गुरुवार, 2 नवंबर 2017











   सरदार ,,,यानी मुखिया 


 इधर कुछ दिन पूर्व ही , जब न्यूज़ १८ पर  , कांग्रेस के प्रवक्ता ,, आलोक शर्मा ने    सीना ठोक कर कह दिया की सरदार पटेल से इंदिरागांधी बड़ी नेता थीं , तो हार्दिक दुःख हुआ !   दुःख इसलिए हुआ की आधुनिक कांग्रेस के प्रवक्ता सरदार को जानते ही नहीं थे ! वे ही क्यों , बहुत से लोग सरदार से इसलिए अनभिज्ञ हैं की उनकी जीवनी किसी स्कुल में ठीक से पढ़ाई ही नहीं गयी ,,,,और ना उन पर किसी फिल्मकार ने फिल्म बनाई ,,!  जो  लोग  भारत को गावं की मिटटी के जरिये पहचानते हैं ,,,वे ही गांधी और सरदार को समझ सकते हैं ,,,और जो गावं को राजाओं , नबाबों , और अभिजात्यवर्ग के लोगों  के रूप में  पहचानते हैं वे ही नेहरू को जान सकते हैं !

    मुश्किल यह है की , सरदार को , आज़ादी के सन्दर्भ में सिर्फ एक ऐसे लौह पुरुष के रूप में सीमित कर दिया गया , जिसने देश  की  ५१२ रियासतों को एक राष्ट्र के रूप में नया स्वरूप दे दिया ,   जो की  रजवाड़ों के स्वार्थी संस्कारों के बीच ,,,एक असंभव कार्य था !  क्या पटेल का व्यक्तित्व बस एक लौहपुरुष का ही था ,,,,??  तो  फिर  वे सरदार क्यों  कहलाये  ,,?? क्या यह सरदार का सम्बोधन उन्हें   रियासतों के  विलय के दुष्कर  कार्य करने के लिए नवाज़ा गया था ,या किसी और कारण ,?  वे क्यों सरदार कहलाये ,,,इसका   उत्तर    आज की पीढ़ी  नहीं जानती  .??

   सरदार पटेल वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम में ,  गांधी के साथ चलने वाले रथ के दूसरे पहिये थे !  या  यु  कहें  की   गांधी और सरदार एक ही सिक्के के दो पहलु थे ! वे गांधी के अनुयायी कम , मित्र ज्यादा थे ! वे  संघर्षों  में  पले _  बढे ब्यक्ति थे !  उन्हें सुविधाओं की चम्मच जन्म से ही मुंह में नहीं मिली थी , और ना ही कोई व्यक्ति उनका गॉड फादर था ! दूसरे शब्दों में यदि एक कड़वा सत्य कहें की , गांधी को और सरदार को " कांग्रेस ' की जरुरत नहीं थी ,,,बल्कि कांग्रेस को इन दोनों व्यक्तित्वों की जरुरत थी ,,, स्वतंत्रता के आंदोलन के लिए ......, तो गलत नहीं होगा  !

  संक्षेप में यदि सरदार की जीवनी पढ़ें , तो यह पता चलता है की वे सं १८७५ में जन्मे , और नेहरू से १४ साल बड़े थे ! वे बहुत ही सामान्य  परिवार  से थे , और स्वभाव से महात्वाकांक्षी नहीं थे ! उन्होंने अपनी वकालत की प्रारम्भिक पढ़ाई भी , अन्य सीनियर वकीलों से किताबें  मांग कर पढ़ीं ,,, क्यूंकि उनके पास किताबें खरीदने  के  पैसे  नहीं थे ! उन्होंने युवावस्था में  ,    प्लेग से पीड़ित अपने मित्र की सेवा की  और  उसका  इलाज़ किया और फलस्वरूप वे भी इस भयानक रोग के शिकार हो गए !  अपने रोग का इलाज़ , उन्होंने परिवार से दूर रह कर,  एकांत में , एक मंदिर में रह कर किया और स्वस्थ हुए !  वकालत  की  पढ़ाई  के बाद उन्होंने गोधरा में रह कर प्रेक्टिस शुरू की ,,,और अपने पैतृक घर , और परिवार से कोई  आर्थिक  मदद नहीं ली !  सं १९०९ में , उनकी पत्नी कैंसर के  रोग  से  ग्रसित  हुई , और मुंबई के एक अस्पताल में मर गयीं ,,,! जब उनकी पत्नी की खबर उन्हें दी गयी तो वे अदालत में एक ज़िरह कर रहे थे ,,,उन्होंने कागज़ पर लिखी अपनी पत्नी की मृत्यु की सूचना को चुपचाप जेब में रख लिया और जिरह पूरी होने के बाद ही अदालत से बाहर आये !
   पत्नी की   मृत्यु  के  बाद  उन्होंने पुनः विवाह नहीं किया ! एक लड़की और एक लड़के , दो बच्चों की परवरिश उन्होंने खुद अपने ही आर्थिक  सीमाओं में आजीवन   की  !

     ३६ वर्ष की उम्र में  सं १९११ में  , वे बैरस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए !जहाँ उन्होंने ३६ माह का कोर्स सिर्फ ३० माह में ही पूरा कर लिया !  वापिस आकर   वे एक सफल बैरिस्टर बने  और अपनी प्रेक्टिस शुरू कर दी ! सं १९१७ में उनकी पहली मुलाक़ात गांधी से हुई ,,,और वे उनकी  स्वराज की धारणा से वे प्रभावित हुए !  इस कार्यक्रम के अंग बन कर  , वे गुजरात  सभा  के सचिव बने जो बाद में कांग्रेस की .. शाखा ' गुजरात  कांग्रेस  के  रूप  में परिवर्तित हो गयी !

    सरदार ने गुजरात में अपने ही तत्वाधान में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया ! उन्होंने सर्वप्रथम अंगरेजी कानून ,',बैथ ' .. का विरोध किया  ! जिसके अनुसार   किसान  और , मज़दूर , अंग्रेजों का सामान  मुफ्त  ढोने के लिए कानूनन बाध्य थे ! अस्वीकार करने पर जेल का प्रावधान था ! इसके साथ साथ ही उन्होंने समाज सेवा का बीड़ा उठाया , जिसमें प्लेग से बचाव , और कुपोषण से मुक्ति हेतु लोगों को शिक्षित करने का कार्य था !   इसी सिलसिले में उन्होंने गुजरात के खेड़ा जिले से , अंग्रेजों को टेक्स दिए जाने का विरोध शुरू किया ,,,और कुछ ही दिनों में किसान टेक्स देना बंद कर दिए ! यह वह समय था जब गांधी जी  चम्पारण  में  निलहे गोरों के विरोध में एक अलग आंदोलन चला रहे थे !  सरदार वल्लभ भाई का जुड़ाव , एक से स्वभाव   के कारण , गांधी से जुड़ता गया ,,और वे गांधी के ना सिर्फ समर्थक बल्कि , एक महत्वपूर्ण सिपाही बन गए ! सरदार ने पुरे जिले के सभी गावों में भ्रमण करके किसानो को जाग्रत किया की वे टेक्स ना दें , ! सरकार ने पुलिस भेजी , किसानो के जानवर और संपत्ति को सीज़ करने के लिए , किन्तु सरदार के इशारे पर किसानो ने अपने जानवर और मूल्यवान संपत्ति को छिपा लिया ,,!! सरकार ने हजारों आंदोलन  कर्ताओं  को पकड़ा  , लेकिन पटेल  पकड़  में नहीं आ  पाए ! धीरे धीरे यह आंदोलन निकट के अन्य प्रांतों में भी फ़ैल गया ,,,लोग पटेल को जानने लगे। .. वे  लोगों के नायक बन गए ,,!  कुछ दिन बाद सरकार झुकी , उसने टेक्स में रियायत की  और कहीं कहीं  तो  एक  साल  के लिए वापिस ले लिया !

     पटेल ने गुजरात  को पूरी तरह सम्हाल लिया ! असहयोग आंदोलन  के दौरान  , उन्होंने  कांग्रेस के  तीन लाख सदस्य बनाये , जिनसे १.५ लाख की रकम भी आंदोलन चलाने के लिए एकत्रित हुई ! पटेल ने अंगरेजी वस्त्र त्याग दिए , और बच्चों सहित खादी पहनने लगे ! उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध , और शराब  बंदी के  लिए  ,सफल  आंदोलन संचालित किये ! वे लोगों द्वारा ' अहमदाबाद '' शहर के नगरपालिका के अध्यक्ष भी बनाये गए और उस जमाने में उन्होंने शहर की स्वच्छता के लिए   महत्त्व   पूर्ण कार्य किया ! जब १९२७  में उस क्षेत्र में भीषण बाढ़ आयी , सैकड़ों लोग बेघर हुए , तो उन्होंने राहत केम्प चलाये  , और  , निशुक्ल वस्त्रों ,दवा, भोजन की व्यवस्था करवाई !  उनके एक आह्वान पर सैकड़ों कार्यकर्ता खड़े हो जाते थे !,,,और वे उनके नायक कहलाते थे ! विभिन्न आंदोलनों के मुखिया होने के नाते   गुजरात  के लोगों ने,, उन्हें अपना " सरदार " माना !और वे उनके बीच प्यार से,,,, " सरदार " ,,,,कहलाने लगे !


    १९२३  में जब गांधी जेल में थे , तो पटेल को नागपुर कांग्रेस का न्रेतत्व करने को कहा गया ! उन दिनों " तिरंगा " फहराना मना था ,,,! नागपुर में तिरंगा फहराने   के लिए उन्होंने हज़ारों कार्यकर्ताओं को देश के कोनों से बुला लिया ...पुलिस समझ ही नहीं पाई  और झंडा फहराया गया ! बढ़ते  हुए प्रभाव को देख कर अंग्रेज सरकार झुकी , और सरदार के कहने पर बहुत से उन लोगों को  जो  झंडारोहण  के लिए जेल में ठूंस दिए गए   थे ,,,रिहा किया गया ! दांडी यात्रा के समय , पटेल से डरे अंग्रेजों ने उन्हें  पहले  ही  गिरफ्तार  कर लिया !  और बंद कमरे में उन पर एक गंभीर मुकदमा चलाने की कोशिश , बिना गवाहों के शुरू हुई !,,,लेकिन जनता के दबाव के सामने सरकार को पटेल को छोड़ना पड़ा !  दांडी यात्रा के बाद जब गांधी भी गिरफ्तार हो गए ,,,तो  सरदार को कांग्रेस का   अंतरिम  अध्यक्ष बनाया गया ! बाद में वे १९३१ में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए !

     दूसरी गोल मेज कांफ्रेंस फेल होने पर गांधी और सरदार दोनों नेताओं को एक साथ गिरफ्तार कर लिया गया ,, और उन्हें यरवदा जेल में साथ साथ रखा गया ! वहां सरदार,    गांधीजी के एक विश्वश्त सहयोगी बने , और स्वराज से ले कर स्वतंत्रता प्राप्ति के सभी मुद्दों पर परामर्श हुआ ! उन्होंने वहां हिन्दू मान्यताओं पर भी चर्चाएं की , हंसी मज़ाक भी किया , और जब गांधी ने आमरण  अनशन शुरू किया तो पटेल ने ही उनकी देखभाल की ! !सरदार से  गांधी की निकटता की रिपोर्ट मिलने पर , अंग्रेजों ने उन्हें अलग नासिक जेल भेज दिया ! इस बीच उनके बड़ेभाई की भी मृत्यु हुई किन्तु उन्होंने अल्पकाल के लिए रिहा होने से मना कर दिया! ,,अंत में सरकार को उन्हें..  उसी वर्ष के अंत में छोड़ना पड़ा !

   १९३४ के बाद सरदार अब कांग्रेस में भी एक " सरदार " का कद अख्तियार कर चुके थे  और उनकी राय हर जगह ली जाने लगी थी ,, चाहे , वह विधान  मंडल  के लिए चुने जाने वाले लोगों के चयन के लिए हो या फिर किसी अन्य मुद्दे के लिए ! सर्वशक्तिमान नेता होने के बाद भी उन्होंने खुद के पद के लिए कभी उठापठक नहीं की और ना ही कोई महत्वकांक्षा पाली !

    शोशलिस्ट विचारों को कांग्रेस में मान्यता दिलाने के लिए जब नेहरू ने पहल की तो.. उन्होंने नेहरू का खुला विरोध किया ! सरदार का मानना था की इससे कांग्रेस दिशाभ्रमित होगी !,,,क्यूंकि सोशलिज्म और वामपंथ एक ही रंग रूप के सिद्धांत थे ,!,जो  कांग्रेस  के मूल सिद्धांत अहिंसा ,,और शांतिपूर्ण असहयोग को प्रभावित कर सकते थे !यही नहीं ,,,जब युवा नेता ,,, सुभाषचंद्र बोस ने भी कांग्रेस के सिद्धांत को गरमदल से जोड़ना चाहा  ,  तो सरदार  उनके   साथ नहीं  गए  !  यही कारण है की शोशलिष्ट और कुछ क्षुब्ध कांग्रेसी उनके  सदा के लिए  आंतरिक विरोधी बन गए !

  असली वक्त आया सं १९४२ , जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ ,,,तो ' अभी नहीं तो कभी नहीं ' की सोच पूरी  कांग्रेस में जाग्रत हो गयी !  नेहरू ने विधान मंडलों से कांग्रेस को अलग करने की पैरवी की ,,,और राजगोपालाचारी ने कहा की अंग्रेजों का पूरा साथ दिया जाना उचित होगा यदि वे हमें आज़ादी देने के लिए अनुबंध कर लें ! अंग्रेजों ने राजगोपालाचारी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो सभी , एकमतेन,," अवज्ञा   आंदोलन " छेड़ने के लिए सहमत हो गए ! यहीं से जवाहरलाल नेहरू और पटेल में थोड़ी समझ एक दूसरे के प्रति  बढ़ी  ! क्यूंकि पहले अवज्ञा आंदोलन को ले कर नेहरू , राजगोपालाचारी   और मौलाना आज़ाद ने आपत्ति उठाई थी ,  लेकिन पटेल के समझाने पर सब मान गए ! फिर भी जब कांग्रेस कमेटी के सामने कई लोगों ने इस आंदोलन के विरोध में आवाज़ उठाई तो पटेल ने  अंतिम  चेतावनी दे दी की अगर कांग्रेस नहीं मानती है तो वे , कांग्रेस छोड़ देंगे !पटेल हर हालत में गांधी के सिद्धांत पर चलना पसंद कर रहे थे ,,,जबकि कई लोगो इसे मंजूर नहीं कर रहे थे !  पटेल के दबाव के कारण ही ७ अगस्त1942  के ऐतिहासिक दिन को  ,  अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ ,,!

    इस आंदोलन को सफल करने के लिए सरदार ने धुआंधार मीटिंग जनता के बीच की   !   यद्यपि   भारत छोडो आंदोलन की इस मुहीम पर सम्पूर्ण कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करके ,,,अहमदनगर जेल में डाल दिया गया जो १९४५ तक जेल  में रहे !,,इस जेल प्रवास में ही कस्तूरबा और महादेव देसाई की मृत्यु हुई जिससे सरदार को बहुत बड़ा दुःख पहुंचा ! ,  पीछे  जनता ने बहुत उग्र प्रदर्शन भी किये ,,,और जनता से पुलिस की झड़प भी होती रही !  इसे अंग्रेजों ने विद्रोह की संज्ञा दी ,,,और इसे १८५७ से भी बड़ा विद्रोह माना !   सरदार   इस दौरान जेल में रहे ,,और १९४६ में बाहर आने पर वह बड़ा परिवर्तन आया..... जब गांधीजी के कहने पर सरदार ने... कांग्रेस के अध्यक्ष पद.... से अपना नाम ,,     नेहरू को आगे करने के लिए   हटा लिया ! सरदार ने जेल में रहते हुए ही कहा की अब उनके विश्राम करने का समय आ गया है ,,,क्यूंकि उन्होंने बहुत परिश्रम कर लिया जो उनके  कूवत से भी बाहर था !  शायद,,,, कांग्रेस के बदलते परिदृश्य को वे भांप गए थे ,,और इसी लिए थकान अनुभव करने लगे थे !

१९४६  में अंग्रेजों ने सत्ता हस्तारण की बात शुरू की ,!,,और दो अलग राष्ट्रों की अवधारणा सामने आयी!  , जिसमें एक राष्ट्र,,,, धर्म आधारित,,," पाकिस्तान  "  की परिकल्पना  जिन्ना  ने की ! अब सवाल उठा की कौन सी  रियासत  किस राष्ट्र में विलीन होगी ,,,और यही वह समय था जब सरदार पटेल ,,,,एक लौहपुरुष के रूप में सामने आये ,,,और उन्होंने एक नए राष्ट्र को मूर्तवत किया !

    सच कहें तो १९४७ की कांग्रेस,,, सिर्फ तीन बड़े नेताओं के नामों की कांग्रेस  बची  थी ,,!   डाक्टर राजेंद्र प्रसाद , जवाहर लाल नेहरू , और सरदार पटेल !  इस   कांग्रेस   में अब बहुत शक्ति , और  ओज बचा ही नहीं था ,,इसी लिए गांधी ने कहा की,,,, कांग्रेस को डिजाल्व कर दो , और नए सिरे से एक पार्टी का गठन करो , जो देश का शाशन चलाये !  अगर यह प्रस्ताव मान लिया जाता तो नयी पार्टी में वे भी समाविष्ट होते , जो बाद में बाहर रह कर नेहरू के विरोधी दिखाई देते रहे ! सरदार की मृत्यु के बाद , और राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बन जाने के बाद ,,, स्वतंत्रता आंदोलन की कांग्रेस तो एक ही व्यक्ति के नाम  शेष बची थी जो  " नेहरू " थे !  और यही कारण   हैकी बाद की भूलें ,,,आज  की  कंटक बनी हुई हैं !

      नेहरू कीमृत्यु के बाद ,,,,,, कांग्रेस,,,,,, कामराज , और निजलिंगप्पा तक  रही ,!,,लेकिन इंदिरा ने जब खुद को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पार्टी से बगावत की,,, तो वह कांग्रेस ख़तम ही हो गयी जो वास्तविक कांग्रेस थी !!  बाद की कांग्रेस तो इंदिरा कांग्रेस कहलाई जिसका चुनाव चिन्ह भी बदला और टीम भी ! आश्चर्य है की स्वार्थी कांग्रेसियों ने उस समय के एक तेजस्वी कांग्रेस नेता की भी अवहेलना की ,,,जो मुरारजी देसाई थे !  बाद में यही नेता कांग्रेस के विरोधी नेता बन कर कुछ समय के लिए ही सही , लेकिन प्रधान मंत्री जरूर  बनाये गए थे !

    आज की कांग्रेस जो यह दावा करे की सरदार  उसकी  विरासत के हैं , तो ,वह गलत है ,,!! ना कांग्रेस वह  पुरानी कांग्रेस है ,,,और ना वे सिद्धांत बचे हैं  जो आज़ादी की लड़ाई के लिए  स्थापित हुए  थे   !  यह कांग्रेस तो सत्ता के लिए लड़ने वाली कांग्रेस है ,,,जिसका पुराणी कांग्रेस से ना  कोई  खून का रिश्ता है ,,ना विचारों का !  कोई कुछ भी कहे ,,,आज की कांग्रेस तो स्वार्थ और वंशपरम्परा से उपजी , चापलूस लोगों द्वारा समर्थित कांग्रेस है ,,जो सत्ता का मक्खन बिना किसी रिस्क के , पीछे  पीछे  रह कर खाना चाहते हैं !यह येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज रहने की कोशिश करते रहने वाली कांग्रेस है जिसका..स्वतंत्रता संग्राम में खून बहाने वाले कार्यकर्ताओं से कोई सम्बन्ध नहीं !

---sabhajeet


मंगलवार, 22 अगस्त 2017

 राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु   लिखी गयी  , स्वीकृति !

   यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

    राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के  शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !

   राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में  उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !

  राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे !  उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !

         यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३७ के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !  !  यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

      अब  यह  देखना  जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?

   वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था  की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन  भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था !   इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य  " गन सेल्यूट " कहलाते थे !

     एक्ट १९३५ में   ,   इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !

     तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,??   इस राज को जानने की जरुरत है !

 खुद  को स्वयंभू  ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , "  मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण  जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए !  महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि  स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !

    जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल  में रहा   बाद में उसकी मृत्यु हो गयी !  ,,,!

    अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे !  तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन ककर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए  और काश्मीर नहीं बना ??राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु लिखी गयी , स्वीकृति !
यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल एक्ट १९३५ के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए , शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी ! भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,! किन्तु काश्मीर ने नहीं दी ,,,क्यों ,,? इसके कारण है नेहरू द्वारा पैदा किये गए काश्मीर के स्वयं भू नेता ,,शेख अब्दुल्ला ! जो शुरू से ही काश्मीर को स्वतन्त्र मुस्लिम राज्य की तरह देख रहे थे ,,और दूसरे उन्हें मौका मिल गया नेहरू की गलती का ,,,जो नेहरू यु एन ओ में जाकर , काश्मीर को अंतर राष्ट्रीय समस्या बना दिए ! बहाना लिया गया गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया के एक्ट १९३५ तथा , राजा की संधि में लिखी शर्तों का !
अब यह देखना जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?
वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था ! इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य " गन सेल्यूट " कहलाते थे !
एक्ट १९३५ में , इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !
तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,?? ऐसा क्यों ,,??
इस राज को भी जानने की जरुरत है !

खुद को स्वयंभू ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , " मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए ! महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !
जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल में रहा बाद में उसकी मृत्यु हो गयी ! ,,,!
अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे ! तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन कर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए और काश्मीर नहीं बना ??
सच तो यह है की काश्मीर के प्रति शुरू से लापरवाही बरती गयी ,,,! पहले तो जब कबायलियों ने आक्रमण किया तो उन्हें पुरे काश्मीर से हटाने की जगह सिर्फ थोड़े से हिस्से से हटा कर युद्ध रोक दिया गया ,,,और इस प्रकरण को नेहरू बे वजह यु एन ओ ले जा कर विवाद का विषय बना दिए ! बाद में शेख अब्दुला को काश्मीर की गद्दी सौंप दी , जो बाद में जल्दी ही प्रकट हो गयी की वह एक स्वतन्त्र काश्मीर मुस्लिम राज चाहता है ! उसे हटा कर जेल में डाला ,,,तो घिसे पिटे एक्ट १९३७ और संधि शर्तों में उलझ कर नए एक्ट ३५ै ऐ तथा ३७० बना लिए ! ये एक्ट भी संसद में पारित नहीं हुए , और सिर्फ राष्ट्रपति से आदेश बनवा कर काश्मीर में लागू करवा दिए !
दूसरी और देखिये , क्या पी ओ के वाले काश्मीर के हिस्से पर पाकिस्तान ने ऐसे ही एक्ट बना कर लागू किये ,,?? क्या उस हिस्से के सम्प्रभुता , राजा हरिसिंह के राज के आधीन नहीं थी ? क्या उस पर ब्रिटिश काल का एक्ट १९३५ लागू नहीं होता है ,,? तब पाकिस्तान ने वहां कौन सी शराफत दिखाई , जो हम दिखाने में लगे रहे ! ,??
अब वक्त आया है जब इन ऐक्ट के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय से एक्ट हटवाने का जो संसद पारित हैं ही नहीं तो हमारे वाम पंथी प्रबुद्ध लोग हमें सीखा रहे हैं की इतिहास क्या है !
लेकिन याद रहे वक्त करवट बदलता है ,,,, जिन काश्मीरी ब्राम्हणो को यह सीख दी जा रही है की आप वहां रह कर लड़े क्यों नहीं , उनकी और से जबाब है की जब बल का ही प्रयोग करना है तो क्यों ना हम पुरे काश्मीर को वापिस लेने के लिए करेंगे ,,और जो एक्ट लगाए वो हम अपने ही न्यायालय से रद्द करवाएंगे !
राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !
राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !
राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे ! उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !
यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३5 के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !



     राजा हरिसिंह के शाशन काल में ही नेहरू ने ,,मुस्लिम लीडर और तत्कालीन अलगाव वादी , नेता ,



शनिवार, 9 सितंबर 2017





  **** " सबूत " *****

   वह एक लम्बी टाटा सफारी गाड़ी के सामने तनी हुई खड़ी थी ! वह ट्रेफिक पुलिस की वर्दी में थी और साथ में थे दो , डंडा धारी सिपाही !
  वह बार बार हाथ में लिया हुआ एक नोटिस लहरा रही थी ,,,और गाड़ी का मालिक   अपनी  गाड़ी के   डोर पर अड़ा हुआ उसे घूर रहा था ! गाड़ी का मालिक बार बार उसे कह रहा था --- ' मेडम आप मुझे जानती नहीं है ,,इसलिए ये बत्तमीज़ी कर रही हैं ,,!  आज तक किसी ट्रेफिक इन्स्पेक्टर की हिम्मत नहीं हुई  जो वह हमारी गाड़ी का चालान काट देता  ! आप नयी हैं इसलिए मैं आपको माफ़ कर रहा हूँ ,,! "

   लड़की ने कहा , ... ' मुझे फर्क नहीं पड़ता की मैं नयी हूँ या पुरानी  " आपने अपनी गाड़ी पार्किंग लाइन के बाहर रोड पर खड़ी  है ,,नियम के अनुसार यह , अपराध है , और इस पर आपका यह चालान मेने काटा है   आप चाहें तो अभी भुगतान करदें या फिर कल हमारे दफ्तर में आकर भुगतान करदें ,,,!  यदि भुगतान नहीं किया तो हम आपकी गाड़ी सीज़ करवा  लेंगे   !"

   इस बीच कुछ तमाशाइयों की भीड़ वहां जुड़ने लगी !  कुछ संभ्रांत लोग भी आ गए !

   एकत्रित लोगों में कुछ लोग दांत निकालते हुए  गाड़ी मालिक की तरफदारी करने लगे ,,!  वे उस लड़की से बोले ,,
   
        "  हद हो गयी ,,! आप गाड़ी पर लगा पार्टी का झंडा नहीं देख रहीं ,,?   ये शहर के बड़े नेताजी की गाड़ी है ,,,कम से कम इसे तो बख्श दो ,, आज अगर पैसा उगाना ही है तो किसी और चौराहे पर खड़ी हो जाओ ,,,लगता है आपका टारगेट पूरा नहीं हुआ इसलिए आप अड़ गयीं हैं ! "

    लड़की की आवाज़ तल्ख़ हो गयी ,,,वह बोली ,," आप अपनी राय अपने पास रखो ,,!  यह सरकारी मामला है ,,,इसमें दखल डालने पर आप पर भी कार्यवाही हो जाएगी ,,समझे ,,! "

    राय देने वाला व्यक्ति कुछ कहता इससे पहले ही भीड़ को हटाता हुआ एक स्थूल शरीर का युवा नेता आगे आगया ,,,! उसने गाड़ी मालिक से पूछा -- " क्या हुआ भैया " ?

   गाड़ी मालिक ने  लापरवाही से उस पर निगाह डाली ,,,और बोला ,,"  अरे कुछ नहीं ,,,नयी नयी   नौकरी है ,,,वर्दी का रौब दिखा रही हमें ! "  वह स्थूल काय युवा उस लड़की की और मुखातिब हो कर कहने लगा ,,,___

      " मालुम नहीं की यह विधायकजी के भतीजे है ,,,मुन्ना बाबू ,,! पूरा शहर इन्हे जानता है  और आप इन्ही से पंगा ले रही हैं ,,, आप इन्हे जाने दीजिये ,,,इस पी साहब आपको इन्हे चालान देने पर कोई तमगा नहीं दे देंगे ,,बल्कि आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी  समझीं ,,"

   मुझे यह जान कर क्या करना है की कौन किसका रिश्तेदार है या कौन नहीं ,,! " ---- लड़की ने तल्खी से जबाब दिया ,,, आप सब खुद देख लें की यह गाड़ी साइड की पटरी पर बनी सफ़ेद पार्किंग लाइन के  बहुत बाहर रोड पर खड़ी है ,,,अभी बहुत सी गाड़ियों का रेला यहाँ फंस गया था जब ये गाड़ी लॉक करके शॉपिंग करने गए थे ,,"

     अब कुछ सभ्रांत लीग नहीं बीच में कूदने लगे ,,!  बोले ---- क्या विधायकों के रिश्तेदारों के लिए कोई अलग से ट्रेफिक नियम बने हैं ,,?? हम सबने भी तो अपनी गाड़ियां यहां पार्क की थी ,,लेकिन सब सफ़ेद लाइन के अंदर थी  ,,! "

  गाड़ी मालिक ने उन लोगों को घूर कर कहा --" आप लोग चुप रहें ज्यादा नेतागिरी ना करें ,,, पुलिस रोज शरीफ आदमियों को ट्रेफिक के नाम पर परेशान करती है ,,,लेकिन जब उन्हें अपने अफसर के लिए पैसे की जरुरत पड़ती है तो वे ' वसूली ' में उतर आते हैं ,,मैंने तो यही देखने के लिए जानबूझ कर गाड़ी रास्ते में खड़ी की है ,,देखें कौन मुझसे पैसा वसूलता है ,,? "!

   सभ्रांत लोगों में से एक बुजुर्ग ने आपत्ति की ,,,--" लेकिन आप सरेआम गाड़ी सड़क के बीच खड़ी किये हैं ,,,और फ़ालतू बातें कर रहे हैं ,,?   आपको चालान की राशि जमा करने में क्या आपत्ति है ,,?? "

    स्थूलकाय युवा नेता बोला ,,,--"ऐ ययय   चाचा ,,, अपने काम से काम रखो    अब यह इज्जत का सवाल है ,,,भैया जी आप गाड़ी चालु करो  ,,, आगे बढ़ाओ देखते हैं कौन रोकता है ,,??

     लड़की गाड़ी के सामने  जम  कर खड़ी हो गयी ! वह हिलने का नाम भी नहीं ले रही थी ! पता नहीं किस मोरल वेल्यू से प्रभावित हो कर उसके साथ के सिपाहियों ने भी डंडे सम्हाल लिए !

   तभी कार का शीशा  नीचे  हुआ  और  कार के अंदर बैठी  एक वृद्धा महिला ने झाँक कर  पूछा --" क्या बात है मुन्ना ,,,क्यों रार बढ़ा रहे हो ,,?? "

   गाड़ी  मालिक ने कार में बैठी मां को समझाते हुआ कहा। ."कुछ नहीं ,,,कार का  ऐo  सीo   चालु है ,,आप आराम से बैठो ,,थोड़ी देर में  चल रहे  हैं ,,! "

    स्थूल काय युवा नेता ने कहा ---' भैयाजी आपसे कहा ना आप कार में बैठ कर कार आगे बढ़ाओ ,,, आपको कोई नहीं  रोकेगा  !  मैं डी एस पी साहब को फोन करता हूँ !  "

    गाड़ी मालिक कार में बैठ गया ,,, लड़की कार के सामने अपने सिपाहियों के साथ खड़ी रही ,, गाड़ी मालिक ने कार को झटके के साथ,, बैक,, किया ,,लोग हट गए ,,,फिर गाड़ी मालिक ने कार को थोड़ा साइड करके  सफ़ेद लाइन के अंदर कर  दिया  ! दरवाज़ा खोल कर वह फिर बाहर आया और बोला ---" राजू,,,,अब  बुलाओ डी एस पी साहब को ,,इन्हे इनका आयना दिखा दूँ ,!

   ज्यादा देर नहीं लगी ,,,डी एस पी साहब की पीली बत्ती वाली गाड़ी वहां उपस्थित हो गई !  वर्दी वाली लड़की ने आगे बढ़ कर अपने अफसर को सेल्यूट किया  ,! अफसर ने गुर्राई आवाज़ में पूछा ,,--" क्या बात है इंपेक्टर प्रीती ' सड़क पर क्यों मज़मा लगाए खड़ी हो ,,??

    लड़की कुछ जबाब देती उससे पहले ही गाड़ी मालिक बोल उठा ,,__' नमस्कार डी एस पी साहब ,,!  ये आपने कैसे कैसे इंस्पेक्टरों को भर्ती करवा   लिया  डिपार्टमेंट में ,,??

    दी एस पी ने गाड़ी मालिक को देखा और  कूद कर बाहर आगया ,,, बोला ,," अरे  मुन्ना  जी ,,आपने फोन पर याद  किया था हमें क्या परेशानी हो गयी आप  को हुकुम करें ,,! "

    गाड़ी मालिक ने आँखे तरेरते हुए कहा ---  आप खुद देख  लें ,,मेरी गाड़ी पार्किंग लाइन के अंदर खड़ी है ,,,मेरी माताजी बीमार हैं ,, यहाँ कुछ शॉपिंग के लिए दवाइयां लेने आया तो आपकी इन  इन्स्पेक्टर साहिबा ने मेरे ही गाड़ी का चालान काट दिया ,,,,और पैसे मांगने लगीं ,,  अरे आप लोगों को कभी जरुरत हो तो हमें ही सीधे आदेश दे दिया करें ,,, ये चालान से वसूली का नाटक क्यों करते हैं ,,!
! "

   लड़की बिफर गयी  बोली --"  झूठ बोल रहे हैं ये सर ,,! ,,इन्होने अभी अभी यही गाड़ी बेक करके पार्किंग लाइन के अंदर की है ,,! "

    " भाई सत्यवादी हरिश्चंद्र तो पुलिस में ही होते है ,, सबूत सामने है ,,,गाड़ी कहाँ खड़ी है  दिख रही है  ,,,फिर भी अड़े बैठे हैं ,,, पैसे जो चाहिए इन्हे ,,! " ... गाड़ी मालिक का चमचा नेता राजू बोला ,,!!

  ,,,"  आप चाहें तो भीड़ में खड़े इन लोगों से पूछ लें ,,, ये बताएँगे आपको ,,! " --- लड़की ने प्रतिवाद किया ,,!
      डी एस पी ने  इन्स्पेक्टर को डांटते हुए कहा ,,," क्या मुझे नहीं दिख रहा की गाड़ी कहाँ खड़ी है ,,,जो और लोगों से पूछूं ,,? यह  नोटिस केंसिल करो , मुन्ना भैया को जाने दो ,," "

     अब लड़की जान की परवाह किये बिना अड़  गयी ,,,"  मेरे पास सबूत है सर ,,,ये देखिये ,,,मेरे मोबाइल में फोटो है ,,,गाड़ी इन्होने पहले जहाँ खड़ी थी वह साफ़ साफ़ दिख रहा है ,,! "

      ,,," अरे छोडो मोबाइल ,,,और फोटो ,,,अदालतें सबूत में गवाह मांगती हैं मिस प्रीती ,,बेकार की जिद ना करो  मुन्ना बाबू को जाने दो ,,! "

     इन्स्पेक्टर रुआंसी हो गयी ,,,बोली ,,,' सर,,,,! मेरे सिपाही ने वह वीडियो  भी  बनाया है जिसमें ये गाड़ी बेक  कर के गाड़ी को पार्किंग लाइन के अंदर कर रहे हैं ,,, ,,,पूरी भीड़ खड़ी है ,,! "

     '  कौन सी भीड़ ,,?? "--- राजू हंसने लगा ,,! ,,,वह भीड़ की और मुखातिब हो कर  बोला --- ' क्यों भाइयो  ,,?? आप लोग जाएंगे अदालत में गवाही देने ,,??
 
    पल भर में भीड़ खिसकने लगी ,.,,!   गाड़ी  मालिक विजेता की मुद्रा में प्रीती को देखने लगा ,,, बोला     "   डी एस पी साहब ,,,ऐसे अफसरों को पब्लिक ड्यूटी में क्यों लगाते हैं ,,,जिन्हे  समझने बुझने की तमीज नहीं ,,,वो तो में हूँ ,,कोई और होता तो इतनी देर में बलवा हो जाता ! "

   "  आप फ़िक्र ना करें मुन्ना भाई ,,,में प्रीती को पब्लिकडयुटी से हटा कर आफिस अटैच कर दूंगा ,,, आखिर हमारा भी तो फ़र्ज़ है ,,, पब्लिक के साथ ' ना इंसाफ़ी ' ना हो ,,! "


     प्रीती ने एक बार फिर कोशिश की ,,," लेकिन सर  ये फोटो , ये वीडियो झूठे नहीं है ,,,ये पूरा सबूत हैं ,,, इन्होने नियम तोड़े हैं ,,! "

    अब डी एस पी साहब का पारा चढ़ गया ,,,"  शट अप ,,,!! तुम हमीं से जबान लड़ा रही हो ,,, ? ये सबूत किस काम के ,,जब कोर्ट पूछेगा ,,,है कोई ' चश्मदीद गवाह " ,,??

,,,, तभी कार की खिड़की खुली ,,! कार में बैठी वृद्धा बाहर निकली ,,-- बोली --" हाँ में हूँ चश्मदीद गवाह
   मेरा बेटा झूठ बोल रहा है डी एस पी साहब ,,, इसने कार गलत खड़ी की थी ,,,और उस लड़की ने सही चालान काटा ,,! "

    महिला को देखते ही डी एस पी ने आदर से  महिला को प्रणाम किया ,,,,!   बोले ''' अरे आप इतनी देर से अंदर बैठी सब देख रहीं है भाभी जी  ,,,लेकिन चुपचाप बैठी रहीं ,," ,,!

   "  हाँ में सब देख रही थी सब सुन रही थी ,,,देख रही थी की मुन्ना कब तक अपनी औकात की धौंस दिखाता है ,,",,!

       गाड़ी मालिक अचकचा गया ,,,कुछ बोलने को हुआ की  वह वृद्धा फिर बोल उठी ,,, " तेरे पिता  फ्रीडम फाइटर थे ,,, उन्होंने  लाठियां   झेली  जेल गए ,,,लेकिन झूठ कभी नहीं बोले ,,,!  यही कारण है की उनके मरने के बाद उनके सबसे छोटे भाई को जनता ने उनकी साख पर विधायक बनाया !  आज तू उस विधायकी की धौंस उसे दिखा रहा है जो कानून की हिफाजत में लगी है ,,? लानत है तुम पर ,,,कोई नहीं देगा तो में दूंगी गवाही कोर्ट में बेटी ,,,तुम वह चालान इस कार पर चिपकाओ ,,,देखें कौन तुम्हे रोकता है ,,? "

    अब बचे खुचे लोगों में सन्नाटा खिच गया    जैसे  सब को सांप सूंघ   गया  हो ,,!

    गाड़ी  मालिक   पर  तो जैसे घड़ों पानी फिर गया था !    उसने चुपचाप बटुआ खोला चालान के पांच सोउ रूपये निकाले    और सर झुका कर बोला ,,"" आय एम् सारी  प्रीतीजी ,,!  आप यह रसीद काटें ,,,अब इसके बाद ऐसे गलती में कभी नहीं करूंगा ,,!!


,,,,,,, सभाजीत शर्मा
 i


गुरुवार, 7 सितंबर 2017



कमर भर पानी में ,
खडे होकर ,
अपलक ताकते हुए .. आसमान में .,

एक अंजुली पानी .
.फेंका था ..,
तुम्हारी तरफ ...,
जो वापिस आ गिरा 
मेरे ही मुह पर ... ,
शायद तुम प्यासे नही थे ,
प्यासा था ...मै ही ..!

हाँ ...प्यासा था मैँ ...,
साल के पन्द्रह दिनो में .,
तुम्हे याद करने के लिये ..,
इन पन्द्रह दिनो में ही तो ..,
एक दिन तुम्हारा था ..,
जन्म का नही .,
तुम्हारी मृत्यु का ...,
उस विदा का .दिन ,
जब तुम चले गए थे ,
सदा के लिये ...!!

य़ाद आने को तो ,
कई बातें थीं ...,
तुम्हारी ऑर मां की ..,
वो मां का कंघी काढ देना ..,
मोजे पहनाना ..,
और तुम्हारा ..
सायकिल में लगी छोटी सीट पर मुझे बैठा कर ,
बाजार ले जाना ..,!
अपना पेट काट कर ,
मुझे पढाना ..,
ऑर मेरे अफसर बनने पर ,
गर्व से मुझे निहारना ..!!

लेकिन पन्द्रह दिन तो ,
यूँ ही गुज़र गये ...,
इधर उधर पानी देते ,
कोवों को बुलाते ..,
पंडित को खिलाते ..,
ना तुम याद आये ना तुम्हारी य़ादें ..!

एक दिन ,तुम्हारे ..,टूटे बक्से में .
दिख गये ...तुम ऑर मां ,...एकसाथ ..!
जब एक पैन ..ओर पुराना टिफिंन ..
एक कोने में धन्से हुए , टकरा गये मेरी ऊँगलियो से ..,
ना जाने क्यू ..
सहसा ..बिलख गयीं ..मेरी आँखे ..,
फफ़क कर रो पडा मैं ..,
वह पानी ,
धार बन कर बह गया , आँखो से ..,
अविरल रुका ही नही ,
ज़िसे मैने फेंका था ...अंजुली भर ..,
नदी में धन्स कर .., 
मेरे होठों को कर गया ..तर ., 
आकंठ की 
लगा अब कोई प्यासा नही ..रहा ..,
ना तुम ..,
ना मैं .. !!



sabhajeet 


शनिवार, 17 जून 2017


पिता ,,,!
 
   तुम्हे याद करता,,,, गर भूल जाता  जब ,,!
 लेकिन तुम्हे भूला ही कब ,,??

मेरे बेटे ने ,
मुझसे बहस की ,,,बराबर हो कर ,
तो मुझे लगा ,,,
 जैसे में खड़ा हूँ ,,,बेटा बन कर ,
और तुम खड़े हो मुझमें  समाये .!
वही धैर्य ,  वही  समझ , वही चुप्पी ,
लगा जैसे गुजरे दिन  फिर लौट आये ,,!

 पत्नी ने   ,
  बेटे  की हिमायती में ,
 बदलते वक्त के तकाजे ,
 जब मुझे समझाए ,
तो लगा ,,,की तुम ही सुन रहे थे ,जैसे ,माँ से ,
 ,
 दुनियादारी की  घिसी पिटी  बातें ,,
देख रहे थे ,,,चुचाप ,,,
  वे गुजरे लम्हे ,
 जो अपनों के लिए ,
 तुमने गवाएं  ,,!

 पोते का मुंह  देख कर ,
 जब तुम्हारे नयन ,, खुशी की बूंदों से छलछलाये ,
वही खुशी के आंसू मेरी भी आँखों में ,
पीढ़ी के आगे बढ़ जाने पर ,
उमड़ आये ,,!
वो संस्कारों की गठरी ,
 जो तुमने अपने पूर्वजों से ले कर ,
 नवागतों को  सौंपी थी , ,,
 वही कर्तव्य मैंने भी दोहराये ,,!

कदम कदम पर जब ,
 तुम मुझसे छूटे ही नहीं ,
तो अब डरता हूँ ,,,की
 कैसे तुम मोक्ष पाए ,,?
जीवंत रहे हर जगह , मुझमें ही ,
तो कहाँ विसर्जित हो पाए ,,??

,,,,,सभाजीत

शुक्रवार, 17 जून 2016


    "  सावित्री " -' सत्यवान '  और ' यम ' ,,



  ' सत्यवान  ' के प्राण हरण करके ,,,,' यम '  गहन अंधकार के उस मार्ग पर चल पड़े जहाँ कुछ भी दृश्य नहीं था ! यह वह मार्ग था जहां पर सिर्फ अंधकार था ,,,अनन्त अन्धकार ,,,और प्रकाश   का प्रवेश जहाँ वर्जित था! वे सदैव की  भाँति  आश्वस्त थे  कि  उनके इस एकाकी मार्ग पर सिवा उनके कोई और  यात्रा नहीं कर सकता!   तभी उन्हें लगा ,,, कि  आज कुछ असम्भव सा होने वाला है !  उन्होंने  चारो और देखा , फिर पीछे मुड़े तो उन्हें एक ' साया ' अपने साथ साथ चलता प्रतीत हुआ !
 उन्होंने पूछा --" कौन ' ,,,?
  किंचित हास्य भरे स्वर में एक स्त्री कंठ उन्हें सुनाई दिया ---' 'सब कुछ   जानने  वाले , अंधकार में भी  चलने वाले देव ,,,क्या आप को नहीं मालुम की आप के पीछे कौन है ,,??
  यम की छठी इंद्री जाग्रत हुई !
 उन्होंने भी हास्य भरे स्वर में उत्तर दिया ,,, ' जानता हु ,,, किन्तु पहचानना नहीं चाहता !  तुम ' अश्वपति ' की पुत्री  ' सावित्री ' हो ! "
  ' आप  मेरे पिता को  पहचानते  हैं किन्तु मुझे नहीं ,,,ऐसा क्यों देव ,,?? "
  यम  गम्भीर हो उठे ,बोले ---  ," इसलिए , क्यूंकि ,,, ' अश्वपति '  एक तपस्वी है ,,, वह राजा के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुआ ,,,और  ' अश्व ' रूपी अपनी सभी इंद्रियों की रास को अपने ' बस ' में रखने में समर्थ है !  ' तपस्या ' एक साधना है ,,,और जो इसमें सफल होता है , 'यम ' की निगाहों में वह हमेशा आदर का पात्र होता है !'
  --- तो आप जैसे ' समर्थ देव को मुझे पहचानने में  शंका क्यों ,,??
 यम इस बार जोर से हँसे ,,,__ " तुम्हे ना पहचानू यह कैसे संभव है ,,? तुम,, '  सविता ' हो ,,, भले ही तुम्हे लोग ' सावित्री ' कह कर बुलाते हैं ,,,किन्तु मैं अपनी परम शक्ति  ' अंधकार '  की एक मात्र ' शत्रु  '   सविता को ना  पहचानूँ ,,,,?,, यह संभव नहीं ,,, तुम्हारा उदय किस क्षण हो जाएगा ,,,और तुम कब मेरे इस अंधकार के साम्राज्य को छिन्न भिन्न कर दोगी ,,, उस क्षण को पहचानना कठिन है !,  इसलिए में जान कर भी तुम्हे पहचानना नहीं चाहता !  "
 अब सावित्री भी मुखरित हो गयी  !  वह बोली --' देव  आप सूर्य ' को तो पहचानते ही हैं ना ,,? '
--- हाँ सूर्य को पहचानता हूँ ,,,जैसे अंधकार  एक ' सत्य ' है उसी प्रकार  प्रकाश ' भी ,,,और वह सूर्य का ही रूप है !   "
   --  तो '  देव ' ,,, मैं इन दोनों सत्य के बीच की  वह बिंदु  हूँ   , जहाँ से ' सत्य अपना स्वरूप बदलता है !,,,, क्या में  अंधकार और प्रकाश की तरह ,  उसी कोख से उत्पन्न हुई वह  शक्ति नहीं हूँ  जो ' सत्य ' के स्वरूप को एक क्षण में  बदल देती है  ,? "
  यम थोड़ा  थम  गए ! उन्होंने कहा ---" यह बात में जानता हूँ ,,,इसलिए इस गहन अंधकार में भी  तुम्हे  मेरे पथ का अनुसरण करते देख मुझे आश्चर्य नहीं हुआ !  तथापि अब मेरा अनुसरण छोड़ दो ,,,क्यूंकि मैं इस अंधकार में ही विलीन हो जाऊंगा ,,,,जबकि  तुम्हारा ' विलीन ' होना संभव नहीं ! "
  सावित्री हंसी !   बोली ---' आप सहर्ष विलीन हो देव ,,!  किन्तु उस ' सत्य ' के साथ नहीं  जो कभी विलीन नहीं होता ! "
    ---' किस सत्य के साथ ? "  यम  थोड़ा  हिचकिचाए  !
   --- उस सत्य के साथ जो आपकी मुट्ठी में कैद है ,,और जिसे आप सदा के लिए अंधकार में  अपने साथ विलीन कर देना चाहते हैं !"
----" मेरे मुट्ठी में तो ' सत्यवान ' के प्राण है ,,, और जिसने जन्म लिया उसे समाप्त होना ही है  यह तो नियति है सावित्री ! "
       ----' देव "   यदि सत्य को धारण करने वाला , सत्य को संचालित रखने वाला , भी अन्धकार में सदा के लिए विलीन हो जाएगा ,,,तो सत्य  किस तरह इस मृत्यु लोक में प्रदर्शित होगा ,,??
    यम अब ठिठक कर खड़े हो गए !    वे बोले--- ' सत्यवान ' अमर नहीं हो सकता सावित्री !"
'----'क्या आपका यह परम सेवक,' अंधकार ' अमर है देव ,,?  क्या 'प्रकाश भी अमर है देव ,,,"  क्या ये नित जन्मते और मरते नहीं ,,?? " सावित्री ने पूछा !
     यम समझ गए थे की वह सावित्री के वाक् चातुर्य में उलझ गए हैं ,,! सबसे बड़ी चिंता उन्हें यह होने लगी की अंधकार  के क्षीण होने का   समय भी निकट आ रहा था ,,,,और तब ' सावित्री ' किसी भी क्षण अंधकार को  प्रकाश  में बदल देने वाली थी ! अंधकार की समाप्ति का अर्थ था उनकी यात्रा में ' अवरोध ' !

   वे बोले ,,,-- तुम चाहती क्या हो  ? अपना अभिप्राय स्पष्ट करो ,,! "
    सावित्री बोली----- ' अमर तो कुछ भी नहीं देव ,,!     जन्म के बाद मृत्यु  और मृत्यु के बाद जन्म एक शास्वत सत्य है !    यही एक ऐसा सत्य है जिसकी निरंतरता बनी ही रहनी चाहिए ,,!  किन्तु देव ,,, जब ' सत्य ' को धारण करने वाले ' सत्यवान ' को ही आप अंधकार में विलीन कर देंगे तो जन्म मृत्यु के इस चक्र का ओचित्य भी क्या  बचेगा ??,,,    सत्य सिर्फ एक शक्ति है ,   किन्तु इसे धारण करने वाला ' शिव ' भी चाहिए !  भले ही निरंतरता बनाये रखने के लिए जन्म मरण हो ,,,किन्तु '  सत्यवान  ' को एक अवसर भी तो मिलना चाहिए की वह अपने सत्य को दूसरे उत्तराधिकारी  को थमा कर जाए ,,!  और मैं यही कहना  चाहती हूँ की सत्यवान ने अपना वह ' कर्म ' अभी पूर्ण  नहीं किया है ,,,,इसलिए अभी आप उसे अपने साथ ले कर नहीं जा सकते ! "

    यम ने दूर नज़रें फैलाई तो पाया की अंधकार क्षीण होने लगा था ,,! सावित्री की आभा बढ़ रही  थी ,,,, अब अंधकार में यात्रा संभव नहीं थी !    उन्होंने पुनः सोचा  और निश्चित किया की "  सत्यवान ' को उन्हें लौटा देना चाहिए ,,, जब तक वह अपना कर्म पूरा ना करे ,,,और सत्य को धारण करने वाला अन्य व्यक्ति पैदा ना कर ले उसे मृत्यु देना उचित नहीं !  रह गयी ' समय ' चक्र की बात तो वह तो चलायमान है ,,,स्थिर नहीं की पुनः लौट कर ना आये ,,!

     यम  ने मुस्करा कर कहा --- ' शब्द ' भी एक ' शक्ति ' है सावित्री ,,,, यह समय को बाँध  सकती  हैं ,,, विचारने को विवश कर  सकती  हैं ,,,शब्द ,,  जय पराजय के प्रतीक हैं !  तुमने जिस शब्द शक्ति के प्रयोग से ' सत्य ' की व्याख्या ' की वह स्तुत्य है !  मैं तुम्हारे लिए ' सत्यवान ' को छोड़ रहा हूँ ,,, किन्तु इसे   निरंतरता देना तुम्हारा कर्तव्य है !   जाओ तुम वापिस लौट कर अपने उस ' सत्यवान  ' से मिलो जिसकी अभी   उस मिथ्या जगत में  जरुरत ,,शेष है " ,,! "
 यह कह कर यम अंधकार में विलीन हो गए !
  प्रकाश की वह ' आभा ' फूट पडी थी ,,, जिसे लोग " पौ फटना ' कहते हैं !


---------"  सभाजीत शर्मा ' सौरभ '

शनिवार, 7 मई 2016

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इधर कुछ दिनो से , कई मित्रों के ब्लॉग मे , प्यार को लेकर कई किस्से लिखे जा रहें हैं !प्यार क़ी कथाओं का अंबार लगा है !बुक में फेस है  , फेस पर पूरी बुक है , वाट्सअप  पर मेसेज हैं ,मेसेज में बूझो तो प्यार  है ,,,   प्यार पर कविता है , कविता में प्यार है ,,  और प्यार क़ी परिभाषाएं भी अपरम्पार हैं ,,! !

ऐसे  मे मेरे टुटपूंजिया विचार वाले ब्लॉग पर जब कोई टिप्पणी मुझे नही मिली तो मेरे  दिल ने कहा,-

 ' यार !! तुम भी तो सोचो ,कुछ  लिखो , लोगों को बताओ की प्यार क्या है ,,!  क्या तुमने कभी प्यार किया ?या फिर तुम्हे भी कभी प्यार हुआ ?'

दिल के उकसाने पर जब  मेने यादों क़ी पिटारी  खोली तो प्यार का एक  वाक़या , जो आक्सीजन लेने के लिए कई सालों से दिल की कोठरियों में , आजीवन सज़ा भोगता ,  अंदर छ्टपटा रहा था, उछल कर बाहर आ गया !उसे देखते ही मेने कहा ;- ' हाँ शायद यही है वह सब कुछ , जिसकी मुझे  जरुरतहै  क्योंकि मैं उसकी पहरेदारी करते करते   चुक  चुका था ,,और वह भी अँधेरे में पड़े पड़े मरणासन्न हालत में पहुँच चुका था ! इसलिए अब उसके आज़ाद होने  न होने  से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था !

  
 आज से  करीब ४० साल पहले ,,,सन 1974 मे ,  शायद में चौबीस वर्ष का  रहा होऊंगा ! यह   उम्र प्यार के लिए बिलकुल मुफीद थी ,,क्योंकि तब मैं  जवान था !,,कहते हैं ,, ,,, प्यार के लिए जवानी  उतनी ही जरूरी  होती है , जितनी क़ी बिजली को बहने के लिए तार क़ी ! बिजली को अगर बहने के लिए तार चाहिए तो जवानी को ठहरने के लिए प्यार चाहिए !
उस वक्त़ , प्यार करने के लिए मुझमे पर्याप्त गुण मौजूद थे , जैसे क़ी में गिटार बजाता था, कविता लिखता था,गीत गाता था, और चश्मा लगाता था !
चश्मा लगाना उस समय का एक उच्चस्तरीय गुण था क्योंकि फ़िल्मो मे हीरोइने या तो चश्मा लगाने वाले अमिताभ , जितेन्द्र, जैसे जीनियस हीरो पर मरती थी या फिर अमोल पालेकर जैसे किसी निरे बुद्धू किरदार  पर.!
खैर !!..
,,,, मैं  जीनियस दिखने क़ी कोशिश करता था, और यह अंदाज़ लगाने क़ी कोशिश करता रहता था कि जीनियस दिखने के कारण ,  कितनी युवा लड़कियाँ मुझे आँखों क़ी कोर से निहार रही है ! .,उस समय शर्म और प्यार का कॉकटेल चलता था,,,,  नीट  प्यार नही चलता था,,इसलिए यह जांनना बड़ा मुश्किल था की कोई मुझे प्यार कर रहा है या नहीं ,,! फिल्मों में  भी उस समय  तक ,,सीधे सीधे ,," आई लव यूं  " का डायलॉग पैदा  नहीं हुआ  था !
!एक दिन मेरे एक विभागीय मित्र ने मुझे फिल्म दिखाने को कहा ! मैंने  उसकी बात मान ली ! क्यौकि वह मेरा मित्र ही नही, मेरा हम उम्र और मेरा  गहन प्रशंसक था ! इतना गहन प्रशंसक  कि  अगर  वह कोई लड़की होता तो   मैं शायद  उसके प्यार मे फँस कर उसी से विवाह कर लेता !
उस छोटे से शहर मे बालकनी से फिल्म देखने वालों कि संख्या बहुत थी !इसलिए हमे बालकनी में सबसे पीछे की कतार का टिकट नहीं मिला  बल्कि  बीच क़ी कतार का टिकिट मिला !टिकिट ले कर हम दोनो टाकीज़ मे घुस कर अपनी सीट पर बैठ गए !
थोड़ी देर मे सभी सीटें भर गयी, और स्क्रीन के पीछे  लगा स्पीकर उस समय के  हिट गाने बजाने लगा ! बैठने के बाद ,  आदतन मेने अपने चारों ओर निगाहें घुमाई - कैसे कैसे लोग,और कैसी कैसी युवा लड़कियाँ कहाँ कहाँ बैठी है,, ज़रा देख तो लूँ  ,,!! !
देखा तो मेरे आगे क़ी दो कतार छोड़ कर  , तीसरी कतार से एक सुंदर आकृति , घूम कर मेरी ओर देख रही थी !मुझे खुद  क़ी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई और उसने  तुरंत अपना मुँह वापिस मोड़ लिया  !

बला का सौंदर्य था !-
गोरा रंग,सुंदर नाकनक्श,  बड़ी बड़ी  आँखें , सुराहीदार गर्दन पर बल खाती लंबी चोटी , और गुलाबी होंठ ,, ,!! क्या मादक स्वरूप था ,,!!  में हतप्रभ रह गया !
स्क्रीन पर तो सुंदर हीरोइन दिखने मे अभी देर थी ! लकिन यह हीरोइन तो टाकीज़ मे ही विद्यमान थी  और ,, ठीक मेरी पंक्ति के एक पंक्ति के आगे ,,!!
तभी उस मूर्ति ने फिर पीछे मूड कर देखा !- उसके पतले गुलाबी होंठ प्यार क़ी मुद्रा मे हँसे, और फिर फैल गए , छिपे हुए दाँतों क़ी धवल पंक्ति भी अपनी छटा बिखेर गई !

मुझे देख कर उसने फिर अपनी गर्दन वापिस मोड़ ली !
यह घटना फिर से घटती, इस से पहले ही अंधेरा हो गया और स्क्रीन " फिल्म डिवीज़न क़ी ब्लेक एन्ड व्हाइट  करतूतों की  भेंट" चढ़ गई ! थोड़ी ही देर में मूल फिल्म  भी चालू हो गयी !
मेरा मन अब स्क्रीन पर बिल्कुल नही लग रहा था !मेरा मित्र मुझे फिल्म के सोन्दर्य पक्ष के बारे मे बताने लगा !मसलन- फिल्माया गया  द्रश्य कितना सुंदर है, हीरोइन कितनी भोली है हीरा उसे कैसे चाहता है वग़ैरह.वगैरह ! लकिन मे तो अपनी सीट के आगे क़ी तीसरी कतार मे नज़र गडाने लगा - ! ना जाने कब वह सुराहीदार गर्दन मुड़े और और फिर मुझे देख ले और कहीं  मैं उसकी नज़रों के तीर से वंचित न  हो जाऊं ! !
और तभी ,, फिर मेरी आरज़ू पूरी हुई ! जैसे ही स्क्रीन पर रोमांटिक गीत शुरू हुआ , फिल्म के हीरो,, हीरोइन  ने  घास पर लोटें , लगानी शुरू कीं ,,  हीरो ने अपना मुँह हीरोइन के मुँह के पास ले जाकार गाना  गाना शुरू किया  , तभी वह गर्दन फिर पलटी!
इस बार उन आँखों मे रोमांस का नशा था !मेरी ओर देख कर वह फिर उसी अदा से मुस्करा कर ,  वापिस पलट गई ! मेरा दिलतो बल्लियों   उछलने  लगा !

 मन में एक मीठी सी गुदगुदी उठने लगी --
- " हे भगवान !! यह कौन है जो मुझ मे इतनी दिलचस्पी ले रही है ??
    इतनी सुंदर कन्या के लिए तो मे सभी गुणों से पूर्ण होने पर भी खुद को उसके योग्य नही समझता था !
    

 नशे के घूँट  पीता  हुआ बेसुध सा मैं  फिल्म मे क्या हुआ कैसे हुआ   कुछ  नही देख पाया !सिर्फ़ सम्मोहित सा टकटकी लगाए , अंधेरे मे आगे क़ी तीसरी पंक्ति की   सीट पर आँखे गड़ाए बैठा  रहा !
तभी इंटरवल हुआ , और हॉल रोशनी से जगमगा उठा !
लकिन इस बार उस लड़की ने पीछे  मुड़कर नही देखा !
मेरे दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे हिलाया और कहा - " चलो सौरभ चाय पिलाओ !"
में अनमने भाव से उठ गया !  चाय के स्टाल पर कुछ  और दोस्त मिले -सभी ने कमेंट किए _ क्या शानदार फिल्म है !! ,तुम्हे कैसी लगी सौरभ ?
 मैं  चुप रहा !,,,,,मुझे जो शानदार दिखा था ,उसके आगे फिल्म  देखने का कोई अर्थ न था ! मुझे जो दिख गया था उसे मैं  भूल नही पा रहा था !
बाहर  निकल कर ,,लाबी मे आकर मेरे मित्र ने  पूछा --
-"क्या बात है यार ? खोए खोए से क्यो हो ? क्या सेंटिमेंटल हो गए हो ?"
मेने कहा - " नही यार !!"
-"तो कुछ तो  है ही ,,,, बतलाओ !!"- मेरा दोस्त मेरे पीछे ही पड़ गया !
मेने सोचा - फिल्मों मे हीरो के प्यार का राज़दार उसकाअपना प्यारा  दोस्त ही तो होता है ! तो क्यों ना मे अपने इस दोस्त को अपना राज़दार बना लू ?
मेने उसे बताया _ "यार ! टाकीज़ मे मेरे सीट के आगे बैठी एक लड़की मुझे मुड़   मुड़  कर,, बार बार देख रही है !मैंने पहले उसे कभी नहीं देखा ,,मुझे समझ में नहीं आ रहा है की वह ऐसा क्यों कर रही है ,,!
दोस्त मुस्कराया ,! फिर रुक कर  धीरे से  बोला -"  यह प्यार का मामला है - 'भाई ! तुम प्यार को पहचान नही रहे हो ! "
-" लकिन मेने तो उसे पहले कभी देखा ही नही !"-
-"  तुमने उसे भले ही ना देखा हो ,पर उसने तुम्हे पहले ज़रूर देखा है ! हो सकता है - कभी तुम गिटार बजा रहे हो और वह श्रोताओं मे बैठी रही हो ! या फिर तुम कविता पढ़  रहे हो और वह प्रशंसकों  में बैठी हो ,, ..तब,..या फिर.कभी तुम ,,,,,,,,!.""
-" बस बस रहने दो भाई !!,,, मैं इतना जानता हूँ की मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा ,, अब  चलो जल्दी अंदर चलो मे तुम्हें उसको दिखाता हूँ !"
में उसका हाथ पकड़ कर वापिस हाल मे आया  !

लकिन मेरी किस्मत !!- उसी समय हाल मे फिर अंधेरा हो गया !
अपनी सीट पर जाकर हम लोग बैठ गये ! मेरे दिल मे थोड़ी थोड़ी गुदगुदी होने लगी! मेने तब तक प्यार सिर्फ़ फिल्मों मे ही देखा था !लकिन ना तो प्यार किया था और ना ही मुझे प्यार हुआ था ! लेकिन आज  यह घटना तो जैसे  मुझे प्यार के पोखरे मे डुबोने जा रही  थी!
यह कैसे मुझे जानती है ..?क्या वाकई मेरे किसी गुण से प्रभावित है ..?क्या वाकई मुझ से प्यार करना चाहती है ..? या इसे  मेरी सूरत शक्ल  भा गयी ,,?   मे धीरे धीरेपोखरे में  डूबने लगा !
तभी मेरे दोस्त ने मेरा हाथ दबाया ! मेने चौंक कर उसे देखा तो उसने अंधेरे मे मुझे इशारा किया - -,
सामने क़ी सीट क़ी गर्दन फिर  मुड़ी  हुई थी !लकिन जब तक मे उसे देखता वह फिर सीधी हो गई !
फिल्म का समय जल्दी ही ख़तम हो गया ' दी एंड ' के पहले ही  अपने अपने परिवारके साथ आये सभ्य लोग उठ कर दरवाजे क़ी ओर बढ़ लिए !जल्दी ही दरवाजे पर भीड़ जमा हो गयी !इस धक्कामुक्की में हम लोग पीछे हो गए !
  मैं धक्का खाते हुए दरवाजे से  जल्दी बाहर निकलने क़ी कोशिश करने लगा - ताकि बाहर निकल कर उस सुंदर कन्या को पूरी तरह ठीक से देख तो  सकूँ !
लकिन ऐसा नही हुआ !

  भीड़ ने मुझे बहुत पीछे  धकेल दिया था  !

-ज्यों त्यों बाहर आकर ,  मित्र का हाथ पकड़ कर मे जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरने को हुआ तो देखा  कि वह कन्या पूरी सीढ़िया उतर कर मुझ से काफ़ी आगे निकल गई है !
 भीड़ मे जगह बना कर मैं  तेज़ी से नीचे उतरा ! लकिन तब तक वह कन्या बाहर लान मे पहुँच गई - और एक लेंब्रेटा स्कूटर पर उचक कर बैठ गई !
मुझे  कुछ  दिखा नही तो मेने उस लेंब्रेटा का नंबर नोट कर लिया !
 नंबर प्लेट यद्यपि बरसात मे पानी खाकर धुंधली  हो गई थी , फिर भी मेने उसका नंबर हथेली पर लिख लिया
- एल ओ वी 22 16... !
  मुझे तसल्ली हुई ,,,कम से कम अब मुझे उस कन्या के बारे मे एक सूत्र मिल गया था ,,,,लॅंब्रेटा का नंबर..!
तभी मेरा दोस्त आ गया !  बोला --
- " क्या हुआ यार !! तुमने उसे देखा..?"
-" नही यार !! नही देख पाया ! लकिन वह लंबी , छहररे बदन क़ी सुंदर लड़की है !! बाकी उसकी अदाएं तो देख ही चुका हूँ !"
दोस्त फिर मुस्कराया , बोला- "मेने काफ़ी कुछ  देख लिया  - यार! वो  मेरी भाभी बनने लायक है !"

" भाभी ??" - मैं  चौंका !

- " हाँ भाभी !! यानी तुम्हारी पत्नी !" -- अब दोस्त भी शरारत से मुस्कराने लगा !

मेरी बची खुची बुद्धि भी ख़तम हो गई !!,,,,मेने कहा -
" लकिन मे तो उसे  जानता  ही नही "
दोस्त बोला -" अब हम उसे जान लेंगे ! लेंब्रेटा का नंबर है  न हमारे पास !"
मेने गिरते पड़ते अपनी मोटर साइकिल क़ी ओर कदम बढ़ाए !! दोस्त को घर ड्राप  कर  के मैं  जब अपने घर पहुँचा  तो देर रात तक पहले तो नींद नही आई,!

और जब आई तो स्वप्न मे मुझे कई लेंब्रेटा दिखे !
   

*********                                     
                                       ..............
दूसरे दिन मेरे प्यारे दोस्त क़ी मेहरबानी से , यह खबर बिजली क़ी तरह मेरेअन्य  दोस्तों के बीच फैल गई !

किसी को विश्वाश ही नही हुआ , कि में प्यार भी  कर सकता हूँ - अथवा  मुझे प्यार हुआ  होगा ! क्योंकि प्यार के प्रयोगात्मक कार्य मेने कभी किये ही  नही  थे !

  जबकि मेरे मित्रों मे सभी तरह  लोग थे !

सिविल कांट्रेक्टर, लेखक, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, गीतकार , संगीतकार वग़ैरह वग़ैरह..,!

मुझ से मिलने पर वे सब  पूछने लगे -

" मिला लेंब्रेटा का पता ..?"
  लेकिन  में क्या जबाब देता ..??

मेरे एक मित्र जो इरिगेशन विभाग मे इंजीनियर थे , प्यार मे बहुत एक्सपर्ट थे ! उन्होने कई बार प्यार किया था !और प्यार के सभी लटकों झटकों से परिचित थे!उनके लिए प्यार तो जैसे कबड्डी थी !
एक और मित्र जो साउथ इंडियन थे , उन्होने प्यार करके एक बंगाली लड़की को अपनी पत्नी बनाया था , अपनी पत्नी के अलावा वे  मुझे  भी बहुत चाहते थे !उन्हें मुझ पर बहुत तरस आता था की मैं इस मामले में कितना नादाँ हूँ !!
एक तीसरे मित्र एक कालेज के  प्रोफ़ेसर थे !उन्होने एक डिप्टी कलेक्टर की बेटी के प्यार मे डूबकर , घर से भागकर आर्य समाज मंदिर मे विवाह किया था ! फिर वे एक महीने गायब रहे थे ,,क्योंकि उनके भावी ससुर ने पुलिस पीछे लगा दी थी ! बाद में बेटी ने ही मामला सुलटाया !
ये सब मुझे प्यार से ग्रसित  मानकर , मेरी मुफ़्त सेवा के लिए तत्पर हो गए !

 और दुसरे दिन ही  ग्रुप बना कर , सब लोग एक साथ मेरे घर आ धमके !
बोले -

" हम आज ही से शुरू करेंगे अभियान..!"

"कैसा अभियान ? "- मैंने  सकपका कर पूछा !

मेरे अभिन्न मित्र ने , जो टाकीज़ मे मेरे साथ था ,  मुस्कराकर  कहा -
" देवी सीता को  ढूंढने  का अभियान "

सभी लोग एक बार ज़ोर से हँसे !फिर मेरी ओर शरारत भरी निगाह उठा कर बोले-
" अपनी भाभी को तलाशने का अभियान !"

 लेकिन मैं  न हंस सका , न गंभीर हो सका!
 और उधर  ,,दिल था की मान ही नही रहा था कि वह लड़की मुझे नही चाहती होगी,
  ,,, उसका टाकीज़ मे मुड़कर देखना और मुसकराना मुझे बार बार याद आ जाता था !
  फिर भी अपने मन को दबाकर मैं  मौन ही रहा !-क्योंकि एक " भाभी " 'शब्द मेरे दिल मे गुदगुदी करने लगा था !

मेने कहा-

" लकिन कैसे ? में तो उसे जानता ही नही, कभी भी पहले उसे नही देखा ! सिर्फ़ एक स्कूटर का नंबर  है मेरे पास !"

वे  हँसते हुए बोले -- -
" वही तो है जादुई चाबी !, अब देखो हम क्या करते है!"

मेरे इंजीनियर मित्र अपने साथ एक परिचित' मेकेनेक ' को लाए थे !

उन्होने उसे नंबर देते हुए कहा-

" शहर के  हर मेकेनेक की  दुकान को छान मारो  !यह स्कूटर कहाँ सुधरता है , शाम तक पता लगा कर बताओ 

 !"
मेकेनेक ने नंबर को कई बार देखा- पढ़ा, शारलक होम्स कि तरह उसकी चतुर आँखे फैली और सिकुड़ी, लकिन उन मे चमक नही आई !

सब लोग समझ गए , वह इस नंबर के बारे में ज़्यादा कुछ नही जानता !

वह बोला -

"में राजदूत मोटर साइकिल बनाता हूँ ! लेंब्रेटा स्कूटर आजकल बहुत कम रह गए हैं - फिर भी में दो घंटे मे आकर आपको बताता हूँ !"

जब वह मुड़कर वापिस चला गया तो दोस्तो क़ी चौकड़ी फिर सक्रिय हुई !

प्रोफ़ेसर मित्र , जो इंग्लिश लिट्रेचर के प्रोफ़ेसर थे, ने पूछा -
कुछ अंदाज़ करो , वह कन्या तुम्हारे किस गुण से प्रभावित हुई होगी ?- जैसे कविता से, या गायन से या...,या तुम्हारे इस जीनियस रूप से ?..

मुझे अपने अपने ढेर सारे गुणों से चिढ़ होने लगी ! पता नही उसे क्या अच्च्छा लगा होगा ?

मुझ से तो अच्छे मेरे ये मित्र गण थे जिनके पास सिर्फ़ एक ही गुण था - ' लड़की को मोहित करने का गुण !'

मोहित करने के लिए प्रोफ़ेसर मित्र ने रोमांटिक नॉविलों का सहारा लिया था !
 साउथ इंडियन  मित्र  ने जोक्स का !
    और  इंजीनियर मित्र ने सुहाने गीतों के केसेट देकर लड़की का दिल जीता था !

सभी एक ही गुण के धनी थे !

 लड़की पटाने के ,,,!!

में ने कहा- " में क्या जानू वह मेरे किस गुण को चाहती है ?"

 साउथ इंडियन मित्र की   बंगाली पत्नी भी साथ आई थी !वह बोली -
-

"बाबा ! क्या तुम रोमांटिक कविता लिखते हो ?"

मेने कहा- " नही"

तो फिर रोमांटिक गाने ज़ोर ज़ोर से गाते हो ?

मेने कहा -
" नही भाभी ! मुझे जो अच्छा लगता है , उसे ही मैं गाता बजाता ,- लिखता पढ़ता हूँ ! मैं   तो कलाकार हूँ ,,  सिर्फ कला से  रोमांस करता हूँ !"

-"लड़की को लड़के कि कौन सी चीज़ अच्छी लग जाए ,ये तुम लोग नही जान सकते ! बासु  ने तो मुझे एक बार अपने हाथों से खाना बना कर खिलाया ,  और  मैं  इन पर मर मिटी ! क्या शानदार मच्हली बनाता है बासु  !"
सब हंस पड़े !

 लेकिन मैं चिंतित हो उठा ,,,घबराने लगा !
 ना जाने किस बात पर रींझ कर वह कन्या मुझसे प्यार कर रही होगी  ! जिस गुण  को वह मुझमें सोच रही होगी और वह उसे नहीं मिला तो आगे क्या होगा ,,? - बहुत ही भयानक बात थी !लड़कियां धोखा खाने पर भी  बहुत खतरनाक सिद्ध होतीं हैं ,,यह मैंने कुछ उपन्यासों में  पढ़ रखा था !  ,,  मैं सोच ही रहा था 
कि  तभी वह मेकेनेक विजेता कि तरह लौट कर वापिसलौट  आया!,,,आते ही बोला -

-"भाई जी ! वह स्कूटर" डी एफ ओ द्विवेदी 'का है ! बहुत बिगड़ता है, बार बार राजू मेकेनेक के गेरेज़ मे जाता है ! कई बार तो पार्ट न मिलने कारण हफ़्तों वहीं खड़ा रहता है  !"

" होय " -- सभी ने ज़ोर से एक हुंकार भरी !

" द्विवेदी डी.एफ.ओ. को  मैं  जानता हूँ !"- इंजीनियर मित्र ने कहा- " वो सिविल लाइन मे मेरे क्वाटर के आगे तीसरी लाइन मे रहते है!"

--'तीसरी लाइन'?,,,,   मैनें  सोचा - यह तीसरी लाइन टाकीज़ मे भी थी और अब फिर सामने  आ रही है ! अजीब संयोग है !

- " तो फिर पहला प्रयोग !!', आज मेरे घर मे संगीत सभा होगी, जिसमे द्विवेदी को सपरिवार बुलाया जाएगा ! सौरभ का  गिटार बजेगा!

'और अगर द्विवेदी नही आए , या वह कन्या को साथ नही लाए तो ?'

प्रोफ़ेसर दोस्त ने आशंका ब्यक्त की !

-"तो फिर हम अपने क्वाटर के उपर  लाउडस्पीकर लगाएँगे ! उसका मुँह' भाभी ' के घर कि तरफ करेंगे , ताकि प्यार कि धुनें सुन कर वह बाहर आए !"

" होय " - सभी ने समवेत स्वर मे फिर जोरदार हुंकार भरी1

में सोचने लगा - ये लोग क्या कर रहे है - !

तभी बासु  बोला -

-"अगले दिन अगला प्रयोग होगा !  मैं  कन्या के घर के ठीक सामने इस आशिक को अपने स्कूटर से हल्की टक्कर मारूँगा !ये गिर कर बेहोश होने की एक्टिंग करे - हम इसे उठाकर लड़की के घर मे ले जाएँगे - फ़र्स्ट मेडिकल हेल्प के लिए !,,,, वहाँ दोनो एक दूसरे को जी भर कर देख लेंगे !"

यह पूरी तरह फिल्मी सीक़वेंस थी ! मुझ मे अन्य गुण तो थे - लकिन मेने कभी एक्टिंग नही की थी !जो कुछ मेरे पास था ,, ओरिजनल ही था !

मेने कहा - " यह मैं  नही कर पाउगा !"

प्रोफ़ेसर ने कहा - " यह बिजली का इंजीनियर है !मीटर चेक करने के लिए वहाँ जाए !वह लड़की इसे बैठाल  कर चाय पिलाएगी और ढेर सारी मीठी मीठी बाते करेगी !"


  इस बार  "होय "- की  सबसे उँच्ची हुंकार उठी !

मेकेनेक बोला - " भाई जी ! आप अपना संदेश मुझे टेप करके देदे मे उसे दे आउग! !"

यह रिस्क थी ! टेप अगर ग़लत हाथो मे पड़ गया तो फ़ज़ीहत है !

   मैंने  कहा - " पहला प्रयोग ठीक है !  मैं  आज इंजीनियर मित्र के घर मे गिटार बजाउँगा !इससे कुछ हुआ तो ठीक  वरना मैं यह घटना भूल जाऊंगा !"
-

-'होय " - सबने फिर हर्ष मिश्रित हुंकार भरी !

   नतीज़न रात को महफ़िल सजी !

   लेकिन डी एफ ओ ने सभा मे आने से इनकार कर दिया !!

उस रात को एक लाउडस्पीकर लाया गया !, उसका मुँह कन्या के घर की तरफ किया गया !  एम्प्लीफायर  का  फुल  वोल्यूम खोला गया !

मेने गिटार पर  गीत बजाने  शुरू किए ! मेरा प्रिय गीत था - ' चंदा मामा दूर के '! उसे सुन कर दोस्तों ने मुंह बिचकाया बोले - "यह ठीक नही" !

मेने दूसरे  पुराने गीत,, शुरू किए - 'ये जिंदगी उसी की है ' , 'आजारे अब मेरा दिल पुकारा ', 'जाग दर्द इश्क जाग ,'

लकिन मेरे दोस्त झल्ला उठे !


- " ये क्या मर्सिया गा रहे हो भाई   ?? रोमांटिक गीत बजाओ  ,,!!"
   जैसे मेरे सपनों की रानी कब आएगी तूँ.... या रूप तेरा मस्ताना ,,,  !"

 लेकिन ,,नये गीतों की मेरी प्रेक्टिस नही थी , मेरी  पसंद के गीत तो पुराने मेलोडियस गीत ही थे ! ,,,फिर भी दोस्तों के कहने पर नए गीत बजाने की कोशिश करने लगा !

गीतों की प्रेक्टिस न होने के कारण गिटार बेसुरा बजने लगा !

थोड़ी देर मे , बगल मे रहने वाले , घर द्वार वाले बंगाली  मोशाय  आ गए !
बोले - " अब बंद कीजिए यह संगीत ! 'रात '' खराब' हो रही है ! सोने दीजिए हमें !"

मेरे मित्र उनसे उलझने लगे !
' हमारा घर है '-हमारा मन है ', हम जो चाहें सो करें ', वगेरह वगैरह  !

तभी मुहल्ले के बहुत से और विवाहित अन्य  सभ्य ब्यक्ति आ गए !

  वे कहने लगे की आप  लोग बेवजह शोर मचा रहे हैं ,,हमारी नींद खराब हो रही है ,,हम डिस्टर्ब हो रहे हैं ,,!
युद्ध का वातावरण बनते देख मेने गिटार बंद कर दिया !

प्रयोग की वह रात निराशा भरी रही ! उसके बाद दो तीन दिन तक सभी मित्र अपने अपने कामों में उलझे रहे , अतः कोई किसी से नही मिल पाया !

हाँ ,  मैं  ज़रूर उस डी एफ ओ के क्वार्टर के सामने से एक  बार गुज़रा लकिन मुझे वह चेहरा दोबारा  नही दिखा !

  बल्कि ,,मुझे उस क्वार्टर के माली ने घूमते देख कर टोका -

" राह भटक गये हो क्या साहब ?"
  मैनें  शरमा कर कहा - " कुछ ऐसा ही है !"

चौथे दिन हम सब दोस्त फिर इंजीनियर मित्र के घर एकत्रित हुए !
सभी लोग मुझे कन्या से मिलवाने के उपायों पर चर्चा करने लगे !

तभी पड़ोसी बंगाली महोदय तूफान की तरह ड्राइंग रूम मे घुसे !घुसते ही बोले -

- " क्यों दत्ता ,,, ! कुछ सुना तुमने ?? "

मेरे मित्र ने पूछा -
" क्या हुआ ? "

बंगाली महाशय - बोले

-" वो डिप्टी कलेक्टर नारंग  मल्होत्रा  का बाइस साल का जवान लड़का , फाँसी लगा कर मर गया !"

" डिप्टी कलेक्टेर नारंग का लड़का ??,,,यु मीन ,,'नीरज ' ?" ,,,,वह दुबला सा काला क़ाला ,,बदशक्ल लड़का,,,' नीरज' ?"

"हाँ ! वही  नीरज , !,,,,,, पुलिस आई है !,,,,"  जानते हो तलाशी लेने मे क्या मिला ??"

-"क्या मिला ?"

- "ढेर सारे प्रेम पत्र ! " - बंगाली महाशय थोड़े ब्यांगात्मक लहजे मे बोले !

-"प्रेम पत्र ?? - किसके प्रेम पत्र ?"

-" और किसके प्रेम पत्र ! ! - उसके क्वार्टेर के सामने रहने वाले डी.एफ.ओ.द्विवेदी  की लड़की के हाथ के लिखे प्रेम पत्र !"

हम सब अवाक रह गये !

मुझे तो जैसे साँप ही सूंघ गया !

हमारे चेहरे पढ़ते हुए बंगाली महाशय बोले -

"- वो लोग प्यार करता था छुप छुप कर ! उधर चार दिन पहले , फिल्म देखने भी गया था दोनों !लड़की अपने पिता के साथ गई थी , नीरज अकेला गया था ! लड़के में कोई  गुण  नहीं थे ,, ं एक  नंबर का आवारा ,, पढ़ाई में कई बार फेल हो चुका था , डी एफ ओ  द्विवेदी तो उससे बहुत चिढ़ता था !- उस दिन मैं  भी गया था फिल्म देखने ! मेने उन दोनो को प्यार भरे इशारे करते भी देखा था !- लड़की का पिता भी  वो इशारे भाँप गया था ! "

हम सब बंगाली महोदय का मुँह तकने लगे !

बंगाली मोशाय - मेरी ओर मूड कर बोले -
"अरे  ओ सोरभ !" तुम भी तो था,,, उस दिन टाकीज़ मे यार ! नीरज ठीक तुम्हारे पीछे वाली सीट पर ही तो बैठा था !-बिल्कुल ठीक  तुम्हारे पीछे !- वही नीरज ,,,,!!,,,आज मर गया !"

मेरे कान सनसनाने लगे ! मुझे कुछ भी सुनाई देना  बंद हो गया !
बंगाली मोशाय शायद आगे कह रहे थे -

" ' सिलि लोग !' ज़रा सी बात पर आज कल ये लड़के जान दे देते है !उसकी चिट्ठी शायद डी एफ ओ ने पकड़ ली थी ! दूसरे दिन ही लड़की को ननिहाल भेज दिया , और लड़के के बाप से लड़के की शिकायत कर दी  ! साला लड़का इतनी सी बात पर फाँसी लगा लिया !"

इतना कह कर बंगाली मोशाय आँधी की तरह वहाँ से बाहर निकल गए !दूसरे घरों मे यही खबर देने !

उसके जाने के बाद में सकपकाया हुआ थोड़ी देर बैठा रह गया !

में समझ गया - ' उस दिन वह कन्या लगातार मुड मुड कर मेरे पीछे बैठे नीरज को देख रही थी !दोनो के बीच नज़रों के तीर , ठीक मेरे सिर के उपर हो करही  चल रहे थे !'

      और ,, मैं ,,?? ,,  मैं उस दिन ,, बीच मे  एक ,बैडमिंटन कोर्ट के   
, 'नैट'   'की तरह था !जिसे छू कर नज़रो की शटल , इस कोर्ट से उस कोर्ट मे जा रही थी ! यानी द्विवेदी की सुन्दर लड़की के कोर्ट से नीरज के कोर्ट में ,,!

  ,,,, बेचारा ,,,' नैट ,,,' बीच मे बेवज़ह ही झूल गया था  !

 तभी बाहर कोई रेडियो बजने लगा !,,,,गीत था - 

,,,,,' मारे गए गुलफाम अजी हाँ मारे गए ..गुलफाम ..,!"
  मैं सोचने लगा ----
गुलफाम कौन था ..???

' मैं  या नीरज या कोई और ???',

 यह पहेली सुलझाने की मैं   बेकार कोशिश करने लगा !

लेकिन मेरा दिल भी तभी  बार बार यह सवाल करने लगा
मुझे उस समय क्या हुआ था ??


    .. प्यार ,,,या प्यार का अहसास ,,???
  और ,,,,,
'   क्या ,, मैनें  प्यार किया था या मुझे प्यार हुआ था ?'.


उसके बाद भी ,,,
बहुत दिनों तक मैं जूझता रहा -
  लेकिन प्यार की यह  गुत्थी  सुलझा  नहीं सका !
   चूँकि मैं  बहुत सोचने के बाद भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा ,,,तब भी नहीं और तब के बाद  अभी तक भी ,,,कभी नहीं ,, ,,,इसलिए ,,,, मेने प्यार के उस वाकये को फिर से कबाड़ की तरह पिटारे मे ठूंस दिया !

   
,,,,,,,शायद प्यार के जानकार, प्यार के  विशेषज्ञ  मुझे कभी  कुछ बता सकें !,,,यह प्रतीक्षा अभी भी है ,,!!



   --' सभाजीत 
         
     चेतावनी  :-  ( यह एक कहानी है , इसे आत्म कथा समझने की भूल ना करें !)

_

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

    "   प्रेम  ,,,,,,

    प्रेम   का अर्थ ,,,
  ' मांडू ' ओर '   ताजमहल   ' की     दीवारो  पर  , 
   लिख दिया  ,, इतिहासकारो  ने ,

    प्यार के जानकारो  ने ,
    पढ़ाये , हमें ,
    उच्चतम  शिखर  पर 
    कलश मे  मढे  कुछ नाम ,
   ' लैला -मजनू "  , ' शीरी -फरहाद " ,,,सलीम अनारकली ' 
     वगेरह ,,वगेरह ,,!!

      बचपन से ,
      गणित के पहाड़ो  की तरह , 
      रेट रहे यही नाम , ,
      यादो के बस्ते में ,
      ठुसे रहे यही कागज़ ,   
    ,,, प्यार के मायने ,,
       एक ,,' नर ' एक ,मादा ' ,,!!
       और टपकते रहे ,,,  फटे  बस्तों  से , 
      यहाँ -वहा , सब जगह , 
      पेन्सिल और रबर की तरह ,,!!

       निश्छल चांदनी से , नहाये 
      ब्रक्षो  के झुण्ड , 
       खिलखिलाती नदी , 
       इठलाते समुद्र , 
       गुनगुनाती  धूप   सेकते  , 
        उत्तंग शिखरों से ,,, जब हो गया प्यार मुझे , 
        तो ,,, हंस दी दुनिया ,,
        मेरी नासमझी पर ,,!!

       गणित के समीकरण ने , 
       उकसाया  मुझे , 
       प्यार के कुछ ,,,सवालो को हल करने के लिए , 
       और में ढूंढता रहा ,  कलश के नामो के बीच , 
         कुछ और बात , 

       '   भरत  ' की नंगे पैर ,,' मनुहार ' ,,
         और मूर्छित  लक्ष्मण  की छाती पर ,
         ' राम ' की अनवरत हिचकियाँ ,,,,!
           अत्तेत के धुंए में  विलीन हुए ,,
          ' सुदामा ' के दो मुट्ठी ,,चावल ,, 
           और सत्य के दीवाने , 
           चांडाल ,,' हरिश्चंद्र ' का ' मृत्यु कर ' ,, मांगता ,,
            फैला हाथ ,,!!

          योग था की ' संयोग ' ,,
           प्यार के व्यापारियों ने  भी  , 
           बेचीं    वही  बाते  , 
           बार ,,बार ,,,हर बार ,,

        कि   बन गया  , 


           प्यार   का   ' अमृत  घट  ' ,,
          ' प्रेम रोग ' ,,!!

   ,,,,,,,,,,,,,,,, सभाजीत