रात में खाना खाते हुए पूछा ,," क्या हुआ ,,मुझे बताओ ,,!" 

      मैनें उन्हें सतना से दादाभाई द्वारा भेजे  सन्देश के बारे में बताया । अपनी विचलित मनःस्थिति के बारे में बताया ।

      लेकिन वे तो ईश्वरवादी थी ।  उन्होंने कहा ,," किसी दादाभाई की चिंता मत करो । ईश्वर से बड़ा कोई नहीं होता । '  हुई है वही जो राम रुचि राखा '।,, ईश्वर पर भरोसा रखो सब ठीक होगा । " 

      इतना कह वे तो सो गईं लेकिन मेरी आत्मा जग गई ।

     मन बोला ,," तुम तो माँ के  वरद पुत्र हो ,, सीधे माँ को क्यों नहीं बताते जा कर ,,?? वे सब देख लेंगी क्या करना है क्या नहीं । " 

      माँ का ध्यान मन  में आते ही मन बिल्कुल हल्का हो गया । कोई अवसाद न बचा । जल्दी ही नींद आ गयी ।

       सुबह स्कूटर उठाई और सीधे मंदिर के पहाड़ पर चढ़ गया । उन दिनों ऊपर मंदिर तक जाने के लिए पर्वत का घेरदार,, घुमावदार रास्ता था जिससे वाहन जाया करते थे ।

ऊपर मंदिर में आरती हो रही थी । में चुपचाप भीड़ में जा कर खड़ा हो गया ।

    कुछ देर बाद जब भीड़ छंट गई तो माँ से आमना सामना हुआ ।

     मैनें चुपचाप हाथ जोड़े और पूरी स्थिति को उनको सौंप कर कहा ,," अब आप जानो ,,,,जैसा उचित लगे  वैसा करो ,मैं मुक्त हुआ " !

      अपनी बात कह कर मैं जल्दी ही नीचे उतर आया । 

     नीचे उतरते ही सामने पी एल सिंह मिल गये । वे नगर वितरण केंद्र के अधिकारी थे ,,रोज मंदिर की विद्युत व्यवस्था देखने मंदिर आते ही थे । 

      मुझे देखते ही वे मेरा हाथ पकड़ कर मुझे पास में बने चाय के ढाबे में ले गये । वहां इत्मीनान से बैठ कर उन्होंने कहा ," ,,,


     " कल आपसे बात होने के बाद मैं सतना गया था । वहां आपका विरोधी पक्ष भी मुझे मिला था । उनसे जब पूछा कि बीच में।  'xx दादा '  को क्यों डाला तो वे बोले कि,,' क्या करें ,?? शर्मा जी झुकने वाले नहीं,,,विभाग में हमारी प्रतिष्ठा खत्म हो चुकी है ,,इधर क्रिमिनल केस दायर हो चुका है ,,एक ही रास्ता है बचने का कि शर्माजी समझौता कर लें ,,,इसीलिए ,,xxx दादा के दरबार में गये थे ,,। आप तो  अपनी जाति के हो कर भी साथ नहीं दे रहे ,,,अगर आप जिम्मा ले लें तो दादाभाई क्यों बीच में पड़ें ??'

      पी एल सिंह आगे बोले,,,, कि ,,,मैनें उनसे कहा ,,' तुमने गलत किया,,, इसलिये यह सब हुआ ,,,क्या तुम्हें अपनी गलती का एहसास है ,,??'

   वे बोले,,, " हम कान पकड़ कर शर्माजी से  क्षमा मांगने को तैयार हैं । आप इस केस से छुटकारा दिलवा दो ,,'

     पी एल सिह बोले कि,,  'तब चलो ,,पहले ,,'xxx दादा ' के दरबार में स्वीकार करो कि गलती तुम्हारी है ।' 

    वे सहमत हो गए तो वे सब मिल कर ,,'  xxx दादा ' के दरबार में गए जहां यह तय हुआ कि,,' xxx दादा '  को अब कोइ मतलब नहीं । यह दो विभागों के बीच उत्पन्न हुआ प्रकरण है ,,,कोई जातीय प्रकरण नहीं ,,,इसलिए दादा उनका पक्ष ले कर कुछ नहीं कहेंगें  ,,!,,अदालत में कोई जीते या कोई हारे इससे भी उन्हें कोई मतलब नहीं । दो पक्षों के बीच अगर हो सके तो मैं समझौता करवा दूं ,,और यदि न हो पाए तो भी  उन्हें कोई मतलब नहीं । ' 

    जिसने जैसा जो किया वो वैसा  भोगेगा,,। " 

      इतना कह कर पी एल सिंह  ने अब मूझ पर आंखें  गड़ाते हुए कहा ,

      ,,"  इस तरह अब '  दादा xxx ' तो इस इस मामले से दूर हट गये,,,,,,,,,, लेकिन,,शर्माजी,,!,,मैं,,फंस गया ,,!!,' 

   

 " आप किस तरह,,फंस गए ?? " 

  

 --- " इस तरह ,,,,कि मैनें उनसे हामीं  भर ली कि मैं आपको समझौते के लिए मना लूंगा । " 

 सिंह ने आशा भरी निगाह से मुझे ताकते हुए कहा ।

       उनकी अंतिम बात सुन कर जैसे  मैं अवसाद के गहरे समुद्र में डूब गया । पी एल सिंह ने मुझे एक आसन्न संकट से उबार लिया था लेकिन अहसान और रिश्तों से भरे  अपनत्व के एक  मीठे कुएं के जल में फिर से धकेल दिया था ।

      में कुछ कह पाता ,,उससे पूर्व ही पी एल सिंह गम्भीर स्वर में  फिर बोले,,,

   "शर्मा जी ,,! हम लोग नौकरी पेशा हैं ,,जाती दुश्मनी क्यों पालें ,,?  उधर वे लोग भी नौकरी पेशा हैं ,,,वे मान रहे हैं कि उनसे गलती हो गई है ,,वे क्षमा भी मांगने को तैयार हैं ,,तो क्यों न हम उन्हें क्षमा कर दें ,,?? ,,फिर आप तो ब्राह्मण हैं ,,आप क्षमा कर देंगें तो जीवन भर वे आपके ऋणी रहेंगे ,,। " 

   मैं फिर किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया । कल तक तो दवाब था किसी बाहुबली का ,,,आज मनुहार थी ,,याचना थी ,,उस अपने की ,,,,जो संघर्ष में मेरा सारथी बना था,,सहयोगी था  । 

    फिर भी मैनें कहा ,,

    " अब तो  क्रिमिनल केस शुरू हो चुका है,,,अब समझौता कैसे सम्भव  होगा  ,,??"

  सिंह ने कहा ,," इसका हल उनके वकील साहब ने बताया है ,,आप को कोर्ट में बस यह कहना है कि आप ने आक्रमण के समय धुंधलके में ठीक से नहीं देखा ,,,ये लोग ही  थे यह विश्वासः से नहीं कह  सकते,,!,"

      यह सीधे सीधे होस्टाइल हो जाने का सुझाव था ।

    

 ,,, लेकिन मैं यह कैसे मान लूं कि उन्हें अपने किये का पश्चाताप है ,,वे क्षमा मांगना चाहते हैं ,," ?

--मैनें अन्तिम प्रतिरोध किया ।

 

-पी एल सिंह बोले,," वे  मेरे साथ आपके घर आकर माफी मांगेंगे ,,गलती स्वीकार करेगें  ,,तब तो आप मानेंगे ,,?"


   

    मुझे लगा कि हम लोग मंदिर के नीचे बैठ कर ये बातें कर रहे हैं तो माँ की यही मंशा होगी । ,,,उसे अस्वीकार कैसे करूं ?

     

   मैनें पूछा - " कब आयेंगें वे लोग ??  माफी मांगने ,,??" 

    पी एल सिंह बोले ,," दो दिन बाद उनकी पेशी है ,,वे कल ही हाजिर होंगे आपके सामने ,,क्षमा मांगने । ,,,फिर दो दिन बाद जा कर कोर्ट में जैसा उनका वकील कहे,, वैसा आप कह दीजिये ,,। मामला ,,खत्म,,,। " 

   

मैनें हाँ कर दी ।

   

   लेकिन क्या माँ की यही मंशा थी ,,?? 

    क्या सचमुच समझौता होना सम्भव था ,,?? 

    शायद नहीं ,,,!!

    क्योंकि वह अंतिम देवदूत तो अब अवतरित होने वाला था,,,अंतिम दृश्य में ,,जिसने पूरे दृश्य को बदल दिया ।

   और जिसकी सीख मेरे हृदय में अमिट हो गई जीवन पर्यंत ।



,,सभाजीत


   क्रमशः ,,,,

,,,8,,,


   दूसरे दिन इतवार था ।

  

    सुबह सुबह ही पी एल सिंह अपनी प्लानिंग के मुताबिक नागौद के उन आरोपी लोगों के ले कर मेरे घर आ गए जिनसे मेरी लड़ाई हुई थी और जिन्होंने मुझ पर प्राणघातक हमला किया था ।

    वे कमरे में आकर एक लाइन में खड़े हो गये । फिर पी एल सिंह के निर्देश पर एक एक व्यक्ति ने रिवहीँ  अंदाज़ में आगे बढ़ कर , आधा झुक कर मुझे प्रणाम किया । वे मुंह लटकाए ,  आंखें  झुका कर ऐसे खड़े हो गये जैसे अबोध बच्चे हों और किसी टीचर की आज्ञा पालन करने  भयभीत हो कर आये हों ।

       मैनें ध्यान से देखा,, वे अबोध मुखोटे लगाए वही क्रूर चेहरे थे जिन्होंने मरणासन्न होने की स्थिति तक मुझ पर भद्दी मां बहिन की गालियों के साथ  लोहे की रॉड से घातक इतने प्रहार किये थे कि बस एक प्रहार और होता तो मेरे बच्चे अनाथ हो जाते ।

     ये वही क्रूर चेहरे  थे जो  शासकीय अधिकार के मद में चूर हो कर अवैध कमाई को अपना पैतृक अधिकार मानते थे ।

     ये वही चेहरे थे जिन्होंने मुझ पर अपने बचाव में झूठा मुकदमा ठोका था ।

     ये वही चेहरे थे जिन्होंने जिला अस्पताल तक आ कर , वहां के मुख्य चिकित्सक को अपने मन मुताबिक मेरी चिकित्सा  बाध्य करने की कोशिश की थी ।

     और ये वही चेहरे थे जो अब सिर झुका कर मुझे आदर देने का ढोंग कर रहे थे ।

     मैनें सोचा ,,क्या ये चेहरे क्षमा करने योग्य हैं ,,.? 

     आखिर माँ मुझसे क्या करवाना चाहती हैं ,?? 

     क्या क्षमा कोई आभूषण है जो वीभत्स और क्रूर व्यक्ति के गले में भी लटका दिया जाए,?? 

      तभी  पी एल सिंह ने उन्हें निर्देश दिया । सब लोग शर्मा जी से माफी मांगो ,,।

     उन्होंने एक एक कर के  कहा ,,, हमसे गलती हो गई ।

      

     पी एल सिंह ने फिर कहा ,,

  "-   पंडितजी हैं,,,अब एक एक करके आगे  बढ़ के गोड़ छुवो,,।

      सबने मेरे घुटने छू कर पैर छूने की दिखावटी प्रक्रिया पूर्ण की  ।

     अंत में पी एल सिंह ने मुझसे कहा --" देखिये सब पश्चाताप कर रहे हैं माफी मांग रहे हैं आप भी माफ कर दीजिए ,,। "

     

     मुझे यह एक लघु नाटिका से बढ़ कर कुछ और नहीं लगी ।  फिर भी चूंकि पी एल सिंह से स्वीकार कर चुका था इसलिये  सिर हिला कर हाँ  करके संतुष्टि दिखा दी ।

      बाहर निकल कर वे सब अपनी सामान्य मुद्राओं में हो गए । बाद में मेरी पत्नी ने बताया कि वे हंसे भी ।

      शायद वो अपनी उस नाट्य कुशलता पर हंसे जिसके जरिये उन्हें लगा कि वे कोर्ट में होने वाले फैसले में वे  निर्विघ्न विजयी हो जाएंगे ।

      यह सब देख कर मुझे लगा कि पी एल सिंह नहीं बल्कि पी एल सिंह का प्रस्ताव स्वीकार करके  मैं ही फंस गया हूँ ।  

      वे अपना दावँ खेल कर चले गए थे और मुझे अपने हिसाब  से 

उनके पाले में पूर्व निर्धारित खेल खेलने को आमंत्रित कर गये हैं ।

     लेकिन अब क्या हो सकता था  ? ,,वकीलों के दावँ पेंच से में अनभिज्ञ था । न्याय में सत्य प्रमाणित करना कितना कठिन है यह बात मेरी समझ में आने लगी थी । 

     तीसरे दिन पी एल सिंह घर आ गए । साथ में दो लोग  और थे जो शायद उन्ही ओपियों के रिश्तेदार थे जो माफी मांग कर गये थे ।  उन्होंने कहा ,,,जल्दी चलें ,,हो सकता है पुकार जल्दी हो जाये ,,और फिर वकील साहब बताएंगें कि कैसे और क्या बोलना है ,,।इसलिये जल्दी पहुंच कर समझ लें  तो ज्यादा अच्छा रहेगा ।

    मेरा मन मुझे अंदर ही  अंदर कोसने लगा । मुझे वकील का सिखाया वहः झूठ  बोलना था जो बिल्कुल सच नहीं था ।  लेकिन शायद मैं अब ट्रैप हो चुका था ।

     और में ही क्यों ,,शायद पी एल सिंह भी ट्रैप ही हुए थे । एक ही जाल से ,,,अपनत्व के जाल से । वे जातिवाद के भाईचारे के जाल में फंसे थे ताकि उनके बन्धु बांधव सजा से बच जाए ,,और मैं विभागीय अहसान और सहयोगी भाई चारे के जाल से ताकि पी एल सिंह का विभागीय अहसान चुका सकूं ।

    मन तो हुआ कि आज मना कर दूं किन्तु संकोच में रह गया ।  

चलते समय एक बार मंदिर की ओर नीचे से ही मुंह करके मां को प्रणाम किया और फिर सब कुछ उन्हें सौंप कर पी एल सिंह के साथ अन्य दो लोगों से घिर कर में कोर्ट पहुंचा ।

      कोर्ट शुरू हो चुका था पर न जाने क्यों जज साहब बीच में ही उठ कर अपने चैंबर में जा कर बैठ गए थे । मेरे विरोधियों के वकील साहब शहर के जाने   माने क्रिमिनल केसों के वकील थे । 

    वे जाति से ब्राह्मण और सरनेम से शर्मा ही थे । उन्होंने जाने कितने दुर्दांत अपराधियों को जेल जाने से बचाया था इसलिए वे बहुत कम समय मे प्रख्यात  हो गये थे । 

     मुझे देख कर वे मुस्कराए,,फिर उन लोगों से कहा ,,"- आखिर तुम लोग ले ही आये इन्हें ,,अब ठीक है,,आपको वही कहना है जो पहले बताया था । कोर्ट में इन्हें तुम लोगों को नहीं पहचानना है ,,बस ,,!!" 

     जज साहब अभी नहीं बैठे थे ,,तो हम लोग बाहर निकल कर आ गये । लगा अभी पुकारे के लिए देर है ,,तो पी एल सिंह ने कहा ,," चलो तब तक कहीं चाय पी लेते हैं । " 

     हम लोग पास के एक बड़े रेस्टुरेंट में घुस गए । 

       तुरन्त चाय और काफी का सुविधानुसार आर्डर हुआ । फिर किसी ने कहा ,,' एकएक रसगुल्ला हो जाये ,," !

   तभी मैनें देखा कि सामने की टेबिल पर मेरे परम् मित्र श्री लाजपत राय बैठे हैं ,,वे किसी काम से कोर्ट आये थे ।  शायद किसी से मिलने ,,क्योंकि अमूमन उन्हें कोर्ट आने की जरूरत कभी पड़ती ही नहीं थी । वे जाती से सिंधी थे किंतु सात्विक और ईमानदार । वे सतना नगर के सिंधी समाज के मुखिया थे । और सतना नगर में कोल्ड हाउस के मालिक थे ।

   उन्हें सब लोग जानते थे । न सिर्फ सतना में बल्कि आसपास के अन्य नगरों में भी । उनकी प्रतिष्ठा इतनी थी कि उनके आफिस में नगर के कई लोग समस्या सुलझाने भी चले जाते थे ।

    उन्हें देखते ही मैनें मुस्करा कर , हाथ उठा कर नमस्कार किया किन्तु उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया ।

     तभी रसगुल्ला मेज पर लग गया । मेरे विरोधी भी उनसे अच्छी तरह परिचित थे तो आदर सहित एक प्लेट रसगुल्ला उनकी टेबिल पर भी पहुंचाया ।

    उन्होंने प्लेट की तरफ किंचित न देखते हुए मेरे विरोधियों से पूछा ,," क्या बात है ,,आज बहुत अच्छा दिन है ,,आप लोगों को एक साथ देख रहा हूँ ।,,क्या हुआ आप का केस निपट गया ,,?? " 

   मेरे विरोधियों ने कहा ,," निपटा ही समझिए ,,,।,,हम लोगों में आपसी समझौता हो गया है ,,!" 

   लाजपत राय ने थोड़ा बनते हुए पूछा ,,"  क्या  केस विदड्रा हो गया  या आपके हित में फैसला हो गया ,,? " 

    मेरे विरोधियों ने उत्साहित हो कर कहा ,,," फैसला हमारे पक्ष में हुआ ही समझिए,,इसी लिये रसगुल्ला पेश किया है,,,मुंह मीठा करिए ,,शर्माजी हमारे पक्ष में बोल देंगें ,,यह तय हो गया है । " 

   लाजपत राय उठ खड़े हुए ,,रसगुल्ले की प्लेट उन्होंने सामने से सरका दी । फिर हाथ जोड़ते हुए बोले ,," रसगुल्ला तो फैसले के बाद ही खाऊंगा ,,अभी नहीं । " 

    उठने के बाद उन्होने एक भरपूर द्रष्टि मुझ पर डाली । उस द्रष्टि में ऐसा न जाने क्या था जो मुझे चीर गयी । 

     वहः द्रष्टि हिकारत की थी । क्षोभ की थी । उलाहने की थी । सवालों की थी ।तिरस्कार की थी । मित्रता की शिकायत की थी ।


     लाजपत राय की यह द्रष्टि , और उनका रसगुल्ले की प्लेट को तिरस्कृत करना मुझे बींध गया ।जिस द्रष्टि ने सदा मुझे आदर से देखा था ,जिसमें मेरी प्रतिष्ठा थी वहः आज इस रूप में क्यों मुझ पर उठी यह सोच कर में विह्वल हो उठा ।

     अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।  मैं जैसे लड़खड़ा उठा ।

     रेस्टुरेंट से बाहर आते ही मैनें कहा ,,-" मेरी तबियत ठीक  नहीं

आज मैं गवाही नहीं दे पाऊंगा ।" 

     पी एल सिंह सहित सभी अन्य लोग विचलित हो गये ।

      बोले ," अभी तो आप ठीक थे अभी क्या हुआ ,,?? " 

   मैनें कहा -" मैं नहीं जानता । लेकिन मुझसे बोलते नहीं बन रहा ,,अब मैं घर जाऊंगा । " 

    उन सब ने मुझे समझाने मनाने की कोशिश की किन्तु मेरे कान तो जैसे सनसना रहे थे ।

      मुझे लग रहा था कि कब में लाजपत राय के घर पहुंचूं ,,और उससे उसकी उस निगाह के बारे में पूछूं,, कि "  तुम क्या कहना चाहते हो ,,?? " 

      आखिर पी एल सिंह मांन  गये और अगली तारीख पर गवाही देने का वादा ले कर मुझे छोड़ दिया ।

      में वहां से निकला और स्कूटर से  सीधे लाजपत राय के घर भागा ।

     लाजपत राय घर नही पहुंचा था ,,लेकिन में उसके आफिस के बाहर पड़ी बेंच पर निढाल हो कर बैठ गया ।

      कुछ देर बाद लाजपत राय आया ,,लेकिन मुझे बिना देखे आफिस में घुस गया ।

      यह स्पष्टतः मेरी उपेक्षा थी ।

   लेकिन क्यो,?? 

        इसका जो उत्तर आगे लाजपतराय देने वाला था वहः मेरी कल्पना से बाहर था ।


 -' सभाजीत ' 

   

     क्रमशः,,

,,,9,,,


    लाजपत राय जब इस तरह मुझे उपेक्षित करके अपने कार्यालय में घुस गया तो मुझे अब अपने पर और भी ग्लानि हुई । इसी सतना नगर का जब मैं विद्युत अधिकारी था तो यह व्यक्ति मुझे  अपने आफिस के द्वार में घुसते देख कर उठ खड़ा होता था ,,,हाथ जोड़ कर नमस्ते करता था । अब ऐसा क्या हुआ जो उपेक्षा कर रहा है ।

    मेरी मझली बेटी को ठीक दिवाली पर ,अचानक बीमार होने पर , खून चढ़ाने की जरूरत हुई तो तुरन्त इसी व्यक्ति ने न सिर्फ खून का इंतजाम करवाया था बल्कि रात में रुक कर मेरा साथ दिया था । इसके आफिस में बैठ कर हम लोग घण्टों मनोविनोद करते,,तो यह खाना खाना भी भूल जाता । मेरी किसी भी समस्या को यह फोन पर ही। लोगों से बात करके सुलझा देता था । सामाजिक कार्यक्रमों में अगर मुझे देख लेता तो मेरे पास आकर बैठ जाता । कितने ही मेरे और इसके मित्र कॉमन थे ।  नागौद कांड में अस्पताल में भर्ती होने पर करीब करीब हर दिन मुझे देखने आता था ।

     फिर ऐसा क्या हुआ जो अब यह मेरी उपेक्षा कर रहा है ,,?? क्या नागौद कांड से मेरी प्रतिष्ठा इसकी नजर में धूमिल हो गई है ,,?? क्या मैहर तबादले से में अब क्या इसके लिए मूल्य हीं हो गया हूँ ,,?? 


     यह सोच कर में उठा और उसके आफिस में घुस गया । वहः अंदर पहले से बैठे दो लोगों से बात कर रहा था । मुझे देख कर उसने किंचित मुस्करा कर अभिवादन किया फिर बैठने को कह उन्ही दो लोगों से बात करने में मशगूल हो गया ।

    उनलोगों की बात जल्दी ही खत्म हो गई और जब वे चले गये तो हम दोनों कमरे में अकेले बचे ।

 अब वहः मेरी तरफ मुखातिब हुआ ,,बोला-  ," कैसे आना हुआ शर्माजी ,,! ,,मुझ से कोई काम है ,,?" 

     -" काम न होता तो क्यों आता ,,?? "- मैनें कहा ।

      " कहिये,, क्या खिदमत करूं ,,? " - उसने कहा ।

       मैनें उसके चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए पूछा ,,- " लाजपत राय ,,अभी हम लोग कोर्ट में मिले थे ,,आपने मेरी ओर देखा तक नहीं ,,क्या भूल गये ,,?? 

     " भूला तो नहीं ,,पर अब भूल जाना चाहता हूँ ,,!"

 -" क्यों ,?? 

  " इसलिए कि आज से मैनें कसम खाई है ,,की में किसी ,,' ईमानदार ' का साथ नहीं  दूंगा । "

      उसका यह वाक्य  ठंडी छुरी की तरह मेरे जेहन को जैसे बींध गया ।

      थोड़ी देर निस्तब्धता के बाद उसने मुझे घूरते हुए कहा - " क्या हुआ ? आपने समझौता करके आज उनके पक्ष में गवाही दे दी ,?? " 

      मैनें कहा --" नहीं ,,! आपके चले आने के बाद मैंने मना  कर दिया,,न जाने क्यों,,मुझे  अच्छा नहीं लगा ।" 

   लाजपत राय थोड़ी देर चुप रह कर बोला ,," शर्मा जी ! ,,आपके ऊपर हमला होने से लेकर कोर्ट जाने तक क्या आपने अपनी लड़ाई अकेले लड़ी,??" 

      मैनें कहा --" नहीं ,,!" 

   लाजपतराय बोला --" तब समझौते आ अधिकार आपने अकेले कैसे ले लिया ,,?? "  यदि आप अपने अकेले के बल पर लड़े होते तो मुझे कोई शिकायत न होती,,लेकिन मुझे दुख है कि आपने अपने दोस्तों का हकऔर सहयोग को छीन लिया !" 

    आप जानते हैं कि आप के होस्टाइल होने के बाद क्या होगा,,??,,जज आपके बारे में भी  टिप्पणी दर्ज कर सकता है,,आप की पूरी  शख्शियत पर हमेशा के लिए दाग लग सकता है । "

     दूसरे झूठे और बेईमान लोग जीत जायेंगें ,,वे लोग फिर बेईमानी करेंगें,,और आप जैसे  ईमानदार लोग फिर पिटेंगे। ,,हो सकता है मर भी जाएं । " 

    एक केस आप पर भी दायर है ,,खुद बेदाग बरी  होने के बाद वे झूठे गवाह पेश करके आपको जेल भी भिजवा देंगे,,।

     तब हम लोगों का किसी ईमानदार के साथ खड़े होने से क्या फायदा ,,?? '

    -" आपके विरोधी भी तो हमारे भी मित्र हैं । इसी आफिस में आकर उन्होंने कितने बार क्षोभ प्रकट नहीं किया कि हम उनका साथ न दे कर आपका साथ दे रहे हैं । हमारी आपस में बुराई भी बढ़ी,,,आपके खातिर । हम पग पग पर आपकी टोह लेते रहे ,,आपकी सुरक्षा के लिए ,,अभी भी दादा भाई को  हमीं ने खबर भेजी की शर्मा जी हम लोगों के बीच के आदमी हैं और अच्छे आदमी हैं ,,,तभी उन्होंने खुद को अलग किया ।

पी एल सिंह को तो दादा भाई के हट जाने के बाद उन्होंने उपयोग किया है ,,,।" 

     क्या अब भी आप उन्हें बचाने के लिए उनके पक्ष में गवाही देंगें ,,??"

       

       मुझे अब कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया था ।

     मैनें उठ कर लाजपतराय के हाथ अपने हाथ में लिए और मेरी आँखों में भर आईं ,एक बूंद उस पर चू गईं । मैनें देखा कि उसकी भी आंखें बातें करते करते भर आईं थीं ।

       अब मैं एक पल भी उसके पास नहीं रुका ।सीधे घर आया और आते  ही  मंदिर की देहरी पर जा  कर माँ को प्रणाम किया ।

    मैनें कहा --" माँ तुम्हारा नाम शारदा यूं ही नहीं है ,,तुम आदि शक्ति हो ,,लोगों के विवेक और जिव्हा में वास करती हो ,,तुम  किसी के भी माध्यम से , उसके विवेक में विराज कर , उसकी जिव्हा से कुछ भी करने में समर्थ हो । तुमने सदा सत्य के रक्षा की  हर युग में ,,,आज  मुझ पर भी असीम दया की ,,में कृतार्थ हूँ।" 

****

***********


इसके बाद का वृत्तांत बहुत छोटा है ।

  मैन दूसरी बार कोर्ट में अपनी गवाही में आरोपियों को स्पष्टतः पहचाना । उन के कृत्य को बताया ।

 जज पराशर ज़ाहब ने तीनों को तीन तीन साल की सजा से दंडित किया और उन पर तीन  तीन  हज़ार का जुर्माना किया ।


   हालांकि,, वे हाई कोर्ट जा कर फिर छूट गये ।


  मेरे केस में में बेदाग बरी हुआ ।

*****


    यह वृत्तांत मैनें लोगों के मनोरंजन के लिए नहीं लिखा,,बल्कि उस मित्र की याद में लिखा जो कुछ दिन पूर्व ही यह दुनिया छोड़ कर चले गये ।

*** 

वाट्सएप में लिखना कितना मुश्किल है ये वे लेखक जानते हैं जो लिखते हैं ।

इस लिए शाब्दिक त्रुटियोंऔर व्याकरण के लिए क्षमा ।


 ' सभाजीत '

शनिवार, 27 जून 2020


सिंहावलोकन

1956 के संभवतः अप्रैल माह में मेरे पिताजी का ट्रांसफर , पन्ना के गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल से , नौगावं के  ब्वायज़ हायर सेकेंडरी स्कूल में , संगीत शिक्षक के पद पर हुआ !मैं उस समय करीब छह वर्ष का रहा होऊंगा ! एक वर्ष पूर्व ,  मैं  कुछ दिन , पन्ना के प्रायमरी स्कूल में कक्षा एक में पढ़ा  ,,लेकिन वहां मुझे अच्छा नहीं लगता था तो दो तीन माह बाद ही , मुझे मेरे दादा- दादी जी के पास चिरगावं भेज दिया गया था ,,जहां मेने कक्षा एक की प्रारम्भिक पढ़ाई पूर्ण की ! जब पिताजी नौगावं में , ज्वाइन करके , एक मकान  ले लिए तो मुझे और मेरी माताजी को , जिन्हें मैं " बाई " कहता था , ले कर नौगावं आये !
यह मकान  नौगावं की कोतवाली के सामने ही था ! मकान का यह ऊपरी हिस्सा था और मकान के आगे एक छज्जा था !  एक माह बाद ही मेरा एडमिशन  नौगावं के प्राइमरी स्कूल  की  कक्षा दो में  करा दिया गया ! शुरू में एक सप्ताह तक  तो मेरे  पिताजी आकर मुझे  छोड़ जाते और ले जाते रहे ,,लेकिन जल्द ही मुझे घर आने का रास्ता याद हो गया !
    जल्दी ही पिताजी ने मकान बदल दिया !  कारण यह था की रात में कोतवाली में   अपराधियों की पिटाई होती तो वे बहुत आर्त  स्वर में चिल्लाते थे और उनकी दयनीय आवाजें हमें साफ़ सुनाईं देती ! मेरी बाई रात में उठ कर बैठ जातीं ,, और विह्वल हो जातीं ! तब जो नया मकान मिला ,,वह नत्थू शर्मा   चौराहे पर बना  श्रीवास्तव परिवार का मिला  !यह परिवार अच्चट्  के जमींदार साहब के कुटुंब  का था ! इस कुटुंब में कई भाई थे ,,जिनमें सबसे बड़े थे शारदा बाबू ! उनके चचेरे भाई , किशन श्रीवास्तव के हिस्से में जो मकान आया था वो ठीक हमारे बगल में था ! उसके बाद उन्ही के एक अन्य चचेरे भाई के हिस्से में यह भाग था , जो कानपुर में रहते थे ,,और इसी लिए मकान हमें खाली मिल गया !  यह मकान दोमंजिला था ,, जिसमें नीचे दो कमरे और ऊपर दो कमरे , एक छत , रसोई , वगैरह थी ! हमलोगों के लिए यह पर्याप्त  जगह थी !
    इस मकान में हम लोग करीब आठ वर्ष रहे !


     शख्शियत  -1
    "नत्थू शर्माजी "


 इस मकान में आने के बाद सबसे पहले मैनें नत्थू शर्मा जी को जाना !
  यह चौराहा ही पूरे नौगावं में , उनके नाम से ही विख्यात था ! चौराहे पर उनकी मुख्यतः दूध दही की दो कमरे वाली दूकान थी ,,जिसके एक कमरे में एक भट्टी जलती रहती थी और दूसरे कमरे में वे खोवे की बनी मिठाइयां और दही सम्हाल कर रखते !कमरों के सामने एक छपरी थी ,,जिसमें एक बहुत छोटी सी दो खंड वाली मटमैली सी रैक रखी रहती थी ! दिन में कुछ मिठाइयां , जिनमें पेड़ा  , बर्फी ,रबड़ी , मलाई ,  आदि प्रमुख रहते थे , लाकर सजा दिए जाते थे !
    सुबह सुबह उनकी दूकान पर गावं से दूध ले कर आने वालों की भीड़ मच जाती ! बड़ी बड़ी कढ़ाइयों में दूध उड़ेल दिया जाता ,,और फिर वो भट्टियों पर  औंटता रहता !
   नत्थू शर्मा जी , हष्ट पुष्ट , गोल मुख वाले व्यक्ति थे ! वे अक्सर नंगे बदन रहते ,,और एक धोती पहने रहते ! एक जनेऊ , उनके गोरी  देह  पर , पेट पर लिपटी हुई , उनके ब्राम्हण होने की गवाही देती थी ! वे स्वभाव से कड़क थे , लेकिन दिल से बहुत नरम थे !
   जल्दी ही हम उनके ग्राहक बन गए ! दही तो अक्सर शाम को ले ही आते ,, कभी रबड़ी भी खरीद लाते  !वैसी स्वादिष्ट रबड़ी और दही हमने  कहीं और   नहीं खाई ! कभी कभी वे रसगुल्ले भी बनाते थे ,,, जो मेरी ख़ास पसंद होते थे !
     कुछ दिनों बाद उनसे उधारी भी चलने लगी ,,! पहले तो वे स्ट्रिक्ट रहे,,,, बाद में ,, आलस में कहते ,,तुम्ही लिख दो  कॉपी में ! उस समय तक नौगावं में  पुराने सिक्के और पुराने बाँट ही चलते थे ,,जिनमें इकन्नी , दुअन्नी , चवन्नी , अठन्नी के सिक्के होते और वज़न के लिए , पाव , छँटाक , आध पाव , ही होते थे ! तराजू भी डंडी वाली ,, डोरियों से लटकती पल्लों की होती ,,, जिसमें कम ज्यादा हो जाए तो कोई बुराई नहीं थी ! कॉपी में लिखने की शैली भी पुरानी  थी जिसमें एक निशाँन   के बाहर सीधी खड़ी लकीरों से और आड़ी  लकीरों से पाव , छँटाक  लिख दिया जाता !
    उस समय चार आने की एक पाव मिठाई मिल जाती थी ! यानी एक रुपया सेर ,,!
   जल्दी ही शर्माजी के दो पुत्रों को मैंने देखा ,, जिसमें छोटे का नाम  गोविन्द था ,, और बड़े का नाम गोपाल  था ! दोनों ही अपने पिता जी की तरह सुदर्शन थे  !  कालान्तर में जब मेरी मित्रता छोटे भाई गोविन्द से हो गयी तो मैं उनके घर भी गया  ! जब चाची जी को देखा तो मुझे लगा की ऐसी माता जी सबको मिले ! वे भी बहुत सुन्दर और मृदु स्वभाव की थीं ! गोविन्द के साथ उसके घर जाने पर वहां हमें चाचीजी के हाथ से  रबड़ी खाने को जरूर मिलती थी !
       कुछ  वर्षों बाद , रामलीला में मुझे जब पहले  लक्ष्मण और बाद में राम के स्वरूप के लिए  चुन लिया गया तो गोविन्द ने मेरे साथ लक्ष्मण के स्वरूप का  अभिनय किया  ! वो बहुत ही मृदुऔर  व्यवहारी लड़का  था ,, और यद्यपि मुझसे पढ़ाई में बहुत जूनियर था ,,फिर भी मेरे मित्र की तरह हो गया था  !
        शर्मा जी का परिवार बहुत सुखी था  !,,,, तभी , किसी घातक रोग के कारण अचानक गोविन्द की मृत्यु हो गयी ! वह शर्माजी के लिए बहुत बड़ा आघात था ! उन्होंने दूकान बंद कर दी  और और अस्वस्थ हो गए ! फिर वे कभी नहीं उबर पाए ! यद्यपि बड़े भाई ,,विटनरी में डाक्टर के पद पर नियुक्त हो गए थे , किन्तु शर्मा जी छोटे पुत्र के वियोग को बिलकुल सहन नहीं कर पाए !
    जो चौराहा ,,कभी नत्थू शर्मा जी का चौराहा कहलाता था , जल्दी ही अपने नाम की पहचान खो दिया ! इस बीच करीब 1964  में , श्रीवास्तव परिवार में विवाद हो जाने के कारण , कानपुर वाले भाई ने अपना मकान , शारदा बाबू के छोटे भाई सतीश  को बेच दिया ,,तो हमें तुरंत मकान बदलना पड़ा !  आनन् फानन में जो नया मकान मिला ,,वह मड़ियाँ मोहल्ले में ,, जैन परिवार के बगल में मिला ! यह मकान किसी ठाकुर का था जो गावं में रहते थे  ! हम लोग जब वहां चले गए तो शर्माजी से प्रतिदिन का निरंतरता का  सम्बन्ध छूट गया !
    इस बीच गोविन्द के बड़े भाई का विवाह हुआ ! नौगावं में उस समय  एक उत्सुकता हर घर की महिलाओं को होती थी की किस घर में कितनी सुन्दर  बहू आयी है ,,??  गोविन्द के बड़े भाई की बहू की धूम पूरे नौगावं में गूँज गयी की वो अत्यंत सुन्दर है ! सभी महिलायें उसके दर्शन करने को लालायित  हो उठीं ! लेकिन मजाल जो वह कभी घर के बाहर दिख जाए ,,?? गोविन्द की माता जी का अनुशासन ही ऐसा था की बहू घर से बाहर नहीं आयी ! यहां तक की मंदिर भी नहीं गयी !
        लेकिन एक जगह ऐसी थी जहां उस बहू को आना ही पड़ा ,,,और वह था' ' पाठक फोटो स्टूडियो ',,! लिहाजा वह जब वहां अपने पति के साथ फोटो खिंचाने  आयी तो मोहल्ले की महिलायें , दूर से ही उसके दर्शन करने का यत्न करने लगे ! किसी को झलक मिली ,,किसी को नहीं ,, क्योंकि स्टूडियो के नियम भी स्ट्रिक्ट थे ,! वहां परदे का पूरा इंतजाम था !,और तुरंत फोटो खींचने के बाद वो वापिस भी हो गयी ~!
      नत्थू शर्मा जी और गोविन्द की शक्ल मेरी यादों से कभी बाहर नहीं हुई !   और न ही उस ईश्वर की क्रूरता की ,,जिसने विधान रच कर एक बहुत ही अच्छे व्यक्ति का अचानक  अवसान रच दिया !

क्या अब भी वह परिवार वहां है ,,या नौगावं छोड़ गया ,,? यह मुझे नहीं मालूम ! यदि कभी नौगावं की  पहचान के पदचिन्ह ढूंढने पड़ें तो इस शख्सियतके बारे में शोधकर्ता  जरूर पता लगाएं !

--सभाजीत



 शख्शियत -2
 किशन चच्चा और शारदा बाबू श्रीवास्तव

नत्थू शर्मा चौराहे पर बने , जिस घर में मेरा आठ वर्ष का बचपन गुजरा , वह श्रीवास्तव परिवार का तीन हिस्सों में बाँटा   हुआ बड़ा घर था ! जिस भाग में हम किराए से  रहते रहे ,  वह उन तीनों हिस्सों में से , दो खण्डों में बना  सबसे बड़ा हिस्सा था !निचले हिस्से में चार कमरे थे  जिसमें से दो कमरों को छोड़ कर हमें दो कमरे दिए गए और ऊपर का पूरा भाग जिसमें एक छोटी छत थी , एक रसोई , और तीन कमरे , हमें किराए पर रहने के लिए मिले ! इस हिस्से के मालिक , श्रीवास्तव परिवार के ही सदस्यों में से एक  थे जो कानपुर में रहते थे ,,और उन्हें हमने जिन्हें  कभी नहीं देखा ! मकान का किराया , इस मकान से सटे , एक अन्य भाग में रहने वाले , किशन चच्चा लेते थे , जिनका आँगन  , हमें अपनी छत की मुंडेर पर चढ़ कर देखने से दिख जाता था ! किशन चच्चा से हमारे बहुत घरेलु सम्बन्ध बन गए ! वे एक सज्जन  और मिलनसार व्यक्ति थे !उनके परिवार में उनकी विधवा माता जी , एक बहिन , पत्नी , एक  बिटिया और एक पुत्र   थे ! चाचीजी की मित्रता मेरी माताजी सेबहुत  जल्दी ही प्रगाढ़ हो गयी क्योंकि चाची जी को अपनी पारिवारिक चर्चाओं को शेयर करने के लिए , एक नई  हमउम्र महिला पड़ोसन  मिल गयी थी !
     इस घर में आकर हमें सबसे आकर्षक चीज दिखी , वो ऊपरी हिस्से के सड़क की तरफ बनी  , कमरे में लगी झरोखे दार खिड़की थी  जो लकड़ी की पट्टियों  से  बनी , एक लीवर से खुलने वाली पल्ले वाली  खिड़की थी ,,जिसे खींच कर हम , सड़क पर चलने वाले व्यक्ति को आसानी से देख लेते थे , किन्तु सड़क पर चलने वाला व्यक्ति  हमें नहीं देख सकता था !इसी कमरे में  दीवार में बनी एक अलमारी भी  थी ,,जिसकी तली का   पैदा हटाते ही वह , किशन चचा  की ऊपर वाले कमरे में  , दूसरी तरफ की दीवार में बनी  अलमारी में खुल जाती थी , जिस में    , हाथ डाल  कर किसी भी चीज का आदान प्रदान आसानी से इस और से दूसरी और  किया जा सकता था ! इस एक्सचेंज मार्ग का उपयोग बड़ी सहृदयता से हमारी माता जी और चाची जी के बीच होता रहा ! जब कभी भी कोई व्यंजन हमारे घर बनता तो वह इसी मार्ग से चाची जी को बुला कर थमा दिया जाता , और इसी तरह वहां से भी व्यंजन बेखटके , हमें भी मिल जाते  !उस समय सिर्फ पड़ोसियों के दिल ही एक दूसरे से मिले हुए नहीं होते थे , बल्कि घरों की  दीवारों के दिल भी एक दूसरे घर से मिले होते थे !
      उन दिनों , नौगावं में अधिकाँश  मकानों की छतें पक्की नहीं होतीं थी ! सभी पर खपरैल होती थी  जिसकी लौटावनी  ( मेंटेनेंस ) , मई माह में करवाना जरूरी होती थी !मई माह में ही मजदूर सडकों पर इस काम के लिए दिखने लगते थे , और खपरों से भरी बैलगाड़ियां भी घूमती दिखतीं  , जो सैकड़े के हिसाब से नए खपरे बेचने निकट के गावों से  नौगावं  आती थीं , ताकि टूटे खपरों की जगह नए खपरे लगाए जा सकें ! चूँकि हमारे मकान मालिक कानपुर में रहते थे , इस लिए  लौटावणी करवाने की  जवाबदारी , उन्होंने हमें ही सौंप रखी थी ! मुझे लौटावणी के काम को देखने में बहुत मजा आता था ! एक बारगी सारे खपरे , ऊपर से निकाल दिए जाते और कमरों में सीधे  धूप  पड़ने लगती !,,,फिर एक एक पंक्ति में ,  ढाल बना कर ,  खपरे इस तरह सजाये जाते की पानी उन खपरों की नालियों से बहता हुआ ,, नीचे सड़क पर गिर जाए ! कभी कभी मजदूर  ढाल  सही नहीं बनाते थे  , तो पानी खपरों में दरार बना कर   बीच कमरे में टपकने लगता ,,! इस अवसर पर फिर किसी कम वजन वाले व्यक्ति को खपरों पर सावधानी पूर्वक पैर  रखते हुए उस स्थान तक जा कर या तो ढाल सही करनी पड़ती , या  खपरा ही बदलता  पड़ता !, और इस बात के लिए मैं  घर में सबसे योग्य व्यक्ति था  जो ऊपर चढ़ कर , सटीक ढाल बना देता था  , या खपरा बदल देता था  ! भारतीय  इंजीनियरिंग का   यह शायद  पहला पाठ था , जिसने मुझे बाद में  इंजीनियरिंग की  दिशा  में धकेला !
किशन चच्चा के घर से सटा  , श्रीवास्तव परिवार के मकान का  जो तीसरा हिस्सा था , उसमें सम्मलित रूप से अपने छोटे भाई के साथ  रहते थे - ' शारदाश्रीवस्तव ' !शारदा बाबू के तीन बच्चे थे  ,,तीनों लड़के ! जबकि उनके छोटे भाई संतोष श्रीवास्तव  के एक पुत्र और एक पुत्री थी !शारदा बाबू नगर के प्रतिष्ठित लोगों में गिने जाते थे ! बाजार में उनकी एक गहनों की दूकान थी ,,,जिसमें गहने या तो सुधरते थे अथवा बनते थे ! इस दूकान में वे सेठ की तरह ,  जाकर गद्दी पर  बैठ जाते ,,और एक मुनीम , जो काम का हिसाब लेता था , उन्हें पूरा व्योरा देता था  की आज कारीगर , या सुनार कौन सा काम करेगा ! इस दूकान में अक्सर मैनें  गावं से आये जरूरतमंद लोगों को देखा , जो अपने जेवर गिरवी रख कर या तो  उधार पैसा लेने आते या फिर छुड़वाने आते थे !
        श्रीवास्तव परिवार अचट्ट गावं की जमींदारी से सम्बंधित   परिवार था ! मैंने एक दो बार ही शारदाबाबू जी के पिताजी को देखा , जो गावं से यदाकदा  , नौगावं आते थे ! वे अक्सर  अंग्रेजों के जमाने वाली फोर्ड कार से आते थे और दूसरे दिन ही लौट जाते थे ! रोबीले व्यक्तित्व के  धनी  , जमींदार साहब की आवाज़ और मुखाकृति , किसी में  भी भय  उत्पन्न कर देती थी ! इसी भय के कारण मैनें कभी उनका सामना नहीं किया !
         शारदा बाबूजी के तीन बच्चों में सबसे बड़े मुन्नन ,,यानी सुधीर श्रीवास्तव से मेरी शीघ्र ही गहरी दोस्ती हो गयी ! मुन्नन से छोटे भाइयों में बिन्दु , यानी अरविन्द मुझे भाई साहब कहने लगे ! शारदा बाबू जी , जमींदार साहब के बड़े पुत्र होने पर भी , बहुत सरल और नरम ह्रदय के व्यक्तित्व  थे ! उसी परम्परा में मुन्नन  और भी ज्यादा सरल स्वभाव के बच्चे बने , किन्तु तुनक मिजाजी , और रईसी की ठसक उन्हें वंश परम्परा में मिली ! ! उस घर में , मुझे  जिनसे बहुत स्नेह और प्यार मिला वह थीं ,',मुन्नन की माता जी '  ! वे बांदा की थीं ,, और धार्मिक आस्थाओं  में गहन विश्वाश रखती थीं ! कोई भी तीज त्यौहार , व्रत  उनसे नहीं छूटता था ! वाणीं बहुत मधुर और स्नेह सिंचित थी !
         श्रावण माह में शाम को  वे एक चौकी लगा कर , , अर्थयुक्त बड़ी रामायण पढ़तीं थी  जिसमें चौपाइयां और दोहे सस्वर होते थे और अर्थ को वे इस तरह बाँचतीं की आँखों के सामने दृश्य ही उत्पन्न हो जाता था  ! वे हम बच्चों को निर्देशित करती थीं की हर दिन रामायण जरूर सुनें ,, कोई भी प्रसंग छूटे नहीं ,,, इस लिए मैं  शाम होते ही मुन्नन के घर पहुँच कर पहली पंक्ति में बैठ जाता ! हम लोगों के पीछे दरी बिछा कर शारदा बाबू बैठते , और कभी कभी संतोष बाबू भी ! मेरे बाल मन पर राम की महिमा का जो प्रभाव पड़ा , उसमें मुन्नन की माता जी का ही योगदान है ! मैं उनका आज भी ऋणी हूँ !
      हमारे घर के सामने वाली सड़क के उस पार ,  दूसरी  तरफ , ,,, बीड़ी का एक बड़ा कारखाना था ,,जिसके मालिक शारदा बाबू ही थे ! इस कारखाने का द्वार , नत्थू शर्माजी की दूकान के सामने की तरफ से था ! लेकिन इस कारखाने को मैनें  जब भी देखा , बंद ही देखा  !मुन्नन ने बताया  की सरकारी पैसा देना बाकी है इसलिए अभी  बंद है ,,लेकिन पिताजी ने बताया है कि  जल्दी ही   शुरू हो होगा  ! इस कारखाने के पिछले हिस्से में  कार का एक  गैरिज था , जो  अक्सर खाली रहता था ! मुन्नन ने बताया की उनकी कार अचट्ट  गावं में है ,,जो जब आती है तब यहीं खड़ी की जाती है ! खाली गैरिज में  हम लोगों के खेलने के लिए  उपयुक्त जगह थी ! इस जगह में हमने कंचे खेलने शुरू किये ! सुधीर कंचों पर निशाना लगाता ,, और न लगने पर भी हेकड़ी दिखाता की वह दावं नहीं देगा ,, कारण की खेल उसके गैरिज में खेला जा रहा था  ! सीधे साधे  मुन्नन  का जमींदारी रंग उसमें साफ़ दिखने लगता था ,और तब  हम खेल छोड़ देते थे !,  ! उस समय कंचों की उधारी भी चलती थी ! उसने दो कंचे उधार दे कर अपने लिए दो दावं सुरक्षित करवा लिए ! लेकिन मैं उससे जीत गया तो उसे कुछ कंचे मुझे देने पड़े !इस तरह  मेरे कंचों की संख्या प्रतिदिन  बढ़ती  गयी !
  कंचों में एक खेल था " टोंट घिसने ' का ! इसमें दावं देने वाले को कंचे को कुहनी से धकेलते हुए , गड्ढे तक पहुंचाना पड़ता था ! वह मुझे टोंट घिसवा कर तंग करने में ज्यादा आनंद अनुभव करता था ,,,लेकिन जब उसकी बारी आती तो वह साफ़ मुकर जाता ! कंचे खेलना तो आसान था किन्तु कंचे घर में छुपाना बहुत मुश्किल था ! कारण की मेरे पिता जी ऐसे खेलों के बिलकुल विरुद्ध थे ! तब किसी कपडे में बाँध कर हम उसे ऐसी जगह छिपाते की उस पर किसी की नज़र ही न पड़े !
     प्रारम्भिक प्राइमरी कक्षाओं के साथी मित्र जरूर बनते हैं किंतु उस उम्र का असली दोस्त मुहल्ले पड़ोस का हमउम्र का लड़का ही बनता है । उस हिसाब से मुन्नन मेरे हमउम्र वो दोस्त थे जिनको न कोई और था न कोई ठौर । हम लोग हर दो घण्टे बाद मिलते,,कोई खेल खेलते ,,फिर लड़ते और फिर घर भाग लेते   ।  लगता कि अब कुट्टी हुई है तो शायद ही फिर मिलनी हो ,,लेकिन दो घण्टे बाद ही मुन्नन सब लड़ाई भूल कर फिर मेरे दरवाजे आ धमकते,,,या फिर में उनके घर पहुंच जाता  जैसे कुछ हुआ ही न हो । कद काठी में मुन्नन मुझसे भारी पड़ते थे ,,इसलिए हाथापाई में अक्सर उनसे हार ही जाता था । हमें यह कभी पता नहीं चला कि हम में कौन बड़ा है कौन छोटा,,लेकिन मुन्नन के मन में एक बात जरूर थी कि वे रईसी में बड़े हैं और में छोटा । 
      शुरू में मुन्नन के घर कुआ नहीं था । कुआं किशन चच्चा के घर में था  ,,। दोनों घरों के आंगन के बीच एक दीवार थी जिसके बीच एक दरवाजा था । कहारिन  पानी भर कर किशन चच्चा के घर से मुन्नन के घर पहुंचा कर हौदी में भर देती थी ।  
      उन दिनो देवरानी जिठानी में भी एक विशिष्टता होती थी कि कौन बड़े शहर से आई है और कौन छोटे शहर से ।,,संतोष चच्चा वाली चाची बड़े शहर कानपुर की थीं और शारदा बाबू वाली चाची बांदा की ,,तो घर में संतोष चच्चा वाली चाची का पलड़ा शहर के हिसाब से  भारी ही था । कानपुर में तो नल लगें थे जबकि यहां पानी दूसरे के  कुएं से आता था ,,,इसलिए तुरन्त ही मुन्नन के घर , हौदी वाली जगह तोड़ कर वहां पर कुँवा खुदाया गया  । 
      मैं मुन्नन के साथ खड़े हो कर रोज कुँवा खुदता देखता । शारदा बाबू कुर्सी डाल कर वहीं बैठ जाते और  हरेक फुट खुदने पर मजदूरों से रिपोर्ट लेते की कहीं पत्थर तो नहीं निकल रहा ,,?  और जब पानी निकल आया तो सब  लोग खुशी से उछल पड़े । पानी टेस्ट किया गया  तो मीठा पाया गया । नारियल तोड़ा गया ,मुहल्ले में ,बताशे बांटे गए ।
        कुवां खुदने के कुछ दिन बाद ही किशन चच्चा के आंगन और मुन्नन के आंगन के बीच का आपसी आने जाने का  दरवाजा ईंटों  से चुनवा कर हमेशा के लिए बंद करवा दिया गया । इस तरह वर्षों से आपस में जुड़े दो आंगन हमेशा के लिए अलग हो गए ।
 फिर एक दिन देखा की कारखाना खुल गया है ,,! उसमें कारीगरों को बीड़ी बनाते  मैनें देखा ! उन्हें एक छोटी सी तराजू में तौल तौल कर तम्बाखू  दी जा रही थी और बंडल में बंधे पत्तों की गड्डियां भी ! वे सब कारखाने के बरामदे में  लाइन  में बैैैठ कर बनाते दिखे । बीड़ी के बन जाने के बाद , बीड़ी  को बाद में , कारखाने के आँगन में बनी भट्टी पर सिकते  हुए देखा तो मालूम हुआ की बीड़ी की सिकाई भी होती है !बीड़ी का कारखाना हम दोनों के लिए कौतूहल का केंद्र बन गया । मुन्नन के साथ अक्सर में बीड़ी के  कारखाने में चला जाता । बीड़ी पैकिंग का काम भी हाथों के कौशल का काम था । तब मशीनें नहीं होती थी फिर भी पैकिंग में दक्ष लोग हर एक मिनट में बीड़ी के कट्टे पर झिल्लीदार कागज लपेट कर , उस पर लेइ से स्टीकर चिपका कर , सामने रखी ट्रे में फेंक देते ।
      इसी क्रम में मुझे बीड़ी कारखाने के विज्ञापन विभाग के दर्शन भी हुए । दो लोग जोकरों की विचित्र वेश भूषा में मुंह पोते , अजीब से कपड़े पहने , हाथ में लम्बा भोंपू लिए कारखाने में दिखे । मुन्नन ने बताया कि ये लोग  गावों में जा कर इन भोंपुओं को मुंह में लगा कर हमारी बीड़ी का प्रचार करते हैं ।  मुझे लगा कि ये तरीका अब बहुत पुराना है तो शायद ही कोई इन्हें सुनता होगा ।  और यह सच ही था । , 
  एक हफ्ते बाद ही कारखाना फिर बंद हो गया !  शायद इस कारखाने की बनी बीड़ी का मार्केट था ही नहीं ! उस समय की प्रसिद्द बीड़ियों में चाँद छाप बीड़ी , और गदा छाप बीड़ी का   विज्ञापन ज्यादा  प्रचलन में था ! नौगावं की सड़कों पर , दीवारों पर ये विज्ञापन जगह जगह दिख जाते थे ! इन विज्ञापनों में एनासिन, लाल तेल ,नील ,  हमदर्द के विज्ञापन प्रमुखता से छाये  रहते थे !
    बीड़ी का कारखाना जो बंद हुआ तो फिर कभी नहीं खुला ! अलबत्ता , मुन्नन की कार जरूर एक दिन गैरिज में खड़ी दिखी ! मुन्नन ने गर्व से बताया की यह कार अब कल जगत सागर  घूमने जाएगी ! मैंने मुन्नन से विनय की कि मुझे भी घुमाने ले  चलो  ,,तो मान गया ! दूसरे दिन जब कार जाने को तैयार हुई तो उसने चुपचाप मुझे भी बुला लिया ! मुन्नन के पिताजी ने मुझे देखा तो कुछ नहीं बोले ,, कहा बैठ जाओ ,,,,शायद मुन्नन ने पहले ही उन्हें राजी करवा लिया था ! ! कार सबसे पहले मुन्नालाल पेट्रोल पम्प पर गयी  जहां कुछ गैलन पेट्रोल भरवाया गया ! फिर हम लोग जगत सागर तक गए ! मैंने मुन्नन के साथ पहलीबार जगत सागर तालाब देखा ! घूम कर आये तो मेरे ऊपर मुन्नन का एक और अहसान चढ़ गया था ,,,जिसका बदला मुझे खेल में उसके द्वारा की गयी बेईमानी झेल कर ही देना था !
नौगावँ में अक्सर दिलचस्प हलचलें होती रहती थीं । उन हलचलों में कभी मुन्नन मेरे साथी होते कभी प्रतिद्वंदी ।  कभी कभी सुबह सुबह  साधु वेश में दो व्यक्ति पूरे नौगावँ का चक्कर मारते हुए हर चौराहे पर रुक कर तेज स्वर में दोहे , चौपाईयाँ पढ़ते हुए अवतरित हो जाते । शंख, झालर बजाते हुए वे पहले तीन दिन यूंही  घूमते  , फिर अनोखे ढंग से दान मांगते । उनकी मांग होती कि उन्हें  -' दो सौ अठन्नी , तीन सौ चवन्नी , चार सौ दुअन्नी , पांच सौ इकन्नी  , दान में चाहिए  एकत्रित होने पर वो हरिद्वार जायेंगें । जहां धार्मिक अनुष्ठान करेंगें ।इससे दान दाताओं को पुण्य तो मिलेगा ही , साधुओं का आशीष भी मिलेगा ।
     तब दान देने की होड़ मच जाती । जितने सिक्के मिलते जाते , साधु अपनी मांग में प्रतिदिन  उतनी मात्रा कम करते जाते ,,और एक दिन पूरा पैसा एकत्रित हो जाने पर ,  बटोर कर गायब हो जाते ।
    मुन्नन अपनी माताजी से चवन्नी लेकर , मुझे दिखाते हुए एक दो दिन में दे  देते । इस काम में मैं पीछे ही रह जाता ।
     पत्ते पर ठंडी मलाई खरीदते समय भी वे आगे रहते । यदि मैं एक आने की लेता तो वे चवन्नी की । 
     लेकिन जब दूल्हा बाबा में, हवाईपट्टी पर  कोई हवाई जहाज उतरता तो उसे देखने जाने में हम दोनों साथ होते । एक बार समीपस्थ गावँ झींझन में , एक बाबा ने एक गुफा में घुसने की घोषणा सुन कर उसे देखने  हम दोनों साथ गये ।
         उन्ही दिनों सं 1959  में नौगावं में बिजली आ गयी ! सड़कों पर कुछ ही दिनों में ट्यूबलर  खम्बे गड गए और उन में तार खिंच गए ! जब कनेक्शन होना शुरू हुआ  तो मुन्नन का घर भी अग्रणीय कनेक्शनों में शुमार हुआ ! उसके घर जब पहली बार बिजली का बल्ब जला तो मुन्नन का स्टेटस स्वयमेव बढ़ गया क्योंकि हमारे घर तब तक लालटेन ही जलती थी ! अब मुन्नन जब तब अपनी रईसी का ताव दिखाने लगा ! उसके घर में जल्दी ही बाहर के कमरे में  एक रेडियो भी लग गया  जिसमें विविधभारती के प्रोग्राम आने लगे !सैनिकों के लिए गीतमाला , मुझे बहुत पसंद था , तो मुन्नन से हर हालत में निबाहना मेरी मजबूरी बन गया ! अब वो मुझे दो बातें भी सुना  देता तो मैं चुपचाप सुन लेता ,,क्योंकि रेडियो तो उसी के घर में था !  हालांकि रेडियो से मैं कभी दूर नहीं रहा ,,क्योंकि उसी चौराहे पर बने अज़ीज़ मुहम्मद के घरमें  बहुत पहले से बैटरी वाला रेडियो था ,,जिसमें दोपहर में लगातार तेज स्वर में फ़िल्मी गीत सुनने को मिल जाते थे ,,,,लेकिन रेडियो को ताकते हुए रेडियो सुनने की बात कुछ अलग ही थी !
        थोड़ा बड़ा होने पर रुचियों के अनुरूप होने के कारण हम लोगों में जहां प्रगाढ़ता बढ़ी वहीं कई मुद्दों पर एकमत न होने के कारण बहस भी हो जाती ।  इब्ने सफी बीए के लिखे जासूसी उपन्यास हम लोग कहीं से भी जुगाड़ कर पढ़ते । लेकिन वहः खुद को कर्नल विनोद मानता और मुझे कैप्टिन हमीद । वेदप्रकाश काम्बोज के जासूसी उपन्यास  में भी वहः खुद को जासूस विजय घोषित  करता ,,जबकि मुझे ठग अल्फांसे बताता । जिस फ़िल्म की में तारीफ करता ,,उसकी वहः बुराइयां बता देता ।  अंतरिक्ष यात्रा में अमेरिका - रूस के बीच छिड़े शीत युद्ध में वहः अमेरिका की तारीफ करता और रूस की बुराई,,जबकि मेरे विचार उससे उलट रहते ।
ऐसे अवसरों पर जब हमारा विवाद बढ़ जाता तो मामला मुन्नन की माता जी के सामबे पहुंचता । अक्सर वे मेरी तारीफ करती हूं जब मेरा ही पक्ष लेतीं तो मुन्नन भड़क उठता ।
       सामाजिक श्रेष्ठता जो  उसे विरासत में मिली थी उसी आधार पर  ,,, व्यक्तिगत श्रेष्ठता  पर भी वहः समानाधिकार चाहता रहा ।    स्पर्धा में पिछड़ने पर उसे बहुत झल्लाहट होती तो कभी कभी आंख मूंद  कर चिल्लाते चिल्लाते उसकी आँखों से आंसू बह निकलते । उस की यह हालत देख कर चाची को दया भी आती और हंसी भी ,,। वे मुझे कहती,," इसे समझाओ सभाजीत,,!! ,,तुम समझा सकते हो ,,,तुम इसके दोस्त हो । "
    और सचमुच,,में उसे समझा लेता था ,,क्योंकि मैं उसका पक्का दोस्त जो था ।

      धीरे धीरे मुन्नन से मेरी  कई बातों में तकरार होने लगी !मेरी दूरियां बढ़ने लगी ! तभी रामलीला में मुझे लक्ष्मण के पात्र की भूमिका मिली ,,और नगर में मेरा अपना स्टेटस बढ़ गया ! नए नए मित्र बन गए ,, लोग पहचानने लगे तो मैनें मुन्नन की परवाह छोड़ दी !
       एक दिन मैनें देखा की बीड़ी का कारखाना पूरी तरह तोड़ दिया गया है ! उस जगह अब एक पक्का ,,कई कमरों का मकान बनाया जा रहा है ! शारदा बाबू ,,खुद खड़े हो कर उस मकान को बनवाते दिखे ! गैरिज भी टूट गया ,,और कार भी कहीं चली गयी ,,! शायद वह बेच दी गयी थी ! मकान के एक बाजू में चार दुकानें बनाएं गयी ,,और शेष भाग रहने के लिए बना !  चर्चा से पता चला की शारदा बाबू और संतोष बाबू में बंटवारा हो गया है ,, और कारखाने वाला हिस्सा उन्हें मिला है ! मकान जल्दी ही तैयार हो गया और मुन्नन मेरे घर के सामने आकर रहने लगा !
        जो दुकानें बनीं ,,उनमें एक दूकान शारदा बाबू ने खुद अपने लिए सुरक्षित करके , उसमें कपडे की दूकान खोल दी ! बाजार वाली सोने चांदी की   दूकान किन्ही कारणों से पूरी तरह बंद हो गयी ! कुछ दिनों बाद वह भी बेच दी गयी !
 जमींदारी के स्टेटस को त्याग कर शारदा बाबू  व्यवसायी बनने की दिशा में मुड़  गए !  हालांकि ,, अनुवांशिक जमींदारी की आदत  ने उन्हें व्यवसायी भी  नहीं बनने दिया !
      मुन्नन से दूरी बनने के बावजूद भी , मुन्नन की माता जी मुझे उसी स्नेह और प्रेम  से बुलाती थीं ! मैं उनके पास बैठ कर यहाँ वहां के बहुत से समाचारों से उन्हें अवगत करवाता रहता था ! मुन्नन का क्रोध बहुत जल्दी ही सातवें आसमान पर चढ़ जाता ! उधर अरविन्द अपनी छवि एक तीक्ष बुद्धि वाले की छवि बनाने में जुट गया ! तो जब मुन्नन की माता जी , अरविन्द की तारीफ़ करती तो मुन्नन अपना आपा खो बैठता !
     तभी 1964  में  जिस मकान में हम लोग रहते थे , उसे संतोष बाबू ने खरीद लिया ! हमें आनन् फानन में मकान बदलना पड़ा ,,तो हम देवी जी की मड़ियाँ के पास , जैन परिवार के मकान के बगल में बने एक मकान में शिफ्ट हो गए !
    नत्थू शर्मा का चौराहा छूटते ही ,, हमारा सम्बन्ध मुन्नन के परिवार से पूरी तरह छूट गया !

     लेकिन मुन्नन के साथ बिताये  दिन , और उस परिवार के लोगों की यादें मेरे मन पर आज भी अमिट  हैं !  शारदा बाबू का व्यक्तित्व ,, और उनकी जमींदारी की ठसक , उनका अतीत भी , ,,मेरे  लिए एक यादगार बात है ! ,

--सभाजीत
            

रविवार, 24 नवंबर 2019

   विंध्य की विरासत
   सोन का अभ्यारण  और सीधी जिला

 दंडवत विंध्याचल  के माथे को , अपनी हथेलियों पर थामे , , मेकल  पर्वत एक और विंध्याचल श्रेणियों  को निहारता है तो दूसरी और , दूर तक फ़ैली सतपुड़ा श्रेणियों को ! इस यशस्वी मेकल पर्वत के आश्रम से ही क्षुब्ध हो कर निकली दो धाराएं , परस्पर विपरीत दिशाओं में कूद गयीं थी ,,! पश्चिमी दिशा की और कूदी , नर्मदा का जितना महत्त्व , भारत के पश्चिमी भाग में प्राकृतिक विरासतें संजोने का है , उतना ही महत्त्व सोन का , भारत के पूर्वी भाग में ! प्रेम विह्वल सोन , अपने बलशाली धाराओं के बाजुओं से मार्ग में आयी हर बाधा को तोड़ता हुआ , अंत में जा कर गंगा की गोद  में विश्राम लेता है , किन्तु इस यात्रा में , उसने जो नैसर्गिक सौन्दर्य , और सांस्कृतिक विरासतों के सोपान रचे हैं , वे मध्यप्रदेश के सीधी और शहडोल जिले में बिखरे पड़े हैं !
     सोन  अपने पुरुषार्थ से पहले विंध्याचल की कैमोर पर्वत श्रेणी को ही तोड़ता है , और फिर वेग पूर्वक , सीधी जिले की धरा  पर , अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ बहता है ! सोन कुल ९३२ किलोमीटर की लम्बाई में बहने वाला , भारत की प्रमुख लम्बाई की नदियों में गिना जाता है ! इसमें आकर मिलने वाली घोघर , जोहिला , छोटी महा नदी  , तथा रिहन्द , कन्हार , कोहिला के साथ  उसमें अपना जल उडेड़ने वाली नदियों में  गोपदबनास नदी प्रमुख है !  सोन के बलखाती धारा के साथ , विंध्याचल श्रेणियों के बीच , कैमोर , केनजुहा , रानीमुंडा , पर्वतांचलों  की घाटियां , में  बिखरी वन सुषमा   , सीधी जिले का खजाना है ! इन वनो में सभी प्रकार के बृक्ष हैं , जिन पर विभिन्न पक्षी किलोल करते सहज ही दिख जाते हैं ! सीधी जिले के ग्राम , आज भी आदिवासी जनजातियों , और उनकी संस्कृति के अक्षुण गवाह हैं ! यहाँ के वनो में , महुए के बृक्ष बहुतायत में हैं , जिसकी महक से सारा वन , एक विशेष आनंद से भर जाता है ! जनजातियों  की मधुशाला के यही आधार हैं , जो उनकी गीत संगीत , खान पान का अभिन्न अंग बने हुए हैं !
    यह क्षेत्र वनवासियों की  धरा है  ! यहां की मूल भाषा गोंडी रही है , बाद में हुए राज्यों के विस्तार के  अंतर्गत , यहां हिंदी और बघेली भाषाओं ने लोगों के  जीवन में प्रवेश किया ! इसके पूर्वी भाग में जहां गोंड जन जाती निवास करती हैं , वहीं पश्चिमी भाग में प्रमुख रूप से कॉल जनजाति  ! यहां पहले कालिंजर से आये चंदेल राजाओं ने राज किया , बाद में पश्चिमी भाग , बघेल राजवंशों के आधीन हुआ  ! इस जिले की छह तहसीलों में , फ़ैली वनसम्पदा , पर्यटकों के लिए जहां , विशेष आकर्षण का केंद्र है ,,वहीं यह जिला , ऊर्जा के प्रमुख श्रोत कोयले की पूर्ती भारत के  ऊर्जा संचालन के लिए वर्षों से कर रहा है ! सिंगरौली की कोयले की खदानें यहां का , प्रमुख व्यावसायिक अंग रही हैं , वहीं आधुनिक शक्ति विद्युत् ऊर्जा के विद्युत् ताप गृह , भी इसी क्षेत्र में स्थापित हुए हैं !
         अकबर दरबार के प्रमुख रत्न , बीरबल का जन्म भी इसी धरा  पर हुआ था ! सीधी जिले में जन्मे ,  बीरबल के गावं गोधरा में आज एक बहुत प्राचीन  देवी का  दर्शनीय  मंदिर है ! यह गावं इस क्षेत्र का एक प्रमुख गावं माना जाता है , जो यह दर्शाता है की बुद्धि के धनी , इतिहास प्रसिद्द बीर  बल , इन्ही वनवासियों के बीच बड़े हो कर , दिल्ली  जैसे  राजदरबार के प्रमुख व्यक्ति बने !

    मध्यप्रदेश के पूर्वी द्वार पर , पर्वत श्रेणियों और  सोन की धाराओं के बीच पनपा , यह जिला , आज पुरातन और नवीन सभ्यताओं का  मिश्रित स्वरूप है ! इसका मुख्यालय , सीधी , अब धीरे धीरे , कसबे से एक नगर के रूप में करवट ले रहा है ! यहां के निवासियों में , समीपवर्ती गावों से आये , एवं पहले से बसे  जनजातियों के लोगों की संख्या ज्यादा है   , सड़कें अब धीरे धीरे आधुनिक हो रहीं हैं , और आधुनिक सुविधाओं की राह से आकर  , धीरे धीरे शहरी सभ्यता भी,  अपना पावं  , आदिवासियों के बीच जमा रही है ! कभी यहां , साधारण कच्चे घर बहुत हुआ करते थे , लेकिन अब यहां भी अट्टालिकाएं अपने सर उठा रहीं हैं ! सीधी नगर  अब रीवा कमिश्नरी के मानचित्र पर , विशेष स्थान पा चुका है ! नगर निगम यहां अब , यहां के निवासियों के लिए आकर्षक पार्क विकसित कर रही है , तो नए नए होटल और पर्यटकों के लिए पूर्ण सुविधायुके , रेस्ट हाउस भी यहां बन चुके हैं ! विकसित अस्पताल , शिक्षाकेंद्र , और सांस्कृतिक केंद्र भी स्थापित हैं ,,जो सीधी को आधुनिक विकास की राह पर अग्रसर कर चुके हैं !
    यहाँ पॉलिटेक्निक , आईटीआई , जैसे तकनीकी शिक्षाकेंद्रों के साथ कई अन्य कालेज भी स्थापित हैं , जो शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव कार्य कर रहे हैं !

   पर्यटन की दृष्टि से यह  क्षेत्र बहुत से आकर्षण , अपने  गोद  में समाये बैठा है ! यहां का संजय नेशनल पार्क आज पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण केंद्र है ! जहां  वन्य जीव बहुतायत में विचरते हुए , सहज ही दृष्टिगोचर होते हैं ! विश्वप्रसिद्ध , सफ़ेद बाघ , इसी क्षेत्र की देंन  है , जिसे बघेला राजवंशों ने , यहां के जंगलों में ढूंढ  निकाला था ! सोन नदी और बनास नदी के संगम पर ही स्थापित है , घड़ियालों के संरक्षण हेतु ,, घड़ियाल संरक्षण अभ्यारण !  प्रकृति के इस अनमोल खजाने में , बहुत सी पुरातात्विक  विरासतें , सोन नदी के तट  पर , और गहन जंगलों में बिखरीं पडी हैं ,,जिसमें प्रमुख है ,,कादम्बरी के रचियता , बाणभट्ट की  साधनास्थली  , भ्रमरसेन ! कादम्बरी ,, संस्कृत में , बाणभट्ट द्वारा लिखा गया अद्भुत महाकाव्य है ,, जिसकी परिकल्पना ने , इसी सोन और बनास नदी के संगम स्थल पर बने आश्रमों में जन्म लिया ! बनास नदी की धारा जब , सोन की वेगवती धारा से भेंट करती है तो , यहां एक  विशाल  भंवर का जन्म होता है , शायद इसीलिये इसका नाम , स्थानीय भाषा में भंवर सेन पड़ा ! आज भी यह स्थान बहुत रमणीक है ! बनास नदी के किनारे , ऊंचा खड़ा पर्वत , और दूर से बह  कर आती सोन की धारा में मिलती बनास की धारा के संगम को  निहारते खड़े रहने में , कितना समय बीत जाए पता ही  नहीं चलता ! कादम्बरी के प्रमुख पात्र , शुक , यानी तोते , यहां की पर्वत मालाओं पर विहार करते , आकर्षक दृश्य का सृजन करते हैं !
   पर्वतों के बीच , बलखाती नदी की जल धारा , और पर्वतों  के घाट  , आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेते हैं ! सोन के किनारे ही , बघेला राजवंशों का बनाया गया , शिकारगंज , रेस्ट हाउस , सोन के सौन्दर्य को निहारने का अद्भुत स्थल है !यह आज न सिर्फ दर्शनीय रेस्ट हाउस है , बल्कि बघेला राजवंशों के , प्रकृति प्रेम का गवाह है !
   सोन नदी के तट पर ही , एक तपस्वी , प्रशांत शिव ने , अपना आश्रम बना कर , यहां के कालजयी , अद्भुत , और शिल्प की धरोहरों को दर्शाने वाले मंदिर की स्थापना की थी , जो आज चन्द्ररेह  के शिव मंदिर के रूप में विख्यात है !इस मंदिर में स्थापित शिव लिंग , उसका आंतरिक  शिल्प  , कंगूरे , भीतिकाएँ , उत्कीर्ण कला ,अचंभित करती है , और भारत के उन उत्कृष्ट शिल्पकारों की गाथा बखानती है , जो इस देश की सांस्कृतिक धारा के प्रवाह को निरंतर रखने में , अपना अपूर्व योगदान दे गए ! किसी युग में यह शिवमंदिर , शिव भक्तों और साधकों के ठहरने का भी स्थान था , जो यहां , मंदिर के चरों और बने मठों में आकर ठहरते थे ! आज यह भारत की राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित है , और पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है !
संजय नेशनल पार्क , परसुली वन अभ्यारण , गुलाब सागर डेम ,  बाण सागर डैम , के केंद्र में आज , वन सुषमा के बीच बना है ,, परसुली  रिसोर्ट  ! यहां पर्यटकों के ठहरने , आहार , और सभी दिशाओं में यात्रा करने हेतु , सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं ! सोन नदी के किनारे पर बना यह  रिसोर्ट  , सोन की धाराओं को निहारने , उसे आत्मसात करने का सुन्दर स्थान है ! यह मध्यप्रदेश टूरिस्म का , शाश्कीय रेस्ट हाउस है , जिसका शिल्प , मध्यप्रदेश के , विधानसभाभवन के शिल्पकार द्वारा , उसी तर्ज़ पर बनाया गया  है !  रिसोर्ट  के अंदर , सपरिवार ठहरने हेतु सुविधायुक्त कमरे हैं !
 परसुली रिसोर्ट से सीधी जिले के सभी दर्शनीय स्थलों तक पहुँचने के मार्ग हैं इसलिए इसे , सीधी जिले के टूरिज्म का केंद्र कहा गया है ! इसी के निकट बना है , बघेला राजाओं द्वारा निर्मित   कठ बंगला ,,,जो किसी समय राजाओं के , वन भ्रमण हेतु , ठहरने के लिए रेस्टहाउस का दायित्व निभाता था ! यह कठ बँगला आज भी दर्शनीय है !
    इस समूचे क्षेत्र की धरोहर है , वनवासी जीवन , उसकी लोक रीति , लोक नृत्य , लोकगीत ,, जो जिले के हर गावं में आज भी अपने मूल स्वरूप में मौजूद है !  यदि समय हो तो , कुछ दिन इन जंगलों के बीच आकर , प्रकृति से खुद को जोड़ने का कार्य हर व्यक्ति को करना चाहिए , क्योंकि सीधी जिला आज भी , अपनी मूल विरासतों से कोई समझौता नहीं किया है ! यहां की जनजातियों में कॉल , बैगाओं के अतरिक्त भारिया , अंगारिया जाती के लोग भी अपनी सांस्कृतिक विरासतों के साथ निवास कर रहे हैं !  भारिया जाती जंगलों की रखवाली करने वाली वह जाती है , जो कभी एक जगह स्थान बना कर नहीं ठहरती ! अंगारिया भी विभिन्न धातुओं को शोधने वाली विभिन्न परम्पराओं के  ज्ञान के धनी हैं ! इनकी प्रमुख खेती ज्वार है ,,जो बिना किसी पानी के अतरिक्त प्रावधान के आसानी से पैदा हो जाती है ! वहीं जो भी इनके लिए प्रमुख धान है ! महुआ की मदिरा , इसके जीवन का अंग है ,, और नृत्य , लोक गीत , लोक केहायें इनकी निधि !

    सीधी नगर में स्थापित कई सांस्कृतिक केंद्र , का संचालन यहां के युवाओं ने अपने कंधे पर उठा रखा है ! वे मिल कर लोक नाट्य का प्रदर्शन विभिन्न स्थलों पर करते है , लोक गीतों , और लोक नृत्यों , लोकवाद्यों , को वे आज की आधुनिक सभ्यता के बीच भी , संरक्षित रखने का संकल्प अपने मन में लिए हुए , किसी भी स्थिति , किसी भी परिस्थिति में , मूर्तवत करने हेतु  , अथक प्रयास कर रहे हैं ! सीधी नगर का रंग कर्म भी आज देश के विभिन्न कोनो में अलग अलख जगा रहा है जिसके सूत्रधार ,,इस नगर के रंगकर्मी युवा हैं !

     विंध्याचल की श्रेणियों में बहते सोन नदी ने , मध्यप्रदेश के जिले के वन भूमिभाग पर , जो सांस्कृतिक विरासतों के चिन्ह छोड़े हैं , उन्हें सीधी आ कर  , स्वयं निहारे बिना , वर्णन करना सहज नहीं , क्यूंकि वे बहु आयामी हैं ! इस भाग में हम सोन से विदा ले कर , विंध्य भूमि के उन अन्य भूमिभागों की चर्चा करेंगे ,,जो  विरासत की दृष्टि से अमूल्य हैं !
,,,सभाजीत


शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

 विंध्य की विरासत

  अमरकण्टक
 ,,,,, , जहाँ पश्चिम की और से आकर दो अलग अलग  , विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वत  की श्रेणियां , एक अन्य पर्वत श्रंखला,  मेकल से भेंट करती हैं , वहीं पर समुद्र तल से करीब १०४८ मीटर ऊँचे ,  चौरस स्थान पर स्थापित है एक आदिकालीन ग्राम  अमरकण्टक ! अमरकंटक  को कभी आम्रकूट नाम से पुकारा जाता था  ,  जिसका अर्थ था  , आम्रवन के ऊँचे ऊँचे पेड़ों से आच्छादित एक पर्वत शिखर ! कहा जाय तो यह शायद पर्वत राज मेखल की कन्या नर्मदा के  विवाह के लिएसजाया गया वह नैसर्गिक आम्र  मंडप था जहां , उसी पर्वत पर जन्मी मेखल की पुत्री , नर्मदा , शोणभद्र के साथ विवाह करने वाली थी ! विधि का संयोग की शोणभद्र , नर्मदा की एक दासी , जोहिला के यौवन के जाल में फंस गया , और जब यह बात जब  नर्मदा को पता चली , तो वह क्षोभ , वेदना , और शोणभद्र के बेवफाई के व्यवहार से चोटिल हो कर पश्चिम दिशा की और दौड़ कर मेखल की ऊंचाइयों से नीची कूद गयी !
  जनश्रुतियों की  यह कथा  भले ही कोई आधार रखती हो या न रखती हो ,  किन्तु तीन नदियों के उद्गम का यह क्षेत्र , तीन नदियों के चरित्र को आज भी बखान कर रहा है ! आज का अमरकंटक , अब नर्मदा की जन्म स्थली का पुण्यधाम बन चुका है ! पुराणों में नर्मदा को शिवपुत्री माना गया है ! यह भारत के पश्चमी भाग के लिए जन कल्याणी, जल दायनी  माता के रूप में पूजी जा रही है ! यद्यपि शोणभद्र भी भारत के पूर्वी भाग के लिए एक वरदान की तरह  प्रमुख जीवन  आधार है , किन्तु इसे इसकी बेवफाई के लिए देवता , या राजपुरुष जैसा सम्मान नहीं मिल पाया ! और तीसरी नदी , जोहिला , जो अमर कंटक से करीब दस किलोमीटर दूर ज्वालेश्वर की पहाड़ियों से निकलती है वह आगे जा कर सोनभद्र को खोज कर उस में समा जाती है ,, किन्तु उसे भी तिरष्कृत और  दूषित नदी माना गया है ! जनश्रुतियों की यह कथा प्रेम के उस मूल्य को स्थापित करती है जिसमें , " आसक्ति " ,  " वासना " और  " कपट " के लिए  कोई जगह नहीं है !

   नर्मदा , पहाड़ों से रिस कर निकली एक अनवरत जल धार है , जो इस पर्वत पर आच्छादित वृक्षों की जड़ों में समायी है ! पर्वत और वृक्षों का यह मिला जुला स्वरूप ही शिव है , जिसे महादेव के स्वेद के रूप में , उसे नर्मदा की उत्पत्ति का कारण बताया गया है ! आज इस स्थान पर एक मंदिर स्थापित  है , और अब उद्गम का वह बिंदु , भक्तिभावना के पीछे छिप  सा गया है !भारत के कोने कोने से , विशेष कर पश्चिमी मध्य भाग से , निरंतर लोग इस उद्गमस्थान के दर्शन करने पहुँचते हैं , और मंदिर पहुँच कर अपनी यात्रा को धन्य मानते  हैं ! इस उद्गम स्थान के चारों और २४  मंदिरों की श्रंखलाबद्ध कतार स्थापित  है , जो विभिन्न राजाओं , अथवा श्रद्धालु भक्तों ने बनवाये हैं !यहाँ मराठा साम्राज्य के भोंसले राजवंशों ने , केशवनारायण मंदिर का निर्माण करवाया , एवं इन मंदिरों के और कुंड के जीर्णोद्धार कार्य के  लिए इंदौर की रानी अहिल्या बाई का नाम भी आदर के साथ लिया जाता  है ! किन्तु इस उद्गम क्षेत्र के विकास लिए , रीवा रजवाड़े का विशेष योगदान माना गया है !जिन्होंने १९३९ में इस मंदिर के पुनर्निर्माण हेतु अपना विशेष योगदान दिया !  उद्गम स्थान पर एक प्राचीन कुंड है , जिससे जल ले कर लोग पूजा अर्चना करते हैं , और माता से अपने सुखद भविष्य की कामना करते हैं !यह  नर्मदा कुंड  कहलाता है !आदिगुरु शंकाराचार्य ने यहां आकर नर्मदा की पूजा अर्चना कर एक स्तुति गान लिखा था जो नर्मदा स्त्रोत्र के रूप में आज नर्मदा के सभी मंदिरों में गुंजायमान होता है ! उन्ही के द्वारा यहाँ बंशेश्वर महादेव की स्थापना की गयी थी , और कुंड की आधारशिला भी उन्हें के द्वारा रखी गयी !
         मंदिर परिसर में एक हाथी प्रतिमा है , जिसके नीची से लेट कर लोग बाहर निकलते हैं ! इस क्रिया में भक्त अपनी शाष्टांग मुद्रा में लेट कर नर्मदा को प्रणाम करते हैं !
        इस कुंड से आगे निकली जलधार परएक कुछ दूर जाकर , एक अन्य कुंड है , जो पुष्कर सरोवर के नाम से जाना जाता है ! यहां  सीढ़ियां बना कर , उसमें स्नान करने की सुविधा भी  बना दी गयी है !, इससे उद्गम स्थान के मूल कुंड  की पवित्रता स्थापित रह सके !यहां से नर्मदा उत्तर  मुखी हो कर , सरपट भागती हुई , एक पतली जलधार के रूप में आगे बढ़ जाती है ,,, ! यह उसका बाल्य रूप है ,, मन को लुभाता , स्नेह भरा भाव लिए , उस आम्रकुंज की और जाता ,हुआ  जहाँ उसे विश्वाश था की उसका प्रेमी , शोणभद्र उससे भेंट करेगा !वह आम्र कुञ्ज  इस धारा के तट  पर  आज भी  स्थापित है !
     आगे जाकर यह जलधार कबीर सरोवर जो एक कुंड के स्वरूप में है ,  पर कुछ देर  ठहर कर  जैसे   उंसासें भरती  है और शोणभद्र के चरित्र को भांप कर क्रोधित हो कर टेढ़े मेढ़े डग  भर्ती हुई , मेकल के एक छोर पर पहुँच कर नीचे कूदती फांदती , एक झरने के रूप में पहाड़ से नीची उतर कर पश्चिम दिशा में बढ़ जाती है !८-१० किलोमीटर की इस दौड़ लगाती  हुई यात्रा में , नर्मदा हजारों बार अपनी दिशा बदलती है , बौखलाई हुई , क्रोधित युवती की तरह ,,,जिसकी मनः स्थिति असंतप्त  दिखती   है !
        नर्मदा  कुंड से ले कर कपिलधारा तक ,, आज इस नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर कई आश्रम , मंदिर , संस्थान स्थापित हो चुके हैं !जिसमें पूर्वी तट पर बर्फानी आश्रम , मृत्युंजय आश्रम , कल्याण सेवा आश्रम , शिवगोपाल आश्रम , रामकृष्ण कुटीर  के साथ साथ , सर्वोदयी विश्रामगृह , और गुरुद्वारा गुरुसिंघ सभा प्रमुख हैं ! पूर्वी तट पर ही जैन मंदिर और शिव मंदिर स्थापित हैं !
 जबकि पश्चिमी तट पर , चंडिका आश्रम , कलचुरी काल के पुरातन मंदिर , कर्ण  मंदिर , तपनिष्ठ धूना  , कोटितीर्थ कुंड , और गीता स्वाध्याय मंदिर स्थापित हैं !  निर्माणाधीन  श्रीयंत्र मंदिर आने वाले समय के लिए , एक भ्रमणीय स्थल साबित होगा ,,!
      विभिन्न औषधियों , वाटिका , और कुंजों के सम्मलित स्वरूप में  , माई की बगिया भी इस नर्मदा के तट पर उसके उद्गम से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर  स्थित है !किंवदंतियों में यह स्थान राजा मेकल की पुत्री नर्मदा की वह वाटिका थी जहाँ आज भी गुलबकावली के फूल खिलते हैं ! यह औषधीय दिव्य पुष्प , शोणभद्र द्वारा घने जंगल से  खोज कर गया वह  पुष्प था जिसके  लिए , मेकल राजा ने अपनी पुत्री के विवाह की शर्त निर्धारित की थी ! गुलबकावली का फूल ,  नेत्र रोग की वह  आयुर्वैदिक  औषधि है , जिससे सभी प्रकार के नेत्र रोगों का उपचार होता है ! इस उपवन में आम के वृक्षों के साथ साथ , कटहल , सरई  और जामुन के वृक्ष हैं !
   
नर्मदा धारा के उद्गम से  दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थापित हैं कलचुरी काल के प्राचीन मंदिर ! इनका निर्माण काल 1041  से 1073  ईस्वी के समय का है , जब इस क्षेत्र में कलचुरियों का शाशन था ! कलचुरी राजा , कर्णदेव ने इन मंदिरों का निर्माण करवाया था ! कलचुरी शिव भक्त थे , और उन्होंने अमरकोट क्षेत्र से ले कर रीवा तक कई शिवमंदिरों का निर्माण किया था ! इन मंदिरों की स्थापित्य शैली , एक जैसी ही है ! बड़े से चबूतरे पर तोरण द्वार , मंडप और गर्भगृह ! मंदिर में चारों और कईछोटी  मूर्तियों के माध्यम से , मनुष्य के भोग और योग की स्थितियों को उत्कीर्ण किया जाता रहा ! कर्ण  मंदिर पुरातत्व की दृष्टि से  एक दर्शनीय स्थान है !यहीं पर स्थापित है विष्णु मंदिर और आदि गुरु द्वारा स्थापित पातालेश्वर मंदिर और सूर्य कुंड ! जो आज श्रद्धा का केंद्र है !

   उद्गमस्थल से करीब एक किलोमीटर आगे ही बन रहा है " श्रीयंत्र " मंदिर जिसकी आधार शिला स्वामी सुखदेवा  जी महाराज ने अट्ठाइस वर्ष पूर्व रखी थी !यह तांत्रिक विद्याओं की साधना हेतु बनाया जा रहा , चौंसठ योगनी मंदिर की शैली का ही है !इसके गर्भ गृह में मा त्रिपुरा की मूर्ती की स्थापना होगी ! इसका शिल्प अद्वितीय है और यह अभी से पर्यटकों के लिए कोतुहल का केंद्र बन रहा है !
नर्मदाधरा के पूर्वोत्तरी तट पर निर्माणाधीन जैन मंदिर,कलात्मक मंदिरों की बानगी है !   जिनमें महावीर स्वामी की२४ टन  वाली , १० फ़ीट ऊंची एक विशाल प्रतिमा स्थापित है और प्राणप्रतिष्ठा की बाट  जोह रही है ! ! !नर्मदा ने भारत के मध्य भाग की गहन घाटी में बहते हुए हर धर्म , हर सम्प्रदाय के लोगों को अपने स्नेहयुक्त जल से अभिसिक्त कर ,  पल्ल्वित किया है , इसलिए उसके जन्म स्थली  में हर धर्म की झांकियां , भारत के एकात्मक , बहुमुखी स्वरूप को प्रदर्शित करती है !


   नर्मदा की धरा के दोनों तट पर स्थापित कई आश्रमों में बर्फानी आश्रम एक  चर्चित आश्रम है ! यह महात्माओं की साधना स्थली है और कई सिद्ध पुरुष यहां आश्रम में अपनी साधना करते हैं ! वहीं मृत्युंजय आश्रम , रामकृष्ण्कुटीर जैसे कई आश्रमों के अलावा , कल्याण सेवा आश्रम प्रमुख है! बाबा कल्याणदास जी द्वारा स्थापित यह आश्रम अद्भुत है !  जहाँ , पर्यटकों और यात्रियों के रात्रि विश्राम की  भी पूर्ण सुविधा उपलब्ध है !

       रुष्ट  , पीड़ित , अपमान से क्षुब्ध नर्मदा की ,  कपिलधारा  स्थल तक की यात्रा , टेढ़े मेढ़े पग रखती , बल खाती उस युवती की यात्रा जैसी यात्रा  है ,  जिसकी  अपने तन मन की सुध बुध खो गयी हो ! इस यात्रा में वह कभी कभी तो घूम कर एक बार फिर अपने  विवाह  स्थल की और भी निहारती है ,, और फिर मुड़  कर विह्वलभाव से फिरअपने पथ पर  आगे बढ़ जाती है ! वह जिस और निहारती है वह है सोनभद्र का वःह स्थान जहाँ सोनभद्र जन्मा था ! वही सोनभद्र जिसे शायद वह जन्म जन्मांतर से जानती थी ! वही सोनभद्र जो जौहला के प्यार में आसक्त हो कर उसे भूल बैठा था ! वही सोनभद्र जो उसके लिए जंगलों से गुलबकावली के फूल चुन कर लाया था !  कपिलधारा स्थल पर पहुँच कर वह मेकल पर्वत को छोड़कर चुपचाप छलांग लगाती हुई नीचे उतर कर घने जंगल में विलीन हो  जाती है ! यह स्थान आज पर्यटकों के भ्रमण का स्थल है ,,! यहां आज मेला सा लगता है !

    नर्मदा ने ठिठक कर जिस सोनभद्र की और क्रुद्ध भाव से देखा था , वही सोनभद्र सोनमुंडा स्थल पर पहाडों को तोड़ कर बाहर निकल कर , जल धार बन कर पूर्व दिशा की और बह निकला है ! यहां भी एक गोमुख है , जिससे निरंतर जल बाहर निकल कर बाहर आता रहता है ! किन्तु यह जल धार ज्यादा दूर तक नहीं बहती , ! इसे भान हो जाता है की उसके कारण ही देवी नर्मदा , अमरकंटक छोड़ कर , विह्वल हो कर सर्वथा विपरीत दिशा में दौड़ती चली गयी है ,,! उसे अपनी भूल का अहसास होता है , ग्लानि होती है , पश्चाताप होता है , और वह भी अमरकंटक के उच्चतम शिखर से एकाएक नीचे कूद कर छार छार हो जाता है ! सोनमुंडा के जिस स्थान पर सोनभद्र नीचे कूदता है वह धरातल से करीब १०० फ़ीट ऊंचा है ! सोन नीचे कूद  कर छार छार  हो कर भूमिगत हो जाता है और करीब दस किलोमीटर दूर जाकर फिर उथली जलधार के रूप में अवतरित होता है ,,!
 सोनमुंडा पर पर्यटकों का मेला लगा रहता है ! यहां आज लंगूर और बंदरों का साम्राज्य है ! ये बंदर इतने चतुर होते हैं की अगर कार की खिड़की खुली रह जाए तो कार के अंदर का सारा सामान पार करने में देर नहीं लगाते ! इस स्थल पर कई प्रकार की दुकाने सजी मिल जाएंगी जहां विभिन्न सामान मिलता है ! सोन के इस अवतरण स्थल पर अब मंदिर भी स्थापित हो गए हैं और ब्रम्हा से संबंधित कई धार्मिक कथाएं जन्म ले चुकी हैं ! नर्मदा उद्गम पर जहां भक्ति भाव है , समर्पण है , वहीं इस स्थान पर आमोद प्रमोद है ! सुदूर दीखते पर्वतों की श्रेणियां , अपलक निहारने को और मन्त्र मुग्ध हो जाने को बाध्य करती हैं !
  अमर कंटक जहाँ  श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए भक्ति स्थल है , वहीं  आयुर्वेद के ज्ञाताओं के लिए जड़ी बूटियों का विशाल खजाना ! गुलबकावली के फूल की अद्भुत क्षमता तो हम देख ही चुके हैं , लेकिन कंद  मूल , जड़ों , पत्तियों , वृक्ष की छालों , में छिपी औषधियां यहां प्रचुर मात्रा में मिलती है ! जबसे देश में आयुर्वेद चिकित्सा ने नए पंख पसारे हैं , तब से यह स्थल पूरे भारत में औषधियों के संकलन  का प्रमुख केंद्र बन चुका है !


अमरकंटक उन नर्मदा परिक्रमा वासियों के लिए यात्रा प्रारम्भ करने का स्थल है ,जो अमरकंटक से खम्बात की खाड़ी  तक की १३४२ किलो मीटर की  यात्रा , उसके दोनों तटों पर करके जीवन की साध पूरी करते हैं ! नर्मदा परिक्रमा , एक कठिन वृत्त की तरह है , जिसमें  जगह जगह अनजान जगहों पर पड़ाव करने होते हैं और खुद अपने हाथों से साधुओं की तरह टिक्कड़ सेक कर खाने होते हैं ! कुछ लोग पैदल यात्राएं करते हैं तो कुछ वाहनों पर ,,! यात्राओं के लक्ष्य और अनुभव इनकी थाती है ! परिक्रमाओं के अनुभवी , श्री अमृतलाल वेगड़ ने , इस परिक्रमाओं के सुख  दुःख , कष्ट और शान्ति की अनुभूति पर बड़ी पुस्तकें लिखी हैं  जो साहित्य जगत में अलग ही स्थान रखती है !

    अमर कंटक शहडोल जिले के अंतर्गत आने वाला एक धार्मिक पर्यटन स्थल है ! यहाँ आकर जिस आत्मिक शान्ति की अनुभूति होती है ,,वह अद्भुत है ! विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत यहाँ आकर मेकल के कन्धों पर जैसे अपने सर टिका देते हैं वहीं पर्यटक अपने जीवन की अशांति से ऊब कर यहां आकर श्रांत होकर अपना सर इस पुण्य धरा  के आश्रमों में शान्ति हेतु  धरा पर  टिका देते हैं !! नर्मदा यहीं से इन दो पर्वत श्रेणियों की गहन घाटी के बीच , जैसे दो भाइयों की सुरक्षित बाहुओं के बीच निःशंक हो कर  पश्चिम की और बहती है ! शोक संतृप्त , शॉन भद्र यहीं से जौहला को साथ ले कर , कैमूर पर्वत की श्रेणियों का सहारा ले कर पूर्व की और बह कर , मोक्षदायनी गंगा में मिल जाता है ! और कहना न होगा की विंध्य की साझा विरासत में , दक्षिण और उत्तर की  संस्कृतियां धूप   छावं की तरह सहेलियां बन कर यहीं पर  खेल रही हैं ! अमरकंटक विंध्यांचल की ऊंचाइयों से , उसकी श्रेणियों पर फैले , विंध्य की धरा के अवलोकन का वह विहंग बिंदु है , जिसमें विंध्य की विरासत समग्रता से एक ही दृष्टि से दृष्टिगोचर होती है !

---सभाजीत 
   

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

विंध्य की विरासत
शहडोल सोहागपुर  नगर

 चारों और गहन वन , पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा , मेकल पर्वत  और विंध्याचल की  तलहटी में बसा , शहडोल नगर , कभी सोहागपुर नामक प्राचीन नगरी के नाम से विख्यात था ! जिस तरह अमर कंटक तीन नदियों का उद्गम  है , तीन पर्वतों का संधिस्थल है , उसी तरह सोहागपुर  तीन  प्राचीन राजवंशों ,रतनपुर के  कलचुरियों,  ,गढ़ा  के  गोंडों , और बघेल राजाओं के राज्यों की   सीमान्त     भूमि रहा है ! सोहागपुर उत्तर से दक्षिण दिशा जाने आने का वह  द्वार रहा है , जिससे हो कर कभी राम अपने वनवास काल की अंतिम शर्त निबाहने भारत के दक्षिण भाग में  दंडकारण्य गए थे ! किम्वदंतियां  है की सोहागपुर द्वापर युग का वह विराट नगर था , जहां पांडवों ने अपने वनवास के अंतिमवर्ष का अज्ञात काल , यहां के राजा विराट के महल में गुजारा था  और यहीं द्रोपदी पर गलत नज़र डालने वाले विराट के साले  कीचक का महाबली भीम ने वध किया था !

   गुप्तकाल के अवसान के बाद , नर्मदा तट के कलचुरियों ने,  नौवीं  से ग्यारहवीं सदी  तक , त्रिपुरी में राजधानी बना कर जब राज्य का विस्तार किया तो सोहागपुर उनके अधिकार में आया ! कलचुरियों ने कई दुर्ग , गढ़ियों   , जलाशयों  ,और भव्य मंदिरों का   निर्माण करवाया , जिसके अवशेष आज चंद्रेह  , गोर्गी , सोहागपुर , अमरकंटक , आदि  में देखने को मिलते हैं ! दक्षिण से उत्तरी राज्यों के विजय अभियान में सबसे पहले जो  महत्वपूर्ण  दुर्ग राह में आते थे , उनमें से , पहला सुहागपुर , दुसरा बांधवगढ़ , और तीसरा कालिंजर माना गया है !१५वीं सदी में गुजरात से आये बघेलों ने पहले कालिंजर , फिर गोहरा दुर्ग पर अधिकार जमाया किन्तु मुगलों के विरोध के कारण उन्हें जब कालिंजर और गोहरा छोड़ना पड़ा तो वे तब , बांधवगढ़ आये ! उस समय सोहागपुर गोंडों के आधीन था ! १८५७ की पहली क्रान्ति में अंग्रेजों ने बघेल शासकों का साथ लिया  , और बदले में उन्हें मिला सोहाग पुर का राज , जो  स्वतंत्रता प्राप्ति तक उनके आधीन रहा !

          सोहागपुर में आज भी प्राचीन काल की गढ़ियाँ उपस्थित है ! इन गढ़ियों में बनी बावड़ियां , उस काल की अनवरत जल प्रदाय की  द्योतक हैं ! वर्तमान में यहां , बघेल राजवंशों के रियासतदारों का निवास है ! सोहागपुर कल्चुरीकाल की मूर्तियों  खजाना है , और आज भी पग पग पर खोदने पर कई मूर्तियां निकलती रहती हैं !
               लेकिन समय काल  ने , सोहागपुर को पीछे छोड़  दिया ! कभी सोहागपुर से बाहर निकल कर  , करीब ढाई किलोमीटर दूर , १६वीं सदी में , शहडोलवा अहीर के द्वारा ,बसाया गया एक  छोटा सा गावं , आज चमक दमक  से युक्त शहडोल जिले का सुन्दर  नगर बन गया है ! शहडोल को सहारा मिला कटनी बिलासपुर रेलवे लाइन पर बने उस रेलवे स्टेशन से , जहां से वनोपज को  देश के अन्य भागों तक ढो कर  ले जाने के लिए अंग्रेजों ने उसे  बनवाया था ! शहडोल का  रेलवे  स्टेशन ,आज बहुत विकसित स्टेशन है , और पर्यटकों के आवागमन को  भारत के हर कोने से  जोड़ता है ! स्टेशन के निकट का क्षेत्र अब होटल , रेस्टुरेंट , से सजा हुआ वह विकसित स्थान है जहां सभी प्रकार की भोजन और   ठहरने की उत्तम व्यवस्था है !

      रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर , शहडोल की आधुनिकता के रंग में रंग में रंगी हुई , आदिवासी और विकसित आर्य सभ्यता का समवेत रूप ,  एक सार हुआ दिखता है ! चौराहे  भव्य हैं , आवागमन के लिए सभी प्रकार के वाहन मार्गों पर दौड़ते दीखते हैं ! बाज़ार समृद्ध है , और कुछ अट्टालिकाएं , शहडोल के क्रमश उत्थान की   गाथा बखान रही हैं !

        यहां ,  लोगों में यह  मान्यता है की महाभारतकाल में , जिस बृक्ष पर , अर्जुन ने अज्ञातवास के दौरान , अपने हथियार पोटली में बाँध कर एक पेड़ पर सुरक्षित रखे थे , वह  शमी वृक्ष आज भी वहीं  विदवमान है ! इस बृक्ष को आज  लोग शीश नवा कर  प्रणाम करते हुए , उससे  अपनी मनोकामना पूर्ण होने की कामना करते हैं ! महाभारत काल के राजा विराट के महलों के  कोई अवशेष तो अब यहां नहीं है , किन्तु कीचक वध का स्थान  आज भी  लोगों में चर्चित है !पथरीले क्षेत्र में भोज्य शाला के  कई अवशेष आज उस काल के अवशेषों के रूप में जन श्रुतियों में व्याप्त हैं जहां स्त्री वेश में भीम ने कीचक का वध किया था  !
       एक  पुराने उद्यान में स्थित बावड़ी  को यहां के निवासी , राजा विराट के समय उद्यान में  राजा  रानी के आवागमन का मार्ग बताते हैं  ! इस उद्यान में बहुत उम्र दार वट बृक्ष  युक्त ,एक विस्तृत  बगीचा है ,~ यह रमणीक है , और पुरातन काल के अवशेषों में से एक माना  जाता है !,
   यहीं पर स्थित है , एक सिद्ध पुरुष की धूनी !,,,फट्टी  बाबा की धूनी ! कहते हैं की कभी एक रेलवे कर्मचारी को यहां की सिद्धदेवी , कंकाली देवी ने स्वप्न में दर्शन देकरआदेश दिया  की वह शहडोल आकर उनकी पूजा अर्चना करे ! उस कर्मचारी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और शहडोल आकर माँ  कंकाली देवी की अनवरत पूजा में ,  लींन हो गया !यहां आश्रम बना कर , धूनी जला कर , यहीं  रम गया !  इस धूनी पर आज लोग आकर मत्था टेक  कर मंगल कामना करते हैं , औरअपने  दुःख निवारण की  प्रार्थना   करते हैं  !

   जिन कंकाली देवी की पूजा अर्चना में , सिद्ध परुष ने अपना सारा जीवन , खुले आसमान के नीचे बिता दिया , उसका भव्य मंदिर शहडोल में ,आज भी  गहन आस्था का केंद्र बना हुआ है ! यह एक विशाल मंदिर है ,,और  क्षेत्र के चारों और से आकर ,  लोग  माता के दर्शन हेतु यहां पंहुचते हैं !  धार्मिक मान्यताओं के अनुसार , दक्ष के यज्ञ को विन्ध्वन्श करने के बाद भी , जब भगवान् शिव का मोह , देवी सती की काया से नहीं टूटा , तो विष्णु ने उस काया को अपने चक्र से  खंड खंड कर दिया , फिर भी कंकाल शेष रह गया , जिसे कंधे पर लादे शिव  यहां जब आये तो इस सिद्ध क्षेत्र में उनकी मोह की  तंद्रा जागी , और उन्होंने  माँ सती का वह  कंकाल यहां फेंक दिया और तपस्या हेतु पर्वत शिखर पर चले गए ! वही अठारह भुजाओं युक्त ,  कंकाली देवी  यहां विराजमान है ! यह आदिवासियों , और उत्तरी सभ्यता के आर्यों की सम्मलित भक्ति की विरासत है ! इनकी पूजा का प्रथम अधिकार , गोंड जाती के पुजारियों को है , और उनके बिना पूजा सम्भव नहीं !

             शिव के विराटस्वरूप का द्योतक यहां का विराटेश्वर मंदिर , कलचुरी काल के स्थापित्य का उत्कृष्ट नमूना है ! यद्यपि शिवलिंग , खजुराहो के मंदिरों की तरह विराट नहीं है ,,किन्तु मंदिर पर उत्कीर्ण , शिल्प , कलचुरियों की श्रेष्ठ कला की अभिव्यक्ति का नमूना है ! मंदिर का अग्रिम भाग , जीर्ण होने के कारण पुनः निर्मित किया गया है , किन्तु मंडप और गर्भ गृह , उसी स्थिति में है ! कलचुरी मूलतः  शिव भक्त थे  इसलिए उनके समय में शिव मंदिर की स्थापना यत्र तत्र देखने को मिल जाती है !

      शहडोल का बाणगंगा कुंड , कभी अनवरत जल का श्रोत रहा होगा ! गहराई तक खुदे कुंड का तल , पृथ्वी  की  परतों से जुड़ा रहता है , इसलिए इसमें , भू गर्भीय जल निरंतर भरते रहने के कारण यह कभी सूखता नहीं  ! ऐसे जल श्रोत को पुरातन काल में बाण गंगा , या पाताल गंगा शब्द से जोड़ कर इसकी अनवरतता को चरितार्थ करने के लिए , इसे दिव्य  बाण  द्वारा उतपन्न किया गया  जल कुंड कहा जाता रहा है !  जनश्रुतियों में ,लोग इसे  महाभारत काल के राजा विराट की राजधानी से  जोड़ कर भी  देखते हैं !
 अब  यहां पर एक विकसित उद्यान , नगरपालिका द्वारा बना दिया गया है , जो आधुनिक शहडोल के निवासियों का भृमण  केंद्र बन गया है ! संध्या होते ही यह उद्यान यहां के युवाओं , और वयस्कों की उपस्थिति से भर जाता है ! रंग विरंगे पुष्प , मनोरम छटा बिखेरते हुए यहां आने वाले पर्यटकों के मन को मोह लेते हैं !

  शहडोल  , आदिवासी , और आर्यों  की  मिली जुली संस्कृति का केंद्र रहा है !शहडोल जिले के घने जंगलों के मध्य बसे  , आदिवासियों में  , गोंड , कमर , अहीर , गड़रिया , अगरिया , कॉल , भूमिया , जन जातियां निवास करती हैं ! इनमें अधिकतम , वनोपज पर आधारित हैं , और खान पान में मोटा चावल , जवां का बना पेज और साधारण सब्जियां प्रयोग में लाती हैं ! कभी जंगलों के बने रहने तक आखेट करके वन्य  जीवों  का मांस भी इनके भोजन में शामिल रहता था , किन्तु अब जंगली मुर्गे पाल कर उसका उपयोग ये लोग करने लगे हैं ! इनके देवी देवताओं में देवी और ब्रह्म का विशेष स्थान है ! बड़े बब्बा , और चौत्रों चबूतरों को भी ये शृद्धा पूर्वक नमन  करते  हैं ! वनोपज से प्राप्त बांस से कई प्रकार के सामान बनाने में ये निष्णात  हैं !
     विंध्य की विरासत के  इनके लोक नृत्य ,अब तक  देश भर में धूम मचा चुके हैं ! ढोलक , टिमकी , मादल , की थाप पर चांदनी रात में जब ये समूह बना कर नाचते हैं तो वह  उमंग देखते ही बनती है !

    शहडोल का शाब्दिक अर्थ कुछ भी रहा  हो , उसका अधिस्थापा कोई भी हो , किन्तु अनुभूति में शहडोल , मीठे शहद से भरा वह  छत्ता है , जो वनांचल में , उन पर्वतों , वृक्षों की  शाखाओं पर लगता है ,, जहां  प्रकृति का रस कूट कूट कर  भरा होता है ! वृक्षों से झरते महुए की जो सुगंध , आदिकाल से मनुष्यों को  मदमस्त करती रही , और मीठी शहद की मिठास ,  औषधीय गुणों से   , जो मनुष्यों को चिर जीवी बनाती रही , उसका उपवन  है ,,शहडोल !  विंध्य की विरासत का  यह भू भाग धर्म , आस्था , प्राकृतिक सौंदर्य  ,सरल  जनजीवन से युक्त वह भू भाग है , जिसे देख कर न सिर्फ आँखें तृप्त होती हैं , बल्कि इसकी गोद  में कुछ पल बिताने से  मन को  भी  अपूर्व शान्ति मिलती   है !

---सभाजीत   

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

#गढ़कुंडार

गढ कुंडार का दुर्ग और उसके भग्नावशेष गढ़-कुंडार मध्य प्रदेश के निवाङी जिले में स्थित एक गाँव है। इस गाँव का नाम यहां स्थित प्रसिद्ध दुर्ग(या गढ़) के नाम पर पढ़ा है। यह किला उस काल की न केवल बेजोड़ शिल्पकला का नमूना है

गढ़ कुङार का इतिहास

गढ़ कुङार का इतिहास बहुत ही गौरवशाली है । जूनागढ़ के राजा रूढ देव जू खंगार के पुत्र खेत सिंह खंगार क्षत्रिय दिल्ली सम्राट पृथ्वी राज चौहान के साथ बुदेलखंड में आए । जो की पृथ्वी राज चौहान के सामंत थे महाराजा खेत सिंह खंगार क्षत्रिय जी ने गढ कुङार पर खंगार राज्य की स्थापना की और 1182 से लेकर 1347 तक खंगार क्षत्रिय शासन रहा जिसमें खूब सिंह खंगार राजा मानसिंह खंगार

राजा हुमात सिंह खंगार क्षत्रिय नाग देव खंगार वरदायी खंगार क्षत्रिय राजवंश साथ ही गढ़ कुङार की विरांगना केशर दे

गढ़ कुङार का जौहर

बुदेलखंड जिसे जिझौतिखंङ के नाम जाना जाता है था बुदेलखंड का पहला जौहर गढ़ कुङार में हुआ तुगलक ने जब गढ़ कुङार पर आक्रमण किया तब खंगार क्षत्रिणीयो ने अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु किले में बने अग्नी कुङं में हजारों खंगार क्षत्रिणीयो के साथ मिलकर जौहर किया था परन्तु कभी स्वाभिमान को नहीं झुकाया जो गर्भवती रानी थी वह गुप्त रास्ते खंगार क्षत्रिय राजवंश को जीवित रखने के जंगलों का सहारा लिया । इसमें गढ़ कुङार की विरांगना केशर दे ने तलवार से भीषण युद्ध किया और अंत में जौहर किया जिसका स्मारक आज भी गढ़ कुङार पर बना हुआ है

गढ़ कुङार की कुल देवी माँ गजानन

गजानन माँ जो हाथी और शेर पर विराजमान है । जो खंगारो की कुल देवी माँ गजानन जिनका प्रचीन मंदिर बना हुआ जिनका प्रसिद्ध जल कुङ आज भी हजारों सालों से पहाड़ पर बना हुआ है । गढ़ कुङार के राजा खेत सिंह जू की वरदानी थे उनकी चमत्कारी तलवार जो पत्थर को भी चीर देती थी वह माँ का वरदान स्वरुप है

क्षत्रियों में सिंह शब्द का प्रयोग

सिंह शब्द एक उपाधि है जो खंगार राजाओं की देन हैं जब पृथ्वी राज चौहान बुदेलखंड की ओर कूच कर रहे थे तभी भिन्ङ मार्ग पर रात्रि ठहरे तभी कुछ षडयंत्रकारी ने उन्हें उकसाया की खेत सिंह जू की वीरता का परिचय लिआ जाए सुबह आयोजन हुआ जिसमें बब्बर शेर और खेत सिंह का भीषण युद्ध हुआ जिसमें खेत सिंह खंगार क्षत्रिय जी ने शेर को चीर दिया चारो तरफ आवाज आयी शेर चीरा शेर चीरा तभी पृथ्वी राज चौहान ने कहा सिंह पर विजय प्राप्त करने वाले सिंह होते हैं 11 वी सदी के बाद सभी राजा अपने नाम के साथ सिंह जोड़ ने लगे

वर्ष 2006 में मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं भारत के गृहमंत्री मा राजनाथ सिंह ने महाराजा खेत सिंह जू की जयंती समारोह के उपलक्ष्य में भव्य गढ़ कुङार महोत्सव की घोषणा की जो मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्रालय द्वारा तीन दिवसीय संचालित किया जाता है जिसमें सम्पूर्ण भारत वर्ष से लाखों खंगार क्षत्रिय समाज आते भव्य मेले का आयोजन होता । गढ़कुंडर 27 दिसंबर को महाराजा खेतसिंह खंगार की जयंती मनाई जाती है।

★रहस्य★

देश भर में अनेक ऐसे किला हैं, जिन्हें हम जैसा देखते है, वैसा ही पाते हैं। लेकिन यह कहानी है उस रहस्यमयी किला की, जिसके बारे में हम आपको बताने जा रहे है। जिसकी विशेषता ही इतनी डरावनी है कि अनेक लोग इसे सुनकर ही यहां जाने के बारे में सोचते हैं। बावजूद इसके यहां सैलानियों की भीड़ लगी रहती है। इस किला का विशेषता यह है कि १२ किलोमीटर दूर से किला की आकृति को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, लेकिन जैसे ही हम किला के नजदीक जाते है किला वैसे-वैसे गायब होने लगता है। नजदीक पहुंचने के बाद तो जैसे कुछ समझ पाना ही मुश्किल होता है कि जो दूर देखा था, क्या हम वहीं हैं। इतना ही इस किले की कहानियां भी डरावनी हैं।

हम बात कर रहे है बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में स्थित गढ़ कुंडर किला की। यह किला मध्य भारत में मध्य भारत राज्य के उत्तर में स्थित एक छोटे से गांव में स्थित उच्च पहाड़ी पर स्थित है। ओरछा से सिर्फ 70 किमी दूर है। यह मध्यप्रदेश में विरासत के किले में से एक है और प्रेम, प्रेम लालच और भयानक तोडफ़ोड़ का एक महान इतिहास है। गढ़ कुंडर इतिहास में प्रमुख व्यक्तित्व नागदेव और रूपकुन्वर हैं। उनकी प्रेमिका की कहानियां अभी भी बुंदेलखंड के लोक गीतों में हैं। यह इस तरह से स्थित है कि 12 किमी से यह नग्न आंखों से दिखाई देता है, लेकिन आप इसे करीब पहुंचते हैं, यह विहीन दिखाई देता है और उसे ढूंढना मुश्किल हो जाता है। यह 1539 ईसवी तक राज्य की राजधानी का इस्तेमाल किया गया था। बाद में राजधानी को बेतवा नदी के तट पर ओरछा स्थानांतरित कर दिया गया था।.

यह है डरावनी कहानी, पूरी बरात हो गई थी गायब
स्थानीय निवासी इस किले के बारे में जो बताते है, उसे कुछ डरावनी कहानियां भी है। स्थानीय वृद्ध डोमन सिंग बताते है कि अनेक वर्षों पूर्व इस किले मे घूमने के लिए आई पूरी की पूरी बारात गायब हो गई थी। जिसके बारे में अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। यह बारात अब भी रहस्य बनी हुई है। डोमन सिंग के अनुसार काफी समय पहले यहां एक गांव में एक बारात आई थी, जिसमें करीब ७० लोगों के शामिल होना बताते है। जो कि सभी गढ़ कुंडर के किला घूमने के लिए गए थे। बताया जाता है कि बाराती किला में घूमते-घूमते वहां चले गए थे, जहां कोई नहीं पहुंच सकता था। यह किला का जमीनी के भीतर का हिस्सा बताया जाता है। इसके बाद बाराती वापस ऊपर नहीं आ सके। इस तरह पूरी की पूरी यहां गायब हो गई थी। बताया यह भी जाता है कि इस घटना के बाद जमीन से जुड़े दरबाजों को बंद कर दिया गया था। गढ़कुंडार के रहस्यों के बारे में ग्रामीणों द्वारा और अधिक तो बताया गया, लेकिन इशारों ही इशारों में इतना जरूर कह दिया कि किला रहस्य से भरा हुआ है। किले की एक और विशेषता है कि भूलभुलैया और अंधेरा रहने के कारण दिन में भी यह किला डरावना लगता है।

जिनागढ़ के महल के नाम से था प्रचलित
खेत सिंह न केवल पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख हैं बल्कि एक करीबी दोस्त भी हैं। वह मूल रूप से गुजरात से थे उन्होंने युद्ध में परमल शासक शिव को पराजित किया और किले पर कब्जा कर लिया और खंगर वंश की नींव रखी। उस समय तक, यह जिनागढ़ के महल के नाम से जाना जाता था। यह खेत सिंह खंजर था जिसने नींव रखी और जिजाक भुक्ति क्षेत्र में खंगर के शासन के शासन को मजबूत किया। वह वर्ष 1212 ई। में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, खांगर की पांच पीढ़ी ने यहां शासन किया। बाद में खेत सिंह के पोते महाराजा खुब सिंह खंगर ने जिनागढ़ पैलेस को दृढ़ कर दिया और इसे 'कुंडर किले' के नाम से रखा। कुंडर शासक, इस किले से लेकर 1347 ईस्वी तक शासन करते थे, जब मोहम्मद तुगलक ने इसे कब्जा कर लिया था जो बुंदेल शासकों के लिए प्रभारी सौंपे थे। नागदेव आखिरी खंगेर शासक थे, जिन्हें कई अन्य खांगर सेना के जनरल के साथ हत्या कर दी गई थी, जिसमें एक बुर्जे शासकों ने हिस्सा लिया था। उस समय में बुंदेल शासकों ने मुगलों की जिम्मेदारता की थी बुन्देला राजा बीर सिंह देव ने इसके लिए आवश्यक नवीकरण का काम किया और इसके वर्तमान स्वरूप को प्रदान किया।

किले की विशेषताएं भी दंग करने वाली
गढ़ कुंडर किले में 150 फीट की ऊंचाई है और 400 फीट की चौड़ाई फोर्ट में प्रवेश द्वार है जिसकी ऊंचाई 20 फीट है। किले परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाहरी दीवार में गेज्बो / टॉवर की संख्या हैब्रिटिस्टर बिलोचमन ने इस किले के बारे में प्रसिद्ध किताब अकबरनामा के बारे में बताया। उनका कहना है कि किले 01 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं। यह इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह नए आगंतुकों के लिए एक पहेली बनी रहे। किले एक खुला विशाल आंगन के आसपास बनाया गया है किले रेत पत्थर से बना है जो स्थानीय क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध है। यह इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि अंदर के कमरे आसानी से बाहरी लोगों को देख सकें लेकिन बाहरी व्यक्ति अंदरूनी नहीं देख सकते हैं। आप किले में कुछ चट्टानों और खंभे पर शिलालेख पा सकते हैं। एक बार जब आप गढ़ कुंडर किले में प्रवेश करते हैं, तो बाईं तरफ, एक छोटा सैनिक बैरक होता है। यह दक्षिणी सेना में है किले के मुख्य पहाड़ टॉवर परिसर के दक्षिण-पूर्व पर स्थित है कुल किले स्तंभों पर खड़े हैं और बहु-मंजिल किले परिसर है। प्रत्येक मंजिल के निर्माण में प्राकृतिक प्रकाश, जल आपूर्ति, घास का भंडारण, शौचालय आदि के लिए विशेष ध्यान दिया गया है।

खंडहर में बदल रहा स्वरूप, लेकिन पहचान कम नहीं
गढ़ कुंडर का किला देखरेख के अभाव में दिन प्रतिदिन खंडहर में बदलता जा रहा हैं। धर के लालच में लोगों द्वारा इसमें जगह-जगह खुदाई भी कर दी हैं, लेकिन इसकी पहचान पर अब तक कोई फर्क नहीं पड़ा है। गढ़ कुंडार का किला अब भी अपनी पहचान देश में बनाए हुए है। जैसा कि सभी ने इतिहास में पढ़ा है, वहीं शान आज भी इसकी है। गढ़ कुंडर किला चंडला, बुंदेला और खंगर जैसे बुंदेलखंड शासकों के अधीन रहा। यह प्रकाश में आया जब 1180 में राजा पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख खेत सिंह खंगार ने अपनी राजधानी यहां बनाने की योजना बनाई। गढ़ कुंडर किले के महत्वपूर्ण पर्यटक आकर्षण हैं। मुरली मनोहर मंदिर, रानी का महल, अन्धाकोप, स्टोरेज हाउस, राज महल, नरसिंह मंदिर, सिद्ध बाबा स्थान, रिसाला, दीवान-ए-अमा, दीवान-ए-ख़स, घोड़ा अस्तबल, जेल घर, मोती सागर, राव सिया हाउस आदि। इसी तरह हम भी पास के पर्यटन बिंदुओं पर जा सकते हैं जैसे निमा शहर, गढ़ी हाथीया किला आदि। उनके स्थानीय देवी महा माया ग्रीड वासनी का एक महत्वपूर्ण मंदिर है, जिसे स्थानीय लोगों के बीच बेहद माना जाता है। यहां एक पानी की टंकी भी मंदिर के करीब, सिंह सागर टैंक में मौजूद है। किले के उत्तर-पश्चिम में, बेतवा नदी 3 मील की दूरी पर बहती है। हर सोमवार एक स्थानीय बाज़ार दिन होता है जिस पर स्थानीय लोग खरीदारी करने के लिए इक_ा होते हैं, जो उनके रिवाज, अनुष्ठान, स्वाद आदि को समझने के लिए एक अच्छा दिन है। अक्टूबर से जनवरी तक यहां अधिकांश लोगों की भीड़ पहुंचती है।
          --महेबा-सहानिया  मऊ 
ओरछा के  राजा रुद्रप्रताप सिंह  के तीसरे पुत्र उदयप्रताप सिंह को बंटवारे में महेबा की जागीदारी मिली !! ओरछा के बुंदेलों ने कभी मुगलों से प्रकट में बैर नहीं की ,इसलिए ओरछा पर तो मुगलों ने  कभी  कोई आक्रमण नहीं किया !   , किन्तु  उदय प्रताप के वंश में जन्मे चम्पतराय को मुगलों की आधीनता कभी  रास आई  ! उन्होंने स्वयं को स्वतन्त्र राजा  घोषित करते हुए मुगलों को कर देने से मना कर दिया ,,! बदले में शाहजहां के काल में , मुगलों ने कई   बार महेबा पर चढ़ाई की ! इसी छुटपुट लड़ाइयों में एक बार चम्पतराय को अपनी रक्षा हेतु यहां की मोर पहाड़ियों में , अपनी गर्भवती पत्नी के साथ शरण लेनी पडी  , और इसी युद्ध के वातावरण में जो उनके यहां पुत्र रत्न पैदा हुए  ,,उन्होंने बुंदेलों की कीर्ति दक्षिण में मराठा साम्राज्य तक फैला दी ! यह यशश्वी पुत्र  थे ,महाराज चम्पतराय के पुत्र ,महाराजा छत्रसाल ,,जिन्होंने बाद में ओरंजेब की सेना को नाकों चने चबवा दिए !
      छतरपुर से १९ किलोमीटर दूर , नागावं मार्ग पर स्थित , महेबा के ध्वस्त महल , चम्पत राय की वीर गाथाओं  को  बखानते  हैं !


अयोध्या के राजकुमार , युग पुरुष राम के परिवेश में ढलने वाले 
तपस्वी राम की तपस्या का गवाह है , ,,चित्रकूट !  मत्गयेन्द्र  मंदिर से लेकर , मंदाकिनी के विभिन्न घाटों  पर , कामद गिरी के  शिखर पर , गुप्त गोदावरी की गहन कंदराओं में , गृहस्थ जीवन के आदर्श , सती  अनुसुइया के पवित्र आश्रम पर , भार्या सीता के के साथ , रमणीक स्फटिक शिला पर , एकांत वास करते राम के पद चिन्ह , यहां आने वाले हर रामभक्त के लिए , मनोकामनाओं के पूरक हैं ! किन्तु राम किसी विशेष भूमिभाग , किसी विशेष विचारधारा के परिचायक नहीं है ! वे तो गरीब केवट के हठ  को सहजता से  स्वीकारने वाले , आदिवासी निषाद राज के अभिन्न मित्र , ज्ञानी तपस्वियों के आदर्श , शबरी के झूठे बेर  प्रेम पूर्वक खाने वाले , जलचर , नभचर ,  , गरुड़ , काकभुशण्ड , जटायु , सम्पत , के आराध्य , किष्किंधा के वानरों के ह्रिदय सम्राट , रावण और विशाल सागर के अभिमान का हनन करने वाले , वे महापुरुष हैं , जिनकी कीर्ति , भारत में ही नहीं , विश्व के अनेक देशों में आज भी सूर्य की तरह  दमक रही है !
     राम कथाएं , नेपाल , श्रीलंका , और वर्मा देश की प्राणवायु हैं !येडागास्कर द्वीप से ले कर , आस्ट्रेलिया तक , राम की यश पताका आज भी फहरा रही हैं !मलेशिया , थाईलैंड , कम्बोडिया , जावा , सुमात्रा , बाली द्वीप , में राम के जीवन प्रसंग आज भी जन जन  में चर्चित हैं !  वहां  के भू भाग में , राम के युग की , आर्य संस्कृति के अवशेष आज भी विदवमान हैं !यहाँ तक की , फिलीपींस , चीन , जापान , और प्राचीन अमेरिका में भी राम की छाप आज भी देखने को मिलती है ! पेरू के राजा खुद को सूर्यवंशी ही नहीं , कौशल्या सुत  राम के वंशज मानते हैं !
    विश्वव्यापी  राम के इस विराट  स्वरूप को  लोगों के ह्रदय में स्थापित करने के लिए , आधुनिक महर्षि , नानाजी देशमुख ने चित्रकूट की भूमि सर्वथा उपयुक्त माना ! चित्रकूट आने वाले सभी राम भक्तों , साधकों , पर्यटकों , और भारतीय दर्शन के शोधकर्ताओं को राम के उस विश्व्यापी विराट छवि के दर्शन होते हैं ,  , नानाजी देश मुख द्वारा स्थापित किये गए रामदर्शन मंदिर में ! इस भव्य स्थान पर , राम से साक्षात्कार होता है , दीर्धाओं में उत्कीर्ण , राम के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के चित्रण से , जो बड़े यत्न से , विभिन्न देशों की , विभिन्न  सांस्कृतिक  शैलियों में उत्कीर्ण की गयी हैं ! अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्रयेष्ठि यज्ञ से ले कर , वशिष्ठ और विश्वामित्र के सान्निध्य में , धनुर्धर राम की श्रष्टि के चित्रों के साथ , सीता स्वयंबर , राम वनवास ,केवट संवाद ,निषाद मित्रता , सीताहरण , जतायुवध , हनुमान मिलन , बाली वध , अशोकवाटिका , रामरावण युद्ध और राम के राजतिलक की गाथा  विशिष्ट शैलियों , और उत्कृष्ट कला के साथ उकेरी गईं है , जो विश्व के हर देश में बसे राम से से साक्षात करवाती है , और चित्रकूट पर्यटन पर आया हर व्यक्ति , इस वीथिका से निकल कर ,  राम से एकात्म हो कर , राम मय हो जाता है ।
      
         राम यदि चित्रकूट न आये होते तो वे प्रकृति की उस अलौकिक शक्ति , उसकी ऊर्जा , और अमोघ औषधियों से परिचित न हुए होते , जो प्राकृतिक कन्द मूल , वनस्पतियों , और प्रकृति के नियमों में समाहित हैं । इसी प्राकृतिक शक्तियों को संचित कर , वे उस बल के स्वामी बने , जिससे निशाचरों का विनाश हुआ , और नाभि कुंड में अमृत सँजोये , रावण का विनाश  भी सहजता पूर्वक हो सका । भारत के उस प्राकृतिक ज्ञान , ऊर्जा , औषधियों की जनक , आयुर्वेद की उस महाशक्ति की, विभिन्न जड़ी बूटियों को पुनः युवाओं से जोड़ने , उन्हें शिक्षित करने हेतु , औषधियों की खेती का कार्य आज , नानाजी देशमुख के प्रयत्नों से साकार हो गया है । आज के चित्रकूट में आधुनिक शिक्षा के साथ , विलुप्त होते पुरातन ज्ञान विज्ञान को भी संरक्षित करने का काम , नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित संस्था द्वारा अबाध गति से किया जा रहा है ।

       आज का चित्रकूट , सिर्फ आस्था , से शीश नवाने का तीर्थस्थल  ही नहीं है , बल्कि भारतीय परंपराओं , सेवा , शिक्षा ,और संस्कृति का अभिनव केंद्र है । कहना न होगा कि आस्था का चित्रकूट अगर राम पर केंद्रित है तो सांस्कृतिक ज्ञान का चित्रकूट , युगपुरुष नानाजी देशमुख पर , जिन्होंने तत्व सार से ,  राम  को  चित्रकूट के जनजीवन से संजो दिया ।

 --- सभाजीत