शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

विंध्य की विरासत
सतना शहर
प्रथम अंक

सुबह से शाम तक , व्यापार के बहीखाते खंगालता , एक बंधे बँधाये जीवन क्रम को जीता , सतना शहर , विंध्य क्षेत्र का वह तोरणद्वार है , जो बुंदेली और बघेली संस्कृति   की सीमा रेखाओं को एक दूसरे में विलीन  करता है ! यहां से प्रतिदिन  गुजरने वाली करीब ९० ट्रेनें , अपनी गोद  में कई यात्रियों, व्यापारियों , पर्यटकों , को  लाकर उन्हें यहां उतारती   हैं , और कई लोगों को अपनी गोद  में ले कर ,   , निर्विकार रूप से गुजर जाती    हैं , जिससे यह शहर रात में भी ऊंघता , जागता  हुआ , जीवंत नज़र आता है ! गर्मियों में झुलसते , बरसात में भींगते , और सर्दी में ठिठुरते , स्टेशन के बाहर , यात्रियों की प्रतीक्षा करते , रिक्शा चालक  , ऑटो चालक  , इस शहर की बानगी दते हैं  की यह शहर , श्रमजीवी लोगों का शहर है ,,श्रम फिर चाहे शारीरिक हो , बौद्धिक हो ,मानसिक हो या  ,  व्यापारिक हो , ,,,श्रम ही इस शहर की मूल  पूंजी है !  १८६३  में बने , वयोवृद्ध सतना स्टेशन की अपनी अविश्मरणीय स्मृतियाँ हैं ! युवा कायाकल्प की चमक से ओतप्रोत  , सतना शहर  के  स्टेशन की    वृद्ध आँखों ने , कई  रंग बिरंगी  घटनाएं अपने जीवनकाल में देखी है ! इस स्टेशन ने , रीवा रियासत के महाराजा , गुलाब सिंह की  बरात  को  आते जाते देखा है  , अंगरेजी हुकूमत के वायसराय  के  भव्य स्वागत को देखा है , पृत्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर के लाव लश्कर को यहां उतरते  देखा है , और उनके पुत्र , राजकपूर  की बरात की आगवानी को भी देखा है ! स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में , महात्मा गांधी के दर्शन के लिए उमड़ी अपार भीड़ को देखा है , जवाहरलाल नेहरू , लोकमान्य तिलक , सुभाषचंद्र बोस के आत्मिक  स्वागत को  भी देखा है !  इस शहर ने अंग्रेजों के युग में , सभी रियासतों को अंग्रेजों की हाज़री बजाते देखा है , बड़े बड़े व्यापारियों , और रियासती कारिंदों की बड़ी बड़ी कोठियों को भी देखा ,,रजवाड़ों की शानो शौकत को भी  देखा  अंगरेजी संस्कृति के अनुशाशन , और  राग रंग को भी देखा है ,  , ,   जो  अब  पूरी तरह  अतीत में  खो कर इतिहास बन चुकी   हैं !

        इतनी विविधताओं  भी , यह शहर सदैव , स्वावलम्बी शहर बन कर ही जिया , क्योंकि यह किसी राजवंश के द्वारा बसाया गया कोई रियासती   ,  शहर नहीं है ! इसलिए इस शहर में ना तो कोई किला है , ना कोई , परकोटा ना प्रवेश द्वार , ना कोई बुर्ज़ ! इसे ना कभी किसी विदेशी आक्रमण का डर  लगा , ना  आतातायी लूट का ! इस शहर को उन  हाथों ने ,पाला ,  जो  अलग अलग  धर्म ,  अलग अलग  जाती , अलग अलग  संस्कृति के  थे ,,जिनमें आपसी वैमनस्य नहीं था ,और  ना सत्ता की भूख ! वे इस शहर को अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे , और इसका लालन पालन , इसका विस्तार , अपनी नेक नियती के साथ  किये  ! यह शहर , खुद अपने लिए नहीं जिया   , बल्कि निकटवर्ती रियासती नगरों की जरूरतें पूरी करने को एक साझा बाज़ार बन कर जिया ! देश के दो महानगर , कलकत्ता , और मुंबई से रेलवे लाइन से जुड़े होने के कारण , आसपास के नगर , छतरपुर , पन्ना रीवा और , , सीधी  के लिए यह समृद्ध थोक बाजार के रूप में  विकसित  हुआ !

     सतना का कोई पौराणिक लिपि बढ़ इतिहास नहीं है , फिर भी यहां के लोगों की मान्यता है , की यह नगर ,राम के युग  से , महर्षि सुतीक्ष्ण  की तपोभूमि के रूप में जाना जाता रहा ! उनके आश्रम के निकट से निकली , सतना नदी के नाम पर इस शहर का नाम  स्थापित हुआ ! दूसरी और , आज के शोधकर्ताओं का मानना है  की इस शहर का जन्म १८ वीं सदी  में तब  हुआ ,,जब १८५७ की विफल क्रान्ति के बाद , अंग्रेजों ने रजवाड़ों को अंकुश में रखने के लिए यहां , मिलिट्री केम्प की स्थापनी की ! उनकी सैनिक छावनी की जरूरतों को पूरा  करने , रसद , हथियार , सैनिकों के त्वरित आवागमन के लिए , एक रेलवे लाइन यहां होते हुए , १८६३ में डाली गयी , जो एक और नैनी इलाहाबाद , और दूसरी और जबलपुर को जोड़ती थी ! सैनिक छावनी , और अंग्रेज अफसरों की दैनिक सामग्रियों की पूर्ती के लिए तब एक बाजार रेलवे के किनारे धीरे धीरे विकसित हुआ , और देश के विभिन्न भागों से आये , गुजराती,  मारवाड़ी, वैश्य  व्यापारियों ने यहां डेरा डाला ! भारत विभाजन के बाद सिंध से आये लोगों ने भी इस नगर को व्यापारिक केंद्र  बना दिया ! शिक्षा , चिकित्सा , न्यायालय , और विभिन्न सरकारी संस्थाओं के साथ साथ ,  फैक्ट्रियों आदि में तैनात हुए कर्मचारियों से यह शहर गुलज़ार हुआ , और इस शहर की साझा संस्कृति ने एक अनुपम  बगिया  की शक्ल अख्तियार कर ली !
   आइये सुनते हैं , इस  शहर की कहानी , यहां के अतिवरिष्ठ ,साहित्यकार और यशश्वी पत्रकार , श्री चिंता मणि मिश्र से ,,,
  , ,  ,  ( इंटर व्यू ,,,श्री चिंतामणि मिश्र )

   अंग्रेजों के युग का बसा  ,  पुराना सतना जहां , पांच समानांतर , कम चौड़ी सडकों और करीब बीस चौराहों की संख्याओं में सीमित  , पुराणी विरासत लिए ,  नजीराबाद से ले कर पन्नी लाल चौक तक की  सीमाओं में समाया शहर है , वहीं आज का नया शहर  निकटवर्ती अन्य कस्बों की   सीमाएं छू रहा है ! रेलवे लाइन के एक और बसे  पुराने शहर का विस्तार अधिक नहीं हुआ , लेकिन रेलवे लाइन की दूसरी और बसे  सतना का विस्तार , धवारी , जवाहरनगर , खूंटी , राजेंद्रनगर , सिविल ,लाइन   कोठीरोड , रीवारोड ,  विराटनगर , पन्नारोड ,  भरहुत कालोनी , सीमारियाचौक , हवाईपट्टी , कोलगवां ,  नईबस्ती , सिंधी केम्प , बांधवगढ कालोनी , बिरला कॉलोनी ,  आदि नामों से ९० के दशक के बाद तेजी से  हुआ है ! इस शहर के पुराने हिस्से में चौराहों और सडकों पर हुई राजनैतिक और सामाजिक  हलचलें , इसका इतिहास बयान करती हैं !
 स्टेशन रोड पर स्थित आज का सरकारी  महाविद्यालय  , कभी रीवा  महाराजा  की कोठी हुआ   करता था !दो मंजिला , कोठी की लाल और भूरे पत्थरों की दीवारें , इसका गोल खम्बों वाला पोर्च , दीवारों पर बना रीवा राज्य का राजचिन्ह , फर्श पर लगा बर्मी टीक  ,   और नीचे का दरबार हाल  इसके अतीत की कहानी कहता है ! राजशाही के जमाने में , इसके अहाते में  एक बड़ा चिड़ियाघर भी था , जिसमें कई प्रजातियों की चिड़ियाँ थी ! इसके दक्षिण की और , एक बगीचा भी था , जिसमें कई  बृक्ष थे  , छोटा सा  सरोवर  था  , मोर , हंस ,    आदि  पले   रहते थे ! महाराजा व्यंकट रमन के जमाने में यहां इलाहाबाद से आयी नर्तकी , ' छप्पन छुरी  का मुजरा हुआ ,, जो शक्ल से तो बदसूरत थी किन्तु आवाज़ से अद्वितीय ! किसी ने उस की शक्ल को ले कर तंज़  कस दिया , तो उसने घूंघट डाल  कर ,  नृत्य किया ! जब राजा ने उस की आवाज़ और कला पर खुश हो  बख्शीश देनी चाही तो  उसने कहा  की जहां कला को रूप से तौला जाए , उस महफ़िल में , मैं बख्शीश नहीं लेती ! इस भवन में अक्सर पन्ना के राजा भी  आ  कर  रुकते थे ! भारत के प्रथम महामहिम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद भी यहां रुक चुके हैं !     इसका शिल्प और महत्त्व यह  बताता है की यह भवन ,  रियासती जमाने से ले कर आज के  आधुनिक सतना की शान है !  ! आज यह  क्षात्रों  के भविष्य को संवारता , सतना का ऐतिहासिक महाविद्यालय है ! इसके प्रांगण में , युवा  क्षात्रों  हलचल आने वाले भारत के उज्जवल  भविष्य का संकेत देती है !
( इंटरव्यू किसी  महाविद्यालय के प्रिंसिपल का ,,, हो सके तो सत्येंद्र शर्मा का )
    इस नगर   के   ऐतिहासिक  भवन आज या तो जर्जर हैं , या पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं !१९३५ के समय जगतदेव  तालाब के पास बनी  सोमचन्द आयल मिल , पुराने पावरहाउस के पास बनी सरवरिया बोर्डिंग हाउस  , महावीर भवन के पास बनी सेठ गणपत मारवाड़ी की लल्ला बिल्डिंग , जिसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का जमावड़ा   था ,  और जिस भवन में , सेठ गोविन्द दस , सीताराम काटजू , पुरुषोत्तमदास टंडन , मदनमोहन मालवीय  , कप्तान अवधेश प्रतापसिंघ ने अपने भाषण दिए ,   ध्वस्त हो चुकी है ! कई रंगारंग कार्यक्रमों  का  साक्षी , पृथ्वी थियेटर के नाटक  का  प्रत्यक्ष दर्शी , और बाद में शहर की आकर्षण बनी ' चांदनी टाकीज़ ' का  सिनेमा भवन आज सिर्फ यादों में ही  शेष  है !
 लेकिन रेलवे लाइन के दूसरी और बने व्यंकट स्कूल के भवन , थर्मल पावर हाउस ,   अंग्रेजों के युग में सिविल लाइन में  बने भवन , धवारी का प्रिंस हाल , और बरदाडीह की गढ़ी , आज भी शहर का पुराना इतिहास बखान रही है ! शहर का पोस्ट आफिस , , पुराना बघेलखण्ड बैंक भवन  , जो अब कम्युनिटी हाल है , एम् एल  बी इमारत , मारवाड़ी धर्मशाला , बाजार अस्पताल , गौशाला ,  इतिहास का ' समय चिन्ह ' बन कर आज भी अपनी गवाही खुद दे रहा है !

    इस शहर की गालियां और चौराहे , सिर्फ गालियां और चौराहे ही नहीं हैं बल्कि इतिहास का दस्तावेज हैं ! १९१४ में स्थापित  गौशाला चौक कभी , पुराने सतना शहर का दक्षिणी सीमा हुआ करती थी ! यहां  की गौशाला में गायें पली थीं और शहर को उनसे शुद्ध दूध मिलता था ! इस चौक से लगे पहले कई बड़े बड़े बगीचे थे , जो अब कांक्रीट के भवनों में तब्दील हो गए ! १९३० से १९४० तक , आज़ादी के आंदोलन के सिपाही  , भुग्गी महराज ने यहीं निवास किया ! पहले यहां एक बावड़ी और कुवां भी था ,, जिसके चिन्ह दीखते हैं !
      गौशाला चौक से मैहर की और जाने पर , आज के सतना की अंतिम सीमा पर बसा है ' नज़ीरा बाद ' ! यद्यपि यह मुस्लिम बाहुल्य बस्ती है , किन्तु यहां की तहजीब गंगा जमुनी है ! गंगा जमुनी इसलिए , क्यूंकि इस मोहल्ले में जहां मस्जिद है , वहीं मंदिर भी कम संख्या में नहीं ! कहते हैं की इस बस्ती को हाजी नज़ीर सौदागर ने मुस्लिमों को मुफ्त में जमीन बाँट कर  बसाया था , लेकिन इसी बस्ती में हिन्दुओं की संख्या भी कम नहीं ! यहां कांग्रेस के प्रख्यात नेता , बैरिस्टर  गुलशेर अहमद का निवास है , तो वहीं   फौजदारी के प्रख्यात वकील मुरलीधर शर्मा  और सतना के प्रख्यात पत्रकार स्व आनंद अग्रवाल  के बेटे भी इसी मोहल्ले में रहते हैं !
 अन्य चौकों में पुराने शहर की उत्तरी  सीमा पर बने , पन्नीलाल चौक , और हनुमान चौक भी ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं !कहते हैं की पन्नीलाल चौक , कभी अंग्रेज मेमों , और अंग्रेज अधिकारियों का सैरगाह था ! यहां पन्नीलाल सौदागर की चर्चित दूकान थी , जिसमें विदेशी कपड़ा , बिस्कुट , शराब , डिब्बा बंद गोस्त , ग्रामोफोन के रिकार्ड , वगैरह मिलते थे , जिन्हे अंग्रेज खरीदने आते थे ! इस चौक के बीच एक बड़ा , पानीदार कुवां भी था ! यह चौराहा , डाक्टर राम मनोहर लोहिया की सभा , पहलवान गामा के अल्प  विश्राम , आर एस  एस  के दफ्तर और संघ कार्यकर्ताओं की हलचल  , समाजवादियों के अड्डे , का गवाह है ! इसी चौराहे पर हाजी गनी का होटल था ! जिसमें गांधी जी के बगावती पुत्र , हरी लाल गांधी , जो कुछ दिन सतना में रहे ,  और  जिन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया था भोजन करने आते थे ! आज भी यह चौराहा शहर का प्रसिद्द चौराहा है , जहां भरा पूरा बाज़ार , होटल , और धर्मशालाएं हैं ! इसी चौक के फैज़ होटल में , डाक्टर लोहिया , राजनारायण , मृणाल गोर , जॉर्ज फर्नाडीज वगैरह आ चुके हैं  ! यहां रामलीला का  भरत  मिलाप संपन्न होता है , ! इसी के निकट , जैनियों का उपासना स्थल , जैन मंदिर भी है ! कभी यहां इस शहर का आकर्षण ,," अशोक टाकीज " भी हुआ करती थी , जो अब शॉपिंग कम्प्लेक्स में तब्दील हो गयी है !
  पन्नीलाल चौक की तरह ' हनुमान चौक ' भी एक ऐतिहासिक चौक है ! यहां एक हनुमान जी का छोटा सा मंदिर है , जिसकी स्थापना १५० वर्ष पूर्व ,  सं १८७८ में हुई ! यह इस शहर की आस्था का केंद्र है ! हर मंगलवार , और शनिवार यहां हनुमान भक्तों का तांता लगा रहता है ! इस चौक पर लुल्ली हलवाई की दूकान कभी बड़ी प्रसिद्द थी , जिसका बना कलाकंद , रेवा के महाराजा को बहुत पसंद था , इसलिए वह सतना से रीवा भेजा जाता था ! इस चौराहे पर सतना के अग्रणीय व्यवसायी ,. बाबू गोपाल नाथ खत्री का निवास था  जिनका सामाजिक योगदान सतना के सुनहरे पन्नो में अंकित है ! कहते हैं की उनके पीछे बनी एक मस्जिद में कुवां ना होने से पानी का अभाव था , इसलिए नमाज़ियों को वजू करने की  दिक्कत  होती थी ! एक दिन उनके घर आयी , चूड़ी पहनाने वाली मुस्लिम मनिहारिन ने उनकी बहु को यह स्थिति बताई तो बहू ने मस्जिद प्रांगण में, अपने खर्चे से  कुवां खुदवाना  स्वीकार कर लिया !  खत्री बाबू को जब यह मालूम हुआ तो वे बहुत प्रसन्न हुए , अपनी बहु को आशीषा , और मौलवी को बुलवा कर कहा की वे जल्द से  जल्द  कुवां खुदवा लें , और जो खर्च लगे , वह उनकी गद्दी से ले जाएँ !हिन्दू मुस्लिम एकता की ऐसी मिसाल मिलना मुश्किल है !  इसी चौक पर हीरालाल मारवाड़ी , अमृतलाल मिश्र , मोहनलालमिश्र  , जैसे  सतना के कर्मठ नागरिकों के मकान थे ,,,जिनका सतना के यत्थान में बहुत बड़ा योगदान है ! सतना का पहला सांध्य अखबार , इसी चौराहे से , प्रखर पत्रकार , चिंतामणि मिश्र द्वारा प्रकाशित हुआ !
  हनुमानचौक से लगा पावर हाउस चौक है ! यहां  जैन धर्मावलम्बियों प्रसिद्द मंदिर और पाठशाला है ! पावर हाउस चौक शहर के पहले बिजलीघर  डीज़ल पावर स्टेशन के नाम पर पड़ा है !  हनुमान चौक से ही लगा शास्त्री चौक है ! यहां कभी तमेरों की बर्तनो की दुकाने बहुतायत में थी ! यहां जो लोग रहे , उनमें , प्यारेलाल संतोषी फ़िल्मी गीतकार का नाम प्रसिद्द है , जिनका लिखा गीत ,, " टम  टम  से ना झांको रानी जी , गाड़ी से गाड़ी लड़ जाएगी "  पुरे भारत में प्रसिद्द हुआ था ! हनुमान चौक से पूर्व की और जाने पर पर एडवोकेट राजकिशोर शुक्ला का निवास था , जिनके छोटे भाई ,,' बिन्दु शुक्ला ' ने बतौर मनमोहन देसाई के चीफ अस्सिस्टेंट , , फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा नाम कमाया ! उनकी अपनी  निर्देशित  फिल्म ' मेरा जीवन ' भले ही ज्यादा नहीं चली , किन्तु  डाक्टर के जीवन पर बनी इस फिल्म की कथा ने दर्शकों को बहुत प्रभावित किया !

(इंटरव्यू सभाजीत शर्मा का )

      सतना शहर के एक अन्य चौराहे , बिहारी चौक ' की महत्ता , हिन्दू धर्म की दृष्टि से ऐतिहासिक है !इस चौक की स्थापना तभी हुई जब , अंग्रेज इस भूमि पर , रेल लाइन बिछा रहे थे ! बाबा बृन्दावन  दास   द्वारा बनवाये गए , , बिहारी जी के मंदिर में , बांके बिहारी यानी कृष्ण की  १५० साल पहले की  ऐतिहासिक  मूर्ति स्थापित है ! यह मंदिर हिन्दुओं की आस्था का महत्वपूर्ण मंदिर है ! इसी चौक में बाबा बृन्दावन दास द्वारा शुरू की गयी रामलीला का मंचन आरम्भ हुआ , जो आज भी अनवरत है ! रामलीला , स्थानीय लोगों का लोकप्रिय मंचन है , जिसमें स्थानीय नागरिक ही पात्रों का अभिनय करते हैं ! यह चौराहा आज़ादी के आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा , जहां विशाल जन सभाएं आयोजित होती थीं ! यहां पुरुषोत्तम दास टंडन ठहर चुके हैं ! गुजराती सेठ धारसी जी, जिनका निवास इस चौक पर था ,  ने यहां पहला स्कूल खुलवाया ! इसी जगह पहले गुजराती समाज का गरबा नृत्य वर्षों तक होता रहा ! यह चौराहा , धार्मिक आस्थाओं , और राजनैतिक गतिविधियों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है !
       बिहारी चौक से लगे , बाजार चौक को भी वही ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है , जो बिहारी चौक को है ! वस्तुतः , सतना का पुरातन ऐतिहासिक बाजार यही है ! यहां के सीरिया हलवाई की रबड़ी  और बब्बू पान वाले का पान कभी बहुत प्रसिद्द  था  , इस चौक ने सतना में आज़ादी के आंदोलनों की आधार शिला राखी ! विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का सत्याग्रह इसी चौराहे पर हुआ  और सत्याग्रहियों पर तत्कालीन अंगरेजी पुलिस के डंडे भी यहीं बरसे ! इसी चौक पर उमड़ी भीड़ को देख कर पुलिस ने हवाई फायर भी किये ! यहां कई सामाजिक  विवाद भी हुए , और उनका निदान भी निकाला गया ! इसी चौक के निवासी नारायणदास खंडेलवाल को पतंगें उड़ाने का शौक था , ! वो पतंगों के साथ पांच रूपये का नॉट टांक देते थे , और कटने पर उसे लूटने की होड़ युवा बच्चों में मच जाती ! इसी चौराहे पर काशी महराज की सोडावाटर की दूकान थी , ! काशी महराज क्रांतिकारियों के पक्षधर थे , और उनकी दूकान में उस काल में भी भगत सिंह , चंद्रशेखर की फोटो लगी रहती थी !
        सतना जहां , आज़ादी के दीवानो , सामाज सेवियों , प्रखर पत्रकारों , बड़े व्यवसाइयों का चर्चित शहर रहा , वहीं रास रंग और मनोरंजन के लिए भी यह शहर प्रमुख रूप से जाना जाता  रहा  ! आज का प्रमुख चौक , लालता चौक किसी जमाने में चकलाटोला चौहट्टा के नाम से जाना जाता रहा ! बांदा की  नवाबी  रियासत कमजोर पड़ने पर , कई वेश्याएं , बांदा  से सतना आकर  बस  गयीं ! यह चौराहा , उनके यहां आबाद होने से , चकला टोला के नाम से जाना जाता रहा ! वेश्याओं का जमावड़ा यहां १९१८ से ले कर १९४० तक शीर्ष पर रहा ! वेश्याओं के रास रंग , नृत्य गान के कारण इस मोहल्ले में शराब की दुकानों के साथ साथ नशे की कई और भी अड्डे स्थापित हो गए , जिसमें अफीम का चलन बहुत रहा ! शराब के साथ भजिया , कबाब , पापड की दुकाने यहां खुलीं और उनमे से प्रसिद्द हुए एक भजिया बनाने वाले के नाम पर , लगा हुआ निकटस्थ चौराहा , फूलचंद भजिया वाला आज भी शहर में प्रसिद्द है !  कहते हैं की लालता नाम की एक नर्तकी यहां बहुत प्रसिद्द हुई !  कभी कभी झगडे भी हुए , जिसमें एक नर्तकी हमीदन जान की नाक भी उसके प्रेमी ने काट डाली ! इसी चौक पर मार्तण्ड टाकीज़ के नाम से ,  एक टाकीज भी खुली , जिसमें बैठने के लिए बेंच नहीं थी ! लोग घर से बोरी फटता ले कर आते , और उस पर बैठते ! इसी चौक पर पक्षियों का बाजार भी था , जहां तरह तरह के पक्षी बिकते थे !
     देश आज़ाद होने के बाद जब सतना ने करवट बदली , तो वेश्याओं के अड्डे यहाँ से खत्म हो गए ! बाद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , और कांग्रेस के प्रखर नेता डाक्टर लालता प्रसाद ने यहां जब अपनी क्लीनिक खोली तो चाऊ का नाम बदल कर " लालता चौक " कर दिया गया ! डाक्टर लालता प्रसाद नेता से अधिक समाजसेवी थे , इसलिए अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने नीमी ग्राम में एक वृद्धाश्रम खोल लिया और वहीं चले गए !
 आज यह चौराहा मजदूरों के लिए प्रसिद्द है  जहां दिहाड़ी पर , काम करने के लिए मजदूरों की हाट लगती है !

    सतना में अन्य चौराहों में कोतवाली चौराहा  , भैंसाखाना चौक ,  धवारी चौराहा , सिविल लाइन चौक , सर्किट हाउस चौक , अस्पताल चौक ,  और सिमरिया चौक के नाम से विख्यात है ! ये सतना के बाद में हुए विकास से विकसित हुए चौराहे हैं ! इनमें धवारी चौक एक पुराना चौराहा है जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है ,इस चौराहे पर बना आधुनिक स्टेडियम ,  खेलों  की हर सुविधा प्रदान करता है ! धवारी बस्ती कभी सतना शहर के बाहर मानी जाती थी , लेकिन अब यह सतना के मध्य  आ गयी है ! अस्पताल चौराहे पर  सतना का सर्व सुविधायुक्त जिला अस्पताल है  वहीं इसी चौराहे पर शहर  प्राचीन देवी मंदिर भी है !  नवरात्रि में , शीतला अष्टमी पर , इस नगर की महिलायें देवी प्रतिमा पर जल चढाने आती हैं ! इसी चौराहे पर जगतदेव तालाब है , जिसके  घाट  पर शिव का प्राचीन मंदिर है !  ,, सेमरिया चौक सतना के आधुनिक विकास का केंद्र है ,यहां यातायात की सुविधा के लिए , एक फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माणाधीन है ! ,! सिमरिया चौक पर सतना का बस स्टेण्ड है , जहां से हर दिशा में  बसें  प्रस्थान करती हैं ! सतना का एक मात्र कम्युनिटी हाल इसी चौक पर स्थापित है  जिसमें विविध आयोजन होते हैं ! इसमें एक साथ एक हजार तक लोगों के बैठने की व्यवस्था है ,,और  एक बड़ा स्टेज भी है , जहां पर नाटक , सभाएं आदि आयोजित होती हैं !यह हाल सर्व सुविधायुक्त हाल है !  सतना के विकास का वर्णन करते समय , सीमेंट संयंत्र के लिए बसी , बिरला कॉलोनी का जिक्र भी बहुत जरूरी है !  सतना के बहुमुखी उद्योगों में सीमेंट उद्योग का प्रथम स्थान है , वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए यूनिवर्सल केबिल फैक्ट्री का योगदान भी सतना के लिए महत्त्व पूर्ण है !

      पुराने गौरव की कीर्ति पताका फहराता आज का सतना ,  ,  विभिन्न जातियों , धर्मों , मतों , सम्प्रदायों का मिलाजुला शहर है ! इसमें हर धर्म के उपासकों के उपासना केंद्र हैं! यहां बंगालियों की दुर्गा पूजा अब पूरे हिन्दू समाज द्वारा अपना ली गयी है और नवरात्रि पर यहां जगह दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जातीं हैं ! दूसरी और ,  महाराष्ट्र की  गणेश पूजा भी आज इस नगर  का  प्रमुख आयोजन बन चुकी है , और महाराष्ट्रियन समाज के साथ साथ सम्पूर्ण हिन्दू समाज , जगह जगह , हर्षोल्लाष के साथ गणेश प्रतिमाएं स्थापित करता है ! नवरात्रि में गरबा नृत्य का आयोजन , अब सिर्फ गुजरातियों का उत्सव नहीं है , बल्कि यह सम्पूर्ण सतना निवासियों का उत्सव है !  यहां के शिव मंदिरों में , शिवरात्रि धूम धाम के साथ मनाई जाती है , वहीं  बसंतोत्सव पर हर स्कूल , हर समाज में सरसवती पूजी जाती है ! होली यहां का सार्वजनिक उत्सव है ,,, जिसमें रंग और उल्लास देखते ही बनता है !  चैत्र की नव रात्रि , नागपंचमी ,  कजलियां , और रक्षा बंधन का आज  भी यहां बरकरार है ,,वहीं ,, पितृ पक्ष में पुरखों को  जलांजलि , दशहरे में रामलीलाओं का आयोजन , रावण दहन के त्योहारों के साथ साथ  दीपावली  का प्रकाश पर्व भी सतना को जगमगा देता है !
    कन्याओं की शिक्षा के लिए यहां दो सरकारी  स्कूल हैं ,जिनमें महारानी लक्ष्मी बाई कन्या पाठशाला , और बूटी बाई स्कूल प्रमुख है ! इसके अतिरिक्त आर्य कन्या विद्यालय , सिंधु कन्या विद्यालय  भी शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं ! स्टेशन रोड पर स्थित महिला कला विद्यालय भी सतना की शान है !  कन्याओं की उच्च शिक्षा के लिए , महाराजा कोठी का महाविद्यालय अब पूरी तरह कन्या महाविद्यालय के नाम से जाना जाने लगा है ! बच्चों की शिक्षा के उत्कृष्ट विद्यालय ,  प्रेम नगर स्थित वेंकट  एक  , वेंकट  दो  ,  के नाम से विख्यात हैं ! इसके अतिरिक्त कई अन्य स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणीय भूमिका निभा रहे हैं , जिसमें ,  सरस्वती  स्कूल ,   संत ,,,,,,,,, , सी एम् ऐ  विद्यालय , आदि प्रमुख हैं !
        सतना में एक यूनिवर्सिटी , ऐ के एस यूनिवर्सिटी के नाम से अपना परचम लहरा रही है ! इस के विविध पाठ्यक्रम , युवाओं को रोजगार , और खुद के व्यवसाय की दिशा देने में पूरी तरह समर्थ है ! यह यूनिवर्सिटी कई बार विविध अवार्डों से , अच्छे कार्य के लिए नवाज़ी जा चुकी है ! इसी तरह आज के सतना में आदित्य कालेज भी तकनीकी पाठ्यक्रमों का उत्कृष्ट केंद्र है ! यहां इंजीनियरिंग की सभी शाखाओं के साथ , आधुनिक शिक्षा की सभी सुविधाएं प्राप्त हैं ! इससे पढ़े क्षात्र , आज विविध फैक्ट्रियों , माइनिंग , और अग्निशामक इंजीनियिरिंग में सतना का नाम रोशन कर रहे हैं !
( इंटरव्यू ऐ के इस के संचालक का )
   सतना का वित्स कालेज , शिक्षा के क्षेत्र में एक अभिनव संस्थान है ! इसका नाम आज देश में भी प्रसिद्धि पा रहा है ! शिक्षा के प्रतिमानों के साथ साथ , इसके  क्षात्रों  को रंग कर्म , और अभिनय कला ,में भी चारों और प्रसिद्धि मिल रही है ! इस कालेज  में दो भव्य थियेटर हैं , जहां समय समय पर नाटकों के आयोजन भी होते हैं !
            आज का सतना , शिक्षा के क्षेत्र में समृद्ध सतना है ! यहां तकनीकी शिक्षा के लिए पॉलीटेक्निक पहले से ही है !  मध्यप्रदेश सरकार ने जल्दी ही यहां मेडिकल कालेज खोले जाने की स्वीकृति दी है !इसके अलावा पेरा मेडिकल कोर्स पहले से ही यहां संचालित है ! महिलाओं के लिए सिलाई कढ़ाई , के केंद्र भी यहाँ कई वर्षों से संचालित हैं !

  ( इंटरव्यू किसी शिक्षाविद का  हो सके तो सेनानी जी का ) )
     
     किसी भी शहर की असली पहचान होती है , उसकी कला संस्कृति और , साहित्य सृजन ! सतना शहर के  पास विरासत में धरोहर के रूप में यह दोनों विधाएँ विदवमान हैं ! इस शहर में पृथ्वी थियेटर ने नाटकों की जो नीवं स्थापित की , उसका  निर्वहन इस नगर के लोग समय समय पर करते रहे ! १९३१ में यहां मारवाड़ी समाज ने नाटक मंडली स्थापित की कृष्णावतार , भीष्मपितामह  जैसे आदर्श  नाटक खेले गए ! यहां कभी बजरंग विजय कंपनी  नामक  नाटक मंडली बनी जिसने वीर अभिमन्यु , श्रवणकुमार , लैला मजनू नाटक खेले ! बाद में जैन समाज ने भी नाटक मंडली बनाई और कुछ नाटक खेले ! लेकिन इस शहर की आत्मा में बसी रामलीला एक ऐसा मंच रही , जिसमें हर अभिनय प्रेमी  को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला ! रामलीला एक ऐसा आयोजन था , जिसमें पुराने लोगों के हटने के बाद नए लोग आते गए और निरंतरता बनी रही !
    १९८० के दशक में , यहां नुक्कड़ नाटकों ने धूम मचाई ! इससे पहले भी क खा  ग  नामक संस्था के निर्देशक श्री दिलीप मिश्र ने कई नाटक खेले  जिसमें आज के लब्ध  प्रतिष्ठ  , स्क्रिप्ट राइटर ,  अशोक मिश्र  ने भी निर्देशन दिया !  श्री दिलीप मिश्र के सतना से बाहर चले जाने के बाद रंग कर्म के लिए बहुत दिनों तक खामोशी छाई रही , लेकिन  तीन वर्षों पूर्व से इस शहर का रंग मंच नई  चमक के साथ फिर उभरा , जब राष्ट्रीय  नाट्य स्कूल के स्नातक द्वारिका दाहिया ने यहां फिर से नाट्य कर्म की बाग़ डोर  सम्हाली ! उनके निर्देशन में वित्स कालेज के थियेटर में जो नाटक खेले गए वे अब  सतना के रुझान को  नई  दिशा दे रहे हैं ! श्री दाहिया की पत्नी श्रीमती सविता दाहिया भी उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर एक से एक नाटकों को नया आयाम दे रही है ! अब इस नगर में नाट्य उत्सव भी हो रहे हैं ,, और मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए युवा , अब रंग कर्म की धारा ही बहा रहे हैं !  इस बीच श्री दिलीप मिश्र भी लौट आये और उन्होंने भी कई अच्छे नाटक खेल डाले !
  ( इंटरव्यू द्वारिका दाहिया का+ दिलीप मिश्र का )  )
    संगीत के क्षेत्र में , भले ही इस शहर में कोई उस्ताद पैदा नहीं हुआ , लेकिन मैहर  के संगीत घराने से प्रभावित शास्त्रीय संगीत की धारा यहां निरंतर बहती रही ! संगीत भारती , और गीतम नामक संगीत संस्थाएं बनी , और संगीत के उत्कृष्ट आयोजन हुए ! सं १९८४ में , बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले से आये , संगीत महर्षि रतनजन कर के शिष्य , श्री ज्ञान सागर शर्मा ने यहां शास्त्रीय संगीत के विद्यालय स्थापित किये , और यहाँ के संगीत प्रेमी शिष्यों को शास्त्रीय संगीत की उच्चकोटि की शिक्षा से दीक्षित किया !  संगीत के कई स्कूल , उनके बाद , यहां की परम्परा में खुले और धीरे धीरे संगीत कला के श्रोताओं के साथ साथ कलाकार भी यहां स्थापित हुए !  शास्त्रीय संगीत के अलावा , सुगम संगीत ने भी यहां अपनी छटा बिखेरी , और फ़िल्मी संगीत के कई आर्केष्ट्रा  यहां स्थापित हुए ! जिसमें रागनी आर्केष्ट्रा  प्रमुख है !  आज भी इस परम्परा को निबाहते कई आर्केष्ट्रा सतना में संगीत माधुर्य बिखेर रहे हैं !
    साहित्य में सतना शहर सदा अग्रणीय रहा !  नगर निगम का पुस्तकालय यहां  किताबों का आगार रहा ! इसमें कथा साहित्य के साथ , उपन्यास , काव्य संग्रह , लोगों की रूचि वर्धन का सहारा बना ! सतना में निरंतर हुए भव्य कवी सम्मेलनों   ने यहां श्रोताओं को काव्य विधा जोड़ा ! देश के नामी गिरामी कवि , सतना आकर अपना काव्य पाठ कर चुके हैं !  आज यहां के लेखक और कवियों में हरीश निगम , गीतकवि सुमेर सिंह शैलेश , सुदामा शरद  अनूप अशेष , ऋषिवंश , बाबूलाल दाहिया , नाम अग्रणीय कवियों में लिया जाता है , वहीं साहित्य विधा के दमकते नक्षत्रों में चिंतामणि मिश्र , प्रह्लाद अग्रवाल , सुषमा मुनींद्र , संतोष खरे , डाक्टर प्रदीप मिश्र , वन्दना दुबे   और डाक्टर सत्येंद्र शर्मा , साहित्याकाश को आलोकित कर रहे हैं ! इस नगरी में उर्दू शायरी भी पल्ल्वित हुई है ,,जिसके लोकप्रिय शायर  रफीक सतनवी , राईस नस्तर  , पुरनम  सुल्तानपुरी आदि हैं ! सतना में कई फिल्मकारों ने कई विषयों पर वृत्तचित्र और लघु फ़िल्में बनाई हैं , जिनमे  सभाजीत शर्मा , हरी चौरसिया , कुलदीप सक्सेना , और पृथ्वी अयलानी प्रमुख हैं !
( इंटरव्यू प्रह्लाद अग्रवाल का )
      पत्रिकारिता  में सतना की अपनी विशेष आभा है , जिसमें  चिंतामणि वरिष्ठ पत्रकार हैं ! आज़ादी के समय से ही पत्रकारिता यहां परवान चढ़ी , और दैनिक सांध्य पत्रों के साथ साथ , दैनिक अखबार भी यहां से प्रकाशित हुए ! सं १९३३ में पहला प्रेस , माया प्रेस के नाम से सतना में खुला जिसे माया बाबू नामक बंगाली महोदय ने चालू किया ! इसी प्रेस से पहला अखबार " रैय्यत " नाम से नुमाया हुआ ! उस काल में अखबार निकालना , जुर्म जैसा था , तो उसका खामयाजा भी माया बाबू ने झेला और जेल गए ! १९४० के बाद कुछ अन्य लोगों ने भी प्रेस लगाए , समाचार पात्र प्रकाशित किये , किन्तु वे ज्यादा दिन नहीं चले ! १९६२ में सनसनी नामक दैनिक सांध्य अखबार चिंतामणि मिश्र ने शुरू किया और फिर १९७३ में श्री आनंद अग्रवाल की सम्पादकीय में जवान भारत ने धूम मचाई ! इंद्रा गांधी के आपात काल में जब कई पत्रकार जेल चले गए तो समाचार पत्रों की श्रंखला यहां रुक गयी !  बाद में १९८० के बाद कुमार कपूर ने सतना टाइगर नाम का अखबार शुरू किया , जो लोकप्रिय हुआ ! इसके बाद कई समाचार पात्र शुरू हुए , जिसमें कृष्णगोपाल गुप्ता का साप्ताहिक आयोग , शंकरलाल तिवारी का बेधड़क भारत , निरंजन शर्मा का क्रांतिदूत , गिरजा प्रसाद का चितेरा आदि उल्लेखनीय है ! पत्रकारिता के लिए शहीद हुए आनंद अग्रवाल का नाम सतना में आदर से लिया जाता है ! इनके अखबार जवान भारत ने , कई पत्रकारों को पटल पर आगे आने के अवसर दिए ! १९८४ में मायाराम सुरजन ने सतना में " देशबंधु " नामक दैनिक समाचार पात्र का आगाज़ किया , और इस समाचार पात्र ने कई लेखकों , और पत्रकारों को आगे आने के अवसर दिए ! भगवान् दास सफड़िया  , सुदामा शरद , प्रह्लाद अग्रवाल  , बाबूलाल दाहिया , देवीशरण ग्रामीण इस समाचार पात्र के नियमित स्तम्भकार बने !  एक और समाचार पत्र  नेशनल टू  डे भी कुछ दिनों के लिए प्रकाशित हुआ किन्तु जल्द ही बंद हो गया ! पत्रकारों में निरंजन शर्मा का नाम विशेष उल्लेखनीय है  जिन्होंने अल्प  आयु से ही पत्रकारिता शुरू की , और कई समाचार पत्रों का सम्पादन सम्हाला !  आज   यहां से लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र  , दैनिक भाष्कर  सहित सतना स्टार , और दैनिक  पत्रिका का प्रकाशन भी हो रहा है !इन समाचार पत्रों के सम्पादक और सह सम्पादक  माने हुए वरिष्ठ पत्रकार हैं और सतना की हर गतिविधि को देश के शेष संसार से जोड़ते हैं !
 (इंटरव्यू किसी पत्रकार का ,,हो सके तो सुदामाशारद , अथवा निरंजन शर्मा का )

    सतना शहर को जिन सुघड़ हाथों ने गढ़ा , जिसमें मूल्यों के रंग भरे , जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम से इसे जोड़ा , और जिनकी बदौलत यह शहर आज जीवित है , उन महापुरुषों का उल्लेख करना , आज उन्हें पूर्वजों की तरह याद करने जैसा है ! हर शहर का अपना विशिष्ट इतिहास होता है , लेकिन सतना का इतिहास तो  रंगबिरंगी पेंटिंग की तरह है ,,जिसमें हर कोण से देखने पर नई  आकृति उभरती है ,,ऐसी आकृति  जो कहती है की ठहरो , अभी तो मेरी हे कथा पूरी नहीं हुई , तुम अगला पृष्ठ कैसे पलट सकते हो ,,? इस शहर के प्रणेता , वे अंग्रेज , जो सुदूर देश से इस विंध्य भूमि पर आये , और भले ही उनका मूल्य ध्येय यहां शाशन करने का रहा हो , किन्तु जिन्होंने यहां की भूमि में  , नयी आबादी वाला एक शहर बसा दिया हो ,  वापिस नहीं गए , और सतना रेलवे स्टेशन के एक कोने में बने अपने चिर विराम स्थल क्रिश्चियन कब्रिस्तान में सो  गए  !उन्हें  श्रद्धा के दो फूल चढाने का दस्तूर तो बनता ही है ! उन्हें भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जो विभिन्न शहरों से यहां आये , यहां व्यापार की नीवं डाली , सामाजिक मूल्यों  को जिया , और इस शहर को पनपता छोड़ कर , अतीत में विलीन हो गए !  उन कला प्रेमियों , नृत्यांगनाओं , और साहित्य लेखकों को भी शृद्धा सुमन चढाने का दस्तूर बनता है , जिन्होंने इस शहर को मनोरंजक बनाया ,  इसे  रंगीन धड़कन दी , और उन अनाम मजदूरों को भी श्रद्धा सुमन चढाने का हक बनता है ,, जिन्होंने इस भू भाग को रेल की पटरियों के माध्यम से , देश के हर कोने से जोड़ा !  सतना नगर की गाथा कहने से सतना का पूरा परिचय नहीं मिलता ! वस्तुतः यह तो उस नगर की कथा थी , जो स्वयं भू नगर था ,,, जिसका सृजन किसी ने नहीं किया ,, ! किन्तु इस नगर के चारों और  फैले विंध्य की भूमि पर जिन संस्कृतियों ने पंख पसारे  , जो अपने  पीछे अनोखी धरोहरें छोड़ गए हैं , जिनके पद चिन्ह आज भी इस माटी पर अंकित हैं , उसकी कथा भी हम अगले अंक में कहेंगे ,, ताकि हम आप जान सकें की भले ही शहर स्वयं भू हो सकते हैं , लेकिन इस  धरा  की  संस्कृति , स्वयंभू नहीं नहीं हो सकती ! वह सिर्फ किसी एक सड़ी का इतिहास नहीं है ,,,बल्कि सदियों का इतिहास है !

--सभाजीत
 maihar mandir
पुरुष एंकर - उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार ,  , मंदिर में उपलब्ध शिला  पट्ट  यह व्यक्त करता है की यह मंदिर ५०२ ईस्वी में निर्मित हुआ ! इतिहास के अनुसार  पांचवी सदी  से ले कर दसवीं सदी  तक यह क्षेत्र विभिन्न राजवंशों का संघर्ष क्षेत्र रहा !  गुप्त राजवंश और कलचुरी राजवंश  जहां वैष्णव मत के आराधक थे , वहीं नागा राजवंश और चंदेल राजवंश  शिव आराधक ! इसलिए यह क्षेत्र  दोनों  भक्ति  की साझा  भूमि के रूप में   जाना जाता   है !   मैहर व् इससे जुड़े कई  स्थानों के    मंदिर , विष्णु  मंदिरों के साथ साथ ,  शिव   के मंदिरों   के रूप में उपलब्ध हैं !
       एक किंबदंती के अनुसार , मैहर नगर का विकास , उन घुमक्क्ड योग साधना के संतों द्वारा सं १७७८ में किया गया , जिन्हे यह क्षेत्र , ओरछा के बुंदेली राजाओं द्वारा दान में  मिला था  ! जोगी नाम से विख्यात इस समुदाय को , कई स्थानों को नाथ सम्प्रदाय माना जाता है ! इस नगर की बोली बुंदेली है , जो यह स्थापित करती है की यह विंध्य   के  , बुंदेलखंड भूमि का ही हिस्सा है !



  

शनिवार, 26 जनवरी 2019



,,," विंध्य की विरासत " ,,

    प्रथम अंक 

( एक व्यक्ति  ढलवां पहाड़ी  के पीछे से निकल कर , क्रमशः उठता हुआ  ,,कैमरे के  आगे आता है  !  पीछे , पृष्ठभूमि में  फ़ैली हुई  विंध्याचल पर्वत  की चोटियां हैं    !  आगे आया  हुआ ,,पुरुष   एंकर है ,,कैमरा  ज़ूम हो कर  एंकर  पर जाता है ! )

एंकर -दोस्तों,,! आज हम अपने धारावाहिक " विंध्य की विरासत " के माध्यम से ,  विंध्याचल पर्वत  के पूर्वोत्तरी भाग में बिखरी , उस भूमि से आपका परिचय कराने जा रहे हैं , जिसके कण कण में राम का वास है ,  जहाँ ऋषियों  और  महर्षियों के तप का तेज ,है कई  वीर राजवंशों की गाथाएं हैं , और पग पग पर आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक की राष्ट्रीय धरोहरें हैं ! यह भूमि भाग ,,, विंध्याचल पर्वत की तराई में  बघेलखण्ड के  शहडोल जिले  से लेकर, रेवा , सीधी , सतना , पन्ना जिले की   वन सुषमा को अपने आँचल में  समेटे ,   बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले तक ,,"  विंध्य भूमि " के नाम  से आदिग्रंथों में   उल्लेखित किया गया है   ! वस्तुतः यह भूमि ,  गंगा कछार की भूमि से दक्षिण दिशा में प्रवेश करने का तोरण   द्वार  है  जिससे हो कर अगस्त ऋषि और भगवान् राम , आर्य संस्कृति के ध्वजावाहक बन कर ,  दक्षिण के  भू भाग में   प्रवेश किये  और  जहां आज भी ,,  आदिकालीन द्रविण संस्कृति  और आर्य संस्कृति की   साझा विरासत  फल फूल रही   है !
     विंध्यांचल  पर्वत ,,,,अगर  देखा जाए तो , कोई एक पर्वत के स्वरूप में नहीं है बल्कि पश्चिम  के  , गुजरात प्रांत से ले कर , पूर्व में बिहार और उत्तरप्रदेश तक  फ़ैली  कई पर्वत श्रेणियों की एक लम्बी श्रंखला है ! इसकी ऊंची  श्रेणियां ,, एक और छत्तीसगढ़ के  मेकल पर्वत को छूती हैं  और  दूसरी और   राजस्थान  के  राजपूताने  के शौर्य  वैभव ,, अरावली पर्वत को ! आदिकाल में , विंध्याचल पर्वत में फैले ,  सघन  वन , गहरी  घाटियों , हिंसक वन्यजीव , और दुर्गम भूमि के अवरोध के  कारण , इसे लांघना  संभव नहीं था और यह पर्वत  अजेय था !  मेकल पर्वत से निकल कर ,सतपुड़ा और विंध्याचल की गहरी घाटी में , पश्चिम की और  बहती नर्मदा , अरब सागर की खम्बात की खाड़ी में  विलीन होती थी और इसी पर्वत से निकल कर ,  , पूर्व की और बहता सोन  नद कैमोर घाटी से बह कर , बिहार जाकर , गंगा नदी में  अपना अस्तित्व विलीन करता था  इस प्रकार  उत्तर और दक्षिण की भूमि  को सरहदों  में बांटने का काम विंध्याचल  जैसे यहां एक प्रहरी  बन कर ,  अपनी  दोनों  भुजाएं फैला कर ,  करता था !    ! पौराणिक कथाओं के अनुसार   ,  कहते हैं की विंध्याचल पर्वत , अपनी ऊंचाई  को निरंतर उठाता हुआ  , देवताओ के प्रिय पर्वत ,  हिमालय को चुनौती देने लगा , !  अप्रिय स्थिति भांप कर , अगस्त्य ऋषि ने आर्य संस्कृति की धर्मध्वजा  ले कर , उत्तर से दक्षिण  की यात्रा की ,  और  जब वे यहां मेकल के किनारे  से गुजरे , तो  विंध्याचल पर्वत ने शाष्टांग दंडवत  लेट कर उन्हें प्रणाम किया!  अगस्त ऋषि ,  अपने  वापिस लौटने तक उसे उसी प्रकार लेटे  रहने का  निर्देश  देकर दक्षिण की और  चले गए और फिर  कभी वापिस नहीं आये ! कहते हैं आज यह उसी तरह दंडवत हो कर , पश्चिम से पूर्व तक शाष्टांग मुद्रा में लेटा है , और अगस्त ऋषि के लौटने की बाट  जोह रहा है !

   { नेपथ्य से वाइस ओवर  ) ( विभिन्न दृश्यावली के साथ )  ,
 भारत के हृदय क्षेत्र , मध्यप्रदेश की , पूर्वोत्तरी सीमाओं पर   , अगस्त ऋषि  को दिए वचन को निबाहता विंध्याचल पर्वत , जिस भू भाग को अपने आगोश में समेटे है , वह विंध्य भूमि के नाम से  जाना जाता  है ! इस क्षेत्र को सींचने वाली नदियाँ , रिहन्द , सोन , तमसा ,  सतना , केन , धसान , और बेतवा , सदा नीरा हैं !' सोन ' को अपने तीव्र वेग के कारण , हिमालय पर बहने वाले   ब्रम्हपुत्र  की तरह , पुरुषवाची  " नद " की संज्ञा मिली है  जो पौराणिक कथाओं के अनुसार , जौहला  द्वारा भटकाया हुआ , नर्मदा का  वह  विकल प्रेमी है , जो पश्चाताप की आग में झुलसकर , मेकल पर्वत से छलांग लगा कर , जौहला को अपने साथ ले , उत्तर पूर्व की और त्रीवता से दौड़ कर , मोक्षदायनी गंगा नदी की  गोद  में समा जाता है !इसी सोन के किनारे , भ्रमर शैल पर ,  महाकवि बाण भट्ट ने , अपना आश्रम बना कर , कालजयी काव्य " कादम्बरी " की  अद्भुत रचना की ! इसी सोन के   तट  पर , तपस्वी शिवभक्त ,प्रशांत शिव की तपोस्थली  है  , जिन्होंने  चंद्रेह  के अद्भुत शिव मंदिर का निर्माण करवाया ! इसी सोन के तट पर , मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम है , और इसी सोन से  जौहला  के  मिलन घाट  को , रामायण काल के पितृभक्त  ' श्रवण' को दशरथ द्वारा शब्दभेदी बाण द्वारा मारे जाने का वर्णन यहां की जनश्रुति में है ! आधुनिक भारत के निर्माण में , पर्वतों को तोड़ कर , महीन बालू प्रदान करने वाली प्रमुख  नदी यही सोन है और इसी सोन को बाणसागर में  बाँध कर , आज वद्युत उत्पादन का बड़ा जल विद्युत् उत्पादन का  शक्तिकेंद्र बनाया गया है  !
बाणसागर बाँध से निकली , सोन की वेगवती जल धाराएं , नहरों के माध्यम से बह कर ,  रीवा  जिले की बिछिया नदीं से मिल कर , इस क्षेत्र की प्रमुख नदी , तमसा  में  उड़ेल  दी गयी हैं , जहां से  , सिरमौर में , बड़ा जल विद्युत् उपकेंद्र , मध्य प्रदेश की विद्युत् वाहिकाओं में ऊर्जा का संचार कर रहा है ! बाणसागर से  निकला सोन का जल , सतना और रीवा के ग्रामीण अंचलों को भिगोता , विंध्य  के मध्य भाग में   उन्नत कृषि का सम्बल बना हुआ है , वहीं वह अपनी बिछुड़ी  प्रिया , नर्मदा,,  के बरगी बाँध से निकले जल को  , सतना जिले में गले लगाने  को  आज भी बेताब है !

( तमसा नदी के किनारे चलती हुई एक स्त्री एंकर   )
  स्त्री एंकर-   विंध्याचल पर्वत  की   ४८३ किलोमीटर लम्बी कैमोर पर्वत माला  पूर्व में बिहार के रोहतास  , और उत्तर में ,  उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले  तक फ़ैली हुई है     , जिस के  पूर्वी भाग में कैमोर पर्वत श्रंखला से  सट कर  सोन अपनी पूर्व की लम्बी यात्रा संपन्न  करता है ! इस , 'सोन घाटी में ,  फ़ैली गहन  वन सुषमा आदिकाल से '  विंध्यावाटी  ' के नाम से    विख्यात है !
  कैमोर पर्वत श्रंखला के ही ' तामकुंड ' नामक स्थल से निकली , -विंध्य क्षेत्र की प्रमुख  दूसरी नदी, ,,  '  तमसा ',, यानी टोंस नदी का  यहां के जनजीवन में कम महात्यम  नहीं है ! यह नदी  यहां के  चूने   पत्थर के पथरीले क्षेत्र पर बहती हुई , धार्मिक नगरी  मैहर  में  ,  माँ  शारदा का मुंह निहारती हुई , सतना नगर के निकट , माधवगढ़ किले को छूती हुई , रीवा जिले के विद्युत् शक्ति केंद्र सरमौर से निकल कर चाकघाट होते हुए , फिर कैमोर श्रंखला को पार ,करके  यमुना नदी में   जा मिलती है ! २६४ किलोमीटर की इस यात्रा में , वह  , रीवा रियासत  में  कई मनोरम  प्रपातों का सृजन करती है  जो देखते ही बनते हैं ! पुरवा , चचाई , और क्योटी प्रपात , विंध्यभूमि के चर्चित प्रपात हैं , जिसका अपार जल  हृदय को आनंदित करता है ! तमसा नदी का उलेख रामायण में भी है , जिसके किनारे पर , राम ने , वनयात्रा के दौरान , अयोध्या त्यागने के बाद पहली रात्रि विश्राम किया था ! आधुनिक भारत के निर्माण में , विंध्याचल श्रेणियों की तरहटी में , बिखरा  चूने  पत्थर का अनमोल खजाना , सीमेंट निर्माण का मूल तत्व है ! इसलिए सतना और रीवा क्षेत्र  में आज सीमेंट के कई कारखाने उच्च ग्रेड की सीमेंट बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं !

   ( नेपथ्य में  वाइस ओवर  )
  विंध्याचल श्रेणी ,   कैमोर पर्वत माला के उत्तरी भाग की तराई की पठारी भूमि में स्थित  ,   विंध्य भूमि का रीवा नगर , बघेल राजवंशों की मुख्य  राजधानी  रहा   ! बघेल राजाओं  की   पूर्ववर्ती  राजधानी , बांधवगढ़ में स्थापित हुई ,, जहां का अजेय ,किला  कई राजवंशों के उत्थान पतन , आपसी युद्धों , और राजशाही के  उथलपुथल का गवाह रहा है !विश्व प्रसिद्द  सफ़ेद शेर , इसी बघेल  राजवंश की दी हुई  सौगात है   ! बांधवगढ़ का वन्य अभ्यारण , न केवल समूचे देश में प्रसिद्द है , बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी लुभा रहा है ! रीवा  जिले के गोविंगढ़ तालाब में बना राजशाही युग का   कठ बंगला सहज ही  सबको  अपनी और खींच लेता है , विंध्य भूमि के इसी भाग में ,   शिव , ,वैष्णव  संस्कृतियों के अवशेष , आज भी धार्मिक उथल पुथल की गवाही देते हैं वहीं बौद्ध काल के स्तूपों के  अवशेष और जैन मंदिर  के स्मृति चिन्ह भी अहिंसा के परम् धर्म और  विचारधारा की कथा कहते नजर आते हैं !मुगलकाल में , शहंशाह  अकबर के  दरबार के नौ रत्नों के दो रत्न , तानसेन और बीरबल भी इसी विंध्य भूमि के रत्न थे , जो रीवा राज से अकबर दरबार भेजे गए ! आज़ादी के संघर्ष में , बलिदानी युवकों में   रणमत  सिंह का नाम ,  यहां के इतिहास में अमित  अक्षरों में  दर्ज़  है !

   पुरुष एंकर - विंध्याचल की छितराईयों श्रेणियों के बीच शोभा देता चित्रकूट , सतना जिले को धार्मिक आस्थाओं का केंद्र बिंदु  है  ,  जहां भगवान् राम का , मंदाकिनी नदी के किनारे , बारह वर्षों  तक  निवास रहा ,,और जहां  की पर्वत श्रेणियों में स्थित ,  कामदगिरि , दो भाइयों के आत्मिक प्रेम का गवाही देता है   !  भरत की निरंतर मनुहार के स्वर आज भी यहां  जनश्रुतियों में समाये हैं और  त्याग की परम्परा निबाहते राम के पद चिन्ह यहां की रज के  कण कण में दिखाई देते हैं ! भरत  के साथ , राम को मनाने आये अवधवासी , अपनी भाषा संस्कृति के साथ ,जब  यहीं रुक गए , तो  उन्होंने  इस भू भाग की   जनजातियों के साथ मिल  कर एक   नई  संस्कृति,  नई  भाषा  का सृजन किया  जो आगे चल   कर  बघेली कहलाई!

 ( नेपथ्य से-वाइस ओवर  ) ( विभिन्न  दृश्यावली सहित  )
   विंध्य भूमि का  सतना जिला बघेलों और   प्रतिहार ठाकुरों की कर्म  भूमि  रहा है  ! यहाँ मैहर की शारदा देवी , विवेक वाणी , और कला की वरदानी देवी है , जिनके चरणों में बैठ   कर    वीण वाद्य के धनी  बाबा अल्लाउद्दीन खां ने रविशंकर, अकबर अली ,  जैसे संगीत रत्न देश  को   भेंट किये !  आदिकाल में ' विंध्याचल पर्वत की  पर्वत श्रेणी    के नीचे  बसी  ,   उच्छकल्प ' के नाम से विख्यात ,  उचेहरा नगरी , धातु शिल्प  की कारीगरी  के लिए कई वर्षों तक  विख्यात रही  !   भरहुत पहाड़ पर बने बौद्धकालीन स्तूप  और उनके केंद्रों के अवशेष सम्राट  अशोक के शाशन  काल की गाथा , पाषाण मूर्तियों के माध्यम से कह रहे हैं  !  चौमुखनाथ मंदिर में शिव की चारमुद्राओं की अद्भुत मूर्ती इसी क्षेत्र में  विराजी हुई है ! तथा विंध्य भूमि के ,  इसी जिले के एक छोर पर , उत्तरप्रदेश की सीमा से  सटा  वह ऐतिहासिक अजेय दुर्ग सीना ताने खड़ा है जिसे शेरशाह सूरी महीनो तक घेरा डाल  कर जीत नहीं पाया था ! यह भूमि वीर  चंदेल राजवंश की कर्मस्थली भी रही , जहाँ  महोबे के बनाफर  वीर आल्हा उदल  की गाथाएं आज भी पूरेभारत में ,  ओज  फैलाती  हुई   , मारीशश में भी चाव से  गायी  जा रही   हैं ! चन्देलों के काल में बने खजुराहो के मंदिर आज विश्व में कोतुहल का केंद्र बने हुए हैं और योग , भोग , और मोक्ष ,के  आनंद की परिभाषा , पाषाण मूर्तियों के ज़ुबानी बखान  रहे  हैं !   ,

स्त्री एंकर -  (  अजय गढ़  घाटी में खड़े हो कर ) -  विंध्य के पर्वत श्रेणियों पर स्थित पन्ना पठार की भूमि , महराज क्षत्रसाल की वीरगाथा  गाती  है ! कवी भूषण की पालकी को कंधा देने वाले वीर बुंदेले क्षत्रसाल , की प्रशंशा करते हुए कवि भूषण ने कहा था ,,
 ' ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी ,
 ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहती हैं ,
 कंद  मूल भोग करें कंद मूल भोग करें ,
तीन बेर खाती ती  वे तीन बेर खाती हैं !
 वहीं दूसरी और  छत्रसाल की वीरता बखानते हुए एक और दोहे में उनके साम्राज्य की सीमा , विंध्य की नदियों को दर्शाते हुए स्थापित की गयी थी ,,
  इति   यमुना  उत  नर्मदा ,
 इति  चम्बल  , उत  टोंस ,
 छत्रसाल सौं  लरन  की ,
 रही ना  कोऊ  होन्स !!

   ( नेपथ्य से वाइस ओवर  )+ ( कवरेज )
 इन्ही वीर बुंदेले छत्रसाल की राजधानी पन्ना में   हीरों की खदानें हीरे उगलती हैं  ! चारों और से घेरे , विंध्यांचल की पर्वत श्रेणियां , इस नगर को प्राकृतिक सौंदर्य  का  धनी बनाती हैं ! इसके उत्तर में बना अजयगढ़ का किला , चंदेल राजवंशों की मूर्ती कला का साक्ष्य है ! विंध्य पर्वत श्रेणियों के   घाट चूमती , कर्णावती नदी ,,, ,के जल में किलोल करते मगर और घड़ियाल , जहाँ  सदियों से पथिकों को  भयभीत करते रहे    वहीं केन नदी के किनारे फैला विशाल वन अभ्यारण , वन्य जीवों के राजा , बाघ का ऐशगाह रहा  !  पन्ना नगरी के चर्चित धार्मिक मंदिर यहाँ आध्यात्म की अलख जगाते हैं ,  कृष्ण भगवान् का ' किशोरजी ' के  मंदिर के साथ  उनके बड़ेभाई बलदाऊ जी का भी विशाल मंदिर  यहां स्थापित है  ! ओरंगजेब के  भाई , दाराशिकोह को भी इसी विंध्य भूमि ने शरण दी , और यहीं से प्रणामी सम्प्रदाय की नई  धर्म  परम्परा की धारा फूटी ! पन्ना का प्रणामी मंदिर आज भी प्रणामी धर्म के अनुयायियों का दर्शनीय मंदिर और आध्यात्म का केंद्र है   !

 पुरुष एंकर -  ( धुवेला के तालाब पर ) -
 विंध्य श्रेणियों पर बसा छतरपुर ,   वस्तुतः छत्रसाल के नाम पर बसाया गया नगर  था  , यह विंध्य के , बिजावर पठार पर बसा हुआ है !  यहां  से  बीस किलोमीटर दूर ,  नोगावं  जाते हुए , मध्य मार्ग में पड़ता है मऊसहानियां , जो छत्रसाल की प्रारम्भिक राजधानी के रूपमें विख्यात है !  बाजीराव पेशवा की नृत्यांगना प्रेयसी , ' मस्तानी ' का भाबनावेश महल यह स्थापित करता है की वह यहीं से मराठे दरबार को भेंट में भेजी गयी थी ! मऊसहानियां के तालाब , छत्रसालयुग के प्रतीक हैं ! यहां स्थापित  आधुनिक धुवेला म्यूजियम युद्धों में प्रयोग किये गए शास्त्रों का आगार है ! विंध्य की इन्ही श्रंखलाओं पर स्थापित है , बिजावर नगर के समीप ' जटाशंकर ' का मंदिर जो धर्म और आस्थाओं का केंद्र है !

नेपथ्य में 
 यह भू भाग चन्देलराजवंशों के स्थापत्य कला , और मूर्ती कला का गवाह है ! खजुराहो के मंदिर विश्व विख्यात हैं ! वहीं चंदला के निकट ,  पहाड़ी पर बनाये गए ,  बुंदेलों के , एक दुर्ग की छवि     दर्शनीय है ! यह स्थान तीन दिशाओं का मार्ग संगम रहा ,,,जिसमें महोबे की दिशा में फैले पाने के बरेज , महोबे के प्रसिद्द  पान की शान की विरासत को संजोये हुए हैं !  बुंदेलों के बनाये कई दुर्ग आज भी बड़ामलहरा नामक स्थान की पहाड़ियों पर अपनी शौर्य गाथा कह रहे हैं !

स्त्री एंकर  - 
विंध्य पर्वत की श्रेणियों के मध्य बहती धसान और बेतवा नदी ने विंध्य भूमि के उन पृष्ठों को रचा है , जिसमें बुंदेले रजवाड़ों  की वीर कथाएं , यहां के प्राचीन अजेय दुर्ग , गढ़कुंडार और ओरछा में पनपी हैं ! गढ़ कुंढार से उदय हुई , बुंदेले राजवंशों के शौर्य की गाथाएं , बेतवा के तट  पर  बने  ओरछा   नगर तक बिखरीं हुई हैं ! अकबर के दरबार में ,  धर्म  के धनी , वीर बुंदेले मधुकर शाह के  मस्तक पर  , जो राम भक्ति का तिलक लगा , वह ओरछा को  अयोध्या से लाये  गये  राम राजा  की राजधानी बनाने तक , सदैव दमकता रहा !  उनके वारिस महराजा रामसाह  के शाशन काल में , यहां काव्य और साहित्य की जो धारा बही , वह काव्य शिरोमणि केशव के काल से अंकित है ! केशव ने जो काव्य रचनाएं की वे कालजयी हैं ! इसी युग में ओरछा के  कुंवर इंद्रजीत की प्रेयसी ,   काव्य विदुषी , नृत्यांगना , रायप्रवीण के साहस की कथा जन  श्रुतियों में बड़े स्वाभिमान स के साथ   कही जाती है ! ओरछा , राम और सीता के पवित्र देवर भाभी के रिश्ते को भी दोहराता है  जो हरदौल और उनकी भाभी के बीच  यहां श्रद्धा स्वरूप विदवमान है !
( नेपथ्य में )
ओरछा ,  वेत्रवती , बेतवा नदी के तट पर बसा एक रमणीक नगर है  !यहां  के महल , मंदिर , और बेतवा  का प्राकृतिक सौन्दर्य आज अनुपम आभा बिखेर रहे हैं ! राम भगवान् के अयोध्या से यहां आने पर बुन्देल राजवंशों ने ओरछा छोड़ कर अपनी राजधानी टीकमगढ़ कर ली ! टीकम गढ़ , के चारों और कई किले हैं , जिनमें बुंदेले राजवंशों का इतिहास बिखरा पड़ा है ! टीकमगढ़ के निकट , बाणासुर के युग में प्रकट हुए , भगवान् शिव की शिवलिंग है , ! विंध्य की पर्वत श्रेणियां , टीकमगढ़ से ले कर , यहां के एक पुराने नगर , चंदेरी तक फ़ैली हुई है , जहां वस्त्र निर्माण कला  युगों पूर्व से अक्षुण है ! चंदेरी , कई ऐतिहासिक करवटों की गवाह है , !  विंध्य की धारा का यह अंतिम छोर है !

 पुरुष एंकर --  सात नदियों  , रिहन्द , सोन , तमसा , सतना ,  कर्णावती , धसान , बेतवा ,  से सिंचित , आम्र कूट  और चित्र कूट के शैल शिखरों से  सजा ,  आदिवासी जनजातियों की संस्कृति अपने में संजोये ,  विभिन्न
रीतिरिवाजों को निबाहता , आदिकाल के स्मृतिचिन्हों  को गहन वनो के बीच अक्षुण रखे ,  विभिन्न अरण्यों में विचरते वनजीवों  के आश्रय ,  शौर्य की धरोहरों को अंक में लपेटे  ,  साहित्य , कला , और संगीत के धनी , इस विंध्य क्षेत्र की कथाएं , धारावाहिक के  इन सीमित अंकों में समेटना सहज नहीं है ! यह धरा  जहां वैदिक युग के स्मृति चिन्हों की साक्षी है ,जहां मध्यकाल के राजवंशों की उथल पुथल की गवाह है ,  वहीं यह आधुनिक भारत की छवि में भी अब  धीरे धीरे परवर्तित होती जा रही है ! इस धरा के गर्भ जहां  में चुना  पत्थर , हीरा , कोयला, जैसे खनिज छिपे हुए हैं , वहीं यह धरा  , वनोपज , और वन्य संस्कृति , के निर्वाहक , जनजातियों में --कोल  , गोंड , भारिया , अगरिया , बैगाओं के जीवन आधार , और उनकी संस्कृति की आधार भूमि है !  पाषाण युग के  भित्तचित्र भी  इस क्षेत्र के  गहन वनो में   स्थित है ,, जो मनुष्य  जाती के क्रमशः उत्थान कथा कह रहे हैं  !   इन संस्कृतियों की पूरी कथाएं कहने , उनके उत्सवों , खानपान की कथा बखानने , उनके नृत्य संगीत को निहारने , उनकी व्याख्या करने में कई अध्याय लग  लग जाएंगे  ! विंध्य की  यह धरा , दो राजवंशों -बघेलों और - बुंदेलों की कर्म भूमि होने के कारण , आज  दो क्षेत्रों- बघेलखण्ड और बुंदेलखंड  के नाम से जानी जाने लगी है , !
  भले ही राजशाही के कारण , यहां विभिन्न संस्कृतियों का चलन हुआ , किन्तु आम्रकूट से लेकर , चित्रकूट होते हुए ओरछा तक फ़ैली इस धारा के कण कण में एक ही आराध्य लोगों के हृदय में बसे  हुए हैं  और वे हैं  --,,," राम ",,! राम इस धरा की आत्मा हैं , राम इस धरा के आदर्श हैं , राम इस धरा के नायक हैं , इसलिए यहां का  जनजीवन सहजता , सरलता और आस्था के एक ही सूत्र में पिरोया हुआ दिखता है !
अपने धारावाहिक विंध्य की विरासत  में हम , यहां के  कुछ आकर्षक स्थानों , परम्पराओं , संस्कृतियों से आप को जोड़ेंगे  ,, जिसमें रमने के बाद आप के मन में एक ही अभिलाषा जागेगी , विंध्य की इन वीथियों में  विस्तृत भ्रमण की , उसमें बिखरे आध्यात्म को  आत्मसात करने की , उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का रसपान करने की ,और उसके रमणीय स्थलों में रम जाने की ,,! हमारा विश्वाश है की आप हमारी इन कड़ियों से जुड़ने के बाद कहेंगे ,,, यह तो आनंद का  अथाह है ,,, इसमें जितना डूबें ,,,उतना कम है !
तो  अगली कड़ी का हमारे साथ इंतज़ार कीजिये ,,, और अपना टीवी , अपनी चैनल पहले से खोल कर रखिये ,,रात्रि ,,,बजे ,,, , ',,,' चैनल पर ,,!
 शुभरात्रि ,,!

 ( आलेख ,,,सभाजीत )
  

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

किताबों के कीड़े ,
किताबों में रहते हैं ,,
किताबें कुतरते ,
किताबें खाते हैं ,,
और जब बहुत मोटे हो जाते हैं ,
 तब बाहर आते हैं ,,!!

बाहर निकलने पर ,
वे दीमक को समझाते हैं ,,!
की किताबें तो बस  वही  हैं ,,
जिसको उन्होंने पढ़ा ,,
बाकी तो ,,बकवास है ,
 ' मूर्खों का गढ़ा ',,!!

वर्जनाओं को तोड़ दो ,
 हवाओं का  रुख मोड़ दो ,,
तुम घुसो हर  जगह पर ,
हर पुराने घर ,
फोड़ दो ,

तुम  लिखो  कि,,
नदियों के धारे ,,
ऊपर से नीचे क्यों नहीं बहे ,,?
तुम कहो कि,,
पर्वत घमंडी ,,
सर उठाये क्यों खड़े ,,??

तुम ये पूछो ,
 क्यों हवा में ,,परिंदों का राज है ,,?
तुम ये  पूछो  ,
 शेर क्यों ,,
 बकरी को खाने को आज़ाद है ,,??
तुम बताओ ,,
 नई पीढ़ी को,,, कि ,,
वाद ही संवाद है ,,!
तुम  समझाओ ,
प्रगति का  मतलब  ही  बस ,
 प्रतिवाद है ,,!!

बदल दो तुम देश ,
 हर परिवेश ,
तोड़ कर पुराने विश्वाश ,
मिटा दो किंबदंती ,
  कि,,लिख लो ,
खुद नया इतिहास ,,,!!
भुला दो पूर्वजों के नाम ,
पुराने खानपान ,,!
कि किंचित शेष ना रह पाए ,
 अपने आप की पहचान ,,!!

प्रगति के नाम पर ,
विदेशी हाथ,,,
 थाम कर ,,
तुम धरो एक लक्ष्य ,
की हो तुम्हारा ,,
चतुर्दिश ,,एकछत्र ,,राज ,,,
रटाते रहो सबको सदा ,
की बाकी सब हैं ,
 गरीब और मजदूर ,,
एक तुम ही हो ,
 सबके ,,," गरीब नवाज़ " ,,,!!
रियासत से ,,
 सियासत तक ,
प्रजा कहलाये ,हरदम ,एक चिड़िया ,,
और तुम   रहो  ,,
उनके शिकारी ,,,
 आसमां में उड़ते ,,,' बाज़ ' ,,!!

---  सभाजीत

शनिवार, 27 अक्टूबर 2018


"  चन्दा मामा "

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शैशवास्था में , माँ के चेहरे को लगातार देखते रहने के बाद , जब घर के बाहर किसी और चेहरे को पहचानने का बोध जागा , तो माँ ने मुझे गोद में ले कर , चाँद दिखाते हुए कहा --" वह है ' चन्दा मामा " ! मैंने  माँ के चेहरे को छू कर , फिर चाँद के चहरे को छूने के लिए अपना नन्हा हाथ बढ़ाया , तो माँ ने हँसते हुए कहा --" चन्दा मामा दूर के ,,"  !,,,,  , उसे सिर्फ बुला सकते हो ,,, उसके साथ खेल सकते हो , लेकिन उसे छू नहीं सकते !  तब मुझे महसूस हुआ  की माँ के जैसा ही कोई अपना और भी है , जो मेरे साथ खेल सकता है , जिसे मैं कभी भी बुला सकता हूँ ,  और  जिससे मुझे कोई भय नहीं ! ,
 
   कुछ बड़ा हुआ , तो वही चाँद , अपने कई रूप बदलता दिखा ,, कभी , नाखून की तरह , कभी आधा अधूरा , कभी बहुत बड़ा , तो कभी आसमान से बिलकुल विलुप्त ! कभी वह बदलियों में घंटों छुप जाता , तो कभी  अचानक प्रकट हो जाता !  तब मैंने माँ से पूछा भी था की यह कैसा मामा है ,,? जो रूप बदल बदल कर रहता है ,,?? 
       माँ ने कहा ,,," वह तुम्हें '  चिढ़ाता  " है , वह भी उसका तुम्हारे लिए एक खेल है ,,  तुम  भी उसे चिढ़ा देना !  मैंने माँ की बात मान कर चाँद को कई बार जीभ दिखा कर चिढ़ाया भी ,,और खुश भी हुआ की मैंने उसे जबाब दे दिया !
 
        कुछ दिनों बाद मेरी बहिन ने जन्म लिया , तो चाँद को मैं भूल गया !  दिन भर बहिन का चेहरा देख कर ही खुश होता रहता ,,   लेकिन बहिन के थोड़ा  बड़े होते ही ,  चाँद  फिर मेरे जीवन में  आ गया   , अपना बड़ा सा गोल मुँह ले कर , की  देखो ,,, मैं साक्षी हूँ , उस रक्षा बंधन का , जो तुम अपनी बहिन की रक्षा के लिए , अपनी कलाई पर " राखी " के रूप में बँधवाओगे ! माँ ने बताया की , ' रक्षा बंधन ' पूर्णिमा के दिन आता है ,!,,,,,,जब तुम्हारा चंदामामा  तुम्हारे हाथ में , तुम्हारी बहिन के हाथ की बंधी  राखी देखता है !,,,,  वह यह भी कहता है की आज से तुम बड़े हो गए हो , ,,, अब तुम्हें मामा की रक्षा नहीं चाहिए , क्यूंकि अब तुम खुद एक
  ' रक्षक ' बन चुके हो !

       कुछ बड़ा हुआ , तो चाँद फिर दिखा ,,, गणेश चतुर्थी के दिन ,,! बोला ,,, ' मैं तो सबका मामा हूँ ना ,,,तो शिवजी के बेटे के जन्म पर भी तो दिखूंगा ही ! 
,,,,, गणेश मेरे प्रिय देव थे ,  उनका चेहरा ही मेरे लिए कौतूहल के साथ साथ , एक दोस्त के  चेहरे जैसा लगता था ! और  उनका वाहन चूहा ,,,!,वह  तो मेरे घर में कई बार रोटी चुरा कर भागा था ! 
      वे लड्डू खाते थे , जो मुझे भी प्रिय था !  मुझे चाँद  की यह बात तब भी अच्छी लगी ,, और तब भी अच्छी लगी , जब वह अनंत चौदस के दिन खुद  आकर गणेश जी को वापिस ले गया !

    स्कूल गया तो , एक दिन जब बहुत बड़ा गोल सा चाँद , आसमान में हँसते हुए उभरा , तो माँ  ने कहा ,,,आज " गुरू पूर्णिमा " है !  आज फिर चाँद तुम्हे बताने आया है की जीवन में गुरू का महत्त्व कभी ना भूलना !  तुम्हे जीवन में बहुत सी  बातें  सिखाने वाले , बहुत से गुरू मिलेंगें ,  लेकिन गलत या सही जानने -  समझने  का बोध जिस  गुरू  ने तुम्हें दिया है ,,उसे सदा याद रखना ! जाओ अपनी पाठशाला के गुरूजी को प्रणाम करके आओ ! मैं ने  आसमान में  हँसते चाँद को निहारा ,,और उसे भी प्रणाम किया !  सोचा कि ,,, असली गुरू तो तुम्ही हो --" मामा " ,,!!

 थोड़ा  समय ही बीता , कि   एक दिन वह फिर  आसमान से झांका ,, ! इस बार पूरा चेहरा तो नहीं दिखाया ,, लेकिन झाँक कर बोला ,,' आज राम का विजय दिवस है !  तुम जो कुछ दिनों से ,  राम लीला  देख कर मुदित हो रहे थे , उसका निष्कर्ष दिवस है ,,जब रावण  का वध भी होगा , और उसकी बुराइयों का दहन भी !  आज तुम्हारे कसबे का मैदान सजा हुआ है ,, तुम भी जा कर आनंद लो ,, मैं वहां तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ !'!,,,  उसकी बात मान कर मैंने यह उत्सव भी मनाया !

  मैदान में जा कर लगा की , अब ठण्ड के दिन आ गए हैं ,, इसलिए पूरीबांह की कमीज पहनना शुरू कर दूँ ,  की तभी , एक दिन चाँद ,, थोड़ी सिहरन लिए , आसमान में आ  धमका !,,,,  बोला .--
,,,,,, ' आज शरद पूर्णिमा है बेटा ,,!  माँ से कहो की खीर बनाएं और , अपने आँगन में रख दें ! मैं तुम्हारे जीवन में अमृत भरने के लिए बूँदें टपकाऊँगा ,, जो तुम्हे ना सिर्फ निरोगी करेंगी  ,,बल्कि तुम्हारी वाणी में भी खीर खाने से अमृत का वास हो जाएगा  ! " !
       घर आया तो माँ पहले से ही जैसे तैयार बैठी थी ,,शायद उसे अपने भाई की करतूतों के बारे में बहुत पहले से ही पता था !

    ठण्ड पड़ते ही , मेरा जीवन क्रम थोड़ा बदल गया , जल्दी सोना ,,और देर से उठाना ,,इसलिए ,, चाँद से बातें तो नहीं हो पाईं ,,लेकिन वह खिड़की से झाँक कर मेरी टोह लेता ही रहा !  ठण्ड जब घटी , तो   जो मौसम आया , उसने गुदगुदाना शुरू किया !  यह फागुन था ,,!

  ,,,,,,,,अब तक मैं कुछ बड़ा भी हो चुका था ,,  एक दिन चाँद आसमान में आकर ठिठोली करने लगा ,,हुड़दंगी करते हुए बोला --" "  बिटवा !!,, आज होलिका दहन है ,,और  परसों,, रग से सराबोर होने वाली 'होली; ! ,,,  थोड़ा होशियार रहना ,,!,, तुम्हारी बहिन सुबह से तुम्हारा मुंह रंगने को तैयार बैठी है !  हालांकि   उस दिन  वह तुम्हें  टीका लगा के  तुम्हे  माँ के हाथ के  बने घर के  पकवान , गुजिया पपडिया  भी खिलाएगी ,,! ,,,, लेकिन फिर भी रंग में तुम उससे जीत ना पाओगे !   समझे ,,!!,,,, " 
,,,,,,, मैंने मुंह बिचका कर उसे चिढ़ाया ,,, और कहा --" मामा ,,तुम मुझे डराने के इरादे से  आये हो क्या ,,?? हा  ,हा ,,!! मैं भी कम होशियार नहीं ,,समझे ,,? " ,,,,,,,,,
,,,,,,, होली के हुड़ंग में तो बाद में कई दिन बीत गए , पता ही नहीं चला !  "  फिर तो स्कूल की परीक्षा  ,, और परीक्षा के डर   ने पता नहीं कब मेरा समय बितवा  दिया ! ,,,, चाँद की और ना मैंने देखा ,,,और ना उसे अपनी  ओर मुझे  देखने  दिया !   बस ,,!! ,, पास - फेल  शंशय में उतराते हुए ,, जब  परिक्षा में उत्तीर्ण होने की खबर मुझे  मिली तो,,, मैं खुश हो गया !  तभी इतनी गर्मी पड़ने लगी ,, की  रात में चारपाइयाँ निकाल कर सब लोग  छत पर सोने लगे !

     अब  चंदा मामा ,, पंद्रह दिन बाद फेरा लगाते ,,और छत पर पडी हमारी चादरों को ठंडा कर जाते !  जब वे आते ,,तो हमसे बातें होती रहतीं ,, लेकिन जब वे नहीं आते तो हम तारे  गिनकर अपनी गणित को मजबूत करने की कोशिश करते ! इन कामों में मेरी चुलबुली बहिन , मुझसे हमेशा ही आगे रहती ,, !
          चाँद से बातें करते करते ,,,, उसके बताये त्यौहार मनाते मनाते ,,,,, मैं  कब बड़ा हो गया ,, यह जान ही नहीं पाया !  लेकिन  अब ,, मुझे चाँद ' मामा ' नहीं ,,बल्कि एक ' चेहरा' जैसा  दिखने लगा था !  मुझमें यह बदलाव कैसे आया ,,, यह तो ठीक से नहीं बता सकता !,, लेकिन एक बात जरूर  जान गया की , यह बदलाव , फ़िल्मी गीत सुनने से , और फ़िल्में देखने से हुआ  है ! ,,,, मुझे  "   चौदहवीं  के  चाँद "  में , एक चेहरा दिखाने वाले वे शायर ही थे , जो बार बार मेरे इस नए  चाँद को एक सुन्दर , युवा , स्त्री के चेहरे से तौल रहे थे !
  " चौदहवीं का चाँद हो ,,' , ' चाँद सा मुखड़ा क्यों शरमाया ' , , चाँद सी महबूबा हो मेरी , '    जैसे गीत मुझे गुदगुदाने लगे !,,,,तो मैंने चाँद से नाता बदल लिया  !,,,  मैं भी चाँद में एक  चाँद से मुखड़े  को तलाशने लगा !  ,,,,,,,,,मोहल्ले के चेहरे तो मेरी बहिन जैसे ही दिखे ,,इसलिए ,,उनमें चाँद ढूंढने पर भी नहीं मिला ,,!  फिल्मों के परदे पर जो चाँद थे ,, वे मेरी पहुँच से उतने ही दूर थे ,,  जितना की वास्तविक चाँद !,,,और ,,, दूसरे  मुहल्लों में जा कर चाँद ढूंढने की जुर्रत मुझे इसलिए नहीं हुई ,,क्योंकि  वहां कई ,,राहु केतु ,सितारे ,,, पहले से ही उन चांदों  को  घेरे रहते थे !,,
         तो चाह कर भी चाँद  नहीं पा सका !   यही करते करते नौकरी लग गयी ,,और दिन रात उसमें खट्ने लगा !  एक दिन एक ज्योतिषी  को पूछा ,, तो उसने कुंडली देख कर बताया की तुम्हारा जन्म , कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हुआ है !,,जब  चाँद बिलकुल ही प्रगट नहीं होता !  यही कारण है की ना तो तुम चाँद के प्रति कभी  आसक्त होंगे , और ना चाँद तुम्हारे प्रति  !

    दिन बीतते गए ,, और जब चाँद को मैं नहीं ढूंढ पाया , तो मेरे माता पिता ने , एक ' चाँद ' ढूंढ कर , उसे मेरी जीवन संगिनी बना दिया !  अब चाँद तो हमेशा साथ था ,,,लेकिन जल्दी ही  युवा वस्था का गीत  सच हो कर सामने आ गया ___ " चौदहवीं का चाँद हो ,,या " आफताब " हो ,,? " !  ,,,,,मेरी उम्र ढलते ढलते ,, चाँद भी अक्सर " आफताब " बन कर  दिखने लगा !

    लेकिन ' मेरा चाँद " जिसे मुझे मेरी माँ ने बचपन में दिखाया था ,, एक बार ,, जरूर फिर आया ! 
,,,,,,, जब पहली ' करवा चौथ " में  ,  मेरी पत्नी ने छलनी से झाँक कर , पहले उसे , और फिर मुझे देखा ,,तो वह पीछे से खिलखिलाया  !   बोला  --"  तुमने मुझ से सभी त्योहारों के बारे में जाना था ,,बेटा ! लेकिन इसके बारे में ,, मैं तभी बता सकता था , जब ज़मीन का चाँद तुम्हारी ज़िंदगी में उतर आये !  अब इस चाँद को सम्हाल कर रखना ,, यह तुम्हारे लिए खिलौना नहीं ,,बल्कि जीवन का अमृत है ! यह दिन भर भूखी प्यासी रह कर भी ,, तुम्हारे दीर्ध जीवन के लिए व्रत रहेगी !  तुम्हारा मुंह देख कर व्रत  तोड़ेगी ! यह मेरी तरह  दूर का चाँद नहीं ,,तुम्हारे घर का चाँद है !  और याद रखो ,,, जिस माँ के कारण तुम मुझसे परिचित हुए थे ,,जब वह भी तुम्हारे साथ दुनिया में नहीं रहेगी ,,तब यही ,, तुम्हें ,, और तुम्हारे बेटे के लिए एक माँ की भूमिका भी निभाएगी !     ,,,मैं तो एक  अजन्मा ,," मामा " हूँ ,,तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि  सबके लिए ,!,  जो भी बेटी ,,वहां ,,ज़मीन पर माँ का रूप धारण करती है ,,मैं ही उसके बेटे का पहला मामा होता हूँ !
  अब मुझे धरती की  एक नयी बहिन मिल गयी है ,,जो तुम्हारे साथ रहेगी  ! इसे दुखी मत करना ,,, वरना मैं  तुम्हारी कुंडली से हमेशा के लिए गायब हो जाऊंगा ! मेरे न रहने पर अमावस्या का घनघोर अन्धेरा ही तुम्हारे पीछे  शेष बचेगा ! और अन्धेरा तुम झेल नहीं पाओगे ! ",,,,

   मैंने सर झुका कर चाँद  को प्रणाम किया ! मैंने कहा --" तुम सदा मेरे साथ ही रहना ,,,चाहे मेरे मामा की तरह , चाहे मेरी गृहिणी की तरह ,,और चाहे मेरे बेटे के मामा की तरह ,,!  तुम्हारे बिना  तो मेरे  जीवन की गणना भी संभव नहीं ! वह शून्य है ! " 
,,,,,, !   तब से हर करवाचौथ पर  पहले मैं अपनी माँ को , फिर चाँद को ,  को प्रणाम करता हूँ ,और फिर अपनी पत्नी, को धन्यवाद देता हूँ   जिन्होंने मुझे हमेशा के लिए चाँद से फिर  जोड़ दिया  !

 ---  सभाजीत
     
     
   

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

   सीख

    *****


 (  यह नीति कथा है , जो कभी लिखी नहीं गयी !  यह सिर्फ  अनुभव की गयी !  यद्यपि राम कथा  लिखने वाले   महर्षि बाल्मीक  और गोस्वामी तुलसीदास  की नज़रों में यह आयी होगी , किन्तु इसे  किन्ही कारणों से वे   टाल गए ! बाद में रावण वध के बाद से  अयोध्या में जन्मी कई घटनाओं से इस सीख की उपस्थिति सत्यापित हुई है  , तथापि यह आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण और उपयोगी है , जिसका अनुगमन , आज के राजनीतिज्ञ भी करते हैं ! और  खुद भी घटना क्रमों का कारण भी बनते हैं   )

       ********



 नाभि में , लगे घातक वाणों से  ,  चोटिल  हो कर , रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा !   उठने  की कोशिश की तो उसे लगा ,  की  उसकी संचित ऊर्जा का अमृत कुंड जैसे अचानक सूख  रहा  है ! वह जान गया की , अब  उसका  उठना  मुश्किल है !  शक्ति धीरे धीरे क्षीण होने लगी , और  असह्य  दर्द के   साथ   उसकी आँखों के आगे   अन्धेरा  छाने लगा !  ,  उसके चारों और  , उसकी रक्षार्थ लड़ने वाले  लंका के सभी योद्धा , दौड़ कर उसके पास आये , और उसे उठाने की मदद  करने लगे ,, लेकिन उसने उन्हें  मना कर  दिया !
  उसने थोड़ा सर उठा कर  दूसरे पक्ष में खड़े विभीषण की और निहारा ,, और असह्य वेदना के साथ  भी  मुस्करा दिया!
   उधर राम के   समीप खड़े  विभीषण ने भी भांप  लिया की राम के  विषाक्त वाण अपने लक्ष्य पर काम कर गए हैं ,,और रावण अब मृत्यु के मुंह में जा रहा है ,! तभी अपने भाई की चिरपरिचित मुस्कान में उसे , अपने  बाल्य काल   के उस  भाई की स्नेह  दृष्टि दिखाई दी , जो कह रही थी , की अब तो आओ , मुझे सम्हालो , या मैं सिर्फ अनुचरों के हाथों में ही प्राण त्याग दूँ ,,? ,  आखिर तो ,,, इस राज पाट की लालसा में तुमने अपने मन की कर ही ली है ,,,अब अंतिम समय में मुझसे कैसा द्वेष ,,?? "

   उस दृष्टि से  आहत  हो कर , विभीषण के मुंह से भी दुःख भरी चींख निकल गयी , और वह दौड़ता हुआ  रावण के समीप जा कर  उसके  सर को  अपने हाथों पर ले लिया ! अब कोई द्वेष नहीं बचा था ,,, ना कोई मतांतर , ! अब सिर्फ वहां दो भाई थे ,  , जो एक ही कोख से जन्मे थे , लेकिन  जिनमें ,, सत्ता ,,, और नीति के कारण इतना विरोध हो गया था ,,,की वे एक दूसरे के जान के दुश्मन बन गए थे  , लेकिन अब जब विरोधी ही शेष नहीं बचने वाला था , तो विरोध क्या शेष बचने वाला था !

     ,,,  विभीषण की आँखों से अश्रुधार बह निकली !  बोला ---"  मुझे क्षमा करना भैया ! मुझसे भूल हुई !  मुझे लंका त्याग कर राम का साथ नहीं देना चाहिए था ,,, लेकिन आप मेरी और आदरणीय भाभीश्री , मंदोदरी की बात बिलकुल नहीं मान रहे थे , ,, मैंने कई नीति की बातें भी आपसे निवेदन की , किन्तु आप सभी निर्णय , अपने तक सुरक्षित रखते गए !  यहां तक की आप मेरी सीख को भी अपने लिए घातक मानने लगे , और मुझे लगा की अगर मैं ज्यादा दिन लंका में रहा तो आप मुझे या तो कारागार में डाल देंगें ,,या फिर मेरी ह्त्या करवा देंगे ! "
   रावण ने दर्द में कराहते हुए भी , मुस्कराने की कोशिश की  और बोला --" यह बात छोटे भाई ,, सोच सकते हैं ,,लेकिन बड़े कभी नहीं सोच सकते ! छोटे भाई को भय तो दिखाया जा सकता है , किन्तु बड़ा भाई कभी उसका अहित नहीं कर सकता ,,,क्यूंकि वह उसे पुत्रवत मानता है !  अच्छा हुआ तुमने लंका छोड़ दी ,,,लेकिन मंदोदरी भी तो मेरी आलोचक है ,,, उसने मुझे क्यों नहीं छोड़ा ,,? "
   विभीषण को कोई उत्तर नहीं सुझा ! वह और भी ज्यादा विलखता  हुआ अश्रु पात करने लगा !
     रावण कराहते हुए बोला -- ' अब दुखी मत हो ,,! मेरे बाद तुम्हें ही वंश और कुल को चलाना है ,, !  हाँ मंदोदरी मेरी सबसे प्रिय है ,,उसका ध्यान रखना ! "

     राम दूर से यह दृश्य देख रहे थे !  वे समझ गए की रावण अब कुछ क्षणों का ही मेहमान है !  उन्होंने कुछ सोचा और लक्ष्मण से बोले --" रावण अब इस पृथ्वीलोक से जा रहा है ! वह एक  राजा था ,, भले ही उसकी नीतियां सफल नहीं हुई ! तुम जाकर उससे पूछो की वह अंतिम समय में क्या महसूस कर रहा है ,,, किस कारण से इतना बलशाली होते हुए भी वह आज पराजित हुआ है ,, इसका भेद वह खुद खोले ,,!  तुम उससे राजनीति के ज्ञान के याचक बन कर  शिक्षा ले कर मुझे बताओ ,, , ! "
   लक्षमण अनमने मन से , राम की आज्ञा शिरोधार्य करके  रावण के पास गए ,, और वही प्रश्न पूछा ,,,जो राम ने कहा था ! रावण ने उन्हें अनसुना कर दिया ! तो वे वापिस लौट आये ! राम   समझ गए ,,और बोले ,,की----"
            ""--  लक्ष्मण ,,!!  वह भले ही धराशायी है , किन्तु एक पंडित है ,,और राजा भी ,   तुम उसके कर्मों पर मत जाओ ,,उसके ज्ञान और अनुभव को देखो ,,और उसके कदमों की तरफ खड़े हो कर फिर पूछो , वह जरूर जबाब देगा ! "
         लक्षमण दोबारा गए ,,और रावण के क़दमों की तरफ खड़े हो  खड़े कर   वही प्रश्न फिर दोहराया,,! इस बार रावण ने आँखें खोलीं ,, और बोला ---
      --- "  हे लक्ष्मण ,,!! राम तो मुझ से भी ज्यादा नीतिज्ञ हैं ,, लेकिन अगर पूछा ही है तो  मैं बताता हूँ की ,,  एक राजा को सभी की सलाह जरूर सुननी चाहिए !  भले ही वह छोटे से छोटा व्यक्ति हो या कोई बड़ा व्यक्ति हो !  राज्य कर्म सिर्फ अपने अनुभव , और अपनी नीतियों से नहीं चल सकते !    राजा सिर्फ अपने लिए राजा नहीं होता , वह सबके लिए होता है ! इसलिए किसी की भी अवहेलना करना ठीक नहीं ! "
             इतना कह कर रावण के मुंह पर संतोष के भाव आ गए , उसे  लगा की उसने अपने मन की बात कह दी है ! , और वह आँखें बंद करके गहन मूर्छा में चला गया !
   लक्षमण वापिस राम के पास गए और उन्हें रावण के उत्तर से अवगत करवा दिया ! राम चुपचाप मनन करते रहे और  फिर उन्होंने हनुमान को बुला कर कहा ,, " हे हनुमत ,,आप जाओ ,,और विभीषण के  शोक संताप को कम करवाने में सहायता करो !  रावण की मृत्यु हो चुकी है ,,उसके ,, अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था करवा दो , ताकि ,, उसे राजोचित सम्मान मिल सके !

           रावण के अंतिम संस्कार के बाद , सीता की अग्नि परिक्षा हुई , और तब राम उन्हें ले कर वापिस अयोध्या आ गए , जहां उनका राजतिलक हुआ !  राम ने  राजा का दायित्व निभाया ,, और पूरी प्रजा उनके राज में सुख अनुभव करने लगी !

    लेकिन एक दिन अयोध्या में एक धोबी ने बखेड़ा खड़ा कर दिया !  उसने जो सवाल अपनी पत्नी को ले कर उठाये ,,उससे  राम विचिलित हो गए !  इस अवसर पर उन्हें क्या करना चाहिए ,,,यह प्रश्न बार बार उनके मन में कौंधता रहा ! उन्होंने मनन किया , और अंदर टटोला , तो  एक राजा के बतौर , रावण की दी सीख उन्हें बार बार याद आने लगी !
 ,,,,,,,, "  एक राजा को सभी की सलाह जरूर सुननी चाहिए !  भले ही वह छोटे से छोटा व्यक्ति हो या कोई बड़ा व्यक्ति हो !  राज्य कर्म सिर्फ अपने अनुभव , और अपनी नीतियों से नहीं चल सकते !    राजा सिर्फ अपने लिए राजा नहीं होता , वह सबके लिए होता है ! इसलिए किसी की भी अवहेलना करना ठीक नहीं ! "
          इस बात पर मनन करके ,,  उन्होंने अपने साथियों से सलाह ली , और अंतिम निष्कर्ष यह निकाला की , धोबी के कथन पर हुई , प्रजा की प्रतिक्रया की अवहेलना उन्हें नहीं करना चाहिए !  इसलिए उन्होंने  निर्णय लिया की वे अपनी प्रिय पत्नी को भी बनवास हेतु भेज देंगें ,,और तदानुसार उन्होंने लक्षमण को बुला कर आज्ञा भी दे दी !
          रावण की सीख ने  रघुकुल को भी वेदना दे दी !  सीता को वनवास क्या मिला ,  ,, अयोध्या ही , श्री रहित हो गयी !

                   ************

    आज भी राजनीति इन दो सिद्धांतों के बीच झूल रही है !  क्या राजा को स्वविवेक से , अपनी  नीति पर अडिग रह कर   निर्णय लेने चाहिए , या फिर प्रजा की भावना अनुसार ,  मंत्री परिषद् की राय से  निर्णय  लेना  चाहिए ! यह प्रश्न अनुत्तरित है !
 अपने विवेक और अपनी नीति और अपने निर्णय  पर रावण चला ,,,किन्तु उसका  परिणाम ठीक नहीं  हुआ   ,,,
,,, और लोगों की भावना को सर्वोपरि मान कर , मंत्री परिषद् की सलाह से राम चले , तो उनका अपना दाम्पत्य  जीवन बुरी तरह  प्रभावित हुआ !
   सर्वथा  दो विपरीत आचरण , और सिद्धांत की नीतियों  के बीच  ,  सफल नीति क्या है ,,,यह तो ज्ञानी  लोग ही बता पाएंगे , किन्तु यह सच है की दोनों एकल  नीतियां ,, " लोकतंत्र , और राजतंत्र , उस त्रेता युग में भी ,   असफल नीतियां ही सिद्ध हुईं  थीं !

   ---सभाजीत 

 " शोध " 


सफाई पर लेख लिखना था !
दोस्तों ने कहा , तुम गप्पें ज्यादा मारते हो , यथार्थ कम होता है ! इसलिए शोध पर्यक लेख लिखा करो ! तो सोचा ,,,कलम घसीटने से पहले थोड़ा शोध ही कर लूँ ,,!!
सुबह सुबह घर से निकल पड़ा !
इधर उधर देखता चल ही रहा था की एक लड़का मिल गया !
उम्र सिर्फ दस साल ,,,कपडे मैले ,,बाल उलझे ! इतने सुबह बेचारा यह लड़का , काम ढूंढने निकल पड़ा ,,,यह सोच कर मेरा ह्रदय द्रवित हो गया !
पता नहीं कब यह देश नौनिहालों के प्रति जाग्रत होगा !
यही विचारते विचारते मैं थोड़ा ठिठक गया !
वह बोला --" क्या ढूंढ रहे हो बाबूजी ,,?
कुछ नहीं ,,कोई सफाई वाला है तुम्हारी निगाह में ,,??
वह हंसा , बोला --" सफाई तो मैं ही कर दूंगा ,,,मौका दीजिये ,,! "
" क्या तुम भी सफाई करते हो ,," ?
" आजमा कर देख लीजिये ,,! अभी अभी ,,दस ट्रेनों में घूम कर वापिस लौटा हूँ ,,! "
" तो तुम ट्रेन में सफाई करते हो ,?'
" हाँ ,,! भीड़ में भी करता हूँ ,,,बाज़ार में भी करता हूँ , मंदिर में भी करता हूँ ,, जहां मौका लगे वहीं करदेता हूँ ,,! "
" भीड़ में ,,? मतलब ,,? "
" मैं जेब साफ़ करता हूँ ,,! " ---वह हंसा ,,!!
मैं घबरा गया ! उसे वहीं छोड़ कर , अपनी जेब टटोलता आगे चल दिया !
आगे खद्दर धारी मिल गए !
वे सुबह सुबह अपने दो कुत्तों को सैर करवाने निकले थे !
दोनों कुत्ते दो अलग अलग विपरीत दिशाओं में उनको खींच रहे थे , और वे संतुलन बनाते हुए , उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे थे !
कुत्ते शायद अलग अलग अपनी भोज्य सामग्री देख कर लपके थे ,,,जो शायद एक और कुछ मैला जैसी थी और दूसरी और एक सड़ी हड्डी !
मुझे देख कर वे खद्दर धारी नेताजी ,,,झेंपते हुए बोले ---" सुबह सुबह कहाँ चल दिए भाई ,,? "
मैंने उन्हें अपने अभिप्राय के बारे में बताया ,,,!
वे बोले हम विपक्ष में हैं ,,! तुम तो देख ही रहे हो ,, सफाई का हाल , मेरे दोनों कुत्ते गन्दगी देख कर मचल रहे हैं ,,सरकार का काम है सफाई करवाना ,,,अगर करवाती तो ये क्यों भागते ,,?
" सही कहा भाईसाहब ! लेकिन मैं तो सफाई का यथार्थ ढूंढने निकला हूँ ! ,,,मुझे लेख लिखना है ! "
अगर यथार्थ पर लिखना है तो मेरी विरोधी पार्टी पर लिखो ना ,, वह तो सफाई में अव्वल रही है ! "
" कैसे ,,? "
" अरे वे तो सफाई मास्टर हैं ! पार्टी का चन्दा वे साफ़ कर गए ! योज़सनाओं की राशि वे साफ़ कर गए , अनुदान राशि , रिलीफ फंड , बैंक लोन वे साफ़ कर गए ! सब्सिडी वे साफ़ कर गए ! खनिज वे साफ़ कर गए , पहाड़ , जंगल वे साफ़ कर गए ! यही तो असली सफाई हुई है ,,पिछले सत्तर वर्षों में !
" भाई साहब ,,! कुछ साल तो आपकी पार्टी ने भी राज किया है ,,,क्या आप पर यह सफाई लागू नहीं होगी ,,? "
" तो क्या वे हमें छोड़ देते हैं ,,? वे भी तो वही कहते हैं ,,,जो हम कहते हैं ! "
" इसका मतलब तो आप लोगों ने बारी बारी से सफाई की है ,,,! "
वे हंसने लगे ! बोले _ " आप लिख रहे हो और यथार्थ लिखना चाहते हो तो जो मैं बता रहा हूँ वही लिखो ,,, बाकी तो पढ़ने वाले समझेंगे ! "
तभी उनके दोनों कुत्ते , अपना भोज्य पदार्थ छोड़ कर सीधे मुझ पर ही भोंकने लगे ! मैं घबरा कर पीछे हट गया ! वे उन्हें पुचकार कर " लाड " भरे सम्बोधन से बुलाने लगे !
मैंने हाथ जोड़े और आगे बढ़ लिया !

आगे थोड़ा सुनसान पड़ा ,,, तो जल्दी जल्दी पैर उठाने लगा ,,,यह इलाका थोड़ा बदनाम था !
तभी ना जाने कहाँ से टी तहमद पहने , बड़ी बड़ी मूंछे रखाये , मुंह पर रुमाल बांधे एक आदमी सामने आ गया ! बोला--" बाबूजी जहां हो वहीं रुक जाओ ,,!"
मैं रुक गया तो वह बोला ---" जो भी पहने हो उतार दो फ़ौरन ,,आवाज़ मत करना समझे ,,! "
मेरी घिघ्घी बांध गयीं ! लेकिन मेरे पास तो कुछ था ही नहीं ! सोना चांदी पहनने का शौक था नहीं , घड़ी बांधता नहीं था , मोबाइल में टाइम देख कर काम चला लेता था , जो आज घर पर ही धोखे से छूट गया था ! हाँ बटुआ ,,जरूर जेब में था !
मैंने कहा --" मेरे पास कुछ नहीं है भाई ,,चाहो तो तलाशी ले लो ! "
उसने तलाशी ली ,,,बटुआ निकाला ! लेकिन उसमें एक भी नॉट नहीं था ,,,खाली पड़ा था !
बोला --" फालतू टीम खराब कराया ,,,बोनी भी नहीं हो रही है ! कैसे फटीचर हो ,,?? क्या करते हो "
"
मैंने कहा ,,," भैया ,,!! लिखने का फितूर है सफाई पर लिखने का मूड था ,,तो यथार्थ लिखने के लिए सुबह सुबह ही निकल पड़ा ,,!
" तो क्या दिखा सफाई पर तुम्हे अब तक ,,?'
" आप जैसे ही लोग ही दिखे ,,! और कुछ तो नहीं दिखा ! "
" ठीक कहते हो बाबू ,,! अब हमारे बारे में कुछ ना लिखना वरना हम भी " साफ़ " कर देते हैं ,,,आदमी को भी ,,समझे ,,? "
" कैसे ,,"-- मैंने नादानी में यथार्थ जानने के लिए पूछ लिया !
वह मुस्कराया ,,,उसने एक रामपुरी चाक़ू निकाल लिया ,,और मेरे मुंह के पास लहराते हुए कहा ,,," ऐसे "
मैंने डर के मारे घरघराती आवाज़ में कहा ,,," बिलकुल नहीं लिखूंगा भाई ! ,,, मैं तो फेसबुकिया लेखक हूँ ,, ये तो दोस्तों की बेवकूफी में आकर यथार्थ ढूंढने आ गया ,, मुझे कौन कोई पी एच डी,, लेनी है ! "
वह हंसा ---" पी एच डी ले कर भी क्या करते बाबू ,,? मैंने ली है ,,,तो कौन सी नौकरी मिल गयी ,,? आखिर करना तो यही काम पड़ रहा है ! "
मैंने हाथ जोड़े और वापिस लौट लिया !
घर आकर पत्नी को बताया तो वह हँसते हुए बोली __ " मुझे धन्यवाद दो ,,,! मैंने तुम्हारा बटुआ रात में ही साफ़ कर दिया था ,,एक भी पैसा नहीं छोड़ा था ,,,वरना आज कुछ ना कुछ नुक्सान तो तुम्हें होता ही ! "
मैं सफाई के यथार्थ को अब पूरी तरह जान चुका था !
--- सभाजीत

बुधवार, 29 अगस्त 2018

  कल सड़क पर एक चोर उचक्का मिला !

    चोर उचक्का इसलिए , क्यूंकि पहले २००७, फिर २०१२ में वह इन्ही आरोपों में जेल काट आया था !  अदालत ने खुद   अपनी धारदार कलम से उसे सज़ा सुनाई थी , और वह अपने कृत्य के लिए दोष सिद्ध किया जा चुका था !
 उससे हाल चाल पूछा तो उलटे वह मुझी से पूछने लगा _

   कहो साहब ,,? ,,, कुछ घर में " माल-वाल "   जोड़ा की नहीं ,,??
   " तुम्हें क्यों बताऊँ ,,? " - मैंने सशंकित हो कर इधर उधर देखते हुए कहा !
     वह हंसा   फिर बोला --" तुम्हारा " डाटा " है मेरे पास ,,!   तुम्हारी पेंशन , तुमने क्या खरीदा , तुम कहाँ गए , तुम्हारे घर में कौन से ताले लगे हैं ,,तुम रात में कितने बजे तक जागते हो , ,,,सब मेरी जानकारी में  रहता  है ,,समझे ,,?? "
   मुझे पसीना निकल आया ! मैंने डरते हुए पूछा --" तुम्हें कैसे मालुम है यह सब ,,?? मैं अगर चाहूँ तो मोहल्ले की एक खबर भी नहीं बताता कोई ,, और तुम इतना सब जान जाते हो ,,?'
    वह हंसा  फिर बोला ---" किस दुनिया में जी रहे हे दोस्त ,,? यह डिजिटल युग है ,,मेरे पास तो शहर के सभी छोटे से ले कर बड़े आदमी के सभी डाटा मौजूद हैं ,,  एक परसनल " डाटा बैंक " बना कर रखता हूँ ! "
 -- " चलो ठीक है ,,,   क्या  उठाईगिरी करना बंद कर दिया है आजकल ,,? " - मैंने पूछा !
     उसने एक सिगार निकाला और एक चीनी लाइटर से उसे जला कर मेरी और धुंआ छोड़ता हुआ बोला ---" किस ज़माने की बात कर रहे हो बाबूजी ,,?? ,,सबने प्रगति की ,,,तो मैं  क्यों   " प्रगतिशील "  ना बनता ,,?? "
   --" प्रगतिशील ? "
   -- " हाँ जो प्रगति की चाह में प्रयत्नशील रहे ,,वही तो हुआ --" प्रगति शील " ,,तो मैं भी हुआ प्रगति शील ,,! "
   - " चलो ठीक ,,,लेकिन तुमने इस बीच क्या प्रगति की भाई ,,? "
  - " तुम्हें तो मालुम ही था ,, मैं कोई अनपढ़ उठाईगीर तो था नहीं ,, " हिस्ट्री " में " एमए " था ,, तभी सोच लिया की यह उठाईगिरी अब सभ्य ढंग से करूँ ,, तो मैंने एक संस्था बनाई ,,," अखिल भारतीय उठाईगीर समूह " ,,जिसमें मेने  देश के सभी  उठाईगीरों ' को जोड़ा !  मैंने बड़े लोगों से कहा की इससे पहले , तुम्हारा पूरा माल उड़वा दूँ ,,,तुम खुद हमें एक मुश्त बड़ा चन्दा देना शुरू कर दो ,,फायदे में रहोगे ! "
  - " अरे ,,!!    तुम्हारी  संस्था रजिस्टर कैसे हो गयी ,,,? उठाईगिरी तो आपराधिक शब्द है ,,? "
     उसने सिगार का जोर दस कश लिया ,,और इस बार धुंए का एक गुबार मेरे मुंह पर उंडेल दिया ,,फिर थोड़ा तल्खी से बोला --"  " अपराध क्या है ,,,क्या तुम जानते हो ,,?? ---अपराध वह  होता है  जो अदालत मान ले , पुलिसिया भाषा में लिखा गया शब्द ,,,अपराध नहीं होता समझे  चश्मुद्दीन ,,? ,समझे ,  जब तक अदालत ना कह दे की अपराध हुआ है तब तक इस देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी है और मानव अधिकार की सुरक्षा की छतरी उसके सर पर तनी मानो  ! ,,,
  ---" ठीक है ठीक है ,," ,,मैं घबरा गया की यह नाराज़ ना हो जाए ,,वरना मेरा घर साफ़ हुआ समझूँ !
     समझ गया की मैं घबरा गया हूँ  तो मुस्करा कर मेरी खिल्ली उड़ती हुए बोला --" डरो मत ,,,अब मैं छोटे मोटे शिकार नहीं करता ,, अब मैं वो पुराना  व्यक्ति नहीं हूँ ! "
        '--" धीरे धीरे मैंने एक एनजीओ  बना ली ! "-- वह आगे बोला --" जानकारी के अधिकार ' के तहत मैंने सरकार से   जानकारियां लीं ,,,और फिर उसी के विरुद्ध तीखे लेख लिखने लगा !  सरकार मुझसे डरने लगी  तो मैं " एक्टिविस्ट " कहलाने लगा !  आजकल कविता में छंद  सोरठां  तो लिखना नहीं पड़ता , तुकबंदी के भी जरुरत नहीं ,,,तो मैं  वर्ग वाद , गरीबी अमीरे को ले कर कवितायें रचना शुरू कर दिया ,,,और आज मैं एक चर्चित   कवि हूँ !  नकल करके मैंने हिस्ट्री में एमए किया था ,,, तो खुद को " इतिहासकार " सिद्ध कर दिया !   इस देश का कोई लिखित इतिहास तो है नहीं , तो मैंने अपनी दृष्टि से बहुत सी जगहों और घटनाओं का इतिहास लिख मारा ,,तो  मुझे ,, पी एच डी  मिल गयी ! "
    --- मैं अपलक उसे ताकता रह गया !
       ---- " मुझे माफ़ करना यार ,,! ,,मैंने तुम्हारे पुराने धंधे के बारे में पूछ लिया था ,,,मुझ से गलती हो गयी ! " -- मैं करीब करीब घिघयाते हुए बोला !
     --- अरे तुम अगर कहोगे भी तो क्या आज लोग तुम्हारी बात सुनेंगे ,,? ,,,अब में राजनीति में कूद गया हूँ ,,, मैं इस देश में अब समाजवाद लाना चाहता हूँ ,,,! और इसलिए  आजकल जगह जगह मेरे भाषण होते हैं ,,,भारी जनता जुड़ती है ,,,!  कई पार्टियां मेरे ऊपर डोरे डाल  रही है ,,, की मैं उन्हें ज्वाइन कर लूँ ,,,मगर मैं  उन्हें घास नहीं  डाल  रहा हूँ ! "  ,
  "  क्यों सर ,,! " --मैंने उसका सम्बोधन आदर में बदलते हुए पूछा !
     --" इसलिए की पहले वे मुझे टिकट कन्फर्म करें ,,, और मंत्री बनाने का वायदा करें ,,,तभी मैं उन्हें ज्वाइन करूंगा ! "
       --- वह,,,! वह,,,!! " ,,, अब मेरे पास तारीफ़ के शब्द भी नहीं बचे थे !
       --- अरे क्या वह,,,वह ,,?? ,,,अभी तो हमारी मंजिल बहुत दूर है ,,, !  अभी तो हमें बहुत कुछ करना है ,,! "
       --- " जब इतना हुआ तो आगे भी होगा ,,,गाते रहिये ,,," हम होंगे कामयाब ,,,हम होंगे कामयाब ,,एक दिन ,," --- मैंने हँसते हुए कहा !
            उन्होंने मुझे  घूर  कर देखा ,,,,तभी एक लम्बी कार ,, आकर उनके पास रुकी ,,ड्रायवर ने उतरकर उन्हें सेल्यूट किया !  मैंने आश्चर्य से पूछा --" आप आज पैदल कैसे चल रहे थे ,,,बिना कार के ,,? "
             वे हांसे फिर बोले --" कभी कभी फिर से साधारण आदमी की तरह जीने की तमन्ना होती है ,,,तो कार पीछे छोड़ कर पैदल चलने लगता हूँ , देखना चाहता हूँ ,,की जहां से कभी मैंने माल पार किया था ,,,उन लोगों ने भी कितनी तरक्की की है ,,! ,!   दो फायदे हैं ,,,लोग और आप जैसे पत्रकार , मुझे सरल व्यक्ति मान लेते हैं ,,,और मेरी तमन्ना एक आम आदमी बन कर घूमने की पूरी  हो जाती है ! "

   मैंने हाथ जोड़े ,!,,
     वे एकबार कार के अंदर से अपनी मुंडी उचका कर बोले --

     " इसे छाप ना देना ,,वरना तुम्हें जेल करवा दूंगा ,,,' मानहानि ' के आरोप में ,,समझे ,,,,,??? "

    इस बार फिर मेरे मुंह पर बहुत बड़ा धुंए का गुबार आया !,,,लेकिन यह कार का था ,,,सिगार का नहीं ,,!

   इसकी सरकार बन जाएगी तब क्या होगा ,,??

    यह सोचते सोचते मैं आगे बढ़ गया !

--- सभाजीत


गुरुवार, 23 अगस्त 2018








" मनीषा ,,,,,,," 


     बहुत दिनों तक ,   यूनियन लीडर होने  की विद्रोही छवि के कारण , मेरा विभाग , ,मुझे   तहसील स्तर की   जगहों पर पोस्ट करता रहा    ! कभी कभी तो शुद्ध डकैत क्षेत्रों में  सहायक यंत्री  के ,    उपसंभागीय पद पर मुझे  तहसील क्षेत्र के सघन वनो के अंदर ,  विद्युतीकरण का कार्य देखना पड़ा ! जब बच्चे बड़े होने लगे , तो स्थायित्व  की चिंता सताने लगी ! ईश्वर का  सहारा था तो   ईश्वर  ने साथ दिया , और स्वयमेव बिना किसी की शिफारिश के , कमिश्नरी स्तर  के एक  बड़े  शहर में पोस्टिंग  मिल गयी !

   एक शुभाकांक्षी , वरिष्ठ साथी ने कहा की अब , प्रशाशन से लड़ाई बंद करो , और यहां जम कर रहो , ताकि बच्चे स्थिर हो कर अपनी पढ़ाई पूरी  कर सकें ,,,,, तो बात मान ली !

   यह राजनीति ग्रसित शहर था , किन्तु ब्राम्हणो का वर्चस्व होने के कारण , मुझे स्वयमेव ही सुरक्षा की छतरी , ब्राम्हण होने के कारण मिल गयी , और धीरे धीरे मैं भी उस शहर में ' अंगद का पैर  " बन गया ! फ़ायदा यह हुआ की मेरे बच्चे स्थिर हो कर पढ़े , और उनकी पढ़ाई इस शहर में ही पूर्ण हुई !  इस शहर में रहते हुए कई अनुभूतियों का पिटारा मेरी यादों में है , जिसका ,,जिक्र  आगे  फिर कभी   करूंगा !
       कई वर्ष पूर्ण होने पर बदलाव ने दस्तक दी , और उसी के साथ , ब्राम्हण वर्चस्व का गणित बदल गया !  ,,,लेकिन बदलाव होते ही , जो लोग शहर के देवता की तरह पुजते  थे , वही अब दानव मान लिए गए ! शिकायतें यह हुईं  की " ब्राम्हणो " ने मिल कर इस क्षेत्र में बड़ी मनमानी की है   , और जो ब्राम्हण यहां पदस्थ हैं  , अगर उन्हें नहीं हटाया गया , तो  क्षेत्र गर्त में  डूब  जाएगा ! दुर्भाग्य से मैं भी ब्राम्हण , था और बहुत समय से  , वहां राज कर रहा  था तो मुझे पहली लिस्ट में ही चिन्हित कर लिया गया  ,,, और तुरंत मेरा स्थानांतरण , प्रदेश की उत्तरी सीमा से सीधी दक्षिणी छोर पर बने एक आदिवासी जिले ,  में कर दिया गया !!

  नौकरी में , जातिवाद , इतना ज्यादा प्रभाव करेगा , यह मैंने सोचा ना था ! लेकिन मन  ने कहा ,,,यार ,,!!  इतने दिनों तक ब्राम्हण होने का सुख उठाये हो , तो अब विभाग में ब्राम्हण होने का दुःख भी  झेलो ! ईश्वर वादी होने के कारण , मन ने यह भी कहा ,,,," जो होता है भले के लिए होता है ,,,यह जान लो " ,,तो चुपचाप छह चकों के ट्रक में , चार बच्चों के कारण ,पिछले ३५ वर्षों की जोड़ी गृहस्थी , ठूंस ठूंस कर ,  भर कर,   वहां आदिवासी  जिले में  चला गया जहां आने जाने का साधन सिर्फ सड़क मार्ग था !  उबड़ खाबड़ मार्ग पर  सामान तो टूटा ही , मन भी , एक शहर में बने साहित्यिक मित्रों   को छोड़ने के दुःख के कारण  दुखी हो  गया !

    माँ  नर्मदा के किनारे बसे  इस शांत शहर को देख कर  लगा की सच में जो होता है भले के लिए ही होता है !  विभागीय कालोनी में क्वार्टर अलॉट हो गया , और बच्चे भी पढ़ाई पूरी  कर लेने के बाद , अपने अपने लक्ष्य पूरा करने अन्य विभिन्न शहरों में बिखर गए !  सिर्फ सबसे छोटी बेटी  अपनी शेष पढ़ाई के लिए मेरे साथ थी ! ,, यह क्षेत्र पूरी  तरह आदिवासी क्षेत्र था , जिन्हे  विकसित करने के लिए , सरकार कई वर्षों से भागीरथी प्रयास  कर रही थी ! जिला छोटा था ,और मुझे अब शान्ति चाहिए थी ,,,,तो ,, मुझे ईश्वर कृपा से मेरा मनचाहा काम , जिले के  आफिस के अधिकारी के रूप में मिल गया ! आफिस का काम , और बिलिंग , तथा , कम्प्यूटर सेक्शन के प्रभारी के रूप में , मुझे नयी नयी योजना बनाने  का काम भी सौंप दिया गया !

  जल्दी ही वहां भी बदलाव हुआ  और हमारे एक उच्च अधिकारी ,' शिवांग '   साहब की पोस्टिंग हुई ! उनकी पोस्टिंग के साथ  ही  ,  सभी दफ्तरों में , बाबुओं में कानाफूसी होने लगी , और ' शिवांग " का अर्थ जानने की जिज्ञासा  की सब के मन ,में हिलोरें उठाने  लगीं !
      तब तक कुछ लोग जान चुके थे की मेरी साहित्य में रूचि है , तो वे मेरे पास आकर , फुसफुसा कर पूछने लगे ,,," सर ,,,ये  "शिवांग " किस  जाति  में आते हैं ,,,? , अभी तक तो हमने ऐसा कोई सरनेम नहीं सुना  है ,,क्या आप जानते हैं ,,ये कौन हैं ,,,कहाँ से हैं ,,?? "  !
     लेकिन यह सरनेम तो मैंने भी नहीं सुना  था और दुर्भाग्य से मैं उन्हें पहले से जानता भी नहीं था ! मुझे लगा , की बाबू लोग , आदतन , नए अधिकारी के बारे में जान कर , अपनी गोटी बैठाने के लिए मुझसे इंक्वायरी कर रहे हैं !  तो मैंने कहा --" यह नाम तो मैं भी नहीं जानता , और जानने से मुझे क्या फर्क पडेगा ,,?? जब आ जाएँ तभी जान लेना ! "
       उस आदिवासी बाहुल्य जिले में , मेरे आफिस में , जो कुछ  सीनियर बाबू थे , वे सवर्ण  भी थे ! वे लोग किंचित मुस्करा कर बोले ,,," सर हम जानते हैं ,,,यह सरनेम '   एस सी / एस  टी  में होता है ,,,और यह साहब , इस कोटे से ही जल्दी जल्दी प्रमोशन पा कर इस पोस्ट पर आये है !  यह एस सी हैं ,,,! "

    मैं समझ गया ,,,  एस सी मायने --" दलित " ,,!!
   ,,,  मुझे लगा की सरकारी हर विभाग में , अभी भी व्यक्ति अपनी तकनीकी , और अनुभव की  योग्यता से  ज्यादा ,  जात  पांत से ही जाना जा रहा है ! पिछले शहर में भी ब्राम्हण होने की योग्यता ने मुझे वहां टिक कर रहने का अवसर दिया था ,,,यहां भी बहुत से लोग ब्राम्हण होने के कारण  मुझे मान्यता दे रहे हैं , जबकि एक उच्च पद पर आने वाले अधिकारी की पहली जांच वे उसकी जाति   आधार पर ही करने को आतुर हैं !
 भले ही विभिन्न सरकारें , सामाजिक न्याय और सामान अधिकार के नाम पर , पानी की तरह पैसा बहा कर , सामाजिक समरसता की ककहरे बांच रही थी ,,,लेकिन विडम्बना ही थी की अभी धरातल पर यह समभाव नहीं उतारा था !
   जल्दी ही नए अधिकारी आ गए ! कुछ ही मीटिंगों में हमने और बाबू स्टाफ ने यह जान लिया की वे कार्य में चतुर , अनुभवी , और दृढ निश्चय के साथ फैसले लेने वाले व्यक्ति हैं ! उन्हें बाबुओं की बैसाखी पर चलने की आदत नहीं थी , और वे विभाग में भी एक  अच्छे  ,  विशिष्ट  , अधिकारी के रूप में अपनी साख रखते थे  ! उन्होंने अपनी अनुभवी पारखी निगाह से जल्द्दी ही आलसी , कामचोर , बहाने बाज , बाबुओं , और मेहनती , लगनशील बाबुओं को अलग अलग पहचान लिया , और छटनी करके , महत्वपूर्ण कार्य , लगनशील लोगों को , तथा , अनुपयोगी कार्य बहानेबाज बाबुओं को बाँट दिए !
     फलस्वरूप , कुछ लोग उनकी तारीफों के  पुल  बांधने लगे , और कुछ उनकी जाति  पर तरस खाकर ,उन्हें कोसने लगे !

 ,,,,दफ्तर का काम तो सुचारु रूप से चलने लगा , किन्तु घर अभी अव्यवस्थित ही था ! एक कामवाली की तलाश जारी थी ,,,लेकिन सही कामवाली नहीं मिल रही थी ! अचानक एक दिन , एक लड़की हमारे घर के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी ! वह  युवा थी , और बहुत सलीके से वेश भूषा बनाये  हुई थी ! पूछा ,,, तो बोली--"  मैं काम करना चाहती हूँ ,,, जो सही लगे वह दे दीजियेगा ,,,मुझे काम की जरुरत है,,"  !
     पत्नी ने पूछा ,,, " किस   जाति  से हो बाई ,,?? ",,,
    तो वह सकुचाते हुए बोली ,,,' अहीर  हैं ' ! नाम "    मनीषा  " है  "  ! ,
     ,,  पत्नी आश्वश्त हो गयी ,,,,,,अहीर  मायने ,गाय चराने वाला  ,,!
       तो अहीर  से तो काम लिया  सकता है  क्यूंकि पत्नी नहीं चाहती थी की वह किसी छोटी  दलित जाति  से काम करवाए ,,,! उसे लगता था की ,,,चौके में जा कर , बर्तन समेटने में भी अच्छी  जाति  की ही कामवाली प्रवेश करे ! इसीलिये वह बहुत दिनों से ऐसी ही कामवाली के इंतज़ार में थी !
----- लिहाजा उस लड़की को तुरंत काम पर लगा लिया गया ! वह बहुत सुघढ़ ढंग से काम करने लगी ,,,और बिना किसी शिकायत के समय पर घर आ जाती !
      धीरे धीरे ,, मेरी पत्नी का विश्वाश बढ़ता गया ,,और वह लड़की भी अपने मन से कई दायित्व आगे बढ़ कर सम्हालने लगी ! मेरी सबसे छोटी बेटी , मेरे साथ ही रहती थी ! उसने वहीं कम्प्यूटर कोर्स ज्वाइन कर लिया था और बीएससी की डिग्री की पढ़ाई करने लगी ! जल्दी ही मेरी बेटी का लगाव भी उस लड़की से हो गया , और वह उसके घर की बातों के बारे में पूछने लगी ! लड़की ने कहा की वह सिर्फ पांचवी तक ही पढ़ पाई थी , तभी उसके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और उसकी  माँ  को छोड़ दिया ! मजबूरी की स्थिति में वह गावं छोड़ कर माँ  के साथ  इस शहर में चली आयी थी  ! माँ  अक्सर बीमार रहने लगी तो उसने काम ढूंढा  , और अब धीरे धीरे उसे काम मिल गया है इसलिए अब उसके  घर की  जीविका चलने लगी है !
  मेरी बेटी को उससे सहानुभूति हो गयी !  उसने  उसके लिए छठवीं  कक्षा की किताबें  खरीद , दीं   और  उसे  एक घंटा घर में ही पढ़ाने लगी ! !

    लड़की बहुत प्रसन्नता से समय देते हुए , मनोयोग से पढ़ने लगी ! इधर , मेरी पत्नी भी उससे खुश हो कर उससे किचिन में चाय बनवाने लगी , और धीरे धीरे , वह  किचिन में उसके साथ  रोटियां सेकने की मदद भी करने लगी !  छोटे मोटे  ,, नास्ते ,,,पकौड़ी   तलने का काम भी उसने अपने हाथ में ले लिया और सुबह आकर वह  सेंडविच , और पकौड़ी भी  सुघड़ता से बना लेती ! हमने धीरे धीरे उसे घर का मेंबर ही मान लिया और वह  हमारे घर में एक सदस्य के रूप में रम गयी !

   घर व्यवस्थित होने पर , घर में , साथी इंजीनियरों का , और अधीनस्थ बाबुओं का भी आनाजाना शुरू हो गया ! कभी कभी छोटे पद पर कार्य रत चौकीदार , और चपरासी पद के लोग भी आ जाते ,,तो वे चाय पीने के बाद   हमारे घर में ,काम करने वाली  लड़की से अलग से पानी मांगते  , और कप खुद धो कर  वापिस रख देते ! मेरे मना करने पर वे जीभ निकाल कर कहते , --" वर्षों से चाकरी और सेवा की है , आप ब्राम्हण हैं !   , हम आपके घर झूठा  कप छोड़ कर कैसे जा सकते हैं" ?,,,
 मेरी पत्नी मुझे टोक देती थी की ,,,"  जो रिवाज है , उसे चलने दो , ,,वे मन से करते हैं तो तुम्हे क्या पडी है जो तुम अपनी अलग मुर्गे की डेढ़  टांग लगाओ " ,!

  लेकिन  एक दिन,,,एक विचित्र बात हुई ! हमारे आफिस के बड़े बाबू ,,,,, जिनसे हमारी थोड़ी  मित्रता  हो गयी थी , अपने दो भाइयों के साथ , मुझसे मिलने मेरे घर आये ! बड़े बाबू एक कुलीन ब्राम्हण थे , और उनका बड़ा आदर  शहर के  समाज , और शहर में , पूज्य ब्राम्हणो के रूप में होता था ! वे नगर के  सर्व  ब्राम्हण समाज के अध्यक्ष भी थे ! वे मुझे आग्रह करके एक बार सर्व समाज ब्राम्हण की बैठक में भी  ले गए थे ,, जहां मेरा भी बहुत आदर किया गया ! एक तो मैं एक  बड़ा विद्युत् अधिकारी था , , और वह भी ब्राम्हण ,,,,, तो ब्राम्हण  समाज ने मुझे खासी इज्जत दी !
   बड़े बाबू अक्सर आ जाया करते थे और मेरी पत्नी उनके लिए चाय नास्ते का इंतजाम कर दिया करती थीं !       वे ,पहले भी  कई बार आ कर हमारे  घरमें चाय नास्ता कर गए थे !
 उस दिन जब वे अपने भाइयों के साथ आ कर बैठे , और विभिन्न बातों पर चर्चाएं होने लगी , तभी  मनीषा , मेरी पत्नी के निर्देश पर , एक प्लेट में पकौड़ी और तीन चाय ले कर बैठक में  आयी ! उसे देख कर , बड़े बाबू के भाइयों ने कौतुहल से पूछा --" यह  आपकी  बिटिया है क्या ,,?? "
  मेने बताया  _  "  नहीं यह कामवाली है , इसके हाथ की बनी  चाय पकौड़ियाँ तो आप पहले भी कई बार खा चुके हैं ,,बड़ी स्वादिष्ट बनाती है ! "
 बड़े बाबू के भाइयों ने उससे पूछा  --" कहाँ की हो बिटिया ,,?  इसी शहर की ?? "   तो मनीषा चुप हो गयी ! मैंने कहा --" यह निकट के किसी गावं की है ,, वक्त की मार के कारण ,   अपनी  माँ  के साथ यहाँ शहर में आ कर रह रही है ,,,बहुत अच्छा काम करती है ! "
 इस बार बड़े बाबू के तिलकधारी , और बड़ी सी पाण्डित्याइ  चोटी  रखे , एक  भाई ने पूछा --" बताया नहीं    बिटिया किस गावं की हो ,,?
 "  मनीषा ने अटक अटक कर बताया ---" परसवाड़ा  की " ,,!
" ----" परसवाड़ा की ,,?? " ,,,अरे वह तो हमारा ही गावं है ,,,तुम किसकी बेटी हो ,,?? "  इस बार बड़े बाबू ने    खुद भौंहे सिकोड़ते हुए  पूछा  !
  मनीषा के मुँह पर हवाइयां उड़ने लगी , वह नर्वस हो गयी !
बड़े बाबू के भाई ने  पूछा ,," अपने पिता  का नाम बताओ ,,"!
 मनीषा मेरी और ताकने लगी ! मुझे साफ़ दिखाई देने लगा की वह घबरा गयी है !
 मैंने कहा --"  डरती  क्यों हो ,,अपने पिता का नाम बता दो ना ,," !
 मनीषा ने धीमे स्वर में बताया ---" रामदीन " ,,!
   " रामदीन ,,,?? " वह तो अहिरवार था ,,  ,,,हमारे घर में हरवाहे का  काम देखता था ,,,क्या तुम उसकी बेटी हो ,," ?
   मैंने विवाद किया ,," नहीं ,,,यह तो अहीर है ,,, हो सकता है वह कोई और होगा "
   वे बोले -- " तुम्हारी माँ  का नाम रामकली ही है ना ,,?? "
  मनीषा चुपचाप नीचे देखने लगी !
  बड़े बाबू के भाई बोले ---" इसका पिता ने दूसरी औरत  रख ली थी  ! ये लोग अहीर नहीं अहिरवार हैं ,,, ,,,,,,बाद में इसकी  माँ  घर छोड़ कर चली आयी थी ,,और रामदीन सट्टेबाज़ी में जेल चला गया था ! - मैं इसे   अच्छी तरह से जानता हूँ ! "
   मुझे भी थोड़ा धक्का सा लगा !
 मैंने मनीषा से कहा ,," तुम इन्हे अपने बारे में  सही सही क्यों नहीं बताती कि ,,तुम कौन  हो "
  मनीषा बोलने में खुद को  अशक्त महसूस करने लगी !
   वह  जैसे  असहाय मृगी की तरह खुद को  चतुर शिकारियों से घिरा पा रही हो  , और उसके बोलने की शक्ति ही  जैसे समाप्त हो गयी हो , उसकी हालत ऐसे ही हो गयी ! !
   वह चुपचाप  उन लोगों को ताकती खड़ी रही !
  बड़े बाबू के भाई बोले --" इसकी माँ  अहिरन  थी  , उसने दूसरे गावं से भाग कर रामदीन के साथ शादी की थी ,,,,, लेकिन जल्दी ही दोनों में लड़ाई  हुई  , और राम कली को  उसने छोड़ दिया ! हम लोग इसकी कहानी जानते हैं ! "
   मैं चुप रह गया !
      पकौड़ियाँ और चाय ठंडी हो चुकी थीं ! बड़े बाबू उठ खड़े हुए ,,साथ में उनके तिलकधारी दोनों भाई भी !
     मैंने कहा --" अरे रुकिए चाय तो पी कर जाइये ,,"
  वे बोले---" माफ़ करें शर्माजी , अब हम कुछ नहीं खाएंगे  ! आप  निम्न जाति  के  लोगों  के हाथों की चाय    हमें पिलवाते हैं ,,और उनके ही हाथ का बना नास्ता भी खिलवा  रहे हैं   !  आप ब्राम्हण हो कर , किचन में इन छोटी जाति  के हाथ का बनाया खाना खा रहे हैं ! यह गलत बात है ! "
  वे उठ कर खड़े हो गए , और हाथ जोड़ते हुए बाहर निकल गए !
  पत्नी भी क्रोध करती हुई बाहर निकल आयी !
   वह  बोली --" मनीषा ,,! तुमने तो खुद को अहीर बताया था ,,फिरयह अहिरवार कैसे हो गयीं ,,"
   मनीषा बुझे मन से बोली ,," आंटी ,,! मेरी माँ  तो अहीर ही है ना ,,?? तो मैंने क्या गलत कहा ,,?? मानती हूँ की मेरे पिता ," अहिरवार " हैं , छोटी जाति  के ,  पर  मेरे पिता ने   तो हमें  कब से   छोड़  दिया है  ! "
   ---" वह तो  ठीक है ,,! लेकिन  जाति  तो पिता की ही मानी जाएगी ना ,,??,,, तुम्हारे जाति  छिपा लेने के कारण ,   आज हमें   उन    लोगों से बातें  सुनने  को मिल गयीं   जो हमें ,,, समाज में बहुत मान  देते हैं !  ! "
 
      मैंने बीच में पड़ते हुए कहा --" कोई बात नहीं मनीषा ,,! हमें फर्क नहीं पड़ता ,,,बहुत होगा तो बड़े बाबू हमारे घर नहीं आएंगे ,,,अब अगर नहीं आते हैं तो ना आएं ,,! "

        लेकिन  मनीषा जब वापिस ट्रे ले कर किचिन की और जाने लगी तो मेरी पत्नी  थोड़े सकुचाते हुई बोली   _ " ---" अब आज रहने दो मनीषा,,! मैं देख लुंगी ,,,तुम घर जाओ ,,,कल आना तब बात करेंगे ,,! "

        मनीषा की आँखें भर आईं ,,, बोली --" मेरी गलती माफ़ करें आंटी ,, मैंने कोई झूठ नहीं बोला , ,,मेरी  माँ  अहीर है ,,तो  मैंने खुद को अहीर कह कर काम शुरू कर दिया !   अब मुझे काम से ना हटाइएगा ,,, यह घर अब मुझे अच्छा लगने लगा है,,, दीदी ,,मुझे पढ़ाती भी हैं ,,और मैं काफी पढ़ चुकी हूँ ! "

       तभी मेरी बेटी भी  कालिज से वापिस आ गयी ! उसने पूछा - क्यों रो रही है मनीषा ? "
     ,,,,   अब   हम क्या बताते ,,!
 
      मनीषा ही बोली ,, " मेरे  कारण आज अंकल को कुछ  बातें सुननी पडी !  सब गलती मेरी है ! "

              मेरी बेटी को जब पूरा प्रकरण पता चला तो वह उलटे हम पर ही बिफर गयी !
            बोली --- " जब मेरी सहेलियां आतीं हैं , तो आप   पूछती  हो वह कौन है ,,? , किस  जाति की है ,,?? ,,आप किस युग में रह रहीं है ,शायद जानती नहीं !,, अब कोई जाति  पाँति  नहीं होती ",,! ,,
  ,,,,उसने मनीषा से मुखातिब हो कर कहा ,," मनीषा ,,!!  तुम कहीं नहीं जाओगी यहीं काम करोगी ,,"


          लेकिन मनीषा ने जैसे कुछ  सुना  ही नहीं !  शायद उसे हृदय में कोई गहरी ठेस लगी थी !  वह  चुपचाप , अपनी आँखें पोंछती हुई बाहर चली गयी !

  दूसरे दिन दफ्तर में जब अपने चैंबर में बैठा ,,,तो मुझे लगा कुछ मौहोल अलग सा है ! बड़े बाबू ने बात चारों और फैला दी थी !
  एक नजदीकी मातहत ने पूछा --" अगर आपको खाना  बनाने वाली कोई बाई चाहिए तो बताइयेगा ,,हमारे यहां एक बूढ़ी ब्राम्हणी है ,,, जो कई घर में  खाना बनाती है  ,, थोड़ा चार्ज  जरूर  ज्यादा है ,,लेकिन मेरे कहने से  कम ले लेगी ! " !
 मैंने उसे धन्यवाद कहा और कहा की,,,फिलहाल मुझे कोई जरुरत नहीं !
  उस शाम घर लौटा तो , पत्नी बोली   कि ,,,,मोहल्ले की कई औरतें पूछ रही थीं ,,मनीषा के बारे में ,,!  वे कह रहीं थी कामवाम तो करवा लीजिये , लेकिन किचन का काम ये लोग करें यह ठीक नहीं ! आप को अगर जरुरत है तो किचन के लिए कोई औरबड़ी  जाति  की औरत रख लीजिये !  लोग अच्छा नहीं मानते ,,,छोटी जाति  के हाथों का ,बना   खाना ,,,,,, खाना ! "
मैंने पूछा --"  मनीषा  आयी थी फिर ,,?? "
 पत्नी ने बताया --" नहीं ,,,! वह भी नहीं आयी ,,! कल मैंने चौके में जाने से रोक दिया था तो शायद वह भी बुरा मान गयी !"
--" चलो ,,! अपने काम अब तुम खुद करो ,,इसी में सार है ,,! " ,,मैंने लम्बी सांस छोड़ी !

समय चक्र आगे बढ़ चला ! जल्दी ही बर्तन आदि के लिए नयी कामवाली  आगयी ,,और चौका पूरी तरह पत्नी के द्वारा संचालित होने लगा !  जिस तरह मनीषा के आने की बात फ़ैली थी , उसी तरह उसके काम छोड़ने की बात फ़ैल गयी और वातावरण जैसे पूर्वतः  शांत हो गया !

    कुछ दिन बाद ही बड़े   बाबू  के घर में , उनके पुत्र के जन्म दिन की पार्टी का आयोजन हुआ !  बड़े बाबू को लोगों ने कहा की इस समारोह में,,,बड़े साहब " शिवांग " सर को भी बुलाया जाए ! बड़े बाबू  भी शायद मन से ऐसा ही चाहते थे तो मुझ से बोले --" सर ,,! आप चलिए ,,आपके साथ जा कर में शिवांग साहब को पार्टी में आने का आमंत्रण देना चाहता हूँ !  आप रहेंगे तो वे आ जाएंगे ! " "
  मैंने बात मान ली और हम लोग दो चार स्टाफ के साथ , बड़े बाबू , शिवांग साहब के घर पहुंचे !  वे अंदर थे !
   , तभी , हमारे ही आफिस का एक चपरासी , जो निम्न   जाति  का था , कुछ नास्ता और पानी के गिलास टेबिल पर रख गया !  बड़े बाबू चुपचाप बड़े साहब के बाहर आने की बाट  ,जोहने लगे  !
 बड़े साहब ने बाहर आ कर   देखा और बोले ,---," अरे ,,!  नास्ता तो ज्यूँ का  त्यूं रखा है ,,,पहले नास्ता लीजिये ,,,! "
 मैंने बड़े बाबू की और देखा ,,,लेकिन उसके पहले ही वह हाथ बढ़ा कर , बड़े  साहब के घर की किचन की  बनी पकौड़ी हाथ में ले कर , मुंह में रख चुके थे ! साथ आये  सभी  लोग  सर झुका कर नास्ता करने में लग गए ! सबने नास्ता ले कर ,,इत्मीनान से पानी पीया !  तभी बड़े साहब ने मुझ से पूछा--" आज कैसे इतने लोगों को ले कर आना हुआ शर्माजी ,,? "
 बड़े बाबू ने हाथ जोड़ते हुए कहा --" सर आज हमारे घर में मेरे पुत्र की जन्म दिन पार्टी है ,,आप सपरिवार आएं ,,यही निवेदन ले कर हम आये हैं ! "
  बड़े साहब ने थोड़ी उपेक्षा के साथ उन्हें देखा और फिर मुझे देखते हुए बोले --" आज तो बाहर का टूर है ,, मुश्किल है ,,शायद लौट ना पाऊं ,,"
 बड़े बाबू  आग्रह के साथ जोर डालते हुए बोले ,," नहीं सर !,,आप को तो आना ही पडेगा ,,आपके बिना पार्टी सूनी हो जाएगी ,,! ,,,अगर आप देर से आएंगे तो भी हम इंतज़ार कर लेंगे ,, लेकिन आप आएं जरूर ,,! "
   " देखता हूँ। .. पूरी  कोशिश करूंगा ,,,! "---- कह कर बड़े साहब उठ खड़े हुए !
   हम लोग बाहर निकल आये !  मैंने बड़े बाबू की और थोड़ी रुक्षता के साथ निहारा ,,,वे शायद समझ गए ,,लेकिन बोले कुछ नहीं !
 शाम पार्टी हुई तो दफ्तरों के सारा स्टाफ बड़े बाबू के घर इकट्ठा हुआ !  बड़े बाबू के सभी रिश्तेदारों के साथ , उनके दोनों भाई भी कार्यक्रम में डोलते नज़र आये !
 देर रात तक बड़े साहब भी आ गए !  बड़े बाबू ने अपने हाथों से प्लेट सजा कर उन्हें दी , और जैसे हर कौर को ताकते हुए धन्य होते रहे !  उनके पंडित भाई दौड़ कर पानी के गिलास ले आये , और आगे बढ़ कर उन्हें पानी प्रस्तुत किया ! पानी पी कर वापिस गिलास करते हुए , बड़े साहब के हाथों से वह गिलास भी बड़े बाबू के भाइयों ने बिना किसी हिचक के थामा !
   मुझे बड़ी वितृष्णा हुई !  मैंने एकांत होते ही बड़े बाबू  और उनके भाइयों से पूछा --" आप को मालूम  है  वे कौन हैं ,,"
   वे हंसने लगे ! बोले---"  जानते हैं  भैया के सबसे बड़े साहब हैं ,", !
  मैंने पूछा ,,और उनकी   जाति  मालूम  है ? "
   वे खिसयाते हुए बोले। ---" जानते हैं ,,,वे एस  सी  हैं ,,निम्न जाति वाले ! "
  --" फिर आपने आज उनके घर ना सिर्फ पकौड़ी खा ली , बल्कि उनके घर, उस चपरासी के हाथ का लाया पानी भी   पिया , जिसे आप वर्षों से जानते हैं की वह निम्न जाति  का है  ! ,,,,,, क्या तब आपका  'जातिबोध  '  नहीं  जागा  ,,??   जिस चपरासी के आपके घर आने पर , चाय पीने पर,  आप उसे अपने घर के  कप भी धुलवा लेते हो , उसी जाति  के अफसर के हाथ का झूठा गिलास आपने खुद आगे बढ़ कर थाम लिया ,,?? आपने तब जरुरत नहीं समझी की  वह  निम्न जाति का होने के कारण ,  गिलास धो कर वापिस करे ,,??

बड़े बाबू दबी आवाज़ में बोले --" आपत्तिकाल ,,मर्यादानास्ति " ,!
  उनके भाई भी कुटिलता से हो हो करके हंस दिए !
 
    कौन सी " आपत्ति " ,,,??   कैसी मर्यादा ,,?? ,,,,मेरे मुंह का स्वाद कसैला हो गया ! मैंने नास्ता नहीं किया !     ,,,चुपचाप वहां से बिना बताये  लौट आया !

   बहुत दिनों तक मैं ,,,मनीषा को ढूंढता रहा ,,,लेकिन वह नहीं दिखी !

   लेकिन एक दिन वह नर्मदा  घाट  पर दिख गयी ! मुझे देखते ही  उसके मुँह पर आत्मीय मुस्कान बिखर गयी ! दोनों हाथ जोड़ कर उसने नमस्ते की ,,तो मैंने पूछ लिया--

   --" कहाँ चली गयीं थी मनीषा ,,??   उस दिन गयीं तो लौट कर वापिस ही नहीं आईं ,,??
     वह गंभीर हो कर बोली --"  जब आंटी ने किचन में जाने को मना किया तो मैं उनकी मजबूरी समझ गयी  ,,,!   आप अच्छे हैं यह बात सही है , लेकिन आपके अच्छे होने से क्या होगा ,,?? दूसरे लोग आपको बुरा भला कहते , व्यवहार तोड़ देते ,,तो मुझे अच्छा नहीं लगता ! इसलिए मैं खुद जान बूझ  कर  वापिस नहीं गयी "

   मैं खामोश रह गया ! फिर रुक कर पूछा --" अभी भी कहीं काम करती हो या नहीं ,,? "
   -  " क्यों नहीं ,,," ,,वह चहक कर बोली ,," अब मैं एक क्रिश्चियन साहब के घर में काम करती हूँ ,, इरिगेशन में इंजीनियर साहब हैं ! ,,वहां कोई  दिक़्क़त  नहीं ,,पूरा किचन मैं ही सम्हालती हूँ ,,मेडम  बीमार रहती  हैं ,, वे खुश रहती हैं ! "
    मैं स्तब्ध सा देखता रह गया !  फिर पूछा --" ,,,,, कहीं वे लोग क्रिश्चियन बनने को  तो  नहीं कहते ,,? "
  मनीषा  खिलखिला कर  बोली --" मैं क्यों बनूं  क्रिश्चियन ?? ,,,मैं तो अहीर हूँ ,,, अपनी  माँ  की बेटी ,,वही रहूंगी  "  !
         वह नमस्ते कह कर चली गयी
     ,,और मैं नर्मदा की शांत बहती धारा को ताकते रह गया !  मन में उठ रही अशांत तरंगों को शांत करने की कोशिश  करते हुए मुझे लगा कि मैं नर्मदा से पूछूं --
       " किस जात की हो  मां ,,तुम ,,?? "



----सभाजीत 

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

   हिन्दू ,,,
हम सबके एक सर्वमान्य देव ,,," शिव " 

वोट के लिये निरंतर बंटते  हिन्दू समाज को एक अहम् जरुरत है , ऐसे बंधन की , जो उन्हें एक एक सूत्र में पिरो सके !  अलग अलग समुदायों के अलग अलग भगवानो ने , उन्हें पहले ही , एक दूसरे से अलग थलग कर रखा है ! हर समाज अपने अपने भगवान् की जयन्ती , चल समारोह आयोजित कर अपने ढंग से मनाता है , किन्तु वे समारोह सर्वथा , एक विलग भावना को ही जन्म देते हैं ! 
  वर्षों पूर्व , अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए , सबसे पहले , लोकमान्य  तिलक  ने ,  एक ऐसे धार्मिक बंधन की महाराष्ट्र में कल्पना की , जो सर्वमान्य हो , और आस्था से सभी महाराष्ट्र वासियों को एक सूत्र में पिरो सकें ,,! इसी भावना के तहत , गणेश उत्सव में ,  सम्पूर्ण महाराष्ट्र में , घर घर एक गणेश की मूर्ति स्थापित करने का आह्वान किया गया  , और पूरा महाराष्ट्र एक सूत्र में " गणेश मय  " हो गया ! समाज एक ईश्वर की छवि को ले कर चेतन हो गया , ! इस उत्सव को ले कर हर घर एक दूसरे से जुड़ गया , ,,,,एक आस्था , एक रूप , एक चेतना !
    आज फिर लोकमान्य तिलक की तरह , अथवा , आदि शंकराचार्य की तरह , एक आह्वान की सख्त जरुरत है , कि ,,, साकार , अथवा निराकार,  दोनों स्वरूपों में  विद्व्मान  , एक ईश्वरीय छवि को हिन्दू समाज अपने मन में धारण करे !, वह छवि  समानरुप से हर घर पूजी जाए , जिस की पूजा अर्चना में , कर्मकांड , और सनातनी  गूढ़ पद्धतियों का समावेश ना हो !और जिसकी पूजा हर व्यक्ति के लिए सहज हो ! 
   सुखद यह है की ऐसे ईश्वर की छवि हिन्दू समाज में पूर्व से ही सर्वत्र व्याप्त है ,,और वह है ,,," शिव " ,,! 
      आदि  देवों  में विष्णु के मंदिर बहुत कम  मिलेंगे , , ब्रम्हा की पूजा पूरी  तरह वर्जित है , जबकि शिव सर्वत्र व्याप्त हैं !  वे प्रकृति के देव हैं , प्राकृतिक स्थान ,," पर्वत " उनके निवास का चिन्ह है ,  वे भोग विलास से दूर , आडमबर से मुक्त हैं ! सर पर , मनुष्य का जीवन आधार  ,," जल " ,, अपने साथ लिए ,  गंगा उनकी जटाओं में विराजमान है !  अपनी कलाओं से मन मोहता , समय की  गणनाओं का प्राकृतिक माध्यम , चंद्र भी उनके माथे पर सोहता है ,,! ललाट पर , भविष्य को देखने में सक्षम , और हर पाप को भस्म करने वाला एक , तीसरा न्रेत्र  भी उपस्थित है, जो आवश्यकता अनुसार खुलता भी है ! कानो में , वे जीव जंतु , जो प्रकृति को संतुलित करने के माध्यम हैं , और जिनमे , किसी भी रोग को नष्ट करने का विष , एक दवा के रूप में विदवमान है ,,,," बिच्छु "  के आभूषण के रूप में , कुण्डल की तरह विदवमान हैं!  !  गले में वह "  हलाहल  " , स्थिर हो कर अवरुद्ध है , जो क्षण मात्र में सारी श्रष्टि को समाप्त कर सकता है ,   और जो मृत्यु का कारक है !,,, किन्तु मानो वह उनके कंठ के कारागार में सदा के लिए कैद है !  कंठ में प्रकृति के विषधारी , वे विषधर भी , हार बन कर पड़े हैं ,  जिनके विष का तोड़ मनुष्य अभी तक नहीं पैदा कर पाया है !  गले में ही , मुंडों  की वह माला है , जो सदा याद दिलाती है की जीवन नश्वर है , और अंत में वही  व्यक्ति की आधारभूत पहचान है ,  !  शरीर पर वह भस्म है , जो  पाँच तत्वों का , मृत्यु के बाद एकसार बन कर  श्मशान में धरती पर शेष रह जाती है ,  बाजुओं में प्रकृति प्रदत्त , वे फल हैं , जो बाजूबंद के रूप में , एक मुखी रुद्राक्षों के रूप में , बंधे हुए हैं ,  वे किसी को रिझाने , आकर्षित करने के लिए , कोई रंगीन तड़क भड़क वाले वस्त्र नहीं पहनते , बल्कि , मरे हुए बाघ की खाल को वस्त्र की तरह धारण करते हैं , जो दर्शाती है , की प्रकृति के पशु भी , अपनी स्वाभाविक मृत्यु के पश्चात , अपनी खाल के रूप में किसी मनुष्य के काम आ सकते हैं ! पैरों में वे ' खड़ाऊं ' पहनते हैं , जो सूखे हुए बृक्ष की , उस लकड़ी के बने हुए हैं , जो अपनी उम्र जी कर समाप्त हो चुका है !

       शिव गृहस्थ हैं , एक पत्नी धारी हैं , और उनके दो  पुत्रों  का  परिवार है !  पुत्रों में जिस ' गणेश ' को प्रथम पूज्य माना गया है , उनका स्वरूप भी प्राकृतिक है ! उनका मुख , सबसे बुद्धिमान , जीव , हाथी का है , और शेष शरीर , इस दुनिया में उपस्थित मानव का ! शिव का वाहन भी प्राकृतिक है ,," बैल " का ,,,जो शक्ति का प्रतीक है ,,और जिसे बाद में मनुष्य ने भी अपने जीवन के आधार कृषिकार्य में भी उपयोग किया है ! 

   शिव के पास जो वाद्य यंत्र है ,," डमरू " ,,,,,वह ,' नाद ' , और ' लय ' , दोनों को एक साथ  उत्पन्न करती है !  वह नृत्य की उमंग देती है , और स्वर का आनंद भी ! उनके पास जो अस्त्र है  वह " त्रिशूल " है , जो  शस्त्र  की तरह भी उपयोग में आता है , और " अस्त्र " की तरह भी ! वह रक्षात्मक भी है , और आक्रामक भी !

   शिव का स्वरूप निराकार भी है , !  प्रकृति के हर स्थान पर उपलब्ध , पत्थर के एक गोल  टुकड़े को , आप शिव स्वरूप में , आसानी से पूज सकते हैं !  पूजा में ना तो कोई कर्मकांड है , ना पद्धति , !  सर्वत्र उपलब्ध " जल " को आप उन पर उड़ेल दीजिये ,  प्राकृतिक बेल पत्र को उन पर रख दीजिये !  हो गयी पूजा ! 

   शिव का यह स्वरूप , आदिकाल से ले कर अब तक ,  हिन्दू धर्म के जनक , आर्यों और अनार्यों को एक  मतेन  स्वीकार था !  , अनार्यों  ने उन्हें उसी सम्मान के साथ पूजा , जिस सम्मान के साथ  आर्यों  ने !  शिव ने किसी भी वर्ग , जाती में कोई भेद नहीं किया ! उन्होंने प्रसन्न हो कर , सरल और सहज रूप में हर व्यक्ति की  आकांक्षा  पूर्ण की !  यहां तक की उसे भी वरदान दे दिया , जो उन्हें ही भस्म करने उनके पीछे दौड़ गया !

  तो जरुरत है , की आदिदेव " शिव " को सम्पूर्ण हिन्दू समाज आज  प्रमुख रूप से अपना पूजनीय इष्ट माने ! शिव के पास , ना भव्य मकान है , ना  भव्य गृहस्थी , ना दिखावा , ना गरीबी अमीरी का कोई भेद ! उनकी पत्नी , एक राजा की पुत्री है ,," पार्वती " ,,,,!,,,लेकिन वह शिव के साथ उसी हिमालय पर , उन्ही की जीवन पद्धति में रहती है , जिसमे शिव रहते हैं ! वे शाकाहारी हैं , प्राकृतिक फलों पर जीवन यापन करते हैं ! वे दो स्वरूपों में रह कर भी एकाकार हैं ,,," अर्धनारीश्वर " के रूप में !  वे नृत्य और संगीत पारंगत हैं , और समस्त जीवों के प्रति सहज दयालु हैं !

  हिन्दू एक जीवन पद्धति है ! आज का हिन्दू " आर्यों " और अनार्यों " की सम्मलित संतान  है !भले ही सामाजिक कारणों से हम आज कई वर्गों में  बँट  गए हों , या राजनैतिक धूर्तता  के षडयंत्र से अलग थलग किये जाने के कुचक्र में फंस गए हों , किन्तु यह सच यह है , हमारा  ईश्वर का सर्वमान्य रूप एक ही है ,,और वह है ,," शिव " !  जरुरत है कि  शिव के इस स्वरूप को हम घर घर में प्रतिस्थापित करें ,   जो मात्र एक पत्थर के गोल टुकड़े के स्वरूप में सहज ही उपलब्ध हैं , और जिन की पूजा अर्चना में किसी तरह की पद्धति , वस्तु  , या धन की जरुरत नहीं है ! शिव हमारे आदिदेव हैं ,,,जो चाहे दलित वर्ग हो या  धनाड्य , सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले सहज देव हैं ! 


,,,,,सभाजीत