मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

विन्ध्य की विरासत

 मैहर नगरी  शारदाधाम

नेपथ्य गीत -,, स्त्री स्वर में ,, , ' कैसे के दर्शन पाऊं री , माई तोरी संकरी किवड़िया ' 


  एंकर - सतना से ४० कि ० मी ० दूर , ,    , हावड़ा- मुंबई रेलवे मार्ग  पर बसा मैहर नगर , आज सम्पूर्ण भारत का पवित्र  तीर्थ स्थल  है !  हजारों   श्रद्धालु भक्तों का मेला इस नगर के प्रांगण में दिन रात  लगा रहता है ! क्यों ना हो ,,? ,,विंध्य श्रेणी के  त्रिकूट पर्वत पर विराजी ,   , विवेक और वाणी की अधिस्ठात्री , सिद्धि  दात्री  माई शारदा  का धाम  तो  इसी नगरी में है !  विश्व में संगीत  का डंका बजाने वाले , सितार के  जादूगर  , और सरोद वाद्य के अद्वितीय साधक , रविशंकर और अलीअकबर खान साहब का  गुरुकुल  भी तो  इसी नगरी में   है !  आध्यात्म  , और  भक्ति मार्ग  के स्वामी ,  सिद्ध संत नीलकंठ महराज की तपोभूमि  भी  तो  यही नगर मैहर  है !
    , मैहर का अर्थ है ,," माई हार "  यानी मैया का आँगन ! माई के आँगन में आया हर व्यक्ति ,    खुद को बेटे की तरह  ,   माँ  के सुरक्षित आँचल में निर्भय महसूस करता है ! उसे विश्वाश होता है की  माँ उसके  सब  दुःख दर्द दूर करेंगी , हर कष्ट का निवारण करेंगी , और वह  माँ  के दर्शन करके ,  एक नयी ऊर्जा के साथ ,  मन में शान्ति धारण कर यहां से  वापिस अपने घर लौटता है ! माँ  की ममता होती ही ऐसी है ,, की  बिना हिचक , वह अपनी संतान को वह सब देती है ,  जो उनसे मनुहार करके मांगते हैं !

  ! संकल्प की लाल ध्वजा आसमान में फहराते हुए , मीलों दूर से टोली बना कर ,  भक्ति  गीत गाते हुए , ग्रामवासी ,  माँ के आँगन में पहुँचते हैं  खेतों में बोई फसल के प्रतीक चिन्ह जवारों  के साथ  , की हे माँ ,,हमारा कृषि धन तुम्हें अर्पित है ,, तुम हमारे घर , परिवार , और कृषि धन की रक्षा करना !

     कई लोग इस स्थान को शक्तिपीठ  मानते  हैं !यहां विभिन्न  वेशभूषाओं में तांत्रिक , और साधक भी पहुँचते हैं ,  ,  अपने तप , और अपनी साधना   का फल पाने के लिए !  ,
 

  ( रेलवे स्टेशन )
        प्रतिवर्ष श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देख कर , रेलवे विभाग ने इस स्टेशन को , प्रतीक्षालयों  को सुविधायुक्त  और आकर्षक बना दिया है ! स्टेशन पर , ट्रेनों के रुकने हेतु , सर्वसुविधायुक्त , ३  लम्बे प्लेटफार्म  बन चुके हैं ! स्टेशन पर खान पान की सुविधा के साथ , जल वितरण की समुचित व्यवस्था है ! स्टेशन पर  इस नगरी की महत्ता का विवरण भी अंकित किया गया है ,,,जिसमें इसे संगीत महर्षि , उस्ताद अलाउद्दीन खान की नगरी के रूप में भी उल्लेखित किया गया है ! स्टेशन से बाहर निकलते ही , ऑटो रिक्शा , यात्रियों का इंतज़ार करते खड़े दीखते हैं ! ये मंदिर तक जाने का आधुनिक साधन हैं ! कुछ वर्षों पूर्व  , मंदिर जाने के लिए तांगों  और साधारण  रिक्शाओं का भी प्रचलन था किन्तु समय के परिवर्तन ने इन्हे विलुप्त कर दिया !
      (   घंटाघर चौक )

  मैहर की शारदा देवी मंदिर की और अग्रसर होते हुए , मार्ग में , मैहर बस्ती  के भी दर्शन होते हैं ! चहल पहल से भरपूर बस्ती ,  अपनी धार्मिक आस्थाओं के साथ साथ अपनी जीवन्तता का भी परिचय देती है !  मार्ग में पड़ने वाले कुछ पुराने मंदिरों को पार कर , मैहर के उस चौराहे से गुजरते हैं ,  जो घंटाघर चौक कहलाता है ! इस चौराहे पर ही मैहर का मुख्य बाज़ार है ! यहीं  एक संगीत महाविद्यालय भवन है , जिसमें  उस्ताद अलाउद्दीन खां  के द्वारा स्थापित मैहर बेंड का वादन हर शाम होता है !  चौराहे से देवी मंदिर की और आगे बढ़ने पर , मिलता है , विशाल तालाब विष्णु सागर ! गर्मियों में यह प्रायः सूखा रहता है , किन्तु बरसात में इसका जल सड़क के किनारों को छूने लगता है ! त्रिकूट पर्वत पर स्थापित मंदिर की आभा यहीं से स्पष्ट दृष्टिगत होने लगती है , और हर यात्री के पग , उल्लासित हो क्र मंदिर निहारते हुए , तेजी से उठने लगते हैं !
      

   ( बीएस स्टेण्ड )

आगे आता है , मैहर का सर्वसुविधायुक्त , बस स्टेण्ड ! सड़क मार्ग से आने वाले यात्रिओं  की बसें इस स्थान तक आ कर यात्रिओं को उतारती हैं !  बसों से उतरे हुए , यात्रियों के झुण्ड भी , माता के दर्शन के लिए , अपनी पग यात्रा प्रारम्भ करते हैं !  साधन संपन्न यात्री , यहां खड़े , ऑटो रिक्शाओं का सहारा ले लेते हैं ,, और मंदिर की और अग्रसर हो जाते हैं !
    किसी भी साधन से आये , किसी भी दिशा से आये , किसी भी स्थिति से आये , इस नगरी में , माता के दर्शन हेतु आया हर व्यक्ति , एक श्रद्धालु ही होता है ! माता के  दर्शन हेतु  आया , थका हारा , उसका एक पुत्र ! जिसे अपनी माँ के दर्शनों की चाह है , और माँ  ने जिसे अपने धाम बुलाया है !

       लगभग  १०० मीटर ऊँचे , उत्तंग शिखर पर बिराजी शारदा , आदिशक्ति का  सार्व भौम  स्वरूप हैं , जो मनुष्य की जिह्वा में वास करती है ! यह आदि शक्ति , जन्म से ले कर मृत्यु तक , सम्पूर्ण  जीवों  के विवेक और बुद्धि की स्वामिनी है ! ज्ञान के प्रतीक चिन्ह , कमल , शंख ,  पोथी  , और माला  , उनके कर  कमलों  में विदवमान है ! ज्ञान के अनुयायी भक्तों की रक्षा का भार , वे स्वयं उठाती हैं !  उनके भक्तों को किसी  अस्त्र  ,  शस्त्र  युद्ध कौशल , शारीरिक बल की जरूरत नहीं ! संकट के क्षणों में , अपने असहाय भक्त  की रक्षा , वे उसे बुद्धि  प्रदान करके करती हैं !
        , शारदा मंदिर के  प्रांगण में प्रवेश करते ही मन आल्हादित हो जाता है ! मंदिर के नीचे फैले क्षेत्र में ,  ध्वजा पताकाओं से  सजा  ,  छोटा सा बाजार , स्थानीय मेले का आनंद देता है !  माँ  को प्रसाद चढ़ावे  में , नारियल ,  इलायची दाने , चुनरी , और फूल  मालाएं स्वीकार हैं ! यह सहज  चढ़ावा है , जो हर व्यक्ति की आर्थिक सीमाओं के अंदर है ! मंदिर और मंदिर के  पूरे  परिसर की व्यवस्था की बागडोर आज स्थानीय प्रशाशन के हाथों है ! ,इसलिए , नवरात्रि की संभावित भीड़ को नियंत्रित करने के लिए , परिसर से बहुत पहले से ही , छावं युक्त मार्ग विभाजन , इस तरह किया गया है , की श्रद्धालु गण कतार   में चल कर , निर्विघ्न रूप से मंदिर तक पहुँच सकें ! मंदिर के नीचे बनी दुकानों में , हाथ  पावं  धोने  , नहाने की समुचित व्यवस्था है ! ! मध्यमवर्गीय सम्पन्न श्रद्धालुओं की सहूलियत के लिए , यहां स्थानीय औद्योगिक संस्थानों   ने  धर्मशालाएं बना दी हैं  जहां लोग ठहर भी सकते हैं !
      - प्रसाद हाँथ में लिए , यात्री नंगे  पावँ  , मंदिर की प्रथम   सीढ़ी   पर बने , विशाल  प्रवेश द्वार पर पहुँचते हैं , जहां द्वारपाल के रूप में स्थापित हैं ,,भैरव देव ! जय  माँ  शारदे के जय घोष के साथ , ललाट पर टीका लगवा ,  माता का नाम ले  कर भक्त  शुरू करते हैं ११५६  सीढ़ियों की  छायादार  चढ़ाई ! पर्वत  शिखर पर पहुँचने के लिए किसी जमाने में मात्र ५६५ बिना छाया दार ,  सीढ़ियां ही थी , जो तीन चरणों  की दुर्गम , यात्रा को बहुत श्रमदायक बना देती थी !  लेकिन आज , पर्वत शिखर पर पहुँचने के लिए , यात्रा बहुत सुगम हो गयी है ! मंदिर के निकट से , ऊपर शिखर तक पहुँचने के लिए आज एक  आधुनिक  रोप  वे उपलब्ध है , जिसमें निर्धारित किराया दे कर ,  सरलता पूर्वक ऊपर पहुंचा  जा सकता  है ! मंदिर के चारों और घूम कर , ऊपर शिखर तक जाने वाली , एक सड़क मार्ग भी है , जिसके माध्यम से वाहन सहित , पर्वत के तीसरी चरण तक आसानी से पहुंचा जा सकता है !

      बलुवा पर्वत के क्षरण की आशंकाओं को देखते हुए , अब पूरी सतर्कता बरती जा रही है , इसलिए नारियल चढाने का काम अब नीचे के प्रवेश द्वार पर ही सम्पन्न कर दिया जाता है ! अपने बालक की मंगल कामना के साथ , मुंडन संस्कार करवाने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी , अब मंदिर के नीचे ही , एक स्थान नियत कर दिया गया है !  यहां , नाइयों की टोलियां , अपने आसान  बिछाये  ,   बढ़ावे के गीतों के मध्य , रट सुबकते बच्चों का मुंडन करते है , जिनकी फीस स्थानीय प्रशाशन ने नियत कर दी है !
       जितनी भक्ति , जितना  परिश्रम , , उतना ही फल , की भावना  से  ओत  प्रोत अधिकतर श्रद्धालु , मंदिर पहुँचने के लिए ,  सीढ़ी  मार्ग ही , चुनते हैं !  प्रारम्भ में जोश देखते ही बनता है , लेकिन धीरे धीरे उन्हें मालुम हो जाता है की , माँ  के दर्शन आसान नहीं , जब स्वेद कण उनके मुंह पर झलकने लगते हैं ! ऊपर की और नजर गड़ाए , मान से दर्शनों की मनुहार करते , वृद्ध , अपाहिज , भी हिम्मत नहीं हारते और एक एक  सीढ़ी चढ़ते हुए , अंत में पहुँच ही जाते हैं मंदिर के द्वार पर !
         सीढी और सड़क मार्ग से पहुंचे यात्री जब मंदिर के प्रवेशद्वार पर पहुँचते हैं , तो उन्हें वहां बैठा मिलता है एक नफरी ! नगाड़े की ध्वनि करता हुआ , वह सबकी मनोकामनाओं की पूर्ती की मंगल कामना करता है ! अंदर एक छोटा सा प्रांगण है , जिसमें , हर सुविधाओं से पहुंचे श्रद्धालु , एक सार हो कर कतार  बद्ध  हो क्र आगे बनी , संगमरमर की सीढियों पर चढ़ कर  माँ  के समक्ष जा खड़े होते हैं ! माँ  की झलक पाते ही हर यात्री , अपने  श्रम  और थकान को भूल कर , उन्हें एकटक अपलक निहारने लगता है ! आल्हादित मन में एक ही भाव उत्पन्न होता है ,,'माँ ,,, मेरा कुछ नहीं , जो कुछ दिया वह तुम्हारा ही है ! ! माता के सामने माथा टेक  कर वह अपनी मनोव्यथा , मनोकामना व्यक्त करता है और साथ लाये नैवेद्य को भक्तिभाव के साथ समर्पित कर देता है ! एक क्षण के लिए , शक्ति और भक्ति एकसार हो उठती है ! चरणामृत ग्रहण कर , माथे पर टीका लगवा कर , प्रसाद ग्रहण कर , प्रफुल्लित मन से लोग आगे बढ़ जाते हैं , कतार का एक अंग बन कर !
   कभी कभी श्रद्धालुओं को माँ  की  आरती में  भी समंलित होने का अवसर मिल जाता है  जो दिन में तीन समय होती है !  प्रातः ,  दोपहर ,  और सांध्या की आरती दर्शनीय है ! जिनमे  आरती का सामूहिक गीत , और अग्नि की लौ , एक ऐसे वातावरण का सृजन करती है , जो अलौकिक होता है !

   आगे  , नरसिंघ अवतार की मूर्ती विराजमान है और बगल में है संकटमोचक हनुमान !  नरसिंघ अवतार की मूर्ती  विष्णु के अवतार की द्योतक है !  किन्तु इस अवतार का स्वरूप अनोखा है ! हाथ में कोई  अस्त्र  शस्त्र  नहीं , ना मनुष्य है ना पशु ,किन्तु हिरणाकश्यप जैसे वरदानी असुर की मृत्यु का कारक  है !  यह स्वरूप  हिरणाकश्यप को मिले उन वरदानी कवच का बौद्धिक तोड़ है , जिसके बिना , उसका अंत सम्भव ही नहीं था ! उधर हनुमान हैं , जो   विष्णु की  सहायतार्थ शिव द्वारा  लिया गया अवतार  कहे गए हैं ! विद्या    वारिधि  , बुद्धि विधाता , हनुमान के लिए ज्ञान और शक्ति एक ही स्वरूप में  निहित है !  देवी परिसर में इन दोनों अवतार स्वरूपों का आध्यात्मिक महत्त्व है ,,इसलिए , देवी दर्शन के बाद , श्रद्धालु ,इन्हे सर नवाते हैं !
  मंदिर के पृष्ठ भाग में , माँ को याद दिलाते रहने के लिए , हत्थे लगाने का रिवाज है ! मंदिर के पीछे  वाले  शिखर प्रांगण में आ कर लोग संतोष अनुभव करते हैं की उनकी देवी दर्शन की साध पूरी  हुई ! प्रांगण में लगे वट वृक्ष को महिलायें धागा बाँध कर मनौती करती हैं !  माता के मंदिर परिसर  का  कण कण साध पूरी करने का साधन  है ! यहां घुमन्तु फोटोग्राफर  , मंदिर यात्रा की यादगारों को  फोटो में ढाल कर तुरंत पकड़ा देते हैं ,,, सदैव के लिए सहेज कर रखने के लिए !
     ,शिखर से नीचे झाँकने पर , नीचे बसी दुनिया  और चलते फिरते लोग , खिलौनों की तरह प्रतीत होते हैं ! हिन्दू धर्म का यही तत्व सार है ,,,जब आप ईश्वर के निकट होते हैं तो शेष दुनिया आपको बौनी दिखती है ! शिखर से नीचे उतरते हुए यात्री धीरे धीरे  पुनः  उसी  मायाजाल में प्रवेश करने लगते हैं , जिसे छोड़ कर , वे ऊपर माँ के दर्शन हेतु गए थे ! सीढ़ियों के दोनों और बैठे याचक , बहुरूपिये , मदारी , संपेरे , उन्हें नीचे की दुनिया से  जोड़ने  का माध्यम बनते हैं !नीचे बाज़ार है , माँ के चित्रों , मूर्तियों , अंगूठियों , घणो से सजी धजी दुकाने , भौतिक धरातल पर फिर ले आती हैं ! स्त्रियां अपने सुहाग रक्षा का सिंदूर खरीदती है , तो बच्चे खिलौने , और शर्म से निवृत हुए पुरुष क्षुधा शांत करने के लिए रेसुरेन्ट तलाशते हैं !
    माता के दर्शन , वर्षों के पाप धो देती है ! धरातल पर आकर भले ही मनुष्य फिर से मायाजाल में फंस जाता है , किन्तु माता उसे सदैव सचेत करती रहती है ! यही मनुष्य का जीवन क्रम है ,, अनवरत , निरंतर , !यही जीवन चक्र है ,,! यही हिन्दू दर्शन है !
   
 (   आल्हा का अखाड़ा )

" माता के भक्तों में , महोबे के शूरवीर , और आध्यात्मिक साधक , ' आल्हा ' का नाम यहां बहुत चर्चित है ! मंदिर के पीछे , एक स्थान ' आल्हा के अखाड़े  " के नाम से विख्यात है ! किंवदंती है की आल्हा शारदा के परम भक्त थे , और उन्हें अमरत्व का वरदान प्राप्त  था ! वे नियमित रूप से इस मंदिर में आते थे ,, और माता को पुष्प चढ़ाते थे ! वे चंदेल शाशक परमाल के दरबार के योद्धा थे , और जब १२वीं सदी में , दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने चन्देलों को हराया , और आल्हा के  छोटे भाई उदल  बलिदान हो गए , तो  आल्हा जंगलों में चले गए ! आज भी  एक पुष्प , ब्रम्ह मुहूर्त बेला में , मंदिर के पट खोलने पर , माता के चरणों में चढ़ा हुआ दिखता है ,  कहते हैं वह आल्हा द्वारा चढ़ाया जाता है !
   

  (  रामपुर मंदिर )

   त्रिकूट पर्वत के  पीछे , पर्वत श्रंखला का जो किला नुमा एक घेरा दिखता है ,, उस पर स्थापित है एक और सिद्ध पुरुष , नीलकंठ महराज  का तपस्या स्थल !  नीलकंठ महराज पर माता की कृपा थी , और उन्हें कई सिद्धियां प्राप्त थीं ! कहते हैं की जो एक बार महराज के मुख से निकल जाए , वह  होनी में   बदल  जाता  था ! उनके इस स्थान पर आज एक  प्राचीन रामपुर  मंदिर है , जिसमें राधाकृष्ण की भव्य मूर्तियां स्थापित है !
     
     (   ओइला  आश्रम )
  नीलकंठ महराज द्वारा एक आश्रम सतना मार्ग पर स्थापित किया गया था  , जहां उनके आध्यात्म गुरु ढलाराम की समाधि है ! यह आश्रम अब '  ओयला  आश्रम ' के नाम से भव्य धार्मिक परिसर का रूप ले चुका है ! नीलकंठ महराज द्वारा , गरीबों के लिए प्रारम्भ किये भंडारे की परम्परा यहां आज भी निरंतर है !  नील कंठ महराज के समाधिस्थ होने पर उनकी भी समाधि यहीं बनाई गयी , और उसके साथ विभिन्न देवताओं के भव्य मंदिर भी निर्मित हुए ! यहां सिद्धविनायक , आदिशक्ति जगदम्बा , आदिदेव शिव , लक्ष्मी नारायण , राधाकृष्ण और रामदरबार की भव्य मूर्तियां हैं , जो आये हुए यात्रियों की मनोकामना पूर्ण करते हैं ! मैहर का यह पवित्र स्थान भी , माता शारदा के मंदिर के बाद दर्शनीय स्थान के रूप में जाना जाता है !
   
   ( गोला मठ )

 धर्म ध्वजा धरनी , मैहर में अनेको अनेक प्राचीन स्थान , सिद्ध क्षेत्र की तरह बिखरे हुए हैं !  जिसमें बड़ा अखाड़ा , गोला मठ , हरनामपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर , गोपाल मंदिर आदि हैं ! मंदिर मार्ग पर स्थित गोला मठ १०वीं सदी में , कलचुरियों द्वारा बनाया गया शिव मंदिर है ! यह पूर्वमुखी , पंचरावी , नागरा शैली में बनाया गया मंदिर है , जिसके बारे में कहा जाता है की इसे मात्र पंद्रह दिनों में तैयार किया गया था !  इसके शिल्प में , खजुराहो के मंदिरों के दर्शन होते हैं  , जो बताते हैं , की  भोग और योग से ऊपर उठने पर ही शिव की प्राप्ति होती है !गोला मठ को भी मैहर के एक और साधक , मुड़िया महराज की तपोस्थली कहा जाता है ! बड़े अखाड़े में महाराजा मैहर के प्रथम गुरु द्वारा स्थापित   राम जानकी मंदिर है ! हरनामपुर के समीप स्थापित जगन्नाथ मंदिर में प्रस्तर कला के विशिष्ट नमूने देखने योग्य हैं !  यहां वर्ष में एक बार रथ यात्रा भी निकलती है !
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     (   बाबा अलाउद्दीन )
       मैहर एक और सिद्ध पुरुष की तपोस्थली है , संगीत के महर्षि उस्ताद अलाउद्दीन खां की तपोस्थली ! बंगाल से , संगीत विद्या की प्यास मन में  लिए निकले  , अलाउद्दीनखाँ ने पहले कई घरानो में संगीत सीखने के लिए देश की  गालियां नापीं , और अंत में रामपुर घराने से उन्हें वीणा वाद्य के बाज का गुरुमंत्र प्राप्त हुआ ! किन्तु यह सीख भी दी गयी की वह हमेशा उसी घराने के शिष्य कहलाएं  और किसी को यह विद्या ना स्थानांतरित करें !  विद्या दान की वस्तु है ,, प्रसार की वस्तु है , इस मंत्र  को हृदय में रख कर वह मैहर आये , और शारदा की ड्योढ़ी पर बैठ कर महीनो सरोद पर  रियाज़ किया ! माता प्रसन्न हुई तो उनके  गुण  ग्राहक बने यहां के राजा बृजेन्द्र सिंह ! अलाउद्दीनखाँ से उन्होंने ना सिर्फ गंडा  बंधवाया , बल्कि उन्हें भूमि दी , आर्थिक सहायता दी ! धीरे धीरे बाबा अलाउद्दीन की ख्याति पूरे देश में फ़ैल गयी और माता शारदा की कृपा से उन्हें दो ऐसे शिष्य रत्न मिले जिन्होंने , मैहर को एक संगीत घराने का नाम दे दिया ! सितार के जादूगर , पंडित रविशंकर , और खुद अलाउद्दीनखां साहब के पुत्र  सरोद वादक अली अकबर खान ,  बाबा से संगीत सीख  कर , देश के वे रत्न बने जिनकी चमक देश के साथ साथ  विदेश तक में  आलोकित हुई ! सुश्री , अन्नपूर्णा देवी , जो बाबा की बेटी थी , एक कुशल संगीत साधक हुईं , और उनका विवाह रविशंकर के साथ हुआ !
          बाबा के समाधि स्थल का नाम मदीना भवन है , जो उनकी पत्नी के नाम पर है ! यहां पर उनके जीवनकाल के चित्र , पुराणी यादें ताजा करते हैं ! उनके ही घर में एक म्यूजियम भी है जहां अनेक प्रकार के भारतीय वाद्य यंत्र , मैहर गुरुकुल की कथा कहते दीखते हैं ! बाबा , प्रयोग धर्मी संगीतज्ञ थे ! राजा के शस्त्रगार में  रखी  पुराणी बंदूकों की नालें काट कर उन्होंने उसे एक नए वाद्य यंत्र का स्वरूप दे दिया , जो आज मैहर बेंड का  अभिनव  वाद्य , नलतरंग कहलाता है !  मैहर बेंड भी बाबा के दें है , जिसमें उन्होंने मैहर के संगीत प्रेमी बच्चों को जोड़ कर , उन्हें वाद्य यंत्र बजाना सिखाया , और सैकड़ों तर्जें इज़ाद की , जो आज मैहर बेंड की शान है !

     ( राजघराना महल )
 ,  मैहर की आधारशिला है यहां का राजघराना ! जिसके कला प्रेम से ही आज मैहर पूरे देश में , संगीत घराने के रूप में विकसित हुआ ! यहां के राजा बृजेन्द्र सिंह को भी एक सिद्ध पुरुष कहा जाए तो अतिशियोक्ति ना होगी ! जिस स्थान पर माता शारदा विराजी हो , उस स्थान के राजा पर माँ की ऐसी कृपा रही , की उन्हें कभी संकट देखने या झेलने का कोई अवसर सम्मुख नहीं आया ! महाराजा बृजेन्द्र सिंह वे भागीरथ थे , जो संगीत की मंदाकिनी बाबा अलाउद्दीन को मैहर ले कर आये !
 मैहर रजवाड़े के महल उस संगीत चेतना , और भक्ति भाव के गवाह हैं , जो इस रजवाड़े में व्याप्त रही ! रजवाड़े के महल , परकोटे , भग्नावशेष ,  किले , प्राचीरें , आज भी उन राज सिद्धों को नमन करती हैं , जिनके कारण आज मैहर दृश्य है ! उनके महल के दरबार में अभी भी लगता है जैसे संगीत की महफ़िल अभी अभी उठी हो !


   ( सीमेंट उद्योग संस्थान के चित्र )
        ! यद्यपि आज रजवाड़े और राजा नहीं रहे , किन्तु उनके स्थान पर , औद्योगिक घ्राणो के  विशिष्ट उद्योगपति , मैहर की यश पताका  पूरे विश्व में फहरा रहे हैं ! विंध्यांचल की तराई में , कटनी से रीवा तक , पृथ्वी के गर्भ में छिपी , एक अदम्य शक्ति , लाइम स्टोन आज विश्व में उच्च गुणवत्ता की सीमेंट का आधार है ! जो आधुनिक भारत के निर्माण में अपनी अदब्वितीय भूमिका निबाह रही है ! पहले यहां चुने के भट्ठे लगते थे ,, लेकिन पर्यावरण के मूल्यों को नमन करते हुए अब वे शांत हैं ! आज यहां , बिरला घराने का  मैहर सीमेंट उद्योग के साथ साथ , रिलायंस सीमेंट , केजेएस सीमेंट के संयंत्र निरंतर सीमेंट निर्माण में संलग्न हैं !
        
        ( िचौल आर्ट के सीक्वेंस ) 
        बदलती हुई संस्कृति के बीच ,  पुरानी  संस्कृति को कलात्मक स्वरूप दे कर , अक्षुण रखने का काम कर रही है , मैहर के निकट बसे  ग्राम  इचौल में स्थापित।  इचौल  आर्ट संस्था ! यह आज एक दर्शनीय स्थान के रूप में करवट लेता स्थान है जो सतना मार्ग पर , मैहर से मात्र दस किलोमीटर दूर है ! यहां कबाड़ से निकली चीजों को अद्भुत रूप दिया गया  है और इसे एक पार्क के स्वरूप में विकसित किया गया है ! परिसर के अंदर ही , एक रेस्टोरेंट है जहां सभी व्यंजन मिलते हैं !

     ( उपसंहार )
  ,, आध्यात्म , संगीत , भक्ति , और शक्ति की पर्याय मैहर नगरी को लोग कई पीढ़ियों से नमन कर रहे हैं ! मैहर के वायुमंडल में संगीत झंकृत होता रहा है  , और सिद्ध दात्री माँ  शारदा की अनुकम्पा , इस भूमि के कण कण पर है ! माँ  के दर्शनों की ललक मन में लिए यहाँ के ग्रामीणों के कंठ से , लोकगीतों के  मधुर स्वर निरंतर फूटते हैं,,
 " माई के दुआरे एक अंधा पुकारे , देवो  दर्श घर जाऊं री , माई तोरी संकरी किवड़िया " 
   प्राचीन काल में भले ही माई के मंदिर की किवड़िया संकरी रही होगी , लेकिन आज माई के द्वार की किवड़िया संकरी नहीं हैं ! पूरे देश के कोने कोने से आकर माई के दर्शनों का अमृतपान , भक्त निरंतर , ३६५ दिन करते हैं , और माई उन्हें निरंतर वात्सल्य भाव से  निहारती है , उनकी मनोकामना पूरी करती है , उनके  दुखों का निवारण करती हैं !
         एक बार मैहर आइये , तो आप बार बार मैहर आएंगे , यह हमारा विश्वाश है ! 

---- आलेख सभाजीत

  

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

,," विंध्य की विरासत " ,,

    प्रथम अंक 

( एक व्यक्ति  ढलवां पहाड़ी  के पीछे से निकल कर , क्रमशः उठता हुआ  ,,कैमरे के  आगे आता है  !  पीछे , पृष्ठभूमि में  फ़ैली हुई  विंध्याचल पर्वत  की चोटियां हैं    !  आगे आया  हुआ ,,   एंकर है ,,कैमरा  ज़ूम हो कर  एंकर  पर जाता है ! )

एंकर -दोस्तों,,! आज हम अपने धारावाहिक " विंध्य की विरासत " के माध्यम से ,  विंध्याचल पर्वत  के पूर्वोत्तरी भाग में बिखरी , उस भूमि से आपका परिचय कराने जा रहे हैं , जिसके कण कण में राम का वास है ,    जिस की  पवित्र  भूमि में ,  ऋषियों  और  महर्षियों के तप का तेज ,है   जिसके    अतीत के पृष्ठों में ,   कई  वीर राजवंशों की गाथाएं हैं , और जिस के  नगरों में  पग पग पर आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक की राष्ट्रीय धरोहरें स्थापित हैं ! यह भूमि भाग ,,, विंध्याचल पर्वत की तराई में , बघेल खंड के  शहडोल जिले  से लेकर, रीवा  , सीधी , सतना , पन्ना जिले  के घने जंगल लांघता ,  , बुन्देल खंड के  ऐतिहासिक नगर खजुराहो , , ओरछा , टीकमगढ़  तक फैला हुआ है !यह  भूमि भाग ,  आदिकालीन द्रविण संस्कृति  और आर्य संस्कृति की   साझा विरासत     है !
   

   { नेपथ्य से वाइस ओवर  ) ( विभिन्न दृश्यावली के साथ )  ,
 भारत के हृदय क्षेत्र , मध्यप्रदेश की , पूर्वोत्तरी सीमाओं पर   , पौराणिक कथाओं के अनुसार ,  अगस्त ऋषि  को दिए वचन को निबाहता विंध्याचल पर्वत , जिस भू भाग को अपने  अंक में समेटे है , वह विंध्य भूमि के नाम से  जाना जाता  है ! इस क्षेत्र को सींचने वाली सात  नदियाँ  , रिहन्द , सोन , तमसा ,  सतना , केन , धसान , और बेतवा ,  निरंतर  बहने वाले   गहन जल से भरी हैं ! !'  विंध्यांचल की  कैमोर श्रेणी के सहारे बहते हुए सोन  के  तट  पर ,विंध्याटवी  के  रमणीक  वन में   स्थित   , , भ्रमर शैल   पर   ,  महाकवि बाण भट्ट ने , अपना आश्रम बना कर , कालजयी काव्य कथा  "  कादंबरी  " की  अद्भुत रचना की ! इसी सोन के   तट  पर ,  चंद्रेह  के अद्भुत शिव मंदिर का निर्माण हुआ  ! इसी सोन के तट पर , मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम था और  , आधुनिक भारत के निर्माण में , पर्वतों को तोड़ कर , महीन बालू प्रदान करने वाली प्रमुख  नदी यही सोन है इसी सोन नदी  को   बाँध कर , आज  बड़ा जल विद्युत् उत्पादन  शक्तिकेंद्र बनाया गया है  !



  कैमोर पर्वत श्रंखला के ही ' तामकुंड '  स्थल से निकली , -विंध्य क्षेत्र की प्रमुख  दूसरी प्रमुख  नदी, ,,  '  तमसा ',, यानी टोंस नदी का  यहां के जनजीवन में  बहुत महत्त्व  है ! यह नदी  यहां के  चूने   पत्थर के पथरीले क्षेत्र पर बहती हुई , धार्मिक नगरी  मैहर  में  ,  माँ  शारदा का मुंह निहारती हुई , सतना नगर के निकट , माधवगढ़ किले को  दुलारते हुए  , रीवा जिले के विद्युत् शक्ति केंद्र सरमौर  में पहुँचती है  और फिर वहां से निकल कर चाकघाट होते हुए    यमुना नदी में   जा मिलती है ! २६४ किलोमीटर की इस यात्रा में , वह  , रीवा रियासत  में  कई मनोरम  प्रपातों का सृजन करती है  जो देखते ही बनते हैं ! पुरवा , चचाई , और क्योटी प्रपात , विंध्यभूमि के चर्चित प्रपात हैं , जिसका अपार जल  हृदय को आनंदित करता है ! तमसा नदी का उलेख रामायण में भी है , जिसके किनारे पर , राम ने , वनयात्रा के दौरान , अयोध्या त्यागने के बाद पहली रात्रि विश्राम किया था ! आधुनिक भारत के निर्माण में , विंध्याचल श्रेणियों की तरहटी में , बिखरा  चूने  पत्थर का अनमोल खजाना , सीमेंट निर्माण का मूल तत्व है ! इसलिए सतना और रीवा क्षेत्र  में आज सीमेंट के कई कारखाने उच्च ग्रेड की सीमेंट बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं !

   ( नेपथ्य में  वाइस ओवर  )
  विंध्य भूमि का रीवा नगर , बघेल राजवंशों की  राजधानी  रहा   ! बघेल राजाओं  की   पूर्ववर्ती  राजधानी  पहले , बांधवगढ़ में स्थापित हुई ,, जहां का अजेय ,किला  कई राजवंशों के उत्थान ,  पतन , आपसी युद्धों , और राजशाही के  उथलपुथल का गवाह रहा है !विश्व प्रसिद्द  सफ़ेद शेर , इसी बघेल  राजवंश की दी हुई  सौगात है   ! बांधवगढ़ का वन्य अभ्यारण , न केवल समूचे देश में प्रसिद्द है , बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी लुभा रहा है ! रीवा  जिले के गोविंगढ़ तालाब में बना राजशाही युग का   कठ बंगला सहज ही  सबको  अपनी और खींच लेता है , विंध्य भूमि के इसी भाग में ,   शिव , ,वैष्णव  संस्कृतियों के अवशेष , आज भी धार्मिक उथल पुथल की गवाही देते हैं वहीं बौद्ध काल के स्तूपों के  अवशेष और जैन मंदिर  के स्मृति चिन्ह भी अहिंसा के परम् धर्म और  विचारधारा की कथा कहते नजर आते हैं !मुगलकाल में , शहंशाह  अकबर के  दरबार के नौ रत्नों के दो रत्न , तानसेन और बीरबल भी इसी विंध्य भूमि के रत्न थे , जो रीवा राज से अकबर दरबार भेजे गए ! आज़ादी के संघर्ष में , बलिदानी युवकों में   रणमत  सिंह का नाम ,  यहां के इतिहास में अमित  अक्षरों में  दर्ज़  है !

 विंध्याचल की छितराईयों श्रेणियों के बीच शोभा देता चित्रकूट , सतना जिले को धार्मिक आस्थाओं का केंद्र बिंदु  है  ,  जहां भगवान् राम का , मंदाकिनी नदी के किनारे , बारह वर्षों  तक  निवास रहा ,,और जहां  की पर्वत श्रेणियों में स्थित ,  कामदगिरि , दो भाइयों के आत्मिक प्रेम का गवाही देता है   !

 ( सतना जिला )
   विंध्य भूमि का  सतना जिला बघेलों और   प्रतिहार ठाकुरों की कर्म  भूमि  रहा है  ! यहाँ मैहर की शारदा देवी , विवेक वाणी , और कला की वरदानी देवी है ,  भरहुत पहाड़ पर बने बौद्धकालीन स्तूप  और उनके केंद्रों के अवशेष सम्राट  अशोक के शाशन  काल की गाथा , पाषाण मूर्तियों के माध्यम से कह रहे हैं  !  चौमुखनाथ मंदिर में शिव की चारमुद्राओं की अद्भुत मूर्ती इसी क्षेत्र में  विराजी हुई है !चन्देलों के काल में बने खजुराहो के मंदिर आज विश्व में कोतुहल का केंद्र बने हुए हैं और योग , भोग , और मोक्ष ,के  आनंद की परिभाषा , पाषाण मूर्तियों के ज़ुबानी बखान  रहे  हैं !   ,



   ( नेपथ्य से वाइस ओवर  )+ ( कवरेज )
 विंध्य पर्वत श्रेणियों के   घाट चूमती , कर्णावती नदी ,,, ,के जल में किलोल करते मगर और घड़ियाल , जहाँ  सदियों से पथिकों को  भयभीत करते रहे    वहीं केन नदी के किनारे फैला विशाल वन अभ्यारण , वन्य जीवों के राजा , बाघ का ऐशगाह रहा  !  पन्ना नगरी के चर्चित धार्मिक मंदिर यहाँ आध्यात्म की अलख जगाते हैं ,  कृष्ण भगवान् का ' किशोरजी ' के  मंदिर के साथ  उनके बड़ेभाई बलदाऊ जी का भी विशाल मंदिर  यहां स्थापित है  !यहीं से प्रणामी सम्प्रदाय की नई  धर्म  परम्परा की धारा फूटी ! पन्ना का प्रणामी मंदिर आज भी प्रणामी धर्म के अनुयायियों का दर्शनीय मंदिर और आध्यात्म का केंद्र है   !

 पुरुष एंकर -  ( धुवेला के तालाब पर ) -
 विंध्य श्रेणियों पर बसा छतरपुर ,   वस्तुतः छत्रसाल के नाम पर बसाया गया नगर  था  , यह विंध्य के , बिजावर पठार पर बसा हुआ है !  यहां  से  बीस किलोमीटर दूर ,  नोगावं  जाते हुए , मध्य मार्ग में पड़ता है मऊसहानियां , जो छत्रसाल की प्रारम्भिक राजधानी के रूपमें विख्यात है !  बाजीराव पेशवा की नृत्यांगना प्रेयसी , ' मस्तानी '  यहीं से मराठे दरबार को भेंट में भेजी गयी थी ! मऊसहानियां के तालाब , छत्रसालयुग के प्रतीक हैं ! यहां स्थापित  आधुनिक धुवेला म्यूजियम युद्धों में प्रयोग किये गए शास्त्रों का आगार है !

नेपथ्य में 
 यह भू भाग चन्देलराजवंशों के स्थापत्य कला , और मूर्ती कला का गवाह है ! खजुराहो के मंदिर विश्व विख्यात हैं ! वहीं चंदला के निकट ,  पहाड़ी पर बनाये गए ,  बुंदेलों के , एक दुर्ग की छवि     दर्शनीय है ! यह स्थान तीन दिशाओं का मार्ग संगम रहा ,,,जिसमें महोबे की दिशा में फैले पाने के बरेज , महोबे के प्रसिद्द  पान की शान की विरासत को संजोये हुए हैं !

स्त्री एंकर  - 
विंध्य पर्वत की श्रेणियों के मध्य बहती धसान और बेतवा नदी ने विंध्य भूमि के उन पृष्ठों को रचा है , जिसमें बुंदेले रजवाड़ों  की वीर कथाएं , यहां के प्राचीन अजेय दुर्ग , गढ़कुंडार और ओरछा में पनपी हैं ! गढ़ कुंढार से उदय हुई , बुंदेले राजवंशों के शौर्य की गाथाएं , बेतवा के तट  पर  बने  ओरछा   नगर तक बिखरीं हुई हैं ! अकबर के दरबार में ,  धर्म  के धनी , वीर बुंदेले मधुकर शाह के  मस्तक पर  , जो राम भक्ति का तिलक लगा , वह ओरछा को  अयोध्या से लाये  गये  राम राजा  की राजधानी बनाने तक , सदैव दमकता रहा !  उनके वारिस महराजा रामसाह  के शाशन काल में , यहां काव्य और साहित्य की जो धारा बही , वह काव्य शिरोमणि केशव के काल से अंकित है ! केशव ने जो काव्य रचनाएं की वे कालजयी हैं ! इसी युग में ओरछा के  कुंवर इंद्रजीत की प्रेयसी ,   काव्य विदुषी , नृत्यांगना , रायप्रवीण के साहस की कथा जन  श्रुतियों में बड़े स्वाभिमान स के साथ   कही जाती है ! ओरछा का इतिहास , लक्ष्मण और  ,  सीता के पवित्र देवर भाभी के रिश्ते को भी दोहराता है  जो हरदौल और उनकी भाभी के बीच  यहां श्रद्धा स्वरूप पूजा जाता  है !
नेपथ्य में )
ओरछा ,  वेत्रवती , बेतवा नदी के तट पर बसा एक रमणीक नगर है  !यहां  के महल , मंदिर , और बेतवा  का प्राकृतिक सौन्दर्य आज अनुपम आभा बिखेर रहे हैं ! राम भगवान् के अयोध्या से यहां आने पर बुन्देल राजवंशों ने ओरछा छोड़ कर अपनी राजधानी टीकमगढ़ कर ली ! टीकम गढ़ , के चारों और कई किले हैं , जिनमें बुंदेले राजवंशों का इतिहास बिखरा पड़ा है ! टीकमगढ़ के निकट , बाणासुर के युग में प्रकट हुए , भगवान् शिव की शिवलिंग है , !

 पुरुष एंकर --  सात नदियों  , रिहन्द , सोन , तमसा , सतना ,  कर्णावती , धसान , बेतवा ,  से सिंचित , आम्र कूट  और चित्र कूट के शैल शिखरों से  सजा ,  आदिवासी जनजातियों की संस्कृति अपने में संजोये ,  विभिन्न
रीतिरिवाजों को निबाहता , आदिकाल के स्मृतिचिन्हों  को गहन वनो के बीच अक्षुण रखे ,  विभिन्न अरण्यों में विचरते वनजीवों  के आश्रय ,  शौर्य की धरोहरों को गॉड में  समेटे   ,  साहित्य , कला , और संगीत के धनी , इस विंध्य क्षेत्र की कथाएं , धारावाहिक के  इन सीमित अंकों में समेटना सहज नहीं है ! यह धरा  जहां वैदिक युग के स्मृति चिन्हों की साक्षी है ,जहां मध्यकाल के राजवंशों की उथल पुथल की गवाह है ,  वहीं यह आधुनिक भारत की छवि में भी अब  धीरे धीरे परवर्तित होती जा रही है ! इस धरा के गर्भ जहां  में चुना  पत्थर , हीरा , कोयला, जैसे खनिज छिपे हुए हैं , वहीं यह धरा  , वनोपज , और वन्य संस्कृति , के निर्वाहक , जनजातियों में --कोल  , गोंड , भारिया , अगरिया , बैगाओं  की  जीवन  शैली तथा  उनकी संस्कृति की आधार भूमि है !  पाषाण युग के  भित्तचित्र भी  इस क्षेत्र के  गहन वनो में   स्थित है ,, जो मनुष्य  जाती के क्रमशः उत्थान कथा कह रहे हैं  !   इन संस्कृतियों की पूरी कथाएं कहने , उनके उत्सवों , खानपान की कथा बखानने , उनके नृत्य संगीत को निहारने , उनकी व्याख्या करने में कई अध्याय लग  लग जाएंगे  !
  भले ही राजशाही के कारण , यहां विभिन्न संस्कृतियों का चलन हुआ , किन्तु आम्रकूट से लेकर , चित्रकूट होते हुए ओरछा तक फ़ैली इस धारा के कण कण में एक ही आराध्य लोगों के हृदय में बसे  हुए हैं  और वे हैं  --,,," राम ",,! राम इस धरा की आत्मा हैं , राम इस धरा के आदर्श हैं , राम इस धरा के नायक हैं , इसलिए यहां का  जनजीवन सहजता , सरलता और आस्था के एक ही सूत्र में पिरोया हुआ दिखता है !
अपने धारावाहिक विंध्य की विरासत  में हम , यहां के  कुछ आकर्षक स्थानों , परम्पराओं , संस्कृतियों से आप को जोड़ेंगे  ,, जिसमें रमने के बाद आप के मन में एक ही अभिलाषा जागेगी , विंध्य की इन वीथियों में  विस्तृत भ्रमण की , उसमें बिखरे आध्यात्म को  आत्मसात करने की , उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का रसपान करने की ,और उसके रमणीय स्थलों में रम जाने की ,,! हमारा विश्वाश है की आप हमारी इन कड़ियों से जुड़ने के बाद कहेंगे ,,, यह तो आनंद का  अथाह है ,,, इसमें जितना डूबें ,,,उतना कम है !
तो  अगली कड़ी का हमारे साथ इंतज़ार कीजिये ,,, और अपना टीवी , अपनी चैनल पहले से खोल कर रखिये ,,रात्रि ,,,बजे ,,, , ',,,' चैनल पर ,,!
 शुभरात्रि ,,!

 ( आलेख ,,,सभाजीत

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

विंध्य की विरासत

सतना शहर

प्रथम अंक
    सूर्योदय का दृश्य !
   लोगों के घूमने , जॉगिंग , करने के दृश्य ! आवागमन के दृश्य ! चाय की गुमटी के दृश्य !  जलेबी समोसे की दूकान के दृश्य !
    (  वाइस ओवर )  

    सूर्य  की  नई  किरण के साथ ही  करवट  लेने वाला   सतना शहर , विंध्य भूमि का वह यशश्वी  शहर है , जिसकी विरासत में श्रम ही  उसकी अपनी  खुद की  पूंजी  है , ! सुबह से ही लोग , खुद को तैयार करते हैं ,  दिन भर की भाग दौड़ के लिए , ताकि वे विकास की तेज दौड़ में अन्य  शहरों की  तुलना में   कहीं पिछड़ ना जाएँ ! हर दिन , महानगरों की होड़ से प्रभावित , यह शहर , हर दिन  नए नए व्यवसायों  की और उन्मुख होता है , और स्मार्ट सिटी बनाने की दौड़ में , चमक दमक से भरे , नए नए बाजारों का सृजन करता है ! जरूरतें , बाजार को जन्म ,  देती हैं  और बाजार उपभोक्तावाद को ! सतना शहर के जन्म की कहानी भी , जरुरत और उपभोक्तावाद की एक  कहानी है , जो तब शुरू हुई जब ,देश की प्रथम विफल क्रान्ति के बाद , अंग्रेजों ने , देशी रियासतों पर अंकुश लगाने के लिए यहां एक सैनिक छावनी स्थापित की ,  ,  !  अंग्रेजों ने सतना की सैनिक छावनी  को ,  अन्य   मुख्य सैनिक  छावनियों , जबलपुर  , इलाहाबाद , झांसी से  आपस में जोड़ने के लिए , जब  रेलवे लाइनों का निर्माण किया  ,  तो  उस रेलवे लाइन पर  बना १८६८ में एक नया स्टेशन ,,सतना !
जल्दी ही ,  अंग्रेज अफसरों और उनकी सैनकों  की जरूरतों  को पूरी करने के लिए एक बाजार की जरुरत पडी , और  तब रेलवे स्टेशन के आस  पास ही बना सतना का  छोटा सा बाजार , जिसे देश के अलग अलग प्रांतों से आये लोगों ने साझा संस्कृति के रूप में , विकसित किया ! बुंदेलखंड और बघेल खंड की रियासतों के बीच , यह एकलौता स्टेशन था , जो उन्हें पूर्व में हावड़ा , और पश्चिम में मुंबई महा नगरों से जोड़ता था , इस लिए यहां का वह छोटा सा बाजार , बहुत  जल्दी ही , रीवा , सीधी , पन्ना , छतरपुर रियासतों के लिए , थोक बाजार के रूप में विकसित हो गया !  इसलिए सतना के विकास की कहानी का सबसे बड़ा गवाह है यहां का रेलवे स्टेशन जिसकी यादों के  बस्ते  में कई  कहानियां करीने से सजी हुई  राखी हैं !
  ( नेपथ्य का एंकर वाइस ओवर )
 आज के  कायाकल्प की चमक से ओतप्रोत  , सतना शहर  के  स्टेशन की    आँखों ने , कई  रंग बिरंगी  घटनाएं अपने जीवनकाल में देखी है ! इस स्टेशन ने ,  गोरी जाति  के अंग्रेजों  की उस पहली व्हाइट ट्रेन को देखा है , जिसमें भारतीयों के लिए यात्रा करना निषेध था ! इसने पहली इलाहाबाद से  भुसावल के लिए चलने वाली  पैसेंजर ट्रेन को भी रवाना किया है ,इसने   रीवा रियासत के महाराजा , गुलाब सिंह की  बरात  को  आते जाते देखा है  , अंगरेजी हुकूमत के वायसराय  के  भव्य स्वागत को देखा है , पृत्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर के लाव लश्कर को यहां उतरते  देखा है , और उनके पुत्र , राजकपूर  की बरात की आगवानी  भी की  है ! स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में , महात्मा गांधी के दर्शन के लिए उमड़ी अपार भीड़ को देखा है , जवाहरलाल नेहरू , लोकमान्य तिलक , सुभाषचंद्र बोस के आत्मिक  स्वागत को  भी देखा है ! 
      यह किसी राजवंश के द्वारा बसाया गया कोई रियासती   ,  शहर नहीं  था  ! इसलिए इस शहर में ना तो कोई किला था  , ना कोई , परकोटा ना प्रवेश द्वार , ना कोई बुर्ज़ ! इसे ना कभी किसी विदेशी आक्रमण का डर  लगा , ना  आतातायी लूट का ! इस शहर को उन  हाथों ने ,पाला ,  जो  अलग अलग  धर्म ,  अलग अलग  जाती , अलग अलग  संस्कृति के  थे ,,जिनमें आपसी वैमनस्य नहीं था ,और  ना सत्ता की भूख ! वे इस शहर को अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे , और इसका लालन पालन , इसका विस्तार , अपनी नेक नियती के साथ  किये  !


     --सतना के जन्म की  कहानी जहां से शुरू होती है ,, वह जगह , आज सिविल लाइन कहलाती है ! जिस क्षेत्र में कभी , अंग्रेजों की पलटन के घोड़े , , सैनिकों की बैरकें , अधिकारियों के  बंगले ,  हुआ करते थे , अब वह यहां का न्यायालय परिसर बन चुका है !  भले ही १५० वर्ष बीत गए , लेकिन इस न्यायालय परिसर के भवनों की बनावट , उस काल की गवाही  देती नज़र आती  हैं  ! आज इस परिसर में सुबह से ही जैसे मेला लग जाता है ! न्याय की प्रतीक्षा में आये ग्रामीण लोग अपने अपने वकीलों को खोजते यहां घुमते नजर आते हैं !  वकीलों का , एक एक कुर्सी का  सामूहिक दफ्तर , तीन शेड के नीचे सज जाता है , और टाइपराइटरों की खट खटाहट  शुरू हो जाती है ! चाय और पान , इस परिसर की ऊर्जा है , इसलिए पान चाय के ठेले यहां वहां लगे दिख जाते हैं ! बीच बीच में , न्यायाधीश के दरवाजे पर हुई पुकार, एक अनोखी हलचल पैदा करती रहती है ,,जिसमें मिसिल दबाये वकील  और  पक्षकार , अपने गवाहों के साथ , दरवाजों की और दौड़ते नज़र आते हैं ! न्यायालय परिसर से लगे , भव्य बंगले , जिनमें कभी अंग्रेज अफसर रहते थे , आज , कलेक्टर , पुलिस अधीक्षक , और अन्य जिला अधिकारियों के निवास में तब्दील हो चुके हैं !  जहां कभी , सिरकम , बग्घियां , और घोड़ों की लाइन लगी रहती थी , वहां अब लाल पीली बत्ती की सरकारी चमचमाती  कारे खड़ी दिखती हैं ! 
    
   सतना  के इतिहास का अहम हिस्सा आज , रेलवे लाइन के किनारे बना  रेलवे कालोनी के रूप में , फैला दीखता है , पुराने क्वार्टर्स , रेलवे के पुराने स्वरूप को दर्शाते हैं ! यहां  एक छोर पर , १८८ ८ में बना , सैंट  मेरी चर्च , १५० वर्ष की स्थापित्य कला का नमूना है ! यह आज भी यहां के क्रिश्चियन समाज का अहम् उपासना स्थल है , ! गुड़ फ्राइडे , और क्रिसमिस डे  के अलावा , नए वर्ष के आगमन पर यह चर्च गुलजार हो उठता है ! रेलवे के इसी छोर के अंत में , एक १५० वर्ष पुरानाक्रिश्चियन  कब्रिस्तान है   जिसकी गोद में , सतना के अधिष्ठाता अंग्रेज अफसरों सहित , शहर के क्रिश्चियन समाज के कई लोग , चिर निद्रा  में   लीन  है !  

    ( इंटरव्यू किसी क्रिश्चयन वृद्ध का
       सतना की    स्टेशन रोड पर स्थित आज का सरकारी  महाविद्यालय  , कभी रीवा  महाराजा  की कोठी हुआ   करता था !दो मंजिला , कोठी की लाल और भूरे पत्थरों की दीवारें , इसका गोल खम्बों वाला पोर्च , दीवारों पर बना रीवा राज्य का राजचिन्ह , फर्श पर लगा बर्मी टीक  ,   और नीचे का दरबार हाल  इसके अतीत की कहानी कहता है ! राजशाही के जमाने में , इसके अहाते में  एक बड़ा चिड़ियाघर भी था , जिसमें कई प्रजातियों की चिड़ियाँ थी  भारत के प्रथम महामहिम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद भी यहां रुक चुके हैं !     इसका शिल्प   बताता है की यह भवन ,  रियासती जमाने  में  सतना की शान  था !  ! आज  यहां  क्षात्रों  के भविष्य को संवारता , सतना का ऐतिहासिक महाविद्यालय है ! इसके प्रांगण में , युवा  क्षात्रों की  हलचल आने वाले भारत के उज्जवल  भविष्य का संकेत देती है 

         अमूमन ,   किसी  शहर का इतिहास  उसके ऐतिहासिक  भवनों  से परिलक्षित होता है ! ,लेकिन सतना का  इतिहास यहां के  चौराहों में अंकित  है  !    यहां का ऐतिहासिक  पन्नीलाल चौक , कभी अंग्रेज मेमों , और अंग्रेज अधिकारियों का सैरगाह था ! यहां पन्नीलाल सौदागर की चर्चित दूकान थी , जिसमें विदेशी कपड़ा , बिस्कुट , शराब , डिब्बा बंद गोस्त , ग्रामोफोन के रिकार्ड , वगैरह मिलते थे , जिन्हे अंग्रेज खरीदने आते थे ! यह चौराहा , डाक्टर राम मनोहर लोहिया की सभा , पहलवान गामा  की हुंकार ,  , आर एस  एस  के दफ्तर और संघ कार्यकर्ताओं की हलचल  , समाजवादियों के अड्डे , का गवाह है ! इसी चौराहे पर हाजी गनी का होटल था ! जिसमें गांधी जी के बगावती पुत्र , हरी लाल गांधी , जो कुछ दिन सतना में रहे ,  भोजन करने आते थे ! आज भी यह चौराहा शहर का प्रसिद्द चौराहा है , जहां भरा पूरा बाज़ार , होटल , और धर्मशालाएं हैं ! इसी चौक के फैज़ होटल में , डाक्टर लोहिया , राजनारायण , मृणाल गोर , जॉर्ज फर्नाडीज वगैरह आ चुके हैं  ! यहां रामलीला का  भरत  मिलाप संपन्न होता है , ! इसी के निकट , जैनियों का उपासना स्थल , जैन मंदिर भी है ! कभी यहां इस शहर का आकर्षण ,," अशोक टाकीज " भी हुआ करती थी , जो अब शॉपिंग कम्प्लेक्स में तब्दील हो गयी है !
        पन्नीलाल चौक की तरह ' हनुमान चौक ' भी एक दूसरा  ऐतिहासिक चौक है !  जिसका जिक्र किये बिना सतना का इतिहास अधूरा है !यहां एक हनुमान जी का छोटा सा मंदिर है , जिसकी स्थापना १५० वर्ष पूर्व ,  सं १८७८ में हुई ! यह मंदिर पूरे  शहर की आस्था का केंद्र है ! हर मंगलवार , और शनिवार यहां हनुमान भक्तों का तांता लगा रहता है ! इस चौक पर लुल्ली हलवाई की दूकान कभी बड़ी प्रसिद्द थी , जिसका बना कलाकंद , रेवा के महाराजा को बहुत पसंद था , इसलिए वह सतना से रीवा भेजा जाता था ! इस चौराहे पर सतना के अग्रणीय व्यवसायी ,. बाबू गोपाल नाथ खत्री का निवास था  जिनका सामाजिक योगदान सतना के सुनहरे पन्नो में अंकित है !
हनुमानचौक से लगा पावर हाउस चौक है ! यहां  जैन धर्मावलम्बियों प्रसिद्द मंदिर और पाठशाला है ! मंदिर में महावीर स्वामी की मूर्ती विराज मान है !  सतना में जैन समाज प्रचुर मात्रा में है !  आज़ादी के बाद , सतना के व्यापार को गति देने  का काम इसी जैन समाज द्वारा संपन्न हुआ ! यह समुदाय बुंदेलखंड से आकर यहां बसा ! अहिंसा और शान्ति का मंत्र सतना की आत्मा में बसा है , इसलिए इस नगर में कभी कोई दंगा , नहीं हुआ ! ह्त्या लूटपाट के प्रकरण भी , यहां , अन्य शहरों की तुलना में नगण्य हैं ! 


          -क्या आप सोच सकते हैं की किसी जमाने का प्रसिद्द फ़िल्मी गीत " टम  टम  से ना झांको रानी जी , गाड़ी से गाड़ी लड़ जाएगी " जैसे हिट गीत लिखने वाले गीतकार ,   ,,प्यारेलाल संतोषी इसी नगर के हनुमान चौक से ही  लगे शास्त्री चौक पर रहते थे !   इस  चौक पर  कभी तमेरों की बर्तनो की दुकाने भी  बहुतायत में थीं ,, चारों और बर्तन ठोकने की आवाज़ आती रहती थी !  यहां जो लोग रहे , उनमें ,  फ़िल्मी गीतकार  तो थे ही  फिल्म निर्देशक ,,' बिन्दु शुक्ला ' का बचपन भी यहीं बीता  जो  बतौर मनमोहन देसाई के चीफ अस्सिस्टेंट , ,  का काम भी  करते रहे !  !  जिगनहट के कुंवर साहब को , फिल्म में हीरो का शौक परवान चढ़ा , तो उन्होंने बाजार में स्थित अपनी पूरी प्रॉपर्टी बेच कर उसे निभाया ! यह शहर आज भी फिल्म कलाकारों और  फिल्मकारों से भरा पड़ा है !


 
-सतना शहर के एक अन्य चौराहे , बिहारी चौक ' की महत्ता , हिन्दू धर्म की दृष्टि से ऐतिहासिक है !इस चौक की स्थापना तभी हुई जब , अंग्रेज इस भूमि पर , रेल लाइन बिछा रहे थे ! बाबा बृन्दावन  दास   द्वारा बनवाये गए , , बिहारी जी के मंदिर में , बांके बिहारी यानी कृष्ण की  १५० साल पहले की  ऐतिहासिक  मूर्ति स्थापित है ! यह मंदिर हिन्दुओं की आस्था का महत्वपूर्ण मंदिर है ! इसी चौक में बाबा बृन्दावन दास द्वारा शुरू की गयी रामलीला का मंचन आरम्भ हुआ , जो आज भी अनवरत है ! रामलीला , स्थानीय लोगों का लोकप्रिय मंचन है , जिसमें स्थानीय नागरिक ही पात्रों का अभिनय करते हैं ! यह चौराहा आज़ादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा , जहां विशाल जन सभाएं आयोजित होती थीं ! यहां पुरुषोत्तम दास टंडन ठहर चुके हैं !    बिहारी चौक से लगे , बाजार चौक को भी वही ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है , जो बिहारी चौक को है ! वस्तुतः , सतना का पुरातन ऐतिहासिक बाजार यही है !इस चौक ने सतना में आज़ादी के आंदोलनों की आधार शिला राखी ! विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का सत्याग्रह इसी चौराहे पर हुआ  और सत्याग्रहियों पर तत्कालीन अंगरेजी पुलिस के डंडे भी यहीं बरसे ! इसी चौक पर उमड़ी भीड़ को देख कर पुलिस ने हवाई फायर भी किये ! 

-बिहारी चौक से पूरब की तरफ बढ़ने पर , मिलता है  आज का प्रमुख चौक , लालता चौक!  इस चौक पर आज महदूरों की  हाट  लगती है ! चौक के चारों और फ़ैली सब्जी की दुकाने , यहां कदम रखने का स्थान नहीं छोड़ती ! दिन भर की मजदूरी के लिए , शारीरिक श्रम देने वाले मजदूरों  की चाह में , यहां शहर के लोग आते हैं , और मजदूरों को साथ ले जाते हैं ! एक प्रकार से शारीरिक श्रम की खरीद फरोख्त की यह परम्परा , अनायास ही ,  उस युग की याद दिलाता है जब यह मुहल्ला   किसी जमाने में चकलाटोला चौहट्टा के नाम से जाना जाता रहा   था !  
 बांदा की  नवाबी  रियासत कमजोर पड़ने पर , कई वेश्याएं , बांदा  से सतना आकर  बस  गयीं थीं  ! यह चौराहा , उनके यहां आबाद होने से , चकला टोला के नाम से जाना  गया ! वेश्याओं का जमावड़ा यहां १९१८ से ले कर १९४० तक शीर्ष पर रहा !  कहते हैं की लालता बाई  नाम की एक नर्तकी यहां बहुत प्रसिद्द हुई !  कभी कभी झगडे भी हुए , जिसमें एक नर्तकी हमीदन जान की नाक भी उसके प्रेमी ने काट डाली ! इसी चौक पर मार्तण्ड टाकीज़ के नाम से ,  एक टाकीज भी खुली , जिसमें बैठने के लिए बेंच नहीं थी ! लोग घर से बोरी फट्टा  ले कर आते , और उस पर बैठते ! इसी चौक पर पक्षियों का बाजार भी था , जहां तरह तरह के पक्षी बिकते थे !
 विविधताओं से भरे इस शहर के समाज में हर समाज के लोगों ने यहां आमद दी ! इसलिए यह शहर आज  विविध उपासनाओं  का केंद्र है !बंगाली समाज ने , मुख्त्यार गंज में माँ  काली  का  भव्य  मंदिर बनाया जो कालीबाड़ी के नाम से जाना जाता है ! नव रात्रि में बंगाली समाज यहां परम्परागत रूप से पूजा करता है ! बिड़ला अस्पताल के सामने रामकृष्ण परमहंस आश्रम और भव्य मंदिर है ! यह मंदिर दर्शनीय है !  बांधवगढ़ कॉलोनी में अय्यप्पा स्वामी का दक्षिण शैली में भव्य मंदिर बना हुआ है ! गायत्री देवी का मंदिर , गायत्री पीठ के अन्यायियों ने सर्किट हाउस चौक पर बनवाया है ! यहां प्रणामी सम्प्रदाय का  मंदिर भी पुराणी चांदनी टाकीज के पास है  यहां के कायस्थ समाज ने चित्रगुप्त मंदिर जगतदेव तालाब पर बनवाया ! इसी तरह हरदौल का एक मंदिर नजीरा बाद में है ! डाली बाबा चौक पर नामदेव समाज का बनवाया नामदेव  भगवान का मंदिर है !  गहरा नाला में नरसिंघ भगवान् बिराजे हैं ! जयस्तंभ चौक पर मार्कण्डेय मंदिर है ! इसके अलावा शिरडी के  साईं  भगवान् के मंदिर , हनुमान जी के मंदिर , भगवान् शिव के मंदिर , और दुर्गा मंदिर इस शहर के हर क्षेत्र्र में है ! 
  मुस्लिमों द्वारा बनाई गई करीब बीस मस्जिदें भी  इस शहर में विदवमान है !  
     लेकिन इन सब धार्मिक स्थलों में ,  जगत देव तालाब का शिव मंदिर ऐतिहासिक, और धार्मिक दृष्टि से सबसे ज्यादा पुराना है ! जगत देव तालाब सतना का ऐतिहासिक तालाब है , जिसे जगत देव पांडे ने सं १८६९ में खुदवाया था ! इस तालाब के  जनानी   घाट  को बनवाने का श्रेय ,   मोती  बाई वेश्या को जाता है ! समाज के वर्जित  समुदाय , की सदस्य , मोतीबाई वेश्या की धर्म परायणता सिद्ध करती है की कर्म से भी  बड़ा धर्म है  ,, सामाज  हित  का धर्म ! !  जगत देव तालाब की सीढ़ियों पर बैठे भिक्षुक , दान पुण्य की आशा में , यहां के धार्मिक लोगों का सतत इन्तजार करते देखे जाते हैं ! 
     सतना का दूसरा भव्य और पुरातन मंदिर , मुख्त्यारगंज का व्यंकटेश भगवान् का मंदिर है !  विष्णु सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले देव हैं !   इस मंदिर का निर्माण सं १८७६ में हुआ ! इसका शिल्प नयनाभिराम है ,,और इसके अंदर आध्यात्मिक अनुभूति होती है ! मंदिर की मूर्तियां   बहुत सुन्दर हैं  जिनमें  व्यंकटेश भगवान् के साथ साथ श्री रंगनाथ , और लक्ष्मी नारायण की मूर्तियां स्थापित है ! सामने गरुण मंदिर हैं ,, और मुख्य मंदिर के पास छोटा सा सरोवर भी है ! इस मन्दिर का स्थापत्य दक्षिण शैली का है ! 

-जैन सम्प्रदाय के कई मंदिर इस नगर में है , किन्तु हनुमान चौक पर स्थापित जैन मंदिर और शास्त्री चौक पर स्थापित गुजराती स्वेताम्बर जैनो का भव्य मंदिर दर्शनीय है !  हनुमान चौक पर स्थापित मंदिर में तीर्थंकर की खंगासनीं प्राचीन प्रतिमा स्थापित है ! मंदिर में छह वेदियां मूल नायकों की है ! और अन्य सभी २४ तीर्थंकरों की है ! पहली वेदी ,वेदी नेमीनाथ स्वामी की है , अंतिम शांतिनाथ भगवान् की ! यहां पूरे वर्ष विभिन्न आयोजन होते रहते हैं ! यहां रथ यात्राओं के आयोजन भी हो चुके हैं ! 
 सुभाष चौक के पास बना जैन मंदिर अत्यंत भव्य और दर्शनीय है !यह मंदिर १९७५ में बना  और इसमें संगमरमर का प्रयोग किया गया है ! इसके गर्भमंडल , प्रभामंडल कलात्मक और आबू शैली के हैं ! रंग मंडप रणकपुर शैली का है  और इसका शिखर पालीताना शैली का बना है !  इसमें भगवान् शांतिनाथ , नेमनाथ , पार्श्वनाथ , और भगवान् महावीर की भव्य  मूर्तियों के साथ साथ भगवान् आदिनाथ की मूर्ती प्रतिस्थापित है ! 



     महिला एंकर -किसी भी शहर की असली पहचान होती है , उसकी कला संस्कृति और  , साहित्य सृजन से ! सतना शहर के  पास विरासत में धरोहर के रूप में यह दोनों विधाएँ विदवमान हैं ! इस शहर में कभी  पृथ्वी थियेटर ने  नाटकों  ने  प्रदर्शन की  जो नीवं स्थापित की , उसका  निर्वहन इस नगर के लोग समय समय पर करते रहे ! लेकिन इस शहर की आत्मा में बसी रामलीला एक ऐसा मंच रही , जिसमें हर अभिनय प्रेमी  को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला ! रामलीला एक ऐसा आयोजन था , जिसमें पुराने लोगों के हटने के बाद नए लोग आते गए और अभिनय की ललक  की  निरंतरता बनी रही !
      -  १९८० के दशक में , यहां नुक्कड़ नाटकों ने धूम मचाई ! विविधता के इस शहर में , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयों से स्नातक हुए , युवाओं के   निर्देशन में  खेले  गए वे अब  सतना के रुझान को  नई  दिशा दे रहे हैं ! ! अब इस नगर में नाट्य उत्सव भी हो रहे हैं ,, और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए युवा , अब रंग कर्म की धारा ही बहा रहे हैं !

  संगीत के क्षेत्र में , भले ही इस शहर में कोई उस्ताद पैदा नहीं हुआ , लेकिन मैहर  के संगीत घराने से प्रभावित शास्त्रीय संगीत की धारा यहां निरंतर बहती रही ! संगीत भारती , और गीतम नामक संगीत संस्थाएं बनी , और संगीत के उत्कृष्ट आयोजन हुए !संगीत के कई स्कूल , , यहां की संगीत  परम्परा में खुले और धीरे धीरे संगीत कला के श्रोताओं के साथ साथ कलाकार भी यहां स्थापित हुए !  शास्त्रीय संगीत के अलावा , सुगम संगीत ने भी यहां अपनी छटा बिखेरी , और फ़िल्मी संगीत के कई आर्केष्ट्रा  यहां स्थापित हुए !

      -  साहित्य में सतना शहर सदा अग्रणीय रहा !  नगर निगम का पुस्तकालय यहां  किताबों का आगार रहा ! इसमें कथा साहित्य के साथ , उपन्यास , काव्य संग्रह , लोगों की रूचि वर्धन का सहारा बना ! सतना में निरंतर हुए भव्य कवी सम्मेलनों   ने यहां श्रोताओं को काव्य विधा जोड़ा ! देश के नामी गिरामी कवि , सतना आकर अपना काव्य पाठ कर चुके हैं !      

              पत्रिकारिता  में सतना की अपनी विशेष आभा है , आज़ादी के समय से ही पत्रकारिता यहां परवान चढ़ी , और दैनिक सांध्य पत्रों के साथ साथ , दैनिक अखबार भी यहां से प्रकाशित हुए ! सं १९३३ में पहला प्रेस , माया प्रेस के नाम से सतना में खुला  !इसी प्रेस से पहला अखबार " रैय्यत " नाम से नुमाया हुआ ! उस काल में अखबार निकालना , जुर्म जैसा था , तो उसका खामयाजा भी माया बाबू ने झेला और जेल गए ! १९४० के बाद कुछ अन्य लोगों ने भी प्रेस लगाए , समाचार पात्र प्रकाशित किये , किन्तु वे ज्यादा दिन नहीं चले ! १९६२ में सनसनी नामक दैनिक सांध्य अखबार चिंतामणि मिश्र ने शुरू किया और फिर १९७३ में श्री आनंद अग्रवाल की सम्पादकीय में जवान भारत ने धूम मचाई ! इंद्रा गांधी के आपात काल में जब कई पत्रकार जेल चले गए तो समाचार पत्रों की श्रंखला यहां रुक गयी ! पत्रकारिता के लिए शहीद हुए आनंद अग्रवाल का नाम सतना में आदर से लिया जाता है ! इनके अखबार जवान भारत ने , कई पत्रकारों को पटल पर आगे आने के अवसर दिए ! १९८४ में मायाराम सुरजन ने सतना में " देशबंधु " नामक दैनिक समाचार पात्र का आगाज़ किया , और इस समाचार पात्र ने कई लेखकों , और पत्रकारों को आगे आने के अवसर दिए !आज   यहां से लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र  , दैनिक भाष्कर  सहित सतना स्टार , और दैनिक  पत्रिका का प्रकाशन भी हो रहा है !इन समाचार पत्रों के सम्पादक और सह सम्पादक  माने हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं और सतना की हर गतिविधि को देश के शेष संसार से जोड़ते हैं !

    सतना शहर को जिन सुघड़ हाथों ने गढ़ा , जिसमें मूल्यों के रंग भरे , जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम से इसे जोड़ा , और जिनकी बदौलत यह शहर आज जीवित है , उन महापुरुषों का उल्लेख करना , आज उन्हें पूर्वजों की तरह याद करने जैसा है ! हर शहर का अपना विशिष्ट इतिहास होता है , लेकिन सतना का इतिहास तो  रंगबिरंगी पेंटिंग की तरह है ,,जिसमें हर कोण से देखने पर नई  आकृति उभरती है ,,ऐसी आकृति  जो कहती है की ठहरो , अभी तो मेरी हे कथा पूरी नहीं हुई , तुम अगला पृष्ठ कैसे पलट सकते हो ,,? इस शहर के प्रणेता , वे अंग्रेज , जो सुदूर देश से इस विंध्य भूमि पर आये , और भले ही उनका मूल्य ध्येय यहां शाशन करने का रहा हो , किन्तु जिन्होंने यहां की भूमि में  , नयी आबादी वाला एक शहर बसा दिया हो ,  वापिस नहीं गए , और सतना रेलवे स्टेशन के एक कोने में बने अपने चिर विराम स्थल क्रिश्चियन कब्रिस्तान में सो  गए  !उन्हें  श्रद्धा के दो फूल चढाने का दस्तूर तो बनता ही है ! उन्हें भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जो विभिन्न शहरों से यहां आये , यहां व्यापार की नीवं डाली , सामाजिक मूल्यों  को जिया , और इस शहर को पनपता छोड़ कर , अतीत में विलीन हो गए !  उन कला प्रेमियों , नृत्यांगनाओं , और साहित्य लेखकों को भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जिन्होंने इस शहर को मनोरंजक बनाया ,  इसे  रंगीन धड़कन दी , और उन अनाम मजदूरों को भी श्रद्धा सुमन चढाने का हक बनता है ,, जिन्होंने इस भू भाग को रेल की पटरियों के माध्यम से , देश के हर कोने से जोड़ा !
        पेड़ , निरंतर  विकसित हो कर आसमान की और ऊपर  उठता हुआ  , मीठे फल देता है , जो लोगों की क्षुधा शांत करता है , उन्हें ऊर्जा देता है , और थके हुए शरीर को  छाया प्रदान  करता है , लेकिन उसकी जड़ें सदा जमीन से जुडी रहती हैं  , उसे थामे रहती हैं ! विरासतें भी हमें , हमारी जमीन से जोड़े रहती हैं , उस  अतीत की  याद दिलाती रहती हैं , जिसके सहारे हम आज इतने ऊपर उठे हैं ! सतना  शहर  का अतीत सबको एक ही सन्देश देता है ,  बंजर में भी जीवन स्थापित करना है तो कर्मयोगी बनो , श्रमजीवी बनो , और हो सके तो स्वयं भू बनो ! विरासत कभी कभी कहीं से मिलती नहीं , खुद बनानी पड़ती है और सतना शहर  का इतिहास ही उसकी विरासत है !

     

   सतना नगर की गाथा कहने से सतना का पूरा परिचय नहीं मिलता ! वस्तुतः यह तो उस नगर की कथा थी , जो स्वयं भू नगर  था ,,, जिसका सृजन किसी ने नहीं किया ,, !
         किन्तु इस नगर के चारों और  फैले विंध्य की भूमि पर पुरातन काल से जिन  संस्कृतियों ने पंख पसारे  , जो अपने  पीछे अनोखी धरोहरें छोड़ गईं   , जिनके पद चिन्ह आज भी इस माटी पर अंकित हैं , उसकी कथा  हम अगले अंक में कहेंगे ,, ताकि हम आप जान सकें की भले ही शहर स्वयं भू  बन जाएँ  लेकिन इस  धरा  की  आदि  संस्कृति , स्वयंभू नहीं नहीं कहला सकती  ! वह सिर्फ किसी एक सदी  का इतिहास नहीं  होती ,,बल्कि वह कई   सदियों  के इतिहास का दस्तावेज  होती है !  और सतना जिले के दस्तावेज तो कई सदियों के दस्तावेज हैं ,, जिनकी छटा वैष्णव और शैव संस्कृतियों  के इंद्रधनुषी  रंग  से ओत प्रोत है ! जहां  बौद्ध काल , और भगवान् महावीर के युग की धरोहतरें हैं ! 
 तो अगले अंक में हम मिलेंगे ,सतना  शहर के चारों और फैले उन स्थानों से  , जो विंध्य की अद्वितीय  वास्तविक विरासत  है !

---सभाजीत



विंध्य की विरासत
सतना शहर
प्रथम अंक

सुबह से शाम तक , व्यापार के बहीखाते खंगालता , एक बंधे बँधाये जीवन क्रम को जीता , सतना शहर , विंध्य क्षेत्र का वह तोरणद्वार है , जो बुंदेली और बघेली संस्कृति   की सीमा रेखाओं को एक दूसरे में विलीन  करता है ! यहां से प्रतिदिन  गुजरने वाली करीब ९० ट्रेनें , अपनी गोद  में कई यात्रियों, व्यापारियों , पर्यटकों , को  लाकर उन्हें यहां उतारती   हैं , और कई लोगों को अपनी गोद  में ले कर ,   , निर्विकार रूप से गुजर जाती    हैं , जिससे यह शहर रात में भी ऊंघता , जागता  हुआ , जीवंत नज़र आता है ! गर्मियों में झुलसते , बरसात में भींगते , और सर्दी में ठिठुरते , स्टेशन के बाहर , यात्रियों की प्रतीक्षा करते , रिक्शा चालक  , ऑटो चालक  , इस शहर की बानगी दते हैं  की यह शहर , श्रमजीवी लोगों का शहर है ,,श्रम फिर चाहे शारीरिक हो , बौद्धिक हो ,मानसिक हो या  ,  व्यापारिक हो , ,,,श्रम ही इस शहर की मूल  पूंजी है !  १८६३  में बने , वयोवृद्ध सतना स्टेशन की अपनी अविश्मरणीय स्मृतियाँ हैं ! युवा कायाकल्प की चमक से ओतप्रोत  , सतना शहर  के  स्टेशन की    वृद्ध आँखों ने , कई  रंग बिरंगी  घटनाएं अपने जीवनकाल में देखी है ! इस स्टेशन ने , रीवा रियासत के महाराजा , गुलाब सिंह की  बरात  को  आते जाते देखा है  , अंगरेजी हुकूमत के वायसराय  के  भव्य स्वागत को देखा है , पृत्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर के लाव लश्कर को यहां उतरते  देखा है , और उनके पुत्र , राजकपूर  की बरात की आगवानी को भी देखा है ! स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में , महात्मा गांधी के दर्शन के लिए उमड़ी अपार भीड़ को देखा है , जवाहरलाल नेहरू , लोकमान्य तिलक , सुभाषचंद्र बोस के आत्मिक  स्वागत को  भी देखा है !  इस शहर ने अंग्रेजों के युग में , सभी रियासतों को अंग्रेजों की हाज़री बजाते देखा है , बड़े बड़े व्यापारियों , और रियासती कारिंदों की बड़ी बड़ी कोठियों को भी देखा ,,रजवाड़ों की शानो शौकत को भी  देखा  अंगरेजी संस्कृति के अनुशाशन , और  राग रंग को भी देखा है ,  , ,   जो  अब  पूरी तरह  अतीत में  खो कर इतिहास बन चुकी   हैं !

        इतनी विविधताओं  भी , यह शहर सदैव , स्वावलम्बी शहर बन कर ही जिया , क्योंकि यह किसी राजवंश के द्वारा बसाया गया कोई रियासती   ,  शहर नहीं है ! इसलिए इस शहर में ना तो कोई किला है , ना कोई , परकोटा ना प्रवेश द्वार , ना कोई बुर्ज़ ! इसे ना कभी किसी विदेशी आक्रमण का डर  लगा , ना  आतातायी लूट का ! इस शहर को उन  हाथों ने ,पाला ,  जो  अलग अलग  धर्म ,  अलग अलग  जाती , अलग अलग  संस्कृति के  थे ,,जिनमें आपसी वैमनस्य नहीं था ,और  ना सत्ता की भूख ! वे इस शहर को अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे , और इसका लालन पालन , इसका विस्तार , अपनी नेक नियती के साथ  किये  ! यह शहर , खुद अपने लिए नहीं जिया   , बल्कि निकटवर्ती रियासती नगरों की जरूरतें पूरी करने को एक साझा बाज़ार बन कर जिया ! देश के दो महानगर , कलकत्ता , और मुंबई से रेलवे लाइन से जुड़े होने के कारण , आसपास के नगर , छतरपुर , पन्ना रीवा और , , सीधी  के लिए यह समृद्ध थोक बाजार के रूप में  विकसित  हुआ !

     सतना का कोई पौराणिक लिपि बढ़ इतिहास नहीं है , फिर भी यहां के लोगों की मान्यता है , की यह नगर ,राम के युग  से , महर्षि सुतीक्ष्ण  की तपोभूमि के रूप में जाना जाता रहा ! उनके आश्रम के निकट से निकली , सतना नदी के नाम पर इस शहर का नाम  स्थापित हुआ ! दूसरी और , आज के शोधकर्ताओं का मानना है  की इस शहर का जन्म १८ वीं सदी  में तब  हुआ ,,जब १८५७ की विफल क्रान्ति के बाद , अंग्रेजों ने रजवाड़ों को अंकुश में रखने के लिए यहां , मिलिट्री केम्प की स्थापनी की ! उनकी सैनिक छावनी की जरूरतों को पूरा  करने , रसद , हथियार , सैनिकों के त्वरित आवागमन के लिए , एक रेलवे लाइन यहां होते हुए , १८६३ में डाली गयी , जो एक और नैनी इलाहाबाद , और दूसरी और जबलपुर को जोड़ती थी ! सैनिक छावनी , और अंग्रेज अफसरों की दैनिक सामग्रियों की पूर्ती के लिए तब एक बाजार रेलवे के किनारे धीरे धीरे विकसित हुआ , और देश के विभिन्न भागों से आये , गुजराती,  मारवाड़ी, वैश्य  व्यापारियों ने यहां डेरा डाला ! भारत विभाजन के बाद सिंध से आये लोगों ने भी इस नगर को व्यापारिक केंद्र  बना दिया ! शिक्षा , चिकित्सा , न्यायालय , और विभिन्न सरकारी संस्थाओं के साथ साथ ,  फैक्ट्रियों आदि में तैनात हुए कर्मचारियों से यह शहर गुलज़ार हुआ , और इस शहर की साझा संस्कृति ने एक अनुपम  बगिया  की शक्ल अख्तियार कर ली !
   आइये सुनते हैं , इस  शहर की कहानी , यहां के अतिवरिष्ठ ,साहित्यकार और यशश्वी पत्रकार , श्री चिंता मणि मिश्र से ,,,
  , ,  ,  ( इंटर व्यू ,,,श्री चिंतामणि मिश्र )

   अंग्रेजों के युग का बसा  ,  पुराना सतना जहां , पांच समानांतर , कम चौड़ी सडकों और करीब बीस चौराहों की संख्याओं में सीमित  , पुराणी विरासत लिए ,  नजीराबाद से ले कर पन्नी लाल चौक तक की  सीमाओं में समाया शहर है , वहीं आज का नया शहर  निकटवर्ती अन्य कस्बों की   सीमाएं छू रहा है ! रेलवे लाइन के एक और बसे  पुराने शहर का विस्तार अधिक नहीं हुआ , लेकिन रेलवे लाइन की दूसरी और बसे  सतना का विस्तार , धवारी , जवाहरनगर , खूंटी , राजेंद्रनगर , सिविल ,लाइन   कोठीरोड , रीवारोड ,  विराटनगर , पन्नारोड ,  भरहुत कालोनी , सीमारियाचौक , हवाईपट्टी , कोलगवां ,  नईबस्ती , सिंधी केम्प , बांधवगढ कालोनी , बिरला कॉलोनी ,  आदि नामों से ९० के दशक के बाद तेजी से  हुआ है ! इस शहर के पुराने हिस्से में चौराहों और सडकों पर हुई राजनैतिक और सामाजिक  हलचलें , इसका इतिहास बयान करती हैं !
 स्टेशन रोड पर स्थित आज का सरकारी  महाविद्यालय  , कभी रीवा  महाराजा  की कोठी हुआ   करता था !दो मंजिला , कोठी की लाल और भूरे पत्थरों की दीवारें , इसका गोल खम्बों वाला पोर्च , दीवारों पर बना रीवा राज्य का राजचिन्ह , फर्श पर लगा बर्मी टीक  ,   और नीचे का दरबार हाल  इसके अतीत की कहानी कहता है ! राजशाही के जमाने में , इसके अहाते में  एक बड़ा चिड़ियाघर भी था , जिसमें कई प्रजातियों की चिड़ियाँ थी ! इसके दक्षिण की और , एक बगीचा भी था , जिसमें कई  बृक्ष थे  , छोटा सा  सरोवर  था  , मोर , हंस ,    आदि  पले   रहते थे ! महाराजा व्यंकट रमन के जमाने में यहां इलाहाबाद से आयी नर्तकी , ' छप्पन छुरी  का मुजरा हुआ ,, जो शक्ल से तो बदसूरत थी किन्तु आवाज़ से अद्वितीय ! किसी ने उस की शक्ल को ले कर तंज़  कस दिया , तो उसने घूंघट डाल  कर ,  नृत्य किया ! जब राजा ने उस की आवाज़ और कला पर खुश हो  बख्शीश देनी चाही तो  उसने कहा  की जहां कला को रूप से तौला जाए , उस महफ़िल में , मैं बख्शीश नहीं लेती ! इस भवन में अक्सर पन्ना के राजा भी  आ  कर  रुकते थे ! भारत के प्रथम महामहिम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद भी यहां रुक चुके हैं !     इसका शिल्प और महत्त्व यह  बताता है की यह भवन ,  रियासती जमाने से ले कर आज के  आधुनिक सतना की शान है !  ! आज यह  क्षात्रों  के भविष्य को संवारता , सतना का ऐतिहासिक महाविद्यालय है ! इसके प्रांगण में , युवा  क्षात्रों  हलचल आने वाले भारत के उज्जवल  भविष्य का संकेत देती है !
( इंटरव्यू किसी  महाविद्यालय के प्रिंसिपल का ,,, हो सके तो सत्येंद्र शर्मा का )
    इस नगर   के   ऐतिहासिक  भवन आज या तो जर्जर हैं , या पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं !१९३५ के समय जगतदेव  तालाब के पास बनी  सोमचन्द आयल मिल , पुराने पावरहाउस के पास बनी सरवरिया बोर्डिंग हाउस  , महावीर भवन के पास बनी सेठ गणपत मारवाड़ी की लल्ला बिल्डिंग , जिसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का जमावड़ा   था ,  और जिस भवन में , सेठ गोविन्द दस , सीताराम काटजू , पुरुषोत्तमदास टंडन , मदनमोहन मालवीय  , कप्तान अवधेश प्रतापसिंघ ने अपने भाषण दिए ,   ध्वस्त हो चुकी है ! कई रंगारंग कार्यक्रमों  का  साक्षी , पृथ्वी थियेटर के नाटक  का  प्रत्यक्ष दर्शी , और बाद में शहर की आकर्षण बनी ' चांदनी टाकीज़ ' का  सिनेमा भवन आज सिर्फ यादों में ही  शेष  है !
 लेकिन रेलवे लाइन के दूसरी और बने व्यंकट स्कूल के भवन , थर्मल पावर हाउस ,   अंग्रेजों के युग में सिविल लाइन में  बने भवन , धवारी का प्रिंस हाल , और बरदाडीह की गढ़ी , आज भी शहर का पुराना इतिहास बखान रही है ! शहर का पोस्ट आफिस , , पुराना बघेलखण्ड बैंक भवन  , जो अब कम्युनिटी हाल है , एम् एल  बी इमारत , मारवाड़ी धर्मशाला , बाजार अस्पताल , गौशाला ,  इतिहास का ' समय चिन्ह ' बन कर आज भी अपनी गवाही खुद दे रहा है !

    इस शहर की गालियां और चौराहे , सिर्फ गालियां और चौराहे ही नहीं हैं बल्कि इतिहास का दस्तावेज हैं ! १९१४ में स्थापित  गौशाला चौक कभी , पुराने सतना शहर का दक्षिणी सीमा हुआ करती थी ! यहां  की गौशाला में गायें पली थीं और शहर को उनसे शुद्ध दूध मिलता था ! इस चौक से लगे पहले कई बड़े बड़े बगीचे थे , जो अब कांक्रीट के भवनों में तब्दील हो गए ! १९३० से १९४० तक , आज़ादी के आंदोलन के सिपाही  , भुग्गी महराज ने यहीं निवास किया ! पहले यहां एक बावड़ी और कुवां भी था ,, जिसके चिन्ह दीखते हैं !
      गौशाला चौक से मैहर की और जाने पर , आज के सतना की अंतिम सीमा पर बसा है ' नज़ीरा बाद ' ! यद्यपि यह मुस्लिम बाहुल्य बस्ती है , किन्तु यहां की तहजीब गंगा जमुनी है ! गंगा जमुनी इसलिए , क्यूंकि इस मोहल्ले में जहां मस्जिद है , वहीं मंदिर भी कम संख्या में नहीं ! कहते हैं की इस बस्ती को हाजी नज़ीर सौदागर ने मुस्लिमों को मुफ्त में जमीन बाँट कर  बसाया था , लेकिन इसी बस्ती में हिन्दुओं की संख्या भी कम नहीं ! यहां कांग्रेस के प्रख्यात नेता , बैरिस्टर  गुलशेर अहमद का निवास है , तो वहीं   फौजदारी के प्रख्यात वकील मुरलीधर शर्मा  और सतना के प्रख्यात पत्रकार स्व आनंद अग्रवाल  के बेटे भी इसी मोहल्ले में रहते हैं !
 अन्य चौकों में पुराने शहर की उत्तरी  सीमा पर बने , पन्नीलाल चौक , और हनुमान चौक भी ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं !कहते हैं की पन्नीलाल चौक , कभी अंग्रेज मेमों , और अंग्रेज अधिकारियों का सैरगाह था ! यहां पन्नीलाल सौदागर की चर्चित दूकान थी , जिसमें विदेशी कपड़ा , बिस्कुट , शराब , डिब्बा बंद गोस्त , ग्रामोफोन के रिकार्ड , वगैरह मिलते थे , जिन्हे अंग्रेज खरीदने आते थे ! इस चौक के बीच एक बड़ा , पानीदार कुवां भी था ! यह चौराहा , डाक्टर राम मनोहर लोहिया की सभा , पहलवान गामा के अल्प  विश्राम , आर एस  एस  के दफ्तर और संघ कार्यकर्ताओं की हलचल  , समाजवादियों के अड्डे , का गवाह है ! इसी चौराहे पर हाजी गनी का होटल था ! जिसमें गांधी जी के बगावती पुत्र , हरी लाल गांधी , जो कुछ दिन सतना में रहे ,  और  जिन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया था भोजन करने आते थे ! आज भी यह चौराहा शहर का प्रसिद्द चौराहा है , जहां भरा पूरा बाज़ार , होटल , और धर्मशालाएं हैं ! इसी चौक के फैज़ होटल में , डाक्टर लोहिया , राजनारायण , मृणाल गोर , जॉर्ज फर्नाडीज वगैरह आ चुके हैं  ! यहां रामलीला का  भरत  मिलाप संपन्न होता है , ! इसी के निकट , जैनियों का उपासना स्थल , जैन मंदिर भी है ! कभी यहां इस शहर का आकर्षण ,," अशोक टाकीज " भी हुआ करती थी , जो अब शॉपिंग कम्प्लेक्स में तब्दील हो गयी है !
  पन्नीलाल चौक की तरह ' हनुमान चौक ' भी एक ऐतिहासिक चौक है ! यहां एक हनुमान जी का छोटा सा मंदिर है , जिसकी स्थापना १५० वर्ष पूर्व ,  सं १८७८ में हुई ! यह इस शहर की आस्था का केंद्र है ! हर मंगलवार , और शनिवार यहां हनुमान भक्तों का तांता लगा रहता है ! इस चौक पर लुल्ली हलवाई की दूकान कभी बड़ी प्रसिद्द थी , जिसका बना कलाकंद , रेवा के महाराजा को बहुत पसंद था , इसलिए वह सतना से रीवा भेजा जाता था ! इस चौराहे पर सतना के अग्रणीय व्यवसायी ,. बाबू गोपाल नाथ खत्री का निवास था  जिनका सामाजिक योगदान सतना के सुनहरे पन्नो में अंकित है ! कहते हैं की उनके पीछे बनी एक मस्जिद में कुवां ना होने से पानी का अभाव था , इसलिए नमाज़ियों को वजू करने की  दिक्कत  होती थी ! एक दिन उनके घर आयी , चूड़ी पहनाने वाली मुस्लिम मनिहारिन ने उनकी बहु को यह स्थिति बताई तो बहू ने मस्जिद प्रांगण में, अपने खर्चे से  कुवां खुदवाना  स्वीकार कर लिया !  खत्री बाबू को जब यह मालूम हुआ तो वे बहुत प्रसन्न हुए , अपनी बहु को आशीषा , और मौलवी को बुलवा कर कहा की वे जल्द से  जल्द  कुवां खुदवा लें , और जो खर्च लगे , वह उनकी गद्दी से ले जाएँ !हिन्दू मुस्लिम एकता की ऐसी मिसाल मिलना मुश्किल है !  इसी चौक पर हीरालाल मारवाड़ी , अमृतलाल मिश्र , मोहनलालमिश्र  , जैसे  सतना के कर्मठ नागरिकों के मकान थे ,,,जिनका सतना के यत्थान में बहुत बड़ा योगदान है ! सतना का पहला सांध्य अखबार , इसी चौराहे से , प्रखर पत्रकार , चिंतामणि मिश्र द्वारा प्रकाशित हुआ !
  हनुमानचौक से लगा पावर हाउस चौक है ! यहां  जैन धर्मावलम्बियों प्रसिद्द मंदिर और पाठशाला है ! पावर हाउस चौक शहर के पहले बिजलीघर  डीज़ल पावर स्टेशन के नाम पर पड़ा है !  हनुमान चौक से ही लगा शास्त्री चौक है ! यहां कभी तमेरों की बर्तनो की दुकाने बहुतायत में थी ! यहां जो लोग रहे , उनमें , प्यारेलाल संतोषी फ़िल्मी गीतकार का नाम प्रसिद्द है , जिनका लिखा गीत ,, " टम  टम  से ना झांको रानी जी , गाड़ी से गाड़ी लड़ जाएगी "  पुरे भारत में प्रसिद्द हुआ था ! हनुमान चौक से पूर्व की और जाने पर पर एडवोकेट राजकिशोर शुक्ला का निवास था , जिनके छोटे भाई ,,' बिन्दु शुक्ला ' ने बतौर मनमोहन देसाई के चीफ अस्सिस्टेंट , , फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा नाम कमाया ! उनकी अपनी  निर्देशित  फिल्म ' मेरा जीवन ' भले ही ज्यादा नहीं चली , किन्तु  डाक्टर के जीवन पर बनी इस फिल्म की कथा ने दर्शकों को बहुत प्रभावित किया !

(इंटरव्यू सभाजीत शर्मा का )

      सतना शहर के एक अन्य चौराहे , बिहारी चौक ' की महत्ता , हिन्दू धर्म की दृष्टि से ऐतिहासिक है !इस चौक की स्थापना तभी हुई जब , अंग्रेज इस भूमि पर , रेल लाइन बिछा रहे थे ! बाबा बृन्दावन  दास   द्वारा बनवाये गए , , बिहारी जी के मंदिर में , बांके बिहारी यानी कृष्ण की  १५० साल पहले की  ऐतिहासिक  मूर्ति स्थापित है ! यह मंदिर हिन्दुओं की आस्था का महत्वपूर्ण मंदिर है ! इसी चौक में बाबा बृन्दावन दास द्वारा शुरू की गयी रामलीला का मंचन आरम्भ हुआ , जो आज भी अनवरत है ! रामलीला , स्थानीय लोगों का लोकप्रिय मंचन है , जिसमें स्थानीय नागरिक ही पात्रों का अभिनय करते हैं ! यह चौराहा आज़ादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा , जहां विशाल जन सभाएं आयोजित होती थीं ! यहां पुरुषोत्तम दास टंडन ठहर चुके हैं ! गुजराती सेठ धारसी जी, जिनका निवास इस चौक पर था ,  ने यहां पहला स्कूल खुलवाया ! इसी जगह पहले गुजराती समाज का गरबा नृत्य वर्षों तक होता रहा ! यह चौराहा , धार्मिक आस्थाओं , और राजनैतिक गतिविधियों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है !
       बिहारी चौक से लगे , बाजार चौक को भी वही ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है , जो बिहारी चौक को है ! वस्तुतः , सतना का पुरातन ऐतिहासिक बाजार यही है ! यहां के सीरिया हलवाई की रबड़ी  और बब्बू पान वाले का पान कभी बहुत प्रसिद्द  था  , इस चौक ने सतना में आज़ादी के आंदोलनों की आधार शिला राखी ! विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का सत्याग्रह इसी चौराहे पर हुआ  और सत्याग्रहियों पर तत्कालीन अंगरेजी पुलिस के डंडे भी यहीं बरसे ! इसी चौक पर उमड़ी भीड़ को देख कर पुलिस ने हवाई फायर भी किये ! यहां कई सामाजिक  विवाद भी हुए , और उनका निदान भी निकाला गया ! इसी चौक के निवासी नारायणदास खंडेलवाल को पतंगें उड़ाने का शौक था , ! वो पतंगों के साथ पांच रूपये का नॉट टांक देते थे , और कटने पर उसे लूटने की होड़ युवा बच्चों में मच जाती ! इसी चौराहे पर काशी महराज की सोडावाटर की दूकान थी , ! काशी महराज क्रांतिकारियों के पक्षधर थे , और उनकी दूकान में उस काल में भी भगत सिंह , चंद्रशेखर की फोटो लगी रहती थी !
        सतना जहां , आज़ादी के दीवानो , सामाज सेवियों , प्रखर पत्रकारों , बड़े व्यवसाइयों का चर्चित शहर रहा , वहीं रास रंग और मनोरंजन के लिए भी यह शहर प्रमुख रूप से जाना जाता  रहा  ! आज का प्रमुख चौक , लालता चौक किसी जमाने में चकलाटोला चौहट्टा के नाम से जाना जाता रहा ! बांदा की  नवाबी  रियासत कमजोर पड़ने पर , कई वेश्याएं , बांदा  से सतना आकर  बस  गयीं ! यह चौराहा , उनके यहां आबाद होने से , चकला टोला के नाम से जाना जाता रहा ! वेश्याओं का जमावड़ा यहां १९१८ से ले कर १९४० तक शीर्ष पर रहा ! वेश्याओं के रास रंग , नृत्य गान के कारण इस मोहल्ले में शराब की दुकानों के साथ साथ नशे की कई और भी अड्डे स्थापित हो गए , जिसमें अफीम का चलन बहुत रहा ! शराब के साथ भजिया , कबाब , पापड की दुकाने यहां खुलीं और उनमे से प्रसिद्द हुए एक भजिया बनाने वाले के नाम पर , लगा हुआ निकटस्थ चौराहा , फूलचंद भजिया वाला आज भी शहर में प्रसिद्द है !  कहते हैं की लालता नाम की एक नर्तकी यहां बहुत प्रसिद्द हुई !  कभी कभी झगडे भी हुए , जिसमें एक नर्तकी हमीदन जान की नाक भी उसके प्रेमी ने काट डाली ! इसी चौक पर मार्तण्ड टाकीज़ के नाम से ,  एक टाकीज भी खुली , जिसमें बैठने के लिए बेंच नहीं थी ! लोग घर से बोरी फटता ले कर आते , और उस पर बैठते ! इसी चौक पर पक्षियों का बाजार भी था , जहां तरह तरह के पक्षी बिकते थे !
     देश आज़ाद होने के बाद जब सतना ने करवट बदली , तो वेश्याओं के अड्डे यहाँ से खत्म हो गए ! बाद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , और कांग्रेस के प्रखर नेता डाक्टर लालता प्रसाद ने यहां जब अपनी क्लीनिक खोली तो चाऊ का नाम बदल कर " लालता चौक " कर दिया गया ! डाक्टर लालता प्रसाद नेता से अधिक समाजसेवी थे , इसलिए अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने नीमी ग्राम में एक वृद्धाश्रम खोल लिया और वहीं चले गए !
 आज यह चौराहा मजदूरों के लिए प्रसिद्द है  जहां दिहाड़ी पर , काम करने के लिए मजदूरों की हाट लगती है !

    सतना में अन्य चौराहों में कोतवाली चौराहा  , भैंसाखाना चौक ,  धवारी चौराहा , सिविल लाइन चौक , सर्किट हाउस चौक , अस्पताल चौक ,  और सिमरिया चौक के नाम से विख्यात है ! ये सतना के बाद में हुए विकास से विकसित हुए चौराहे हैं ! इनमें धवारी चौक एक पुराना चौराहा है जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है ,इस चौराहे पर बना आधुनिक स्टेडियम ,  खेलों  की हर सुविधा प्रदान करता है ! धवारी बस्ती कभी सतना शहर के बाहर मानी जाती थी , लेकिन अब यह सतना के मध्य  आ गयी है ! अस्पताल चौराहे पर  सतना का सर्व सुविधायुक्त जिला अस्पताल है  वहीं इसी चौराहे पर शहर  प्राचीन देवी मंदिर भी है !  नवरात्रि में , शीतला अष्टमी पर , इस नगर की महिलायें देवी प्रतिमा पर जल चढाने आती हैं ! इसी चौराहे पर जगतदेव तालाब है , जिसके  घाट  पर शिव का प्राचीन मंदिर है !  ,, सेमरिया चौक सतना के आधुनिक विकास का केंद्र है ,यहां यातायात की सुविधा के लिए , एक फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माणाधीन है ! ,! सिमरिया चौक पर सतना का बस स्टेण्ड है , जहां से हर दिशा में  बसें  प्रस्थान करती हैं ! सतना का एक मात्र कम्युनिटी हाल इसी चौक पर स्थापित है  जिसमें विविध आयोजन होते हैं ! इसमें एक साथ एक हजार तक लोगों के बैठने की व्यवस्था है ,,और  एक बड़ा स्टेज भी है , जहां पर नाटक , सभाएं आदि आयोजित होती हैं !यह हाल सर्व सुविधायुक्त हाल है !  सतना के विकास का वर्णन करते समय , सीमेंट संयंत्र के लिए बसी , बिरला कॉलोनी का जिक्र भी बहुत जरूरी है !  सतना के बहुमुखी उद्योगों में सीमेंट उद्योग का प्रथम स्थान है , वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए यूनिवर्सल केबिल फैक्ट्री का योगदान भी सतना के लिए महत्त्व पूर्ण है !

      पुराने गौरव की कीर्ति पताका फहराता आज का सतना ,  ,  विभिन्न जातियों , धर्मों , मतों , सम्प्रदायों का मिलाजुला शहर है ! इसमें हर धर्म के उपासकों के उपासना केंद्र हैं! यहां बंगालियों की दुर्गा पूजा अब पूरे हिन्दू समाज द्वारा अपना ली गयी है और नवरात्रि पर यहां जगह दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जातीं हैं ! दूसरी और ,  महाराष्ट्र की  गणेश पूजा भी आज इस नगर  का  प्रमुख आयोजन बन चुकी है , और महाराष्ट्रियन समाज के साथ साथ सम्पूर्ण हिन्दू समाज , जगह जगह , हर्षोल्लाष के साथ गणेश प्रतिमाएं स्थापित करता है ! नवरात्रि में गरबा नृत्य का आयोजन , अब सिर्फ गुजरातियों का उत्सव नहीं है , बल्कि यह सम्पूर्ण सतना निवासियों का उत्सव है !  यहां के शिव मंदिरों में , शिवरात्रि धूम धाम के साथ मनाई जाती है , वहीं  बसंतोत्सव पर हर स्कूल , हर समाज में सरसवती पूजी जाती है ! होली यहां का सार्वजनिक उत्सव है ,,, जिसमें रंग और उल्लास देखते ही बनता है !  चैत्र की नव रात्रि , नागपंचमी ,  कजलियां , और रक्षा बंधन का आज  भी यहां बरकरार है ,,वहीं ,, पितृ पक्ष में पुरखों को  जलांजलि , दशहरे में रामलीलाओं का आयोजन , रावण दहन के त्योहारों के साथ साथ  दीपावली  का प्रकाश पर्व भी सतना को जगमगा देता है !
    कन्याओं की शिक्षा के लिए यहां दो सरकारी  स्कूल हैं ,जिनमें महारानी लक्ष्मी बाई कन्या पाठशाला , और बूटी बाई स्कूल प्रमुख है ! इसके अतिरिक्त आर्य कन्या विद्यालय , सिंधु कन्या विद्यालय  भी शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं ! स्टेशन रोड पर स्थित महिला कला विद्यालय भी सतना की शान है !  कन्याओं की उच्च शिक्षा के लिए , महाराजा कोठी का महाविद्यालय अब पूरी तरह कन्या महाविद्यालय के नाम से जाना जाने लगा है ! बच्चों की शिक्षा के उत्कृष्ट विद्यालय ,  प्रेम नगर स्थित वेंकट  एक  , वेंकट  दो  ,  के नाम से विख्यात हैं ! इसके अतिरिक्त कई अन्य स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणीय भूमिका निभा रहे हैं , जिसमें ,  सरस्वती  स्कूल ,   संत ,,,,,,,,, , सी एम् ऐ  विद्यालय , आदि प्रमुख हैं !
        सतना में एक यूनिवर्सिटी , ऐ के एस यूनिवर्सिटी के नाम से अपना परचम लहरा रही है ! इस के विविध पाठ्यक्रम , युवाओं को रोजगार , और खुद के व्यवसाय की दिशा देने में पूरी तरह समर्थ है ! यह यूनिवर्सिटी कई बार विविध अवार्डों से , अच्छे कार्य के लिए नवाज़ी जा चुकी है ! इसी तरह आज के सतना में आदित्य कालेज भी तकनीकी पाठ्यक्रमों का उत्कृष्ट केंद्र है ! यहां इंजीनियरिंग की सभी शाखाओं के साथ , आधुनिक शिक्षा की सभी सुविधाएं प्राप्त हैं ! इससे पढ़े क्षात्र , आज विविध फैक्ट्रियों , माइनिंग , और अग्निशामक इंजीनियिरिंग में सतना का नाम रोशन कर रहे हैं !
( इंटरव्यू ऐ के इस के संचालक का )
   सतना का वित्स कालेज , शिक्षा के क्षेत्र में एक अभिनव संस्थान है ! इसका नाम आज देश में भी प्रसिद्धि पा रहा है ! शिक्षा के प्रतिमानों के साथ साथ , इसके  क्षात्रों  को रंग कर्म , और अभिनय कला ,में भी चारों और प्रसिद्धि मिल रही है ! इस कालेज  में दो भव्य थियेटर हैं , जहां समय समय पर नाटकों के आयोजन भी होते हैं !
            आज का सतना , शिक्षा के क्षेत्र में समृद्ध सतना है ! यहां तकनीकी शिक्षा के लिए पॉलीटेक्निक पहले से ही है !  मध्यप्रदेश सरकार ने जल्दी ही यहां मेडिकल कालेज खोले जाने की स्वीकृति दी है !इसके अलावा पेरा मेडिकल कोर्स पहले से ही यहां संचालित है ! महिलाओं के लिए सिलाई कढ़ाई , के केंद्र भी यहाँ कई वर्षों से संचालित हैं !

  ( इंटरव्यू किसी शिक्षाविद का  हो सके तो सेनानी जी का ) )
     
     किसी भी शहर की असली पहचान होती है , उसकी कला संस्कृति और , साहित्य सृजन ! सतना शहर के  पास विरासत में धरोहर के रूप में यह दोनों विधाएँ विदवमान हैं ! इस शहर में पृथ्वी थियेटर ने नाटकों की जो नीवं स्थापित की , उसका  निर्वहन इस नगर के लोग समय समय पर करते रहे ! १९३१ में यहां मारवाड़ी समाज ने नाटक मंडली स्थापित की कृष्णावतार , भीष्मपितामह  जैसे आदर्श  नाटक खेले गए ! यहां कभी बजरंग विजय कंपनी  नामक  नाटक मंडली बनी जिसने वीर अभिमन्यु , श्रवणकुमार , लैला मजनू नाटक खेले ! बाद में जैन समाज ने भी नाटक मंडली बनाई और कुछ नाटक खेले ! लेकिन इस शहर की आत्मा में बसी रामलीला एक ऐसा मंच रही , जिसमें हर अभिनय प्रेमी  को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला ! रामलीला एक ऐसा आयोजन था , जिसमें पुराने लोगों के हटने के बाद नए लोग आते गए और निरंतरता बनी रही !
    १९८० के दशक में , यहां नुक्कड़ नाटकों ने धूम मचाई ! इससे पहले भी क खा  ग  नामक संस्था के निर्देशक श्री दिलीप मिश्र ने कई नाटक खेले  जिसमें आज के लब्ध  प्रतिष्ठ  , स्क्रिप्ट राइटर ,  अशोक मिश्र  ने भी निर्देशन दिया !  श्री दिलीप मिश्र के सतना से बाहर चले जाने के बाद रंग कर्म के लिए बहुत दिनों तक खामोशी छाई रही , लेकिन  तीन वर्षों पूर्व से इस शहर का रंग मंच नई  चमक के साथ फिर उभरा , जब राष्ट्रीय  नाट्य स्कूल के स्नातक द्वारिका दाहिया ने यहां फिर से नाट्य कर्म की बाग़ डोर  सम्हाली ! उनके निर्देशन में वित्स कालेज के थियेटर में जो नाटक खेले गए वे अब  सतना के रुझान को  नई  दिशा दे रहे हैं ! श्री दाहिया की पत्नी श्रीमती सविता दाहिया भी उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर एक से एक नाटकों को नया आयाम दे रही है ! अब इस नगर में नाट्य उत्सव भी हो रहे हैं ,, और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए युवा , अब रंग कर्म की धारा ही बहा रहे हैं !  इस बीच श्री दिलीप मिश्र भी लौट आये और उन्होंने भी कई अच्छे नाटक खेल डाले !
  ( इंटरव्यू द्वारिका दाहिया का+ दिलीप मिश्र का )  )
    संगीत के क्षेत्र में , भले ही इस शहर में कोई उस्ताद पैदा नहीं हुआ , लेकिन मैहर  के संगीत घराने से प्रभावित शास्त्रीय संगीत की धारा यहां निरंतर बहती रही ! संगीत भारती , और गीतम नामक संगीत संस्थाएं बनी , और संगीत के उत्कृष्ट आयोजन हुए ! सं १९८४ में , बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले से आये , संगीत महर्षि रतनजन कर के शिष्य , श्री ज्ञान सागर शर्मा ने यहां शास्त्रीय संगीत के विद्यालय स्थापित किये , और यहाँ के संगीत प्रेमी शिष्यों को शास्त्रीय संगीत की उच्चकोटि की शिक्षा से दीक्षित किया !  संगीत के कई स्कूल , उनके बाद , यहां की परम्परा में खुले और धीरे धीरे संगीत कला के श्रोताओं के साथ साथ कलाकार भी यहां स्थापित हुए !  शास्त्रीय संगीत के अलावा , सुगम संगीत ने भी यहां अपनी छटा बिखेरी , और फ़िल्मी संगीत के कई आर्केष्ट्रा  यहां स्थापित हुए ! जिसमें रागनी आर्केष्ट्रा  प्रमुख है !  आज भी इस परम्परा को निबाहते कई आर्केष्ट्रा सतना में संगीत माधुर्य बिखेर रहे हैं !
    साहित्य में सतना शहर सदा अग्रणीय रहा !  नगर निगम का पुस्तकालय यहां  किताबों का आगार रहा ! इसमें कथा साहित्य के साथ , उपन्यास , काव्य संग्रह , लोगों की रूचि वर्धन का सहारा बना ! सतना में निरंतर हुए भव्य कवी सम्मेलनों   ने यहां श्रोताओं को काव्य विधा जोड़ा ! देश के नामी गिरामी कवि , सतना आकर अपना काव्य पाठ कर चुके हैं !  आज यहां के लेखक और कवियों में हरीश निगम , गीतकवि सुमेर सिंह शैलेश , सुदामा शरद  अनूप अशेष , ऋषिवंश , बाबूलाल दाहिया , नाम अग्रणीय कवियों में लिया जाता है , वहीं साहित्य विधा के दमकते नक्षत्रों में चिंतामणि मिश्र , प्रह्लाद अग्रवाल , सुषमा मुनींद्र , संतोष खरे , डाक्टर प्रदीप मिश्र , वन्दना दुबे   और डाक्टर सत्येंद्र शर्मा , साहित्याकाश को आलोकित कर रहे हैं ! इस नगरी में उर्दू शायरी भी पल्ल्वित हुई है ,,जिसके लोकप्रिय शायर  रफीक सतनवी , राईस नस्तर  , पुरनम  सुल्तानपुरी आदि हैं ! सतना में कई फिल्मकारों ने कई विषयों पर वृत्तचित्र और लघु फ़िल्में बनाई हैं , जिनमे  सभाजीत शर्मा , हरी चौरसिया , कुलदीप सक्सेना , और पृथ्वी अयलानी प्रमुख हैं !
( इंटरव्यू प्रह्लाद अग्रवाल का )
      पत्रिकारिता  में सतना की अपनी विशेष आभा है , जिसमें  चिंतामणि वरिष्ठ पत्रकार हैं ! आज़ादी के समय से ही पत्रकारिता यहां परवान चढ़ी , और दैनिक सांध्य पत्रों के साथ साथ , दैनिक अखबार भी यहां से प्रकाशित हुए ! सं १९३३ में पहला प्रेस , माया प्रेस के नाम से सतना में खुला जिसे माया बाबू नामक बंगाली महोदय ने चालू किया ! इसी प्रेस से पहला अखबार " रैय्यत " नाम से नुमाया हुआ ! उस काल में अखबार निकालना , जुर्म जैसा था , तो उसका खामयाजा भी माया बाबू ने झेला और जेल गए ! १९४० के बाद कुछ अन्य लोगों ने भी प्रेस लगाए , समाचार पात्र प्रकाशित किये , किन्तु वे ज्यादा दिन नहीं चले ! १९६२ में सनसनी नामक दैनिक सांध्य अखबार चिंतामणि मिश्र ने शुरू किया और फिर १९७३ में श्री आनंद अग्रवाल की सम्पादकीय में जवान भारत ने धूम मचाई ! इंद्रा गांधी के आपात काल में जब कई पत्रकार जेल चले गए तो समाचार पत्रों की श्रंखला यहां रुक गयी !  बाद में १९८० के बाद कुमार कपूर ने सतना टाइगर नाम का अखबार शुरू किया , जो लोकप्रिय हुआ ! इसके बाद कई समाचार पात्र शुरू हुए , जिसमें कृष्णगोपाल गुप्ता का साप्ताहिक आयोग , शंकरलाल तिवारी का बेधड़क भारत , निरंजन शर्मा का क्रांतिदूत , गिरजा प्रसाद का चितेरा आदि उल्लेखनीय है ! पत्रकारिता के लिए शहीद हुए आनंद अग्रवाल का नाम सतना में आदर से लिया जाता है ! इनके अखबार जवान भारत ने , कई पत्रकारों को पटल पर आगे आने के अवसर दिए ! १९८४ में मायाराम सुरजन ने सतना में " देशबंधु " नामक दैनिक समाचार पात्र का आगाज़ किया , और इस समाचार पात्र ने कई लेखकों , और पत्रकारों को आगे आने के अवसर दिए ! भगवान् दास सफड़िया  , सुदामा शरद , प्रह्लाद अग्रवाल  , बाबूलाल दाहिया , देवीशरण ग्रामीण इस समाचार पात्र के नियमित स्तम्भकार बने !  एक और समाचार पत्र  नेशनल टू  डे भी कुछ दिनों के लिए प्रकाशित हुआ किन्तु जल्द ही बंद हो गया ! पत्रकारों में निरंजन शर्मा का नाम विशेष उल्लेखनीय है  जिन्होंने अल्प  आयु से ही पत्रकारिता शुरू की , और कई समाचार पत्रों का सम्पादन सम्हाला !  आज   यहां से लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र  , दैनिक भाष्कर  सहित सतना स्टार , और दैनिक  पत्रिका का प्रकाशन भी हो रहा है !इन समाचार पत्रों के सम्पादक और सह सम्पादक  माने हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं और सतना की हर गतिविधि को देश के शेष संसार से जोड़ते हैं !
 (इंटरव्यू किसी पत्रकार का ,,हो सके तो सुदामाशारद , अथवा निरंजन शर्मा का )

    सतना शहर को जिन सुघड़ हाथों ने गढ़ा , जिसमें मूल्यों के रंग भरे , जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम से इसे जोड़ा , और जिनकी बदौलत यह शहर आज जीवित है , उन महापुरुषों का उल्लेख करना , आज उन्हें पूर्वजों की तरह याद करने जैसा है ! हर शहर का अपना विशिष्ट इतिहास होता है , लेकिन सतना का इतिहास तो  रंगबिरंगी पेंटिंग की तरह है ,,जिसमें हर कोण से देखने पर नई  आकृति उभरती है ,,ऐसी आकृति  जो कहती है की ठहरो , अभी तो मेरी हे कथा पूरी नहीं हुई , तुम अगला पृष्ठ कैसे पलट सकते हो ,,? इस शहर के प्रणेता , वे अंग्रेज , जो सुदूर देश से इस विंध्य भूमि पर आये , और भले ही उनका मूल्य ध्येय यहां शाशन करने का रहा हो , किन्तु जिन्होंने यहां की भूमि में  , नयी आबादी वाला एक शहर बसा दिया हो ,  वापिस नहीं गए , और सतना रेलवे स्टेशन के एक कोने में बने अपने चिर विराम स्थल क्रिश्चियन कब्रिस्तान में सो  गए  !उन्हें  श्रद्धा के दो फूल चढाने का दस्तूर तो बनता ही है ! उन्हें भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जो विभिन्न शहरों से यहां आये , यहां व्यापार की नीवं डाली , सामाजिक मूल्यों  को जिया , और इस शहर को पनपता छोड़ कर , अतीत में विलीन हो गए !  उन कला प्रेमियों , नृत्यांगनाओं , और साहित्य लेखकों को भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जिन्होंने इस शहर को मनोरंजक बनाया ,  इसे  रंगीन धड़कन दी , और उन अनाम मजदूरों को भी श्रद्धा सुमन चढाने का हक बनता है ,, जिन्होंने इस भू भाग को रेल की पटरियों के माध्यम से , देश के हर कोने से जोड़ा !  सतना नगर की गाथा कहने से सतना का पूरा परिचय नहीं मिलता ! वस्तुतः यह तो उस नगर की कथा थी , जो स्वयं भू नगर था ,,, जिसका सृजन किसी ने नहीं किया ,, ! किन्तु इस नगर के चारों और  फैले विंध्य की भूमि पर जिन संस्कृतियों ने पंख पसारे  , जो अपने  पीछे अनोखी धरोहरें छोड़ गए हैं , जिनके पद चिन्ह आज भी इस माटी पर अंकित हैं , उसकी कथा भी हम अगले अंक में कहेंगे ,, ताकि हम आप जान सकें की भले ही शहर स्वयं भू हो सकते हैं , लेकिन इस  धरा  की  संस्कृति , स्वयंभू नहीं नहीं हो सकती ! वह सिर्फ किसी एक सड़ी का इतिहास नहीं है ,,,बल्कि सदियों का इतिहास है !

--सभाजीत
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पुरुष एंकर - उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार ,  , मंदिर में उपलब्ध शिला  पट्ट  यह व्यक्त करता है की यह मंदिर ५०२ ईस्वी में निर्मित हुआ ! इतिहास के अनुसार  पांचवी सदी  से ले कर दसवीं सदी  तक यह क्षेत्र विभिन्न राजवंशों का संघर्ष क्षेत्र रहा !  गुप्त राजवंश और कलचुरी राजवंश  जहां वैष्णव मत के आराधक थे , वहीं नागा राजवंश और चंदेल राजवंश  शिव आराधक ! इसलिए यह क्षेत्र  दोनों  भक्ति  की साझा  भूमि के रूप में   जाना जाता   है !   मैहर व् इससे जुड़े कई  स्थानों के    मंदिर , विष्णु  मंदिरों के साथ साथ ,  शिव   के मंदिरों   के रूप में उपलब्ध हैं !
       एक किंबदंती के अनुसार , मैहर नगर का विकास , उन घुमक्क्ड योग साधना के संतों द्वारा सं १७७८ में किया गया , जिन्हे यह क्षेत्र , ओरछा के बुंदेली राजाओं द्वारा दान में  मिला था  ! जोगी नाम से विख्यात इस समुदाय को , कई स्थानों को नाथ सम्प्रदाय माना जाता है ! इस नगर की बोली बुंदेली है , जो यह स्थापित करती है की यह विंध्य   के  , बुंदेलखंड भूमि का ही हिस्सा है !



  

शनिवार, 26 जनवरी 2019



,,," विंध्य की विरासत " ,,

    प्रथम अंक 

( एक व्यक्ति  ढलवां पहाड़ी  के पीछे से निकल कर , क्रमशः उठता हुआ  ,,कैमरे के  आगे आता है  !  पीछे , पृष्ठभूमि में  फ़ैली हुई  विंध्याचल पर्वत  की चोटियां हैं    !  आगे आया  हुआ ,,पुरुष   एंकर है ,,कैमरा  ज़ूम हो कर  एंकर  पर जाता है ! )

एंकर -दोस्तों,,! आज हम अपने धारावाहिक " विंध्य की विरासत " के माध्यम से ,  विंध्याचल पर्वत  के पूर्वोत्तरी भाग में बिखरी , उस भूमि से आपका परिचय कराने जा रहे हैं , जिसके कण कण में राम का वास है ,  जहाँ ऋषियों  और  महर्षियों के तप का तेज ,है कई  वीर राजवंशों की गाथाएं हैं , और पग पग पर आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक की राष्ट्रीय धरोहरें हैं ! यह भूमि भाग ,,, विंध्याचल पर्वत की तराई में  बघेलखण्ड के  शहडोल जिले  से लेकर, रेवा , सीधी , सतना , पन्ना जिले की   वन सुषमा को अपने आँचल में  समेटे ,   बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले तक ,,"  विंध्य भूमि " के नाम  से आदिग्रंथों में   उल्लेखित किया गया है   ! वस्तुतः यह भूमि ,  गंगा कछार की भूमि से दक्षिण दिशा में प्रवेश करने का तोरण   द्वार  है  जिससे हो कर अगस्त ऋषि और भगवान् राम , आर्य संस्कृति के ध्वजावाहक बन कर ,  दक्षिण के  भू भाग में   प्रवेश किये  और  जहां आज भी ,,  आदिकालीन द्रविण संस्कृति  और आर्य संस्कृति की   साझा विरासत  फल फूल रही   है !
     विंध्यांचल  पर्वत ,,,,अगर  देखा जाए तो , कोई एक पर्वत के स्वरूप में नहीं है बल्कि पश्चिम  के  , गुजरात प्रांत से ले कर , पूर्व में बिहार और उत्तरप्रदेश तक  फ़ैली  कई पर्वत श्रेणियों की एक लम्बी श्रंखला है ! इसकी ऊंची  श्रेणियां ,, एक और छत्तीसगढ़ के  मेकल पर्वत को छूती हैं  और  दूसरी और   राजस्थान  के  राजपूताने  के शौर्य  वैभव ,, अरावली पर्वत को ! आदिकाल में , विंध्याचल पर्वत में फैले ,  सघन  वन , गहरी  घाटियों , हिंसक वन्यजीव , और दुर्गम भूमि के अवरोध के  कारण , इसे लांघना  संभव नहीं था और यह पर्वत  अजेय था !  मेकल पर्वत से निकल कर ,सतपुड़ा और विंध्याचल की गहरी घाटी में , पश्चिम की और  बहती नर्मदा , अरब सागर की खम्बात की खाड़ी में  विलीन होती थी और इसी पर्वत से निकल कर ,  , पूर्व की और बहता सोन  नद कैमोर घाटी से बह कर , बिहार जाकर , गंगा नदी में  अपना अस्तित्व विलीन करता था  इस प्रकार  उत्तर और दक्षिण की भूमि  को सरहदों  में बांटने का काम विंध्याचल  जैसे यहां एक प्रहरी  बन कर ,  अपनी  दोनों  भुजाएं फैला कर ,  करता था !    ! पौराणिक कथाओं के अनुसार   ,  कहते हैं की विंध्याचल पर्वत , अपनी ऊंचाई  को निरंतर उठाता हुआ  , देवताओ के प्रिय पर्वत ,  हिमालय को चुनौती देने लगा , !  अप्रिय स्थिति भांप कर , अगस्त्य ऋषि ने आर्य संस्कृति की धर्मध्वजा  ले कर , उत्तर से दक्षिण  की यात्रा की ,  और  जब वे यहां मेकल के किनारे  से गुजरे , तो  विंध्याचल पर्वत ने शाष्टांग दंडवत  लेट कर उन्हें प्रणाम किया!  अगस्त ऋषि ,  अपने  वापिस लौटने तक उसे उसी प्रकार लेटे  रहने का  निर्देश  देकर दक्षिण की और  चले गए और फिर  कभी वापिस नहीं आये ! कहते हैं आज यह उसी तरह दंडवत हो कर , पश्चिम से पूर्व तक शाष्टांग मुद्रा में लेटा है , और अगस्त ऋषि के लौटने की बाट  जोह रहा है !

   { नेपथ्य से वाइस ओवर  ) ( विभिन्न दृश्यावली के साथ )  ,
 भारत के हृदय क्षेत्र , मध्यप्रदेश की , पूर्वोत्तरी सीमाओं पर   , अगस्त ऋषि  को दिए वचन को निबाहता विंध्याचल पर्वत , जिस भू भाग को अपने आगोश में समेटे है , वह विंध्य भूमि के नाम से  जाना जाता  है ! इस क्षेत्र को सींचने वाली नदियाँ , रिहन्द , सोन , तमसा ,  सतना , केन , धसान , और बेतवा , सदा नीरा हैं !' सोन ' को अपने तीव्र वेग के कारण , हिमालय पर बहने वाले   ब्रम्हपुत्र  की तरह , पुरुषवाची  " नद " की संज्ञा मिली है  जो पौराणिक कथाओं के अनुसार , जौहला  द्वारा भटकाया हुआ , नर्मदा का  वह  विकल प्रेमी है , जो पश्चाताप की आग में झुलसकर , मेकल पर्वत से छलांग लगा कर , जौहला को अपने साथ ले , उत्तर पूर्व की और त्रीवता से दौड़ कर , मोक्षदायनी गंगा नदी की  गोद  में समा जाता है !इसी सोन के किनारे , भ्रमर शैल पर ,  महाकवि बाण भट्ट ने , अपना आश्रम बना कर , कालजयी काव्य " कादम्बरी " की  अद्भुत रचना की ! इसी सोन के   तट  पर , तपस्वी शिवभक्त ,प्रशांत शिव की तपोस्थली  है  , जिन्होंने  चंद्रेह  के अद्भुत शिव मंदिर का निर्माण करवाया ! इसी सोन के तट पर , मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम है , और इसी सोन से  जौहला  के  मिलन घाट  को , रामायण काल के पितृभक्त  ' श्रवण' को दशरथ द्वारा शब्दभेदी बाण द्वारा मारे जाने का वर्णन यहां की जनश्रुति में है ! आधुनिक भारत के निर्माण में , पर्वतों को तोड़ कर , महीन बालू प्रदान करने वाली प्रमुख  नदी यही सोन है और इसी सोन को बाणसागर में  बाँध कर , आज वद्युत उत्पादन का बड़ा जल विद्युत् उत्पादन का  शक्तिकेंद्र बनाया गया है  !
बाणसागर बाँध से निकली , सोन की वेगवती जल धाराएं , नहरों के माध्यम से बह कर ,  रीवा  जिले की बिछिया नदीं से मिल कर , इस क्षेत्र की प्रमुख नदी , तमसा  में  उड़ेल  दी गयी हैं , जहां से  , सिरमौर में , बड़ा जल विद्युत् उपकेंद्र , मध्य प्रदेश की विद्युत् वाहिकाओं में ऊर्जा का संचार कर रहा है ! बाणसागर से  निकला सोन का जल , सतना और रीवा के ग्रामीण अंचलों को भिगोता , विंध्य  के मध्य भाग में   उन्नत कृषि का सम्बल बना हुआ है , वहीं वह अपनी बिछुड़ी  प्रिया , नर्मदा,,  के बरगी बाँध से निकले जल को  , सतना जिले में गले लगाने  को  आज भी बेताब है !

( तमसा नदी के किनारे चलती हुई एक स्त्री एंकर   )
  स्त्री एंकर-   विंध्याचल पर्वत  की   ४८३ किलोमीटर लम्बी कैमोर पर्वत माला  पूर्व में बिहार के रोहतास  , और उत्तर में ,  उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले  तक फ़ैली हुई है     , जिस के  पूर्वी भाग में कैमोर पर्वत श्रंखला से  सट कर  सोन अपनी पूर्व की लम्बी यात्रा संपन्न  करता है ! इस , 'सोन घाटी में ,  फ़ैली गहन  वन सुषमा आदिकाल से '  विंध्यावाटी  ' के नाम से    विख्यात है !
  कैमोर पर्वत श्रंखला के ही ' तामकुंड ' नामक स्थल से निकली , -विंध्य क्षेत्र की प्रमुख  दूसरी नदी, ,,  '  तमसा ',, यानी टोंस नदी का  यहां के जनजीवन में कम महात्यम  नहीं है ! यह नदी  यहां के  चूने   पत्थर के पथरीले क्षेत्र पर बहती हुई , धार्मिक नगरी  मैहर  में  ,  माँ  शारदा का मुंह निहारती हुई , सतना नगर के निकट , माधवगढ़ किले को छूती हुई , रीवा जिले के विद्युत् शक्ति केंद्र सरमौर से निकल कर चाकघाट होते हुए , फिर कैमोर श्रंखला को पार ,करके  यमुना नदी में   जा मिलती है ! २६४ किलोमीटर की इस यात्रा में , वह  , रीवा रियासत  में  कई मनोरम  प्रपातों का सृजन करती है  जो देखते ही बनते हैं ! पुरवा , चचाई , और क्योटी प्रपात , विंध्यभूमि के चर्चित प्रपात हैं , जिसका अपार जल  हृदय को आनंदित करता है ! तमसा नदी का उलेख रामायण में भी है , जिसके किनारे पर , राम ने , वनयात्रा के दौरान , अयोध्या त्यागने के बाद पहली रात्रि विश्राम किया था ! आधुनिक भारत के निर्माण में , विंध्याचल श्रेणियों की तरहटी में , बिखरा  चूने  पत्थर का अनमोल खजाना , सीमेंट निर्माण का मूल तत्व है ! इसलिए सतना और रीवा क्षेत्र  में आज सीमेंट के कई कारखाने उच्च ग्रेड की सीमेंट बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं !

   ( नेपथ्य में  वाइस ओवर  )
  विंध्याचल श्रेणी ,   कैमोर पर्वत माला के उत्तरी भाग की तराई की पठारी भूमि में स्थित  ,   विंध्य भूमि का रीवा नगर , बघेल राजवंशों की मुख्य  राजधानी  रहा   ! बघेल राजाओं  की   पूर्ववर्ती  राजधानी , बांधवगढ़ में स्थापित हुई ,, जहां का अजेय ,किला  कई राजवंशों के उत्थान पतन , आपसी युद्धों , और राजशाही के  उथलपुथल का गवाह रहा है !विश्व प्रसिद्द  सफ़ेद शेर , इसी बघेल  राजवंश की दी हुई  सौगात है   ! बांधवगढ़ का वन्य अभ्यारण , न केवल समूचे देश में प्रसिद्द है , बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी लुभा रहा है ! रीवा  जिले के गोविंगढ़ तालाब में बना राजशाही युग का   कठ बंगला सहज ही  सबको  अपनी और खींच लेता है , विंध्य भूमि के इसी भाग में ,   शिव , ,वैष्णव  संस्कृतियों के अवशेष , आज भी धार्मिक उथल पुथल की गवाही देते हैं वहीं बौद्ध काल के स्तूपों के  अवशेष और जैन मंदिर  के स्मृति चिन्ह भी अहिंसा के परम् धर्म और  विचारधारा की कथा कहते नजर आते हैं !मुगलकाल में , शहंशाह  अकबर के  दरबार के नौ रत्नों के दो रत्न , तानसेन और बीरबल भी इसी विंध्य भूमि के रत्न थे , जो रीवा राज से अकबर दरबार भेजे गए ! आज़ादी के संघर्ष में , बलिदानी युवकों में   रणमत  सिंह का नाम ,  यहां के इतिहास में अमित  अक्षरों में  दर्ज़  है !

   पुरुष एंकर - विंध्याचल की छितराईयों श्रेणियों के बीच शोभा देता चित्रकूट , सतना जिले को धार्मिक आस्थाओं का केंद्र बिंदु  है  ,  जहां भगवान् राम का , मंदाकिनी नदी के किनारे , बारह वर्षों  तक  निवास रहा ,,और जहां  की पर्वत श्रेणियों में स्थित ,  कामदगिरि , दो भाइयों के आत्मिक प्रेम का गवाही देता है   !  भरत की निरंतर मनुहार के स्वर आज भी यहां  जनश्रुतियों में समाये हैं और  त्याग की परम्परा निबाहते राम के पद चिन्ह यहां की रज के  कण कण में दिखाई देते हैं ! भरत  के साथ , राम को मनाने आये अवधवासी , अपनी भाषा संस्कृति के साथ ,जब  यहीं रुक गए , तो  उन्होंने  इस भू भाग की   जनजातियों के साथ मिल  कर एक   नई  संस्कृति,  नई  भाषा  का सृजन किया  जो आगे चल   कर  बघेली कहलाई!

 ( नेपथ्य से-वाइस ओवर  ) ( विभिन्न  दृश्यावली सहित  )
   विंध्य भूमि का  सतना जिला बघेलों और   प्रतिहार ठाकुरों की कर्म  भूमि  रहा है  ! यहाँ मैहर की शारदा देवी , विवेक वाणी , और कला की वरदानी देवी है , जिनके चरणों में बैठ   कर    वीण वाद्य के धनी  बाबा अल्लाउद्दीन खां ने रविशंकर, अकबर अली ,  जैसे संगीत रत्न देश  को   भेंट किये !  आदिकाल में ' विंध्याचल पर्वत की  पर्वत श्रेणी    के नीचे  बसी  ,   उच्छकल्प ' के नाम से विख्यात ,  उचेहरा नगरी , धातु शिल्प  की कारीगरी  के लिए कई वर्षों तक  विख्यात रही  !   भरहुत पहाड़ पर बने बौद्धकालीन स्तूप  और उनके केंद्रों के अवशेष सम्राट  अशोक के शाशन  काल की गाथा , पाषाण मूर्तियों के माध्यम से कह रहे हैं  !  चौमुखनाथ मंदिर में शिव की चारमुद्राओं की अद्भुत मूर्ती इसी क्षेत्र में  विराजी हुई है ! तथा विंध्य भूमि के ,  इसी जिले के एक छोर पर , उत्तरप्रदेश की सीमा से  सटा  वह ऐतिहासिक अजेय दुर्ग सीना ताने खड़ा है जिसे शेरशाह सूरी महीनो तक घेरा डाल  कर जीत नहीं पाया था ! यह भूमि वीर  चंदेल राजवंश की कर्मस्थली भी रही , जहाँ  महोबे के बनाफर  वीर आल्हा उदल  की गाथाएं आज भी पूरेभारत में ,  ओज  फैलाती  हुई   , मारीशश में भी चाव से  गायी  जा रही   हैं ! चन्देलों के काल में बने खजुराहो के मंदिर आज विश्व में कोतुहल का केंद्र बने हुए हैं और योग , भोग , और मोक्ष ,के  आनंद की परिभाषा , पाषाण मूर्तियों के ज़ुबानी बखान  रहे  हैं !   ,

स्त्री एंकर -  (  अजय गढ़  घाटी में खड़े हो कर ) -  विंध्य के पर्वत श्रेणियों पर स्थित पन्ना पठार की भूमि , महराज क्षत्रसाल की वीरगाथा  गाती  है ! कवी भूषण की पालकी को कंधा देने वाले वीर बुंदेले क्षत्रसाल , की प्रशंशा करते हुए कवि भूषण ने कहा था ,,
 ' ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी ,
 ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहती हैं ,
 कंद  मूल भोग करें कंद मूल भोग करें ,
तीन बेर खाती ती  वे तीन बेर खाती हैं !
 वहीं दूसरी और  छत्रसाल की वीरता बखानते हुए एक और दोहे में उनके साम्राज्य की सीमा , विंध्य की नदियों को दर्शाते हुए स्थापित की गयी थी ,,
  इति   यमुना  उत  नर्मदा ,
 इति  चम्बल  , उत  टोंस ,
 छत्रसाल सौं  लरन  की ,
 रही ना  कोऊ  होन्स !!

   ( नेपथ्य से वाइस ओवर  )+ ( कवरेज )
 इन्ही वीर बुंदेले छत्रसाल की राजधानी पन्ना में   हीरों की खदानें हीरे उगलती हैं  ! चारों और से घेरे , विंध्यांचल की पर्वत श्रेणियां , इस नगर को प्राकृतिक सौंदर्य  का  धनी बनाती हैं ! इसके उत्तर में बना अजयगढ़ का किला , चंदेल राजवंशों की मूर्ती कला का साक्ष्य है ! विंध्य पर्वत श्रेणियों के   घाट चूमती , कर्णावती नदी ,,, ,के जल में किलोल करते मगर और घड़ियाल , जहाँ  सदियों से पथिकों को  भयभीत करते रहे    वहीं केन नदी के किनारे फैला विशाल वन अभ्यारण , वन्य जीवों के राजा , बाघ का ऐशगाह रहा  !  पन्ना नगरी के चर्चित धार्मिक मंदिर यहाँ आध्यात्म की अलख जगाते हैं ,  कृष्ण भगवान् का ' किशोरजी ' के  मंदिर के साथ  उनके बड़ेभाई बलदाऊ जी का भी विशाल मंदिर  यहां स्थापित है  ! ओरंगजेब के  भाई , दाराशिकोह को भी इसी विंध्य भूमि ने शरण दी , और यहीं से प्रणामी सम्प्रदाय की नई  धर्म  परम्परा की धारा फूटी ! पन्ना का प्रणामी मंदिर आज भी प्रणामी धर्म के अनुयायियों का दर्शनीय मंदिर और आध्यात्म का केंद्र है   !

 पुरुष एंकर -  ( धुवेला के तालाब पर ) -
 विंध्य श्रेणियों पर बसा छतरपुर ,   वस्तुतः छत्रसाल के नाम पर बसाया गया नगर  था  , यह विंध्य के , बिजावर पठार पर बसा हुआ है !  यहां  से  बीस किलोमीटर दूर ,  नोगावं  जाते हुए , मध्य मार्ग में पड़ता है मऊसहानियां , जो छत्रसाल की प्रारम्भिक राजधानी के रूपमें विख्यात है !  बाजीराव पेशवा की नृत्यांगना प्रेयसी , ' मस्तानी ' का भाबनावेश महल यह स्थापित करता है की वह यहीं से मराठे दरबार को भेंट में भेजी गयी थी ! मऊसहानियां के तालाब , छत्रसालयुग के प्रतीक हैं ! यहां स्थापित  आधुनिक धुवेला म्यूजियम युद्धों में प्रयोग किये गए शास्त्रों का आगार है ! विंध्य की इन्ही श्रंखलाओं पर स्थापित है , बिजावर नगर के समीप ' जटाशंकर ' का मंदिर जो धर्म और आस्थाओं का केंद्र है !

नेपथ्य में 
 यह भू भाग चन्देलराजवंशों के स्थापत्य कला , और मूर्ती कला का गवाह है ! खजुराहो के मंदिर विश्व विख्यात हैं ! वहीं चंदला के निकट ,  पहाड़ी पर बनाये गए ,  बुंदेलों के , एक दुर्ग की छवि     दर्शनीय है ! यह स्थान तीन दिशाओं का मार्ग संगम रहा ,,,जिसमें महोबे की दिशा में फैले पाने के बरेज , महोबे के प्रसिद्द  पान की शान की विरासत को संजोये हुए हैं !  बुंदेलों के बनाये कई दुर्ग आज भी बड़ामलहरा नामक स्थान की पहाड़ियों पर अपनी शौर्य गाथा कह रहे हैं !

स्त्री एंकर  - 
विंध्य पर्वत की श्रेणियों के मध्य बहती धसान और बेतवा नदी ने विंध्य भूमि के उन पृष्ठों को रचा है , जिसमें बुंदेले रजवाड़ों  की वीर कथाएं , यहां के प्राचीन अजेय दुर्ग , गढ़कुंडार और ओरछा में पनपी हैं ! गढ़ कुंढार से उदय हुई , बुंदेले राजवंशों के शौर्य की गाथाएं , बेतवा के तट  पर  बने  ओरछा   नगर तक बिखरीं हुई हैं ! अकबर के दरबार में ,  धर्म  के धनी , वीर बुंदेले मधुकर शाह के  मस्तक पर  , जो राम भक्ति का तिलक लगा , वह ओरछा को  अयोध्या से लाये  गये  राम राजा  की राजधानी बनाने तक , सदैव दमकता रहा !  उनके वारिस महराजा रामसाह  के शाशन काल में , यहां काव्य और साहित्य की जो धारा बही , वह काव्य शिरोमणि केशव के काल से अंकित है ! केशव ने जो काव्य रचनाएं की वे कालजयी हैं ! इसी युग में ओरछा के  कुंवर इंद्रजीत की प्रेयसी ,   काव्य विदुषी , नृत्यांगना , रायप्रवीण के साहस की कथा जन  श्रुतियों में बड़े स्वाभिमान स के साथ   कही जाती है ! ओरछा , राम और सीता के पवित्र देवर भाभी के रिश्ते को भी दोहराता है  जो हरदौल और उनकी भाभी के बीच  यहां श्रद्धा स्वरूप विदवमान है !
( नेपथ्य में )
ओरछा ,  वेत्रवती , बेतवा नदी के तट पर बसा एक रमणीक नगर है  !यहां  के महल , मंदिर , और बेतवा  का प्राकृतिक सौन्दर्य आज अनुपम आभा बिखेर रहे हैं ! राम भगवान् के अयोध्या से यहां आने पर बुन्देल राजवंशों ने ओरछा छोड़ कर अपनी राजधानी टीकमगढ़ कर ली ! टीकम गढ़ , के चारों और कई किले हैं , जिनमें बुंदेले राजवंशों का इतिहास बिखरा पड़ा है ! टीकमगढ़ के निकट , बाणासुर के युग में प्रकट हुए , भगवान् शिव की शिवलिंग है , ! विंध्य की पर्वत श्रेणियां , टीकमगढ़ से ले कर , यहां के एक पुराने नगर , चंदेरी तक फ़ैली हुई है , जहां वस्त्र निर्माण कला  युगों पूर्व से अक्षुण है ! चंदेरी , कई ऐतिहासिक करवटों की गवाह है , !  विंध्य की धारा का यह अंतिम छोर है !

 पुरुष एंकर --  सात नदियों  , रिहन्द , सोन , तमसा , सतना ,  कर्णावती , धसान , बेतवा ,  से सिंचित , आम्र कूट  और चित्र कूट के शैल शिखरों से  सजा ,  आदिवासी जनजातियों की संस्कृति अपने में संजोये ,  विभिन्न
रीतिरिवाजों को निबाहता , आदिकाल के स्मृतिचिन्हों  को गहन वनो के बीच अक्षुण रखे ,  विभिन्न अरण्यों में विचरते वनजीवों  के आश्रय ,  शौर्य की धरोहरों को अंक में लपेटे  ,  साहित्य , कला , और संगीत के धनी , इस विंध्य क्षेत्र की कथाएं , धारावाहिक के  इन सीमित अंकों में समेटना सहज नहीं है ! यह धरा  जहां वैदिक युग के स्मृति चिन्हों की साक्षी है ,जहां मध्यकाल के राजवंशों की उथल पुथल की गवाह है ,  वहीं यह आधुनिक भारत की छवि में भी अब  धीरे धीरे परवर्तित होती जा रही है ! इस धरा के गर्भ जहां  में चुना  पत्थर , हीरा , कोयला, जैसे खनिज छिपे हुए हैं , वहीं यह धरा  , वनोपज , और वन्य संस्कृति , के निर्वाहक , जनजातियों में --कोल  , गोंड , भारिया , अगरिया , बैगाओं के जीवन आधार , और उनकी संस्कृति की आधार भूमि है !  पाषाण युग के  भित्तचित्र भी  इस क्षेत्र के  गहन वनो में   स्थित है ,, जो मनुष्य  जाती के क्रमशः उत्थान कथा कह रहे हैं  !   इन संस्कृतियों की पूरी कथाएं कहने , उनके उत्सवों , खानपान की कथा बखानने , उनके नृत्य संगीत को निहारने , उनकी व्याख्या करने में कई अध्याय लग  लग जाएंगे  ! विंध्य की  यह धरा , दो राजवंशों -बघेलों और - बुंदेलों की कर्म भूमि होने के कारण , आज  दो क्षेत्रों- बघेलखण्ड और बुंदेलखंड  के नाम से जानी जाने लगी है , !
  भले ही राजशाही के कारण , यहां विभिन्न संस्कृतियों का चलन हुआ , किन्तु आम्रकूट से लेकर , चित्रकूट होते हुए ओरछा तक फ़ैली इस धारा के कण कण में एक ही आराध्य लोगों के हृदय में बसे  हुए हैं  और वे हैं  --,,," राम ",,! राम इस धरा की आत्मा हैं , राम इस धरा के आदर्श हैं , राम इस धरा के नायक हैं , इसलिए यहां का  जनजीवन सहजता , सरलता और आस्था के एक ही सूत्र में पिरोया हुआ दिखता है !
अपने धारावाहिक विंध्य की विरासत  में हम , यहां के  कुछ आकर्षक स्थानों , परम्पराओं , संस्कृतियों से आप को जोड़ेंगे  ,, जिसमें रमने के बाद आप के मन में एक ही अभिलाषा जागेगी , विंध्य की इन वीथियों में  विस्तृत भ्रमण की , उसमें बिखरे आध्यात्म को  आत्मसात करने की , उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का रसपान करने की ,और उसके रमणीय स्थलों में रम जाने की ,,! हमारा विश्वाश है की आप हमारी इन कड़ियों से जुड़ने के बाद कहेंगे ,,, यह तो आनंद का  अथाह है ,,, इसमें जितना डूबें ,,,उतना कम है !
तो  अगली कड़ी का हमारे साथ इंतज़ार कीजिये ,,, और अपना टीवी , अपनी चैनल पहले से खोल कर रखिये ,,रात्रि ,,,बजे ,,, , ',,,' चैनल पर ,,!
 शुभरात्रि ,,!

 ( आलेख ,,,सभाजीत )