सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

कठोरता का प्रतीक चिन्ह ,,,
' पाषाण ' होता है ,,' पुरुष ',,!
और स्त्री होती है , ,,,,
' प्यार ' की एक 'छैनी ',,,!!

हर छैनी ,, 
काटती है , छांटती है , तोड़ती है , एक 'पाषाण ' को ,
जीवन भर , ,,,,
और गढ़ देती है उसे ,
एक ' आकार ' में ,,,!!

कुछ बनाती हैं ,,आकर्षक मूर्तियां ,
कुछ अनगढ़ ,,, बेडौल,, आकृतियां ,,,!!
और कुछ ' छार छार कर देती है उसे तोड़ते,,तोड़ते ,,!!

हर हालत में अस्तित्व खो देता है पाषाण ,,
अपने ' मूल- रूप ' को खोकर ,,!

किन्तु छैनी रहती है,,,
सदा अस्तित्व में ,
अपनी शाश्वत ' धार ' के साथ,,,!!

--- सभाजीत

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

gahre pani paith

" गहरे पानी पैठ ........." !!

मानव जीवन में ' मित्र' शब्द का अद्भुत अस्तित्व है ॥

अन्ग्रेजी में जहाँ इस सम्बन्ध को एक शब्द - " फ्रेंड " के नाम से सीमित दायरे में बाँध दिया गया है , वहीं हिंदी में इस को कई नामों --' मित्र ', 'सुह्रद', 'सखा' से परिभाषित किया गया है । मित्रता वह अनुभूति है जिसे लिंग , स्थान , जाति, के बन्धनों में नहीं बांधा जा सकता । हिंदी में जहाँ पुरुष मित्र को ' सखा' के रूप में संबोधित किया गया है वहीँ ' स्त्री ' मित्र को ' सखी ' के रूप में । वृन्दावन की कई स्त्रियाँ , कृष्ण की सखी थी - और कृष्ण ने मित्र भाव से इनके साथ जीवन जिया ।

मित्र भाव - " सम- भाव " है । इसमें ना तो कोई बड़ा होता है , ना कोई छोटा । इसमें उम्र भी कोई अस्तित्व नहीं रखती । ' सम-भाव ' सामान अनुभूतियों , सामान विचारों , और सामान पसंद से उपजता है । यह निष्कपट , निष्कलंक होता है । बाल्य काल के मित्र इसी सम- भाव के साथ आगे बढ़ते है । कृष्ण की सखियाँ , कृष्ण को बिना देखे नहीं रह पाती थी - वे उनके साथ शरारतों में सम-भाव से सम्मलित होती थी । अपने - अपने दांव को निष्कपट भाव से खेलने वाले ये मित्र अनोखे थे - जो चोर- सिपाही का खेल क्रमशः खेलते रहते थे ।

मित्र भाव में 'ज्ञान ' की कोई भूमिका नहीं । ज्ञान मनुष्य के चारों ओरकई तर्क ,, कई दायरे खडा कर देता है , जो मित्र भाव में सर्वथा वर्जित है । " राम कथा " में " राम " सदेव ग्यानी के स्वरूप में ही हमारे सम्मुख आते है .इसी कारण उनके मित्रों की सूची शून्य है । " राम - सुग्रीव " अथवा " विभीषण - राम " मित्रता , उद्येश्यों की प्राप्ति के लिए की गई राजनेतिक संधि है , अतः मित्रता के दायरे में नहीं आती । यह विडम्बना ही है की राम के जीवन में मित्रता का नितांत अभाव है , जबकि कृष्ण का युवा काल " मित्र -रस " से रसा - पगा है । यही कृष्ण जब ग्यानी हो जाते है तो मित्रों को खो देते है । कृष्ण - अर्जुन का सम्बन्ध भी मित्रता के दायरे में नहीं आता , क्योंकि वहा " सम- भाव " नहीं है । ग्यानी कृष्ण जब अपनी बाल्य काल की सखियों को "अनासक्ति " का पाठ पढ़ाने की चेष्टा , अपने दूत " उद्धव " के जरिये करते है , तो उद्धव - " सम भाव ' के शब्द बाणों से आहत होकर , ज्ञान की अपनी क्षत - विक्षित पोथी को लेकर कृष्ण के पास वापिस लोट आते है ।

मनुष्य के अन्य सम्बन्ध सीमित है , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असीमित है । पिता का सम्बन्ध ' एक ' है , माँ का -एक , पत्नी का - एक , भाई बहिनों के - तीन चार , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असंख्य हो सकते है । यहीं आकर मित्र शब्द -" सखा" शब्द से भिन्न हो जाता है । सखा - " अस्तित्व " है और मित्र - " अनुभूति " । 'अस्तित्व' हमारे जीवन का 'सहभागी' होता है , जबकि 'अनुभूति ' विचारों से 'सहभागिता' करती है । सखा या सखी के सामने हम ह्रदय के पट पूरी तरह ख़ोल देते है , वह हमारी संवेदनाओं की सहभागिता करता है , निष्कपट , निष्कलंक भाव से , ओर हम अपना बोझ उतार कर उसे दे देते हीवह ब्प्झ जो हम अंतस में ढो रहे होते हैं , उसे मात्र सखा ही ग्रहण कर सकता है , मित्र दिलासा दे सकता है , उपाय बता सकता है, सहानुभूति प्रकट कर सकता है , हमें बोझ रहित नहीं कर सकता ।

पश्चिम से आई सभ्यता ओर तकनीक ने , मित्रता के दायरों को विशाल समुद्र में बदल दिया है । आधुनिक युग में मित्रता के लिए हमारे सामने भीड़ खड़ी है । हम जिसे चाहे , उसे मित्र के रूप में चुन सकते है । मित्रता के इस मंच को उत्पन्न करने वाली कई साइट्स आपस में व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता में संघर्ष रत है ओर लोगों को कई विकल्प देती है ओर - लोग अपनी अपेक्षाओं ओर सुविधाओं के हिसाब से इनका उपयोग करते है ।

युवा वर्ग में मित्रता का मानदंड - ' फेस ' है । वे चेट्स करना चाहते है । मनोरंजन मित्रता का उद्येश्य है । ओर अपने अकाउंट में अधिकतम संख्या में " हिट्स " जोड़ना चाहते है । इस व्यापारिक जगत में , विचारों के लिए उनके पास समय नहीं है । जबकि " वयस्क " " व्यक्ति , वहां वहां से तलाशकर जुगाड़े गए संदेशों से खुद को व्यक्त करना चाहते है । वे चाहते है की लोग उनको चिन्हित करें , वे  लोकप्रिय  हों । वे अपनी भावनाओं को फ़िल्मी गीतों के माध्यम से भी स्फुटित करते है ओर अपना सहभागी तलाशते है । आधुनिक काल खंड से प्रायः कट गया उम्र दराज़ व्यक्ति , विचारों को व्यक्त करने से डरता है , क्योकि वे विचार आधुनिक समाज को स्वीकार्य नहीं । ऐसे लोगों की संख्या इन मंचों पर लगभग नगण्य ही रहती है ।

स्त्रियाँ इन नायाब मंचो की शोभा होती है । दाम्पत्य जीवन की कठिन नाव पार सवार स्त्रियाँ , मित्रता की नाव पर भी एक पैर रखना चाहती है, किन्तु इसके लिए वे डरी सहमी भी रहती है । मित्रता का मुखौटा लगा कर , अपरिपक्व , असामाजिक तत्व उनसे अप्रसांगिक बातें करने का प्रयत्न करते है । इस लिए अधिकाँश स्त्रियाँ - " नो चैट " की तख्ती के साथ - अपने ज़ोन पर ताला लगा कर रावण से ठगे जाने की सभी संभावनाएं ख़त्म कर देती है । ये स्त्रियाँ विचारों की दुनिया में सहभागिता चाहती है , अपने विचार व्यक्त करना चाहती है , किन्तु इसके लिए जो मित्र उन्हें चाहिए , उन्हें इन मंचों पर ढूंढना उनके लिए कठिन होता है । अधिकतर पुरुष , मित्रता की आड़ में स्वच्छंद स्त्री मित्र की तलाश करता है , जबकि यथार्थ में कोई भी स्त्री कभी स्वच्छंद होती ही नहीं । वस्तुतः जो भी स्त्री- पुरुष स्वच्छंदता की परिभाषा में आते है , उनके लिए मित्रता कोई मायने नहीं रखती , क्योंकि वे मित्रता को एक खेल के रूप में ही लेते है ।
मित्रता के इस विशाल सागर में , आज मित्रता मछलियों की तरह तैर रही है । किन्तु सागर का पानी 'खारा' है - उसमें मिठास नहीं है । और इसीलिए मित्रता की उस स्वाभाविक मिठास की प्यास हमें तब भी बनी ही रहती है । " नो स्ट्रेंजर " के नारे के पीछे , हम अपरिचित नहीं रहते , किन्तु पूर्णतः परिचित भी नहीं होते । वस्तुतः संमाज से बड़ा कोई मंच , सखा या मित्रता के लिए हो ही नहीं सकता । अपने घर के दरवाज़े बंद करके हम पडोसी से बात चीत करने से भी कतराते है , किन्तु आकाशीय मार्ग पर चर्चा करके एक " कल्पनीय " समाज की सरंचना कर रहे होते है , जहां - " मुख- चित्रों " के पीछे छिपे , किसी अपने जैसे व्यक्ति की हमें तलाश होती है । यह एक मृग मारीचिका है जो मानसिक सूख तक सीमित रहती है ।
हमें अपने संसार को रचने की स्वतन्त्रता है सुख़ की अनुभूति हमारी अपनी है , वह जहां मिले उसे पाना हमारा अधिकार है । अपने विचारों पर टिपण्णी या तालियाँ पाकर हमें सूख या संतोष मिल सकता है , किन्तु मित्रता का - " सम भाव " नहीं । वह फिर भी हम से बहुत दूर रहता है । जैसा की मेने कहा - " सम-भाव " " अस्तित्व " है , " अनुभूति नहीं , इसलिए मंचीय मित्रता के साथ साथ , हमें अपने घरों के दरवाज़े खोल कर , पड़ोस में भी एक मित्र ढूंढना होगा । यह मित्र एक अस्तित्व होगा । यह मित्र आपसे मज़ाक कर सकता है , आपकी संवेदनाओं में शरीक हो सकता है , अन्याय के विरुध्ध कंधे से कंधा मिला सकता है और वैचारिक सहभागिता भी कर सकता है ।
अपने पड़ोस में ऐसे मित्र को ढूँढना एक कठिन बात है । क्योंकि मित्रता में " ज्ञान " वर्जित है और अस्तित्व पूर्ण मित्रता में 'ज्ञान' आड़े आता है । ज्ञान हमारे बीर्च " स्टेटस " की दीवार खड़ी करता है , और हम में अपने अस्तित्व का अहम् पैदा करता है .और इसी कारण मित्रता नहीं मिलती । कृष्ण यदि खुद को " इश्वर " स्वरुप में गोपियों के समक्ष प्रस्तुत करते तो वे उनके सखा नहीं बन सकते थे ।
कबीर ने कहा -
" जिन खोजा तिन पाइयां , गहरे पानी पैठ ॥,
हों बौरा डूबन दारा , रहा किनारे बैठ ।।"
मित्रता का मोती पाना है तो गहराई में उतरना ही होगा । किनारे बैठे व्यक्ति को , लहरों की सतह पर उतराते हुए मोती नहीं मिल सकते । 'दिया' अपने नीचे अन्धेरा रख कर दूर तक कालिमा से युध्ध करता है किन्तु उसे 'सूर्य ' नहीं कहा जा सकता । सूर्य की किसी भी दिशा में चारों और सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश ही है । मित्रता सूर्य की तरह है - जिसे अपने चारों और प्रकाशित होना ही चाहिए ।
------सौरभ
   ( सभाजीत शर्मा )




रविवार, 9 जून 2013

bhatkaan


















जीवन की संकरी गलियों में ,
 भटक ना जाऊं  कहीं अकेला .., !!

प्यार माँगना चाहा  जिससे ,
उसने सदा मुझे ठुकराया ..,
जिसने मुझसे प्यार किया कुछ ..,
उससे मैं खुद हो कतराया ..!

पता  नहीं पतझर कब आया ..,
 जहाँ कभी बसंत था खेला  ..!!

सारे  दिन अनुभव करता था ..,
 मेरे भी पीछे कोई है ..,
मेरी तरह किसी नादा की ..,
 मनचाही मंजिल खोई है .., !

'पग- ध्वनि ' खुद की ही पायी ..,
 जब  मुड  देखा संध्या की बेला ..!!

किससे क्या कुछ कहूँ अजब जब ,
 दुनिया का ही द्रष्टिकोण है ..,
 जो वाचाल उसे सब सुनलें ..,
 कौन सुने उसकी जो मौन है ..,

भाषाओं के ग्रंथों खरीदे ..,
भावों पर खर्चा ना धेला .., !!

--सभाजीत

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

लघुकथा - 1
:

:: उपदेश :::

 कृष्ण ने अर्जुन को अपने केबिन में बुलाया !
 श्री कृष्ण तिवारी अफसर थे जबकि अर्जुन दवे उसका मातहमत  !
  अर्जुन के अन्दर घुसते ही कृष्ण ने ' सखा भाव '  से कहा -
- " बैठो  अर्जुन "
   अर्जुन बैठ गया तो कृष्ण  ने पूछा  - 
- " कैसी तबियत है अब तुम्हारी वाइफ़ की ..?? "
- " ठीक है सर !! ... नरम गरम तो चलती ही रहती है ..! " 
- " भई... तुम भी अजीब आदमी हो ...! ,  बाल बच्चों और घर  की तरफ  कोई ध्यान नहीं देते ..!! "
- " क्या करूँ सर "- अर्जुन ने शिथिल भाव से कहा--"  डिपार्ट मेंट के वर्क से ही फुर्सत नहीं मिल पाती ..,!"
   कृष्ण मुस्कराए ..!,,,  फिर ' दार्शनिक भाव ' में  अर्जुन  पर नज़रें गडा दी ! -
- " घर में किसी को कुछ हो गया  तो क्या दे देगा  तुम्हें डिपार्टमेंट ..?? ... अरे पहले  घर देखो  ... यह  सरकारी काम काज तो चलता ही रहेगा ..! "
 _ " यस सर ..!! " ... अर्जुन को लगा जैसे उसके घाव पर कोई मरहम लगा रहा हो  !
कृष्ण ने दराज खोली ,  सौ रुपयों की एक गड्डी तोड़ कर  उसमें से दस नोट तोड़  कर अलग किये  .. फिर एक लिफाफे में डाल कर , अर्जुन की और उछाल दिए !
- "  " मेहता ' दे गया था ..! ..., तुम्हारा जायज हक़ है इस पर ..! ... उसकी फ़ाइल है तुम्हारे सेक्शन में ... आज ही नोटशीट बना लाओ तो   अप्रूव कर दूँ ! .."
 अर्जुन ने कृतज्ञ भाव से कृष्ण को देखा ,,फिर  लिफाफा उठा कर मोड़ा  और  चुपचाप जेब में डालते हुए कहा  -  " जी  सर .." !
 कृष्ण बोले - " और अपने परिवार का ध्यान रखा करो ..! ... आखिर कमाते किसके लिए हो ..?? ...उन्ही के लिए ना .??.... मेहता कह रहा था की तुम ' संकोची '  हो ...उससे कुछ लेते ही नहीं !.......ऐसी बात है तो  मुझसे ले लिया करो   ... आखिर इस महगाई में कैसे चलेगा तुम्हारा ..?? "
- " जी सर " -- अर्जुन का स्वर भक्ति भाव में धीमा हो गया ! वह उठने लगा तो कृष्ण बोले -
_ " आजकल कोई किसी का सगा नहीं  अर्जुन ! वक्त पर कोई काम नहीं आता ..., ना मित्र ना रिश्तेदार ..!!   काम आती है तो ' विष्णु - प्रिया ' ..यह लक्ष्मी ..!.,  बेवकूफी में जिससे तुम परहेज करते रहते हो  ..!! "
 अर्जुन उठ कर हाथ बाँध कर खड़ा हो गया !
-" और हाँ !... .. फाइलें तो बनती ही ' निबटने ' के लिए हैं ..., तुम नहीं निबटाते  तो मेहता किसी और बाबू से निबटवा  लेता  ! .. यह  सरकारी ' माया जगत  ' है ...और  याद रखो तुम महज   एक  किरदार ..!! "
- जी सर "  ... अर्जुन की आँखें मुंद  गयीं !
- "जाओ अब  नोटशीट बना कर जल्दी ले आओ ..!! "

 अर्जुन बाहर निकला तो उसका चेहरा चमक रहा था !
  कृष्ण ने उसे ' तत्व- ज्ञान ' दे दिया था !
, वह अपनी ' सीट ' पर आरूढ़ हो .. , ' गांडीव ' की तरह ..' पेन ' हाथ में धारण कर .,,,.. नोट शीट पर ' शब्दों '  की  बाण वर्षा करने लगा !


-सभाजीत


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लघुकथा-2 

:: लकी ::

 
दोनों  दोस्त ढाबे पर बैठे थे !

रफीक साइकिल के पंक्चर बनाता था और मंजीत डबलरोटी बेचने का काम करता था !

--" कैसे फंस गयी वो यार तुमसे ,,""  रफीक ने मंजीत से उसकी मुहब्बत का राज जानना चाहा !
- बस यूँ ही ,,धीरे धीरे ,,! " 
- धीरे,,धीरे ,,? क्या बचपन से जानता था तू उसे ,,??" 
--",, अरे नहीं यार ,,!! वो मुलाकात  तो अभी  एक महीने पहले,ही हुई थी,,,, दिनेश के कारण ,,! " 
-" कैसे,,"?? 
-" वो दिनेश से उसका कुछ चल रहा था ! मैं वहां डबलरोटी बेचने जाता था !  दिनेश ने कहा कि  मैं उसका सन्देश उसे दे दिया करुँ ,,! "
-" फिर ,,"??
-" फिर वह मुझे पूछने लगी ,, मुस्करा कर बात करने लगी ,,मैं भी सुबह शाम दोनों टाइम वहां जाने लगा ,,मेरी पुकार सुन कर वह रोज बाहर निकलने लगी ,,!  एक दिन मैंने डबलरोटी के पैकिट पर उसे लिख कर दे दिया ,,' आई लव यूं ',, और उसने भी दस रूपये के नोट  पर लिख दिया --' इलू,,इलू,! ," 
 --"  वाह । . ,, ऐसा क्या भा  गया उसको तुम्हारे अंदर ,,"?? 
-" उसने कहा कि  मेरा ' हेयरकट ' उसे पसंद है ,,, बिलकुल सलमान लगता हूँ ,,! " 
    रफीक ने लम्बी सांस छोड़ी  फिर मंजीत से बोला --
  - "  तू लकी है यार ,, तेरा धंधा भी अच्छा है ,,! " 
    मंजीत हंसा ,, बोला --" तुझे नहीं मिली  अभी तक कोई ,,?? " 
   रफीक ने गहरी उंसास भरी ,,बोला --
--" मेरी साइकिल की दुकान तो लड़कों के स्कूल के सामने है ,,दिन भर पंक्चर बनाते और साइकिल में हवा भरते ही बीत जाता है ,,! महीनों सैलून नहीं जा पाता  ,,,, मुहब्बत कैसे हो ,,?? " 



   ---- सभाजीत 



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लघुकथा-3 


सोमवार, 8 अप्रैल 2013


 " ज़माना "
- वे बड़ी देर से पहले साहब के गेट पर , और फिर कारीडोर में , ,,,साहब के बंगले से निकलने का इंतज़ार करते रहे ! एक अन्य व्यक्ति , जो बाद में चमचमाती कार से आया    , वो भी कारीडोर में बैठ कर  साहब के  बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा  ! थोड़ी देर बाद आखिर चपरासी ने दरवाजे से पर्दा हटाया और,,, एक अधेड़ , रुआबदार अफसर के दर्शन हुए ! बाहर निकल कर वे पहले मुरलीधर की और मुखातिब हुए और  सवालिया  निगाह उन पर डाली - ,
वे हड़बड़ाकरसाहब के आदर में  खड़े हो गए और बोले --
" मैं ....मुरलीधर पाठक ..! ...मुझे मनोज जी ने भेजा था आपके पास ..! "
--" अच्छा जी कहिये ..! " अफसर का स्वर उभरा ! .
" वो मेरे बच्चे के सिलेक्शन का मामला था !  मनोज जी ने  यह पत्र भी दिया है ..." ! कहते हुए मुरलीधर जी ने एक पत्र अफसर को थमा दिया !

" अच्छा अच्छा ..." -अफसर ने पत्र हाथ में थाम लिया !

" देखिये ...!! " - मुरली धर जी की आवाज़ थोड़ी कांपने लगी -   
,,,, " मेरा बेटा वैसे मेरिट में है ! यूनिवर्सिटी टाप की थी उसने !...मैं यह सिफारशी पत्र ना लिखवाता ,लेकिन मनोज जी मेरे पुराने ज़माने के मित्र हैं - वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं .., उन्होंने ही  कहा  कि थोड़ी शिफारिश हो तो कोई बुरी बात नहीं ! ..कह रहे थे कि  आपके बड़े भाई को नोकरी उन्होंने ही दिलवाई थी -- शिफारश पर ..., "

" हाँ हाँ ...मैं जानता हूँ मनोज जी को ..." ..अफसर का स्वर ' शुष्क ' हो चला था ! 
  फिर ...वह दुसरे व्यक्ति की और मुड़ गया !

--" जी मैं मायाराम अग्रवाल हूँ .., " दूसरा व्यक्ति स्वर में मिठास घोलते हुए बोला---" घंटाघर चौक पर सराफे की दूकान है मेरी ! ..."

- कहिये क्या काम है आपको ..? " -- अफसर के स्वर में फिर गुरुता आ गयी !

- " कोई ख़ास नहीं ..., बस दर्शन के लिए चला आया ..., ये कुछ नमूने हैं , मेडम देख लेंगी तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी ..! " -- कहते हुए मायाराम ने एक  भारी  लिफाफा अफसर को थमा दिया !

- " अच्छा..! अच्छा ..! "... अफसर के स्वर में भी मिठास आगई !

- और सर ... उस लड़के का नाम लिफाफे पर ही लिखा है , जिस के लिए आज आपसे महापौर जी ने बात की थी ! " -- मायाराम ने करफुसफुसाकर कहा ..! और फिर झुक कर नमस्कार करके चला गया !

अफसर ने लिफाफे को चिट्ठी पर रख लिया ! फिर मुरलीधर की और मुड़ कर बोला -

- .." मनोज जी को मेरा प्रणाम कहियेगा !,,,,, देखिये ,,,! अब वो ज़माना नहीं रहा बहुत बदल गया है ! ... देश बहुत आगे बढ़ गया है .., बहुत तरक्की हो गयी है ! सब जगह हाई टेक है .. कंप्यूटर का ज़माना है .., , शिफारिशें नहीं चलती ! .. कोशिश करूंगा लेकिन कोई वायदा नहीं कर सकता ,,,! " --
   कह कर अफसर तेजी से मुडा और पर्दा उठा कर फिर बंगले में घुस गया !
            -  सभाजीत
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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

" लाइफ आफ्टर डैथ "



( मरणोपरांत जीवन )



'लाइफ आफ्टर डैथ ' एक रहष्यमय विषय है वर्षों से लोगों के लिए एक कोतुहल रह़ा है कि , मृत्यु के बाद क्या होता है ? हम कहाँ जाते है , क्या करते है , और क्या मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है ?



इस विषय पर पश्चिमी समाज में कई तर्क , कथाएँ प्रचिलित है रहस्यवादी शोधकर्ताओं ने ऐसे कई लोगों के इंटरव्यू लिए - जो कुछ समय के लिए मृत घोषित किये जा चुके थे करीब करीब सभी तथाकथित मृतकों का अनुभव एक जैसा ही सामने आया -एक लम्बी सुरंग की यात्रा , एक प्रकाश पुंज से साक्षात्कार , और फिर लाख टके का एक प्रश्न - " क्या तुमने अपने सभी काम पूर्ण कर लिए है - क्या तुम संतुष्ट हो ?" उत्तर अगर 'हाँ ' में हुआ तो निश्चित मृत्यु और अगर ' ना ' में हुआ तो पृथ्वी पर वापसी



भारत में हिन्दू धर्म में एक पूरा पुराण ही " लाइफ आफ्टर डैथ " के लिए लिख दिया गया है । प्रत्येक घर में - " गरुण " पुराण के रूप में , किसी मृत्यु के वाद इसका वाचन किया जाता है । पंडितों के अनुसार , पुनर्जन्म से बचने के लिए ' मोक्ष ' की कल्पना की गई है -और मोक्ष पाने के लए विधि -विधानों की । किसी मृत्यु के बाद यदि मृतक का कर्म नहीं हुआ , पिंड दान नहीं हुआ , 'प्रयाग' - 'गया' जाकर श्राद्ध नहीं किया गया , ब्राम्हणों को भर पेट भोजन नहीं दिया गया , तो मृतक मृयु क्र पश्चात भी इसी लोक में रहेगा -" भूत योनी " में । मरणोपरांत कोई भी नहीं चाहता की उसके परिजन भूत योनी का जीवन जियें , इसलिए सभी , अपनी हेसियत से बढ़ चढ़ कर इन कर्म कांडों को करते है ।





आर्य समाज के प्रवर्तक , स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक - " सत्यार्थ प्रकाश " इस विषय पर व्यापक चर्चा की है - जो सनातनी धर्मावलम्बियों को मंजूर नहीं है । मेरी पत्नीk घोर सनातनी है - वह इश्वर के कई स्वरूपों में विश्वास करती है - हर देवालय में माथा टेकती है - वर्ष के प्रत्येक तीज त्यौहार - बिना भूले चूके- कलेंडर देख कर मुहूर्त के अनुसार मनाती है । दिन भर वृत रहकर , शाम को विशेष व्यंजन -" फलाहारी " बना कर खाती है , जिसे खाने में मेरी भी रूचि रहती है । विवाह बेदी पार सात फेरे लेते समय मेने कुछ कसमें खाई थी जिनमें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की एक कसम भी शामिल थी । यह कसम गाहे बगाहे में पूरी करता रहता हूँ - उनके साथ - " कथा कीर्तन , धर्म व्याख्यानों में भाग लेकर ।
लिहाजा एक धार्मिक व्याख्यान माला में उनके साथ में भी गया । आयोजकों ने विशाल मंडप तैयार किया था । मंच फूलों से सजा था । स्त्री और पुरुष वर्गों के अलग अलग बैठने की व्यवस्था थी - ताकि धर्म के बीच स्त्री पुरुषों के बीच का प्रेम सिर ना उठा ले । मंच पर व्यास गद्दी थी और व्यास गद्दी पर , क्लीन शेव्ड , रेशमी भगवा वस्त्र धारी ,ललाट पर त्रिपुंड लगाए, गले में रुद्राक्ष धारण किये , उँगलियों में कई करामाती पथ्थरों की अंगूठियाँ पहने , गोर वरनी पुरुष विराज मान था । मंच के बाएँ और आर्केस्ट्रा था , जिसमें बांसुरी प्रमुख थी । ' संगीत, प्रकाश , और दवानी का अद्भुत करिश्मा व्याख्यान में घुल मिल गया , जिसे सुन कर सभी रस विभोर हो गए ।
कथा सुन कर जब वापिस घर आया तो मन बोझिल हो उठा मेने सोचा - मेने तो कुछ भी नहीं किया है - इह लोक और परलोक सुधारने के लिए मृत्यु के बाद चौरासी लाख योनियाँ मुंह बाए मेरा इंतज़ार कर रही है " कूकर - शूकर , जलचर- नभचर , कीट- पतंग , सभी तो बनना पडेगा फिर इन जन्मों के बीच एक टाइम स्लाट और भोगना पडेगा - " भूत - योनी " का - पीपल पर लटक कर , इस बात का इंतज़ार करना होगा की कब मेरे पुत्र गया जाकर मुझे मोक्ष दिलाएं मुझे अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं है वे बहुत ही आलसी और काम टालू प्रवत्ति के है
भरी मन से चुपचाप आँखें बंद कर के मैं लेट गया सोया ही था की अचानक एक बजे मेरी नींद खुल गयी घबरा कर उठ बैठा तो देखा कि एक व्यक्ति मेरे पलंग के पास , कुर्सी पर बैठा मुझे ताक रहा है मेरी पूरी तंद्रा भंग हो गयी उस आदमी को अपने शयन कक्ष में पाकर , मेने डरते हुए पूछा -
" भाई साहब !! आप कौन है और मेरे शयन कक्ष में इतनी रात में कैसे घुस आये ? "
जबाब में वह मुस्कराने लगा
मेने सोचा - जरुर ही यह चोर है पूरी गेंग होगी इसके बाकी साथी मेरे परिवार के अन्य कमरों में माल असबाब कि तलाशी कर रहे होंगे और यह मेरे ऊपर पहरेदारी करने के लिए बैठाया गया होगा मेने हिम्मत बाँध कर फिर पूछा -
" भैया !! कृपया मेरे सवाल का जबाब दें आप अन्दर मेरे कमरे में कैसे प्रवेश किये ?"
वह व्यक्ति गंभीर हो उठा मुझे ताकने लगा फिर धीरे से गहन आवाज़ में बोला -
" हम कहीं भी -जा सकते है हमारे ऊपर कोई बंधन नहीं है "
" भला कैसे ? बिना मेरी परमिशन के आप मेरे निजी शयन कक्ष में कैसे कर बैठ सकते है यह क़ानून विरुध्ध है "
उसने फिर मुझे ताका और ठंडी आवाज़ में बोला-
" क्यौकि हम 'हवा ' है हम 'मरे' हुए व्यक्ति है "
" मरे हुए ?? - यानी भूत ?? " - में सिहर उठा तो पुराण सही कहते है प्रमाण स्वरूप एक भूत मेरे कमरे में उपस्थित था मेने पूछा-
" भूत ?? तो आप भूत है ? "
जबाब में वह चुपचाप मेरी और एक टक देखता रहा फिर बोला -
" भूत तो जो व्यतीत हो गया वह 'समय' है , हम भूत नहीं "
"नहीं ? तो फिर क्या है ?"
" आत्मा !! सिर्फ आत्मा !! इश्वर का एक अविनाशी अंग !!"
" क्या आपका मोक्ष नहीं हुआ ?"क्या आपके पुत्रों ने आपका तर्पण , मोक्ष नहीं करवाया ? "
इस बार वह थोड़ा मुस्कराया फिर बोला -
" हमें मोक्ष कि आकांक्षा नहीं "
" मोक्ष की आकाक्षा नहीं - भला क्यों ? "
" क्योंकि हम मरणोपरांत जीवन जीने में विश्वाश करते है , हम मरणोपरांत जीवन जीने वाले लोग है "
" अजीब बात है !! आप जीवित रहते हुए भोग विलास से तृप्त नहीं हुए , जो मृत्यु उपरान्त भी जीवन चाहते है ? "
" भोग-विलास तो शरीर करता है आत्मा नहीं "
" यदि भोग - विलास नहीं चाहिए तो आप जीवन क्यों चाहते है ? "
" इसलिए की हम जीवित रहेंगे तो समाज भी जीवित रहेगा "
कैसी अजीब आत्मा है - मेने सोचा धर्म व्याख्यानों में तो मृतक के नाम पर कई कर्म कांडों और अच्छे भोजन की बात कही जाती है मृतक का दायित्व परिजनों तक सीमित रहता है और यह है कि मरने के बाद भी ' समाज ' के लिए बात किये जा रहा है मेने सोचा- बड़े काम की आत्मा है क्यों ना इससे मृत्यु उपरान्त जीवन का रहस्य पूछ लू। मेने पूछा -
" महोदय !! क्या मृत्यु उपरान्त भी जीवन होता है ? "
" जरुर !!- हम तो उसे जी ही रहें है "
" " क्या आप स्वेक्षा से उसे जी रहे है ? "
वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर उदास भाव से बोला -
" आप उसे स्वेक्षा या मज़बूरी कुछ भी कह सकते है "
" यदि मज़बूरी हो तो वह क्या हो सकती है ? " - मेने अब उससे चुटकी लेना शुरू कर दिया ।
"मृत्यु के उपरान्त भी हमारे ' नाम ' अभी संसार में जीवित है , लोग हमें याद रखे है । जब तक नाम जीवित है हम मर ही नहीं सकते ।
मृत्यु उपरान्त जीवन के रहस्य की कुछ परतें मेरे समक्ष खुलने लगी । मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी ।
" महोदय !! क्या में आपका वह नाम जान सकता हूँ जिसके कारण आप अभी भी संसार में विद्यमान है ? "
" नाम ?? कुछ भी कह सकते हो हमें क्योंकि हम नाम से ज्यादा , अपने काम के कारण जीवित है यह बात और है की यह पार्थिव दुनिया हमें अब सिर्फ नाम से ही जानती है ।" " मान लो की मैं 'शेलेन्द्र ' हूँ ! गीतकार शैलेन्द्र ! मेने कई गीत लिखे , लोग अभी भी गुनगुनाते है । मुझे याद करते है । इसलिए मेरा नाम मर नहीं रहा है । "
यह एक कड़वा सत्य था । शैलेन्द्र के गीत अमर थे । उन्होंने फ़िल्मी गीतों में साहित्यिक उपमाओं का सहज प्रयोग किया था । पहले एच , एम् वी, वालों ने अपने व्यवसाय हित में रिकार्ड बना कर , उन्हें बेच कर , गीतकार का नाम जीवित बनाए रखा , अब वे ही गीत यु ट्यूब पर फिर से चहक रहे थे । लोग भी उन गीतों को अभी भी गा रहे थे , भूल ही नहीं पा रहे थे ।
" आप से यह पाप कैसे हो गया महानुभाव ? लोग तो आज कुछ भी उलटा सीधा लिख देते है । धड़ल्ले से बिक जाता है - लोगों को यह याद भी नहीं रहता की गीतकार कौन है उसका नाम क्या है । "
" हम तो आदतन अच्छा लिखते रहे , चाहते तो भी सस्ता नहीं लिख सकते थे । फिर एसा पाप करने वाले तो बहुत लोग है । "
" यानी बहुत सी आत्माएं है जो अभी भी जीवित है ? "
" हाँ !! मिलना चाहोगे और लोगों से ? "
" लेखकों में भी हैं कोई ?"
" सभी वर्गों में है । जो मृत्यु उपरान्त जीवन जी रहे है , लेखकों में बहुत है । किससे बात करना चाहोगे ?- " शरत चन्द्र जी से करोगे ? '
" शरत चन्द्र ?? ' यानि बंगाल के प्रसिध्ध लेखक - । " क्या वे भी मरणोपरांत जीवित होंगे ? "
" क्यों ना होंगे ? उनका भी तो समाज से सरोकार रहा । सभी रचनाएं मर्मस्पर्शी , सभी कथाएं समाज के लिए । "
" एक बात बताएं "- मेने हिचकिचाते हुए पूछा - ' मरणोपरांत आप कहाँ निवास कर रहे है ? क्या पीपल पर - जैसा की पुरानो में कहा गया है ? "
" पीपल पर ??- " वह हंसा - " हम भला वहां क्यों निवास करेंगे ?? हम तो विभिन्न कई जगहों पर बस रहे है ."
" जैसे ?? "
" जैसे में गीतों में , शरत चन्द्र साहित्य में , गांधी भारतीय मानस में , विवेकानंद ज्ञान में , मुकेश गायकों में , राज कपूर अभिनय में ....."
" लम्बी फेहरिस्त है । मेने मन में सोचा । लकिन फिर एक प्रश्न मन में उठा -ये आज मुझसे मिलने मेरे शयन कक्ष में क्यों आये इन्हें मुझसे क्या सरोकार है ? प्रकट में पूछा -
" में बहुत कुछ जान गया हूँ । किन्तु एक बात नहीं समझ पाया । "
" क्या ? "
" यही की आप आज यहाँ मेरे शयन कक्ष में कैसे आये ? "
वे गंभीर हो गए । फिर धीरे से बोले -
" कुछ नहीं सिर्फ तुमसे मुलाक़ात करनी थी । "
" मुलाक़ात !! मुझसे ?? भला क्यों ? "
" क्योंकि देर सबेर तुम भी हमारे साथी बनोगे । हमारे साथ रहोगे । "
" आपके साथ क्यों ? मुझे मोक्ष नहीं मिलेगा क्या ? "
" मोक्ष तो होता ही नहीं । "
" मोक्ष नहीं होता ? पुराण , पंडित , कर्मकांडी कह रहे है की मोक्ष होता है ।"
" वे अपनी क्षुधा से मोक्ष पाने के लिए यह व्यवस्था बनाएं है , वरना मोक्ष तो होता नहीं । "
" तो क्या सभी जीवों को मृत्यु के पश्चात इस योनी , यानि आत्मा योनी में विचरना पड़ता है ? "
" नहीं "
" नहीं ?? " - " तो फिर हम आप ही क्यों विचरेंगे इस योनी में ? '
" क्योंकि हमें समाज की चिंता है ।"
" और जो समाज की चिंता नहीं करते ?'
" उनके लिए " चौरासी लाख योनी " का क्रम है ही । ' कीट-पतंग', शूकर - कूकर, जलचर- नभचर , ...."
में पेशोपेश में पड़ गया । मेने सोचा , इन्ही से पूछ लूँ , की मैं क्या करूँ ।
" मुझे बतलाएं की मैं क्या करूँ ? "
" यदि कीट- पतंग , शूकर कूकर बनना पसंद हो तो वही करो , जैसा दुनिया कहती है - " हल्का- फुल्का , मनोरंजक , विषयों पर विचार विनमय करो , लिखो । चौरासी लाख योनियों की यात्रा करो , भोग करो , जनन करो , बार बार मरो । "
" और यदि कीट पतंग नहीं बनना हो तो ? "
" तो अपना नाम जीवित रखो । मरणोपरांत जब तक तुम्हारा नाम जीवित रहेगा तुम भी रहोगे - हमारी तरह समाज के लिए साहित्य में समाये रहोगे सदा के लिए । "
एक और कुवां था तो दूसरी और खाई । कुँए से तो बाहर निकला जा सकता था , किसी प्यासे के द्वारा लटकाए गए घट को पकड़ कर बाहर आया जा सकता है , लकिन खाई से ? वह तो निगल ही जायेगी । मेने देखा वह व्यक्ति धीरे धीरे धुवां हो रहा था । मेने उससे कहा -
" एक आखरी बात ! मरणोपरांत जीवन का क्या यही अर्थ है । "
" हाँ , बिलकुल यही !! और कुछ भी नहीं । " - उसने ओझल होते हुए कहा ।
में बड बढाने लगा - में ' आत्मा योनी में रह लूंगा किन्तु लिखूंगा तो सिर्फ सामाजिक सरोकार के लिए । में किसी भी हालत में कीट पतंग नहीं बनना चाहूँगा ।"
तभी किसी ने मुझे झाझ्कोरना शुरू किया । उठ कर देखा तो पाया की पत्नी मुझे उठा रही है - " क्या बडबडा रहे हो ? उठो दिन निकल आया है - आज आवला नवमी है पंडित जी ने बत्ताया है की आज के दिन मुहूर्त पर पूजा करने पर सीधे मोक्ष मिलता है , मुझे मंदिर जाना है , चलो कार ड्राइव करो ।"
__________ सभाजीत शर्मा ' सौरभ'

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

ravan ka chehara

                          


      
 ;मैदान मे भीड़ भाड़ से थोड़ा हटकर ,रावण अपने ही पुतला दहन को देखने खड़ा हो गया ! चारों और गूँजती फिल्मी गीतों की धुनें माहौल के शोर शराबे को चरम सीमा तक बढ़ने मे मदद कर रही थी .! बीचबीच मे घूमते हुए गुब्बारे वाले जब बच्चो को आकर्षित करने के लिए गुब्बारो पर हाथ रगड़ते ,तो गुब्बारो की त्वचा चीत्कार करने लगती,जिससे शोर मे अजीब सी तीव्रता बढ़ जाती !

--; उदास है क्या भैया ?"

- अचानक पीछे से किसी की आवाज़ आई ! ;

रावण ने चौंक कर कर पीछे मुड कर देखा, तो 'कुम्भकरण ' को खड़ा पाया ! ;

;हज़ारो साल बीत गये ! कुम्भकरण हालाकि शरीर विहीन हो चुका था फिर भी उसकी आत्मा का आकर वैसा ही था,-उसके पुराने शरीर के अनुरूप !  चौड़ी बेडौल काया , आगे बढ़ी हुई बेतरतीब तोंद-- और मोटे मोटे हाथ पैर !

--"; नही कुम्भकरण ! , उदास तो नही थोड़ा चिंतित ज़रूर हू ";
रावण ने कुंभकरण के कंधे का थोड़ा सहारा लेते हुए कहा

--" क्यों भैया ? इस साल तो लाईटिंग पिछ्ले साल से भी ज़्यादा है , और मैदान भी खूब सज़ा है; "

-" वह तो ठीक है , लेकिन लोग हमारा मृत्यु दिवस थोड़ा कंजूसी से मनाने लगे है ; अब देखो ना , हर साल हमारे पुतले , पतले होते जा रहे है ! कारीगर मेटीरियल कम लगता है ,पर बिल पहले से ज़्यादा लेता है !"

--" ठीक कह रहे है भैया ! दशहरा कमेटी भी इस काम मे शायद ज़्यादा कमीशन खाने लगी है !- लकिन, यही तो हम चाहते थे ना भैया... धीरे धीरे ही सही ,   हो तो हमारे मन की रही है ना भैया !"

--"हाँ ....राक्षस संस्कृति का विकास देख कर तो में भी बहुत खुश हूँ ! पहले तो हम लंका तक ही सीमित थे , पर अब तो दुनिया मे हम ही हम है ! यह हमारे लिए गर्व की बात है; !"

-" भैया !! मुझे भूख लगी है ! इस मैदान मे बहुत आदमी है , ! आज्ञा हो तो दस बीस का 'डिनर' कर आऊं  !"

       ....कुंभकरण ने ललचाई नज़रों से भीड़ को देखा जो पुलिस के धक्के खा कर इधर उधर हो रही थी !

--" तुम्हारे पास पहले जैसा शरीर नही बचा है , सिर्फ़ बचा है तो आत्मा का आकार ...!...भला खाओगे कैसे ? "

--" नही भैया ; .....भले ही मेरे पास पचाने के लिए पहले जैसा उदर नही बचा , लकिन भूख तो वैसी ही बची है, वह तो मिटती ही नही है;! "

कुंभकरण ने सफाई दी !

; तभी दूर लंबे लंबे डॅग भरते हुए कोई आता हुआ दिखा !दोनों ने ध्यान से देखा -मेघनाथ, इंद्रजीत ( रावण का पुत्र ) पास आ चुका था !

उसने आते ही रावण और कुंभकरण के पैर छुए ! और फिर कुंभकरण की ओर मुखातिब होकर बोला !

--"; कहाँ गुम हो जाते हो चाचा ? में आपको ढूँढते ढूँढते थक गया! "

--" ; में तो भैया को अकेले देख इन्हें ' कंपनी ' देने चला आया ! लेकिन तुम क्या कर रहे थे वहाँ ? भीड़ में ? ";

--" मुझे भीड़ मे हमारा पुराना दुश्मन " विभीषण " मिल गया था ! वह राम का पिछलग्गू बना उनके पीछे सपाटे से जा रहा था..! एक बार तो मेने उसे लंगड़ी फसाई और वह गिर पड़ा , लकिन फिर मुझे सामने देख कर उठकर फुर्ती से भागा !;

--" तुमने उसे दबोच क्यो नही ळिया ?; "

;कुंभकरण के नथुने  फड़क  उठे !;

_ "मे अकेला था ! उसके साथ उसका पूरा विभीषण समाज था !फिर आजकल राम ने उसे वानर कमांडो दे रख्खे है , जो फ़ौरन उसको घेर लेते हैं !- चाचा अगर आप होते तो एक ही मुट्ठी मे उसे दबोच लेते !"

--" ; जाने दो ! जब हमने उसे तब छोड़ दिया तो अब दबोचने से क्या !! "

रावण ने दोनो को शांत करते हुए कहा !

- " पिता श्री" ! लकिन बदला तो हमे लेना ही है ना; ! "

--" ;बदला ? किससे ? उससे ? जिसने हमारी मददकी ?"--- रावण हंसा ;;

--"हमारी मदद की ? यह क्या कह रहे है पिता श्री ?- वह तो गद्दार था , उसकी वजह से ही तो हम पराजित हो कर मर गये !"

--";मर् गये ? ..क्या हम मर् गये पुत्र ? क्या सचमुच हम पराजित हो गए ? नही पुत्र नही , बिल्कुल नही !"

-रावण फिर हंसा !

--";ठीक है पिता श्री कि हम नही मरे ! पर विभीषण ने तो हमे मरवाया ही ! उसने हमारे साथ गद्दारी तो की ही ! "

--";नही बेटा , उसने तो वही किया जो मैं चाहता था  ! "- रावण इस बार रहस्यमय ढंग से मुस्काराया ;

--" आप ..? आप क्या चाहते थे भा ई ईयी.?"

- कुंभकरण ने इस बार भाई शब्द का उच्चारण ' दीवार फिल्म के अभिनेता शशि कपूर की तरह किया ! ;

--" ;हम चाहते थे की वह ज़िंदा रहे ! हम चाहते थे की वह शत्रु का मित्र बने !हम चाहते थे की "  विभीषण -संस्कृति " पूरे आर्य समाज मे फैल जाए ! और फिर वैसा ही हुआ जैसा मे चाहता था !"- रावण के मूह पर कुटिल मुस्कान फैल गई! उसके स्वर्ण कुंडल दमकने लगे

- आज भारत में हर एक भाई , दुसरे भाई के लिए विभीषण बना हुआ है , जैसे विभीषण ने लंका  अपने शत्रु के हाथ बेच दी थी , आज हर दूसरा व्यक्ति विभीषण की तरह अपना देश को   बेचने को तैयार है ! मज़े की बात है विभीषण होकर भी वह संत  और ' भक्त ' की श्रेणी में पूज्यनीय है !  देश द्रोही विभीषण संस्कृति आज  राम के देश में  पूरी तरह जडें   जमा चुकी है , क्या यह हमारी विजय नहीं है ??

इंद्रजीत और कुंभकरण स्तब्ध होकर उसे देखने लगे !;

--" मे ऋषि विश्ववा का पुत्र !! , राजनीति का प्रकांड विद्वान रावण ,!! क्या मूर्ख था जो मेने उसे लात मारी ? नही पुत्र नही ! विभीषण लात मारने और  हमेशा  त्याग देने लायक ही था ! मे  तो उसे बहुत पहले ही अपने राक्षस समाज से हटाना चाहता था , लकिन तब  क्या करता ? इसीलिए मौका देखते ही मेने उसे ' कट' करके वहाँ 'पेस्ट ' कर दिया , जहा उसकी सही जगह थी ! समझे पुत्र ? ";

दोनो ने हामी भरते हुए सिर हिलाया ! रावण का यह स्वरूप उन्होने पहले कभी नही देखा था; !

--" महराज " !! -----कुंभकरण रावण के इस स्वरूप से स्तब्ध होकर , संबोधन बदलते हुए बोला ; --"फिर भी इतिहास मे उसने हमे तिरिस्कार के योग्य, एक पराजित क़ौम बना दिया ;क्या यह सही हुआ ?""

--"; हाँ पिता श्री !! अब देखिए ,हर साल जनता हमे फूँक कर ताप लेती है , हमारा सरे आम अपमान करती है!---; इंद्रजीत क्षुब्द होते हुए बोला ! ;

--" कौन जनता " ? ......यही लोग ना ? जो इस उत्सव को धूमधाम से मना रहे है ? क्या यह वाकई "जनता " है ?.....नही पुत्र नही !अगर ऐसाही होता तो आज हमारे पुतले हर क़ौम द्वारा, दुनिया के हर कोने मे जलाए जा रहे होते !लेकिन ऐसा नही है! जानते हो क्यो नही है ?;

--" ;एसा क्यो नही है पिता श्री ?"

--"; क्यांकी यह सिर्फ़  मन  समझाने के लिए है कि चलो रावण मर गया ! जबकि  सब  जानते है कि रावण नही मरा ! रावन कभी मर ही नहीं सकता !  हर साल रावण को मारने  के बाद भी वो उसे कभी मार  ही नही पाए !  आज भी  चारों ओर रावण ही रावण है !यहा तक कि  लोगों के  अंदर भी रावण है,! वो खुद भी रावण है ! समझे ?" ; -
रावण ने अट्टहास किया !

; तभी शोर बढ़ गया !किसी विशिष्ट  अतिथि का आगमन हो चुका था ! जिसके इंतज़ार मे उत्सव मे विलंब हो रहा था ! सफेद एम्बेसडर कार मे लाल बत्ती चमकती हुई मैदान मे आई ! उसके आगे - पीछे सायरन बजाते हुए पुलिस कि गाड़ी मैदान मे घुसी !;......,

-" ; ये रथ किस तरह कि आवाज़ करते है पिता श्री ?- जैसे सियार बोल रहे हों !"

--" ; ये 'पुलिस सायरन ' है ! इससे लोग रास्ता छोड़ देते है !"

रावण ने खुलासा किया !

राम और लक्ष्मण के स्वरूपों के साथ विशिष्ट अतिथि आगे बढ़ने लगे ! मैदान मे नारे लगने लगे ! राम और लक्ष्मण के स्वरूपों ने तीर कमान सम्हाल लिए !

--" ; देखो-देखो ! वह विभीषण उंगली से उन्हे बता रहा है ! हमारे पुतलों कि ओर इशारा कर् रहा है "

रावण हंसा--";क्या वो हमारे पुतले है??" -- ;  -" क्या ;कोई जानता भी है हमारे चेहरे कैसे थे ?" ;

-" ;भैया आप ठीक कह रहे है ! देखिए मेरे पुतले कि गुल्मुछ्छ उस हवालदार से मिलती है जो डंडा घुमा रहा है ! "

--"हाँ चाचा !- और मेरी पतली मूँछ उस आदमी से मिल रही है जो उस विशिस्ट अतिथि के साथ साथ दाहिनी ओर चल रहा है ! 

....और हाँ पिता श्री !! ..-आपकी मूँछ !! अरे नही आपका तो  पूरा चेहरा ही  अभी कार् से उतरे उस विशिस्ट अतिथि से मिल रहा है जो राम और लक्ष्मण के साथ आगे बढ़ रहा है !" ;

--" ;बिल्कुल ठीक !!अब ध्यान से देखो , मेरे पुतले के दोनो ओर लगे दस मुंह  भी क्या विशिस्ट अतिथि को घेर कर चल रहे उन  दस लोगों से नहीं मिल रहे हैं जो नारे लगा रहे है ?" ;

--" ;ठीक कह रहे है पिता श्री ! बिल्कुल ठीक ; ! लेकिन  यह कैसे हो गया ? यह तो आश्चर्य है !!"

; रावण हंसा - ; ""यही तो मज़ा है , यही तो राज़ है ! ";

--" ; राज़ क्या है पिता श्री ? कहीं कारीगर तो बदमाशी नही कर गया ; उसीने तो जानबूझ कर वैसे चेहरे नही बना दिए ?" ;

--" ; कारीगर बेचारा मज़दूर आदमी है ,वह क्या बदमाशी करेगा ? और जब वह चेहरे लगा रहा था तो में भी वहीं खड़ा था - उसके नज़दीक !" ;

--" ; तो फिर पिता श्री ?" ;

--" ; उसने कई चेहरे बनाए और फिर बिगाड़े और फिर फिर बनाए , लकिन इन चेहरों के अलवा कोई और चेहरा बना  ही नही पा रहा था वह ... !";

_ "लकिन ऐसा कैसे  हुआ पिता श्री ?" ;

" --' विधाता' कि करतूत !! - रावण हंसा ; "कारीगर रोज़,   दिन रात अख़बारों , पोस्टरों , चौराहों, टीवी मे इन्ही चेहरो को देखता है ! उसके दिमाग मे यही चेहरे रच बस गये है , तो फिर वह और क्या बनाएगा ?  उसके लिए तो  यही सब चहरे  ' रावण  ' हैं !" ;

तभी मैदान मे आतिशबाज़ी जगमगा उठी !आकाश चमक से भरने लगा ;

--" ;लीजिए !! वह छूट गया तीर! अब पुतले आग पकड़ने लगे !"- इंद्रजीत ने उन्सांस भर कर कहा !

   " हमारे नहीं ..! खुद उनके पुतले -  " रावन हंसा !

__" ; हाँ चलो हो गया  पुतलों का दहन ! लकिन हमारे चेहरे अभी भी सुरक्षित है ! कोई हमारे असली चेहरे जान ही नही पाया , तो भला हमे क्या मारेगा; ?" - -रावण ने गंभीरता से कहा ! ;

अचानक भीड़ मे शोर शोर मच गया ! रावण , कुंभकरण और मेघनाथ धीरे से भीड़ मे घुलकर विलीन हो गए !


----सभाजीत शर्मा 'सौरभ'

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

gaandhi

एक दिन के जलसों में , अब सिमिट कर रह गए गाँधी ॥,
औपचारिक लेखों के , हो गए है विषय गाँधी ॥!!

राजनेतिक  फकीरी , ' झंडे' बनी   दरगाहों की ,
रस्मे सालाना उर्स की  ' कव्वाली '  बन गए गाँधी ॥

राम् धुन खादी और चरखा , चला कर रुखसत करें ,
एक दिन के सरकारी मेहमान हो गए गाँधी ॥

साल कुछ ही बीते है , उस शख्श को बिछुडे हुए ,
पाठ्य पुस्तक के किताबी ज्ञान हो गए गाँधी ॥

शाहरुख़, सलमान, आमिर ,विपाशा चर्चा में है ,
पीढियों के लिए तो अनजान हो गए गाँधी ॥

आचरण दूषित , पढाएं 'मुन्ना भाई गांधीगिरी ,
बाक्स ऑफिस के उछल कर हो गए प्रतिमान गाँधी ॥

हुकूमत से लड़े  जो निर्बल की खातिर उम्र भर ,
खानदानी हुकूमत के ही , हो गए पहचान गाँधी ॥

 कुर्सियों पर जमने खातिर, बटोरती  जनता के वोट ,
राजनेतिक पार्टियों के बन गए है ब्रांड गाँधी ॥
......,
 तब वो गाँधी कौन था , जिसको की हमने ' बापू' कहा ?
कौन था वह शख्श , जो आदर्श बन दिल में रहा ?
कौन थी वह शख्शियत जिस पर विदेशी मुग्ध है ??
अहिसा का पुजारी वो कौन गौतम बुद्ध है ??

किसके अनुयायी अभी है , चीन तिब्बत जापान में ,
कौन वह जिसके की आगे सर झुके सम्मान में ??
कौन वो ओबामा का इष्ट ? कौन लूथर किंग है ? ,
कौन है वह गाँधी जिस से , बेन किंग्सले दंग है ??

कौन वह शान्ति का पुजारी , कौन जन मन शक्ति है ?
कौन सिद्धांतों का महात्मा , कौन सत्ता विरक्त है ??
कौन है ख़ुद आचरण और कौन ख़ुद विचार है ,
कौन है वह सनातन जो हर जगह पर व्याप्त है ??


मिटटी कीचड़ से सना गाँधी , एक दिन फ़िर आएगा ,
आडम्बरी जन प्रतिनिधियों , तब तुम्हे न कोई बचायेगा ॥

.....सभाजीत